भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

भाषार्थसहिता ॥ ३१

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणेगृहमागते । क्रीडन्त्योषधयःसर्वा यास्यामःपरमांगतिम् ॥ ५२ ॥

नष्टशौचेव्रतभ्रष्टे विप्रेवेदविवर्जिते । दीयमानंरुदत्यन्नं भयाद्वैर्दुष्कृतंकृतम् ॥ ५३ ॥

वेदपूर्णमुखंविप्रं सुभुक्तमपिभोजयेत् । नचमूर्खंनिराहारं षड्ररात्रमुपवासिनम् ॥ ५४ ॥

यानिह्यस्यपवित्राणि कुक्षांतिष्ठन्तिभोद्विजाः । तानितस्यप्रयोज्यानि नशरीराणिदेहिनाम् ॥ ५५ ॥

यस्यदेहेसदाश्नन्ति हव्यानिन्त्रिदिवौकसः । कव्यानिचैवपितरः किम्भूतमधिकंततः ॥ ५६ ॥

यदभुङ्क्तेवेदविद्विप्रः स्वकर्मनिरतःशुचिः । दातुःफलमसंख्यातं प्रतिजन्मतदक्षयम् ॥ ५७ ॥


विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण यदि अपने घर आवे तो उस समय सब ओषधी [ अन्न आदि ] क्रीड़ा करती [आनन्द मनाती] हैं कि हम परम गति को प्राप्त होंगी ॥ ५२ ॥ शास्त्रानुकूल शुद्धि न करके मलिन रहने सन्ध्यादि कर्म को नियम से न करने वाले तथा वेद से शून्य ब्राह्मण को दिया हुआ अन्न भय से रोता है कि इस दाता ने बुरा किया जो हम को ऐसे गुण कर्म हीन मूर्ख ब्राह्मण के उदर में पहुंचाया ॥ ५३ ॥ वेद के पठन पाठन से भरा है मुख जिस का ऐसे भोजन से तृप्त ब्राह्मण को भी जिमावे और छः दिन के उपासे भी निराहार मूर्ख ब्राह्मण को न जिमावे ॥ ५४ ॥ हे ऋषि लोगो ! जिस मनुष्य का जो पवित्र वस्तु (अन्न आदि) जिस विद्वान् के उदर में ठहरे वह वस्तु ही उसको देना चाहिये अन्यथा देह धारियों का देह किसी प्रयोजन का नहीं है ॥ ५५ ॥ जिस ब्राह्मण के देह में देवता लोग हव्य और पितर लोग कव्य सदैव खाते हैं उससे परे अन्य कौन प्राणी हो सकता है ? अर्थात् उस से उत्तम अन्य कोई नहीं है ॥ ५६ ॥ वेद का ज्ञाता और अपने धर्म कर्म में तत्पर ब्राह्मण जो खाता है दाता को उसका फल असंख्य होता और जन्म जन्म में वह अक्षय अविनाशी होता है ॥ ५७ ॥

३८ व्यासस्मृतिः ॥

हस्त्यश्वरथयानानिकेचिदिच्छन्तिपण्डिताः । अहंनेच्छामिमुनयः ! कस्यैताःसस्यसम्पदः ॥ ५८ ॥ वेदलाङ्गलकृष्टेषु द्विजश्रेष्ठेषुसत्सुच । यत्पुरापातितंबीजं तस्यैताःसस्यसम्पदः ॥ ५९ ॥ शतेषुजायतेशूरः सहस्रेषुचपण्डितः । वक्ताशतसहस्रेषु दाताभवतिवानवा ॥ ६० ॥ नरणेविजयाच्छूरोऽध्ययनान्नचपण्डितः । नवक्तावाक्पटुत्वेन नदाताचार्थदानतः ॥ ६१ ॥ इन्द्रियाणांजये शूरो धर्मंचरतिपण्डितः । हितप्रियोक्तिभिर्वक्ता दातासन्मानदानतः ॥ ६२ ॥ यद्येकपङ्क्त्यांत्रिषमन्ददाति स्नेहाद्भयाद्वायदिवार्यहेतोः ।


हाथी, घोड़ा, रथ यान पालकी आदि इन को कोई पण्डित अच्छा कहते हैं परन्तु हे मुनियो ! हम नहीं चाहते क्योंकि ये हाथी आदि किस कर्म की सम्पदा [फल] हैं ? ॥५८॥ वेद रूप हल से जुते जो सत्पात्र ब्राह्मणों के उत्तम शरीर उन में जो पूर्व जन्म में बीज बोया गया था उसी खेती की ये हाथी घोड़ा आदि संपदा [ फल ] हैं ॥५९॥ सौ १०० में एक शूरवीर, हज़ार में एक पण्डित-और लाख में एक वक्ता [जो वेदादि शास्त्र के गूढ़ विषय को ठीक २ वर्णन कर सके ] होता है और लाखों में भी दाता होना दुर्लभ है ॥ ६० ॥ रण में जीत जाने से शूर नहीं होता-वेदादि के पढ़ने मात्र से पण्डित नहीं होता-वाणी की चतुराई मात्र से लिफाफे दार बनावटी व्याख्यान देने वाला वक्ता नहीं होता और धन के देने मात्र से दाता नहीं होता ॥ ६१ ॥ किन्तु इन्द्रियों को जो जीते वह शूर, शास्त्रोक्त धर्म कर्म को जो ठीक २ करै वह पण्डित-वेदानुकूल हित का उपदेश जो प्रिय वाणी से कहे वह वक्ता-और श्रद्धा तथा सन्मान पूर्वक जो दान दे वह दाता होता है ॥ ६२ ॥ स्नेह प्रीति से, भय से, वा धन आदि के लोभ से जो एक पंक्ति में बेठे ब्राह्मणों को विषम न्यूनाधिक परोसता है वा किसी को उत्तम किसी को निकृष्ट भोज्य वस्तु देता है वह ब्रह्म हत्या का दोषी मुनियों ने कहा है यह बात

भाषार्थसहिता ॥ ३९

वेदेषुदृष्टंऋषिभिश्चगीतं तद्ब्रह्महत्यांमुनयोवदन्ति ॥६३॥
ऊषरेवापितंवीजं भिन्नभाण्डेषुगोदुहम् ।
हुतंभस्मनिहव्यंच मूर्खेदानमशाश्वतम् ॥ ६४ ॥
मृतसूतकपुष्टाङ्गो द्विजःशूद्रान्नभोजने ।
अहमेवंनजानामि कांयोनिंसगमिष्यति ॥ ६५ ॥
शूद्रान्नेनोदरस्थेन यदि कश्चिन्म्रियेतयः ।
सभवेत्सूकरोनूनं तस्यवाजायतेकुले ॥ ६६ ॥
गृध्रोद्वादशजन्मानि सप्तजन्मानिसूकरः ।
श्वाचैवसप्तजन्मानि इत्येवंमनुरब्रवीत् ॥ ६७ ॥
अमृतंब्राह्मणान्नेन दारिद्र्यंक्षत्रियस्यच ।
वैश्यान्नं नतुशूद्रत्वं शूद्रान्नान्नरकंव्रजेत् ॥ ६८ ॥
यश्चभुङ्क्तेऽथशूद्रान्नं मासमेकंनिरन्तरम् ।
इहजन्मनि शूद्रत्वं मृतःश्वाचैवजायते ॥ ६९ ॥
यस्यशूद्रापचेन्नित्यं शूद्रावागृहमेधिनी ।


वेदों में भी देखी और ऋषियों ने भी कही है ॥ ६३ ॥ ऊषर में बोया बीज, फूटे पात्र में दुहा दूध, भस्म में किया होम, और मूर्ख को दिया दान ये सब अशाश्वत नाम शीघ्र नष्ट होते हैं अर्थात् निष्फल हैं ॥६४॥ मरेके सूतक में खानेसे पुष्ट हुआ है शरीर जिस का ऐसा शूद्र का भोजन करने वाला ब्राह्मण किस नीच योनि में जायगा यह हम नहीं जानते ॥ ६५ ॥ शूद्र का अन्न पेट में रहते जो ब्राह्मण मरता है वह निश्चय से या तो शूकर योनि में जन्म लेता है अथवा जिसका अन्न खाया है उस शूद्र के ही कुल में जन्म लेता है ॥६६॥ बारह जन्म तक गीध पक्षी, सात जन्म तक शूअर और सात जन्म तक कुत्ता वह शूद्रान्न भोजी ब्राह्मण होता है ऐसा मनु जी ने कहा है ॥ ६७ ॥ ब्राह्मण के अन्न से अमृत देव योनि, क्षत्रिय के अन्न से दरिद्रता, वैश्य के अन्न से शूद्र होना और शूद्र के अन्न से नरक होता है ॥ ६८ ॥ जो ब्राह्मण मनुष्य एक महीने तक निरंतर शूद्र के अन्न को खाता है वह इसी जन्म में शूद्र हो जाता है और मर कर कुत्ता की योनि में हो जाता है ॥६९॥ जिस के यहां शूद्रा स्त्री अन्न

४० व्यासस्मृतिः॥

वर्जितःपितृदेवैस्तु रौरवंयातिसद्विजः ॥ ७० ॥
भाण्डसङ्करसङ्कीर्णा नानासंकरसंकराः ।
योनिसंकरसंकीर्णा निरयंयान्तिमानवाः ॥ ७१ ॥
पङ्क्तिभेदीवृथापाकी नित्यंब्राह्मणनिन्दकः ।
आदेशीवेदविक्रेता पञ्चैतेब्रह्मघातकाः ॥ ७२ ॥
इदंव्यासमंतन्नित्य मध्येतव्यंप्रयत्नतः ।
एतदुक्ताचारवतः पतनंनैवविद्यते ॥ ७३ ॥

इति श्रीवेदव्यासीयधर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥
समाप्तं चेदं धर्मशास्त्रम् ॥

(रसोई) को बनावे अथवा जिस की स्त्री शूद्रा हो वह ब्राह्मण पितर और देवताओं से वर्जित हुआ नरक में जाता है ॥ ७० ॥ पात्रों के संकर दोष से जो संकीर्ण हैं चाहे जिसके पात्रसे खालें वा जल पीलें अनेक नीच वर्ण संकरों से जिन का मेल है और योनिसंकर दोष से भी जो संकीर्ण हैं अर्थात् चाहे जिसे विवाहलें वा नीच औरतन को भी घरमें रखलें इतने मनुष्य नरकमें जाते हैं ॥ ७१ ॥ पंक्ति में जो भेद करे [न्यूनाधिक परोसे] वृथा पाकी जो पञ्चमहा यज्ञ न करे, अपना उदर भरने के लिये ही अन्न पकावे, ब्राह्मणों की सदैव निन्दा करे और जो आज्ञा को करे (सेवक नौकर हो) और वेद को जो बेंचे अर्थात् द्रव्य के लोभ से पढ़ावे या जपे ये पांच ब्रह्महत्या के दोषी हैं ॥७२॥ इस व्यास जी के मत को यत्न से नित्य पढ़े इस में कहे हुए आचरणों को जो करता है उस का पतन (नरक में जाना) नहीं हो सकता ॥ ७३ ॥

श्रीवेदव्यासीय धर्मशास्त्र का यह चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥
और यह धर्मशास्त्र भी पूरा हो गया ॥

॥श्रीगणेशायनमः॥

अथ शंखस्मृतिप्रारम्भः॥

स्वयंभुवेनमस्कृत्य सृष्टिसंहारकारिणे ।
चातुर्वर्ण्यहितार्थाय शङ्खःशास्त्रमकल्पयत् ॥ १ ॥
यजनंयाजनंदानं तथैवाध्यापनक्रिया ।
प्रतिग्रहंचाध्ययनं विप्रकर्माणिनिर्दिशेत् ॥ २ ॥
दानंचाध्ययनंचैव यजनंचयथाविधि ।
क्षत्रियस्यचवैश्यस्य कर्मेदंपरिकीर्तितम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियस्यविशेषेण प्रजानांपरिपालनम् ।
कृषिगोरक्षवाणिज्यं विशश्चपरिकीर्तितम् ॥ ४ ॥
शूद्रस्यद्विजशुश्रूषा सर्वशिल्पानिचोपयः ।
क्षमासत्यंदमःशौचं सर्वेषामविशेषतः ॥ ५ ॥

सृष्टि और संहार करने वाले स्वयंभु ब्रह्मा जी को नमस्कार करके चारों वर्णों के कल्याण के अर्थ शंख ऋषि ने यह धर्म शास्त्र बनाया है ॥ १ ॥ यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, छः अङ्गों सहित वेद का पढ़ाना, प्रतिग्रह (दान लेना) और स्वयं साङ्ग वेद को पढ़ना ये छः कर्म ब्राह्मण के कहे हैं ॥ २ ॥ दान देना, वेद पढ़ना, विधिपूर्वक यज्ञ करना, ये तीन कर्म क्षत्रिय और वैश्य के लिये कहे हैं ॥ ३ ॥ विशेष कर क्षत्रिय का कर्म प्रजा की रक्षा करना है और वैश्य का विशेष कर्म खेती, गौओं की रक्षा, और लेन देन करना कहा है ॥ ४ ॥ शूद्र का कर्म ब्राह्मणादि तीनों द्विजों की सेवा और संपूर्ण कारीगरी कही है । क्षमा, सत्य, दम, (मन को वश में करना) शौच, ये चारों वर्णों के समान ही धर्मानुकूल कर्त्तव्य कर्म हैं ॥ ५ ॥

२ | शंखस्मृतिः ॥

ब्राह्मणःक्षत्रियोवैश्यस्त्रयोवर्णाद्विजातयः ।
तेषांजन्मद्वितीयन्तु विज्ञेयंमौञ्जिबन्धनात् ॥ ६ ॥

आचार्यस्तुपिताप्रोक्तः सावित्री जननी तथा ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां मौञ्जीबन्धनजन्मनि ॥ ७ ॥

वृत्याशूद्रसमास्तावद्विज्ञेयास्तेविचक्षणैः ।
यावद्वेदेनिजायन्ते द्विजाज्ञेयास्ततःपरम् ॥ ८ ॥

इति श्रीशाङ्खे धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

गर्भस्यस्फुटताज्ञाते निषेकःपरिकीर्तितः ।
पुरातुस्पन्दनात्कार्यं पुंसवनंविचक्षणैः ॥ १ ॥

षष्ठेष्टमेवासीमन्तो जातेवैजातकर्मच ।
आशौचेव्यतिक्रान्ते नामकर्मविधीयते ॥ २ ॥

नामधेयंचकर्त्तव्यं वर्णानांचक्षमाक्षरम् ।


ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्णों को द्विजाति कहते हैं। उनका दूसरा जन्म यज्ञोपवीत के समय से जानना चाहिये ॥ ६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के यज्ञोपवीत सम्बन्धी द्वितीय जन्म में आचार्य तो पिता और गायत्री माता कही है ॥ ७ ॥ जब तक वेदोक्त संस्कार से प्रकट न हों तावत विद्वान् लोग बर्ताव से ब्राह्मणादि के बालकों को शूद्र के तुल्य जानें अर्थात् ब्राह्मणादि के साथ कहा व्यवहार उनके साथ न करें । और तदनन्तर उपनयन संस्कार हो जाने पर उनको द्विज मानना चाहिये ॥ ८ ॥

श्री शंखस्मृति के भाषानुवाद में यह प्रथम अध्याय पूरा हुआ ॥

गर्भ की जब प्रकटता से स्थिति प्रतीत हो उसको निषेक संस्कार ( वा गर्भाधान ) कहते हैं और विद्वान् लोग गर्भ के हिलने चलने से पहिले पुंसवन संस्कार करें ॥ १ ॥ छठे वा आठवें महीने में सीमन्त, पैदा होने पर जात कर्म, और सूतक शुद्धि होजाने पर नाम कर्म संस्कार करें ॥ २ ॥ और चारों वर्णों का नाम ऐसा हो जिसके अक्षर दो वा चार आदि सम हों ( जैसा गङ्गाराम ) और ब्राह्मण का नाम ऐसा हो जिसके उच्चारण में मङ्गल हो जैसे ( शिवदत्त इत्यादि ) क्षत्रिय का नाम ऐसा हो जिससे बल प्रतीत

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३

माङ्गल्यंब्राह्मणस्योक्तं क्षत्रियस्यबलान्वितम् ॥ ३ ॥ वैश्यस्यधनसंयुक्तं शूद्रस्यतुजुगुप्सितम् । शर्म्मान्तंब्राह्मणस्योक्तं वर्म्मान्तंक्षत्रियस्यतु ॥ ४ ॥ धनान्तंचैववैश्यस्य दासान्तंचान्त्यजन्मनः । चतुर्थेमासिकर्त्तव्यं बालस्यादित्यदर्शनम् ॥ ५ ॥ षष्ठेन्नप्राशनंमासि चूडाकार्याथाकुलम् । गर्भाष्टमेऽब्देकर्त्तव्यं ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥ ६ ॥ गर्भादेकादशेराज्ञो गर्भात्तुद्वादशेविशः । षोडशाब्दानिविप्रस्य राजन्यस्यद्विविंशतिः ॥ ७ ॥ विंशतिःसचतुष्कातु वैश्यस्यपरिकीर्त्तिता । नातिवर्त्तेतसावित्रीमतऊर्ध्व्वनिवर्त्तते ॥ ८ ॥ विज्ञातव्यास्त्रयोप्येते यथाकालमसंस्कृताः ।


हो ( जैसा अमितौजाः । अरिन्दमः । इत्यादि ) ॥ ३ ॥ वैश्य का नाम ऐसा हो जिसका अर्थ धन से युक्त हो (जैसा धनसुखराम । लक्ष्मीचन्द्र । इत्यादि) शूद्र का नाम ऐसा हो जिसमें निन्दा प्रतीत हो ( जैसा देवदास कटकक, तुषक इत्यादि ) ब्राह्मण के नाम के पीछे शर्म क्षत्रिय के नाम के पीछे वर्म्म ॥ ४ ॥ वैश्य के नाम के अन्त में धन वा गुप्त शब्द रहे और शूद्र के नाम के अन्त में दास हो । चौथे महीने में बालक को सूर्य का दर्शन करावे इसी का नाम निष्क्रमण संस्कार है ॥ ५ ॥ छठे महीने में अन्न प्राशन संस्कार करावे और मुण्डन संस्कार कुल रीति के अनुसार जन्म से पहिले वा तीसरे वर्ष में [ चाहे जब ] करे । गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण का यज्ञोपवीत ॥ ६ ॥ गर्भ से ग्यारहवें वर्ष क्षत्रिय का, गर्भ से बारहवें वर्ष वैश्य का, उपनयन संस्कार करें । ब्राह्मण की सोलह वर्ष तक क्षत्रिय की बाईस वर्ष तक ॥ ७ ॥ और वैश्य की चौबीस वर्ष तक शास्त्र में कही हुई सावित्री गुरु मन्त्र के ग्रहण का नियत काल है । इस से आगे मन्त्राधिकार निवृत्त हो जाता है ॥ ८ ॥ अपने २ काल के अनुसार नहीं हुआ है संस्कार जिन का ऐसे ये ब्राह्मणादि तीनों वर्ण सावित्री से पतित और सम्पूर्ण धर्मों से

४ शंखस्मृतिः ॥

सावित्रोपत्तिताव्रात्याः सर्वधर्मबहिष्कृताः ॥ ६ ॥
मौञ्जीज्याश्मन्तनानांतु क्रमान्मौञ्ज्यःप्रकीर्तिताः ।
मार्गवैयाघ्रवास्तानि चर्माणिब्रह्मचारिणाम् ॥ १० ॥
पर्णीपिप्पलविल्वानां क्रमाद्दण्डाःप्रकीर्तिताः ।
केशदेशललाटास्य तुल्याःप्रोक्ताःक्रमेणतु ॥ ११ ॥
अवक्रास्सत्वचस्सर्वे नाग्निदग्धास्तथैवच ।
वस्त्रोपवीतेकार्पासक्षौमोर्णानांयथाक्रमम् ॥ १२ ॥
आदिमध्यावसानेषु भवच्छब्दोपलक्षितम् ।
भैक्षस्याचरणंप्रोक्तं वर्णानामनुपूर्वशः ॥ १३ ॥
इति श्रीशाङ्खेधर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
उपनीयगुरुःशिष्यं शिक्षयेच्छौचमादितः ।
आचारमग्निकार्यंच संध्योपासनमेवच ॥ १ ॥


बहिष्कृत [ अनाधिकारी ] व्रात्य हो जाते हैं अर्थात् शूद्र वत् हो जाते हैं॥९॥ मूंज, मूर्वा (तृणविशेष) और शण इन की क्रम से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों की मेखला (कंधनी) और मृग व्याघ्र बकरा इन के चर्म तीनों ब्रह्मचारियों के लिये क्रम से कहे हैं ॥ १० ॥ ढांक पीपल बेल इन वृक्षों के दण्ड तीनों वर्णों के लिये क्रम से कहे हैं । केशों तक ब्राह्मण का, माथे तक क्षत्रिय का और मुख तक वैश्य ब्रह्मचारी का दण्ड रहे ॥ ११ ॥ वे दण्ड टेढ़े न हों त्वचा [ वक्कल ] सहित हों; तथा अग्नि से जले न हों । ब्राह्मण के वस्त्र तथा जनेऊ कपास के, क्षत्रिय के अतसी के और वैश्य के ऊन के होने चाहिये ॥ १२ ॥ भिक्षा मांगने के समय ब्राह्मण ब्रह्मचारी ( भवति भिक्षां देहि ) ऐसा वाक्य कहे । क्षत्रिय ( भिक्षां भवति देहि ) ऐसा कहे और वैश्य ( भिक्षां देहि भवति ) ऐसा वाक्य कहे ॥ १३ ॥

यह शङ्ख स्मृति के भाषानुवाद में द्वितीय अध्याय पूरा हुआ ॥

गुरु शिष्य को यज्ञोपवीत कराकर प्रथम शौच [मल मूत्र के त्यागादि समय कैसे २ शुद्धि करे ] आचार [ धर्मानुकूल व्यवहार ] अग्नि कार्य ( नित्य सायंप्रातःकाल का समिदाधान) और सन्ध्योपासन की शिक्षा दे (सिखावे) ॥१॥

भाषार्थसहिता ॥ ५

सगुरुर्यःक्रियाःकृत्वा वेदमस्मैप्रयच्छति । भृतकाध्यापकोयस्तु उपाध्यायःसउच्यते ॥ २ ॥ मातापितागुरुश्चैव पूजनीयास्सदानृणाम् । क्रियास्तस्याफलाः सर्व्वायस्यैतेनादृतास्त्रयः ॥ ३ ॥ प्रयतःकल्यउत्थाय स्नातोहुतहुताशनः । कुर्वीतप्रणतोभक्त्या गुरूणामभिवादनम् ॥ ४ ॥ अनुज्ञातस्तुगुरुणा ततोऽध्ययनमाचरेत् । कृत्वाब्रह्माञ्जलिंपश्यन् गुरोर्वदनमानतः ॥ ५ ॥ ब्रह्मावसानेप्रारम्भे प्रणवंचप्रकीर्त्तयेत् । अनध्यायेष्वध्ययनं वर्जयेच्चप्रयत्नतः ॥ ६ ॥ चतुर्दशींपञ्चदशीमष्टमींराहुसूतकम् । उल्कापातंमहीकम्पमाशौचंग्रामविप्लवम् ॥ ७ ॥ इन्द्रप्रयाणंश्वरुतं सर्व्वसंघातानिःस्वनम् ।


जो शिष्य को कर्म [ जनेऊ आदि ] कराकर वेद पढ़ावे उसे गुरु कहते हैं । और जो कुछ द्रव्य मासिक वेतन लेकर पढ़ावे उसे उपाध्याय कहते हैं ॥ २ ॥ माता पिता और गुरु इन तीनों की मनुष्यों को सदा सेवा पूजा करनी चाहिये क्योंकि जिस पुत्र वा शिष्य ने इन तीनों का आदर सत्कार नहीं किया उस के सब पुण्य कर्म निष्फल से हैं ॥३॥ प्रातःकाल सावधान हो नियम से उठ कर स्नान और होम करके नम्रता से गुरुओं को अभिवादन करै ॥ ४ ॥ फिर गुरु की आज्ञा लेकर दोनों हाथ जोड़ के और गुरु के मुख को देखता हुआ नम्र होकर वेद का अध्ययन करै ॥५॥ वेद पढ़ने के प्रारम्भ समय और अन्त में (जब पढ़ चुके) ओंकार का उच्चारण करै । और अनध्यायों [ अमावस्या, अष्टमी, पौर्णमासी, चतुर्दशी आदि दिनों ] में कदापि वेद को न पढ़े ॥ ६ ॥ चौदश, पूर्णिमा, अष्टमी, ग्रहण, उल्कापात, बिजली का तड़पना, भूकम्प अशौच (जन्म मरण का सूतक) ग्राम का उपद्रव ॥ ७ ॥ इन्द्रप्रयाण (वर्षाकाल के इन्द्र धनुष का) दर्शन, कुत्ते का रोना, बहुतों के समूह का शब्द, बाजों का कोलाहल और युद्ध इन (चौदश आदि) अन-

६ शंखस्मृतिः ॥

वादकोलाहलंयुद्धमनध्यायान्विवर्जयेत् ॥ ८ ॥ नाधीयीताभियुक्तोपि यानगोनचनौगतः । देवायतनवल्मीकश्मशानशवसन्निधौ ॥ ९ ॥ भैक्षचर्यांतथाकुर्याद् ब्राह्मणेषुयथाविधि । गुरुणाचाप्यनुज्ञातः प्राश्नीयात्प्राङ्मुखःशुचिः ॥ १० ॥ हितंप्रियंगुरोः कुर्यादहंकारविवर्जितः । उपास्यपश्चिमां संध्यां पूजयित्वाहुताशनम् ॥ ११ ॥ अभिवाद्यगुरुंपश्चाद् गुरोर्वचनकृद् भवेत् । गुरोः पूर्वंसमुत्तिष्ठेच्छयीत चरमंतथा ॥ १२ ॥ मधुमांसाञ्जनं श्राद्धं गीतं नृत्यंचवर्जयेत् । हिंसांपरापवादंच स्त्रीलीलांचविशेषतः ॥ १३ ॥ मेखलामजिनंदण्डं धारयेच्चविशेषतः । अधःशायीभवेन्नित्यं ब्रह्मचारीसमाहितः ॥ १४ ॥ एवंव्रतंतु कुर्वीत वेदस्वीकरणंबुधः ।


ध्यायों में वेद को न पढ़े ॥ ८ ॥ यान (सवारी) पर चढ़ा नाव में बैठा और देवमन्दिर, बामी, श्मशान ( मरघट ) मुर्दा इन के समीप में बैठ कर वेदको न पढ़े ॥ ९ ॥ ब्राह्मण ब्रह्मचारी विशेष कर गृहस्थ ब्राह्मण के घर पूर्वोक्त विधि के सहित भिक्षा मांगे। गुरु की आज्ञा लेकर पूर्व को मुख करके शुद्धता से भोजन करे ॥ १० ॥ अहंकार को छोड़ कर गुरु का प्रिय काम और हितकारी कर्म करे और सायंकाल को संध्या और अग्नि में समिदाधान कर के ॥ ११ ॥ फिर गुरु को अभिवादन करके गुरु जो आज्ञा करें उसे करे और गुरु से पहिले उठे और पीछे सोवे ॥ १२ ॥ मधु ( महत वा मदिरा ), मांस, आंखों में अंजन वा सुरमा लगाना, श्राद्ध का भोजन, नाचना, गाना, बजाना, हिंसा, पराई निन्दा और विशेष कर स्त्रियों की लीला को छोड़देवे ॥ १३ ॥ मूंज आदि की मेखला, मृगछाला, दंड इन को विशेष कर नित्य धारण करे और ब्रह्मचारी सावधान रहता हुआ नियम से पृथिवी पर सोवे ॥ १४ ॥ वेद पढ़ने के समय विचार शील ब्रह्मचारी इस प्रकार व्रत नियम आदि करे और फिर वेदाध्ययनकी समाप्ति होने पर गुरुको दक्षिणा देकर गुरुकी आज्ञा

भाषार्थसहिता ॥ ९

गुरवेऽथधनंदत्त्वा स्नायीततदनुज्ञया ॥ १५ ॥ ॥ इति श्रीशाङ्खे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ३ ॥ विन्देतविधिवद्भार्यामसमानार्षगोत्रजाम् । मातृतःपञ्चमींचापि पितृतस्त्वथसप्तमीम् ॥ १ ॥ ब्राह्मोदैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः । गान्धर्वोराक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ २ ॥ एषुधर्म्यास्तुचत्वारः पूर्व्वेयेपरिकीर्त्तिताः । गान्धर्वोराक्षसश्चैव क्षत्रियस्यतुशस्यते ॥ ३ ॥ संप्रार्थितःप्रयत्नेन ब्राह्मस्तुपरिकीर्त्तितः । यज्ञस्थायर्त्विजेदैव आदायर्षस्तुगोद्वयम् ॥ ४ ॥ प्रार्थितःसंप्रदानेन प्राजापत्यःप्रकीर्त्तितः । आसुरोद्रविणादानाद् गान्धर्वःसमयान्मिथः ॥ ५ ॥


में समावर्त्तन स्नान कर के गृहस्थाश्रम को ग्रहण करे ॥ १५ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥

जो अपने गोत्र और प्रवर की न हो ऐसी स्त्री को वेदोक्त विधि से विवाहे अथवा जो अपनी माता के कुल में पांचवीं पीढ़ी की और पिता के कुल में सातवीं पीढ़ी की हो उसे विवाहे (यह पिछला मत एकदेशी है। इसी से संप्रति ऐसी चाल नहीं दीखती है ) ॥ १ ॥ ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच ये आठ प्रकार के विवाह हैं और इन में आठवां पैशाच अधम नाम नीच काम है ॥ २ ॥ इनमें जो पहिले चार कहे हैं वे धर्म युक्त अच्छे विवाह हैं । गान्धर्व और राक्षस ये दोनों क्षत्रिय के लिये श्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥ बड़े यत्न से भली प्रकार प्रार्थना पूर्वक जो वेद विधि से विवाह हो उसे ब्राह्म कहते, यज्ञ में बैठे ऋत्विज् वर को जो कन्या वेद विधि से दी जाय वह विवाह दैव और वर से दो गौ वा उनका मूल्य लेकर जो कन्या वेद विधि से दी जाय उसे आर्ष विवाह कहते हैं ॥ ४ ॥

कन्या वाले से कन्या मांगने के लिये जहां वर प्रार्थना करे उस वेदोक्त विधिसे हुए विवाह को प्राजापत्य, द्रव्यलेकर जो विवाह हो उसे आसुर, कन्या और वर की परस्पर इच्छामात्र से जो विवाह हो उसे गांधर्व कहते हैं ॥५॥

८ शंखस्मृतिः ॥

राक्षसोयुद्धहरणात्पैशाचःकन्यकाछलात् ।
तिस्रस्तुभार्याविप्रस्य द्वेभार्येक्षत्रियस्यतु ॥ ६ ॥
एकैवभार्यावैश्यस्य तथाशूद्रस्यकीर्त्तिता ।
ब्राह्मणीक्षत्रियावैश्या विप्रभार्याःप्रकीर्त्तिताः॥ ७ ॥
क्षत्रियाचैववैश्याच क्षत्रियस्यविधीयते ।
वैश्याचभार्यावैश्यस्य शूद्राशूद्रस्यकीर्त्तिता ॥ ८ ॥
आपद्यपिनकर्त्तव्या शूद्राभार्याद्विजन्मना ।
तस्यांतस्यप्रसूतस्य निष्कृतिर्नविधीयते ॥ ९ ॥
तपस्वीयज्ञशीलस्तु सर्वधर्मभृतांवरः ।
ध्रुवंशूद्रत्वमायाति शूद्रान्नाद्येत्रयोदशे ॥ १० ॥
नीयतेतुसपिण्डत्वं येषांशूद्रःकुलोद्भवः ।
सर्वेशूद्रत्वमायान्ति यदिस्वर्गजितश्चते ॥ ११ ॥
सपिण्डीकरणंकार्यं कुलजस्यतथाध्रुवम् ।


युद्ध करके जो कन्या हरी जाय उसे राक्षस और छल से चुराकर कन्या लेली जाय उसे पैशाच विवाह कहते हैं। ब्राह्मण के तीन स्त्री और क्षत्रिय के दो स्त्री हो सकती हैं ॥ ६ ॥ वैश्य और शूद्र के एक २ ही स्त्री हो सकती है, ब्राह्मणी, क्षत्रिया, और वैश्या ये तीन ब्राह्मण की भार्या कही हैं ॥ ७ ॥ क्षत्रिया और वैश्या क्षत्रिय की भार्या * और वैश्य की वैश्या और शूद्र की शूद्रा ही भार्या होती हैं ॥ ८ ॥ आपत्काल में भी ब्राह्मणादि तीनों द्विज शूद्रा के साथ विवाह न करें क्योंकि शूद्रा में पैदा हुए द्विजाति का कोई प्रायश्चित्त नहीं है किन्तु वह पतित ही हो जाता है ॥ ९ ॥ चाहे कैसा ही तपस्वी, यज्ञशील, और सब धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भी ब्राह्मण शूद्र के त्रयोदशाह (तेरहवीं) श्राद्ध में जीमने से निश्चय कर शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है ॥ १० ॥ द्विजों के कुल में पैदा हुआ शूद्र जिन द्विजों की सपिण्डी श्राद्ध करे चाहे वे स्वर्ग के भी जीतने वाले हों तो भी वे सब शूद्र हो जाते हैं॥११॥ तिस से कुल में उत्पन्न हुए का बारहवें दिन का श्राद्ध करके त्रयोदशाह


* अपने २ वर्ण की एक २ स्त्री से विवाह करना धर्मशास्त्रानुकूल उत्तम पक्ष है। और स्ववर्ण की वा अन्य वर्ण की एक से अधिक स्त्रियों के साथ विवाह करना कामी जनों को व्यभिचार से बचाने के लिये मध्यम पक्ष है।

भाषार्थसंहिता ॥ ९

श्राद्धद्वादशकंकृत्वा श्राद्धे प्राप्तेत्रयोदशे ॥ १२ ॥
सपिण्डीकरणेचार्हेन्नचशूद्रःकथञ्चन ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शूद्रांभार्यांविवर्जयेत् ॥ १३ ॥
पाणिर्ग्राह्यस्सवर्णासु गृह्णीयात्क्षत्रियाशरम् ।
वैश्याप्रतोदमादद्याद्वेदेनेत्वग्रजन्मनः ॥ १४ ॥
साभार्यायागृहेदक्षा साभार्यायापतिव्रता ।
साभार्यायापतिप्राणा साभार्यायाप्रजावती ॥ १५ ॥
लालनीयासदाभार्या ताडनीयातथैवच ।
ताडितालालिताचैव स्त्रीश्रीर्भवतिनान्यथा ॥ १६ ॥
इतिशांखेधर्मशास्त्रेचतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

पञ्चसूनागृहस्थस्य चुल्लीपेषण्युपस्करः ।
कण्डनीचोदकुम्भश्च तस्यपापस्यशान्तये ॥ १ ॥
पञ्चयज्ञविधानन्तु गृही नित्यंनहापयेत् ।


श्राद्ध के दिन अवश्य सपिण्डीकरण करे ॥ १२ ॥ द्विज कुल में पैदा हुआ शूद्र कदापि सपिण्डी करने योग्य नहीं है. तिस से संपूर्ण यत्न से शूद्रा स्त्री से कदापि विवाह न करे ॥ १३ ॥ ब्राह्मण के साथ ब्राह्मणी के विवाह में ब्राह्मणी का हाथ, क्षत्रिया बाण को, वैश्या प्रतोद (पैना) को ग्रहण करे ॥ १४ ॥ जो घर के कामों में चतुर हो, जो पतिव्रता हो, वा जिस के प्राणपति में बसते हों, और जो पुत्रादि सन्तानों वाली हो, वही उत्तम भार्या है ॥ १५ ॥ भार्या को सदैव लालना (लाड़) करे और अनुचित पर ताड़ना भी करे क्योंकि लालना और ताड़ने से ही वह स्त्री लक्ष्मी होती है अन्यथा नहीं ॥ १६ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

गृहस्थ पुरुष को ये पांच प्रकार की हत्या नाम दोष प्रति दिन लगता है कि चूल्ही, चक्की, मार्जनी, (बुहारी) कण्डनी (ओखली) और जल का घड़ा, उस हत्यारूप पाप की शान्ति के लिये ॥ १ ॥ गृहस्थ पुरुष पांच महायज्ञों को प्रतिदिन न त्यागे, क्योंकि पांच महायज्ञों के करने से गृहस्थ का उन

१० शंखस्मृतिः ॥

पञ्चयज्ञविधानेन तत्पापंतस्यनश्यति ॥ २ ॥ देवयज्ञोभूतयज्ञः पितृयज्ञस्तथैवच । ब्रह्मयज्ञोनृयज्ञश्च पञ्चयज्ञाःप्रकीर्तिताः ॥ ३ ॥ होमोदैवोबलिर्भौतः पित्र्यःपिण्डक्रियास्मृतः । स्वाध्यायोब्रह्मयज्ञश्च नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ ४॥ वानप्रस्थोब्रह्मचारी यतिश्चैवतथाद्विजः । गृहस्थस्यप्रसादेन जीवन्त्येतेयथाविधि ॥ ५ ॥ गृहस्थएवयजते गृहस्थस्तप्यतेतपः । ददातिचगृहस्थश्च तस्माच्छ्रेयान्गृहाश्रमी ॥ ६ ॥ यथाभर्त्ताप्रभुःस्त्रीणां वर्णानांब्राह्मणोयथा । अतिथिस्तद्वदेवास्य गृहस्थस्यप्रभुःस्मृतः ॥ ७ ॥ नव्रतैनोपवासैश्च धर्मेणविविधेनच । नारीस्वर्गमवाप्नोति प्राप्नोतिपतिपूजनात् ॥ ८ ॥ नव्रतैनोपवासैश्च नचयज्ञैःपृथग्विधैः ।


हत्याओं सम्बन्धी पाप नष्ट हो जाता है ॥ २ ॥ देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, और मनुष्ययज्ञ, ये पांच महायज्ञ कहाते हैं ॥ ३ ॥ लवण रहित भोजन के वस्तु भात आदि का होम देवयज्ञ, उन २ के नाम से भूमि या पत्तों पर ग्रास धरना भूतयज्ञ, पितरों के लिये अपसव्य से पिण्डदान को पितृयज्ञ, विधिपूर्वक वेदादि का पाठ ब्रह्मयज्ञ और अतिथि का भोजनादि से सत्कार पूजन, मनुष्ययज्ञ कहाता है ॥ ४ ॥ वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, और सन्यासी ये तीनों, द्विज गृहस्थ के भिक्षारूप प्रसाद से यथाविधि (यथार्थ से) जीवते हैं ॥ ५ ॥ गृहस्थ ही यज्ञ करता, गृहस्थ ही तप करता और गृहस्थ ही दान देता है तिस से गृहस्थाश्रम ही सब से उत्तम है ॥ ६ ॥ जैसे स्त्रियों का रक्षक पति, जैसे वर्णों का रक्षक ब्राह्मण है इसी प्रकार गृहस्थ का प्रभु अतिथि कहाताहै ॥७॥ व्रत उपवास और अनेक प्रकारके धर्मसेवन से स्त्री स्वर्गको प्राप्त नहीं होती किन्तु श्रद्धाभक्ति के साथ तन मन धन से पतिकी सेवा पूजा से स्त्री को निश्चित स्वर्ग होता है ॥८॥ व्रत, उपवास, और अपने किये अनेक प्रकार

भाषार्थसहिता ॥ ९१

राजास्वर्गमवाप्नोति प्राप्नोतिपरिपालनात् ॥ ९ ॥
नस्नानेननमौनेन नैवाग्निपरिचर्य्यया ।
ब्रह्मचारीदिवंयाति सयातिगुरुपूजनात् ॥ १० ॥
नाग्निशुश्रूषयाक्षान्त्या स्नानेनविविधेनच ।
वानप्रस्थोदिवंयाति यातिभोजनवर्जनात् ॥ ११ ॥
नदण्डैर्नचमौनेन शून्यागाराश्रयेणच ।
यतिःसिद्धिमवाप्नोति योगेनाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ १२ ॥
नयज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्वन्हिशुश्रूषयातथा ।
गृहीस्वर्गमवाप्नोति यथाचातिथिपूजनात् ॥ १३ ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गृहस्थोऽतिथिमागतम् ।
आहारशयनाद्येन विधिवत्प्रतिपूजयेत् ॥ १४ ॥
सायंप्रातश्चजुहुयादग्निहोत्रंयथाविधि ।
दर्शञ्चपूर्णमासंच जुहुयाद्विधिवत्तथा ॥ १५ ॥


के यज्ञों से राजा स्वर्ग को प्राप्त नहीं होता किन्तु धर्मानुसार ठीक २ प्रजा की रक्षा करने से राजा को स्वर्ग प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ स्नान (शुद्धि) मौन रहना और अग्नि की सेवा (समिदाधान) इन से ब्रह्मचारी स्वर्ग में नहीं जाता किन्तु गुरु की सेवा पूजा करने से स्वर्ग में जाता है ॥ १० ॥ अग्नि की सेवा (पञ्चाग्निताप) क्षमा, और अनेक प्रकार के वार २ स्नान करने से वानप्रस्थ स्वर्ग में तिस प्रकार नहीं जाता कि जैसे भोजन के त्याग से जाता है अर्थात् उपवासों द्वारा इन्द्रियों की चंचलता मिटती है परमार्थ के विचारों में विघ्न नहीं होता ॥ ११ ॥ तीन दण्डों से, मौन से, और शून्य स्थान में रहने से सन्यासी सिद्धि को प्राप्त नहीं होता किन्तु योगाभ्यास से ही सर्वोत्तम गति वा सिद्धि को प्राप्त होता है ॥ १२ ॥ दक्षिणा वाले बड़े २ यज्ञों और ग्रीष्मकाल अग्रियों की सेवा रूप अग्निहोत्र से गृहस्थ पुरुष वैसा स्वर्ग में प्राप्त नहीं होता कि जैसा अतिथि के पूजन से उस को स्वर्ग होता है ॥ १३ ॥ तिस से गृहस्थ पुरुष आये हुये अतिथि को सम्पूर्ण यत्न से भोजन और शय्या आदि देकर विधि पूर्वक पूजन करे ॥ १४ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल से अग्निहोत्र करे और दर्शेटि तथा पूर्णमासेष्टियों को भी विधिपूर्वक प्रतिमास किया करे ॥ १५ ॥

९२ | शंखस्मृतिः ॥

यजेतपशुबन्धैश्च चातुर्मास्यैस्तथैव च ।
त्रैवार्षिकाधिकान्नस्तु पिबेत्सोममतन्द्रितः ॥ १६ ॥
इष्टिं वैश्वानरीं कुर्यात्तथाचाल्पधनो द्विजः ।
न भिक्षेत धनं शूद्रात्सर्वं दद्याच्च भिक्षितम् ॥ १७ ॥
वृतन्तु न त्यजेद्विद्वानृत्विजं पूर्वमेव च ।
कर्मणा जन्मना शुद्धं विद्यया च वृणीत तम् ॥ १८ ॥
एतैरेव गुणैर्युक्तं धर्मार्जितधनं तथा ।
याजयीत सदा विप्रो ग्राह्यस्तस्मात्प्रतिग्रहः ॥ १९ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥ १ ॥
पुत्रेषु दारान् निक्षिप्य तया वानुगतो वनम् ।
अग्नीनुपचरेन्नित्यं वन्यमाहारमाहरेत् ॥ २ ॥


पशुबन्ध यज्ञों और चातुर्मास्य यज्ञों के वैश्वदेवादि चारों पर्वों द्वारा ईश्वर की पूजा करे और तीन वर्ष के निर्वाह से अधिक अन्न का सञ्चय रखने वाला पुरुष हो तो आलस्य छोड़ कर सोम अर्थात् अग्निष्टोम यज्ञ करे ॥ १६ ॥

यदि थोड़े धन वाला ब्राह्मण होतो वैश्वानरी इष्टि कल्पशास्त्र में लिखे अनुसार करे और यज्ञ के लिये शूद्र से धन न मांगे और द्विजों से मांगा भिक्षा का सब धन यज्ञ के अन्त में दान करदेवे ॥ १७ ॥ विद्वान् मनुष्य विधि से वरण (स्वीकार) किये ऋत्विज का त्याग न करे । जन्म तथा कर्म से शुद्ध हो तथा विद्या से पूर्ण हो उसी ऋत्विज का वर्ण करे ॥ १८ ॥ इन्हीं पूर्व गुणों से जो युक्त हो, तथा धर्मानुकूल उपाय से जिस ने धन का संचय किया हो उसी को विद्वान् ब्राह्मण सदैव यज्ञ करावे और उसी से प्रतिग्रह-दान लेवे ॥ १९ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

गृहस्थ पुरुष जब अपने देह में वली (त्वचा की सकुड़न) पलित (बालों का सफेद होना) देखे और पुत्र के पुत्र या कन्या हो जाय, तब वह वन में चला जावे अर्थात् वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण करे ॥ १ ॥ पुत्रों के समीप अपनी स्त्री को सौंप कर अथवा स्त्री को भी संग लेकर वनमें जाकर श्रौतस्मार्त अग्नियों की सेवा करे अर्थात् वन में भी विधिपूर्वक अग्निहोत्र कियाकरे और जो वनमें पैदा हों उन कन्द मूल आदिका ही भोजन करे ॥ २ ॥

भाषार्थसहिता ॥ १३

यदाहारोभवेत्तेन पूजयेत्पितृदेवताः ।
तेनैवपूजयेन्नित्यमतिथिंसमुपागतम् ॥ ३ ॥
ग्रामादाहृत्यवाश्नीयादष्टौग्रासान्समाहितः ।
स्वाध्यायंचतथाकुर्याज्जटाश्चैवबिभृयात्तथा ॥ ४ ॥
तपसाशोषयेन्नित्यं स्वयञ्चैवकलेवरम् ।
आर्द्रवासास्तुहेमन्ते ग्रीष्मेपञ्चतपास्तथा ॥ ५ ॥
प्रावृष्याकाशशायीच नक्ताशांचसदाभवेत् ।
चतुर्थकालिकोवास्यात् षष्ठकालिकएववा ॥ ६ ॥
कृच्छ्रैर्वापिनयेत्कालं ब्रह्मचर्यञ्चपालयेत् ।
एवंनीत्वावनेकालं द्विजोग्रह्माश्रमीभवेत् ॥ ७ ॥

इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

कृत्वेष्टिंविधिवत्पश्चात् सर्ववेदसदक्षिणाम् ।


जो फल मूल आदि अपना भोजन हो उसी से पितर, देवता, और आये हुये अतिथि का नित्य पूजन करे ॥ ३ ॥ अथवा सावधान रहता हुआ ग्रामस्थ द्विजों के घरों से लाकर आठ ग्रास भोजन प्रतिदिन एकवार खाया करे। वेदको नित्य पढ़े और शिर पर जटाओं को रखा लेवे ॥ ४ ॥ तप से अपने शरीर को सुखा देवे, शीत काल में आर्द्र (भीगे) वस्त्र पहिने और ग्रीष्म (गरमी) में पंचाग्नि को तपे अर्थात् चारों दिशा में अग्नि सिलगावे बीच में आसन डाल कर बैठे ऊपर से सूर्य का घाम होवे ॥५॥ वर्षा में आकाश खुले (मैदान) में लेटे और सदैव रात्रि में ही भोजन करे अथवा चौथे काल में वा छठे काल में एक बार भोजन करे ॥६॥ अथवा कृच्छ्र व्रत के नियम से ही अपने काल को बितावे और ब्रह्मचर्य का पालन करे इस प्रकार ब्राह्मण अपने वानप्रस्थ समय को बिताकर संन्यास आश्रम का ग्रहण करे ॥ ७ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥

वानप्रस्थ का नियम पूरा होने पश्चात् सर्ववेदस नाम अपना सब पदार्थ जिस में दक्षिणा देदिया जाय ऐसी प्राजापत्या इष्टि करके और अपने आ-त्मा में ही अग्नियों का विधिपूर्वक समारोप करके संन्यास आश्रम को

१४ शंखस्मृतिः ॥

आत्मन्यग्नीन्समारोप्य द्विजोब्रह्माश्रमीभवेत् ॥ १ ॥
विधूमेन्यस्तमुसले व्यङ्गारेभुक्तवज्जने ।
अतीतेपात्रसम्पाते नित्यंभिक्षांयतिश्चरेत् ॥ २ ॥
सप्तगारांश्चरेद्भैक्षं भिक्षितंनानुभिक्षयेत् ।
नव्यथेच्चतथाऽलाभे यथालब्धेनवर्तयेत् ॥ ३ ॥
नास्वादयेत्तथैवान्नं नाश्नीयात्कस्यचिद्गृहे ।
मृन्मयालाबुपात्राणि यतीनांचविनिर्दिशेत् ॥ ४ ॥
तेषांसंमार्जनाच्छुद्धिरद्भिर्श्चैवप्रकीर्तिता ।
कौपीनाच्छादनंवासा विभृयादव्यथञ्चरन् ॥५॥
शून्यागारनिकेतःस्याद्यत्रसायंगृहोमुनिः ॥६॥
दृष्टिपूतंन्यसेत्पादं वस्त्रपूतंजलंपिबेत् ।
सत्यपूतांवदेद्वाचं मनःपूतंसमाचरेत् ॥७॥
चन्दनेनतुलिप्ताङ्गं वास्यैवं चैवतक्षतः ।


ग्रहण करे ॥ १ ॥ जब ग्राम में धूम उठना बन्द हो जाय, ऊखली से चावल निकाल कर मूसल भी जहां के तहां रख दिये हों, मनुष्यों ने भोजन भी कर लिये हों, रसोई या जल के पात्रों का इधर उधर ले जाना भी बन्द हो गया हो, तब संन्यासी भिक्षा के लिये नित्य गाम में जावे ॥२॥ सात घरों से भिक्षा मांगे, जिस के घर में भिक्षा मांग चुका हो फिर वहां से भिक्षा न मांगे, भिक्षा के न मिलने से दुःखी न हो और जितना मिले उतने से ही सन्तोष मान कर निर्वाह करे ॥ ३ ॥ अन्न को स्वाद ले २ कर न खाये, किसी के घर निमन्त्रित हो भोजन न करे और मिट्टी अथवा तुम्बी के पात्र यतियों के लिये शास्त्र में कहे हैं उन्हीं पात्रों से जलपानादि काम करे ॥४॥ और उन पात्रों की शुद्धि केवल जल से धोने से हो जाती है और सुख दुःख न मान कर उदासीन दशा में विचरता हुआ संन्यासी कौपीन और गुदड़ी दो ही वस्त्रों को धारण करे ॥ ५ ॥ जिस में अन्य कोई न रहता हो ऐसे शून्य घर में रात को रहे । जहां सायंकाल हो जाय वहीं ठहर जावे, मौन रहे ॥ ६ ॥ दृष्टि से देखकर मार्ग में पग रक्खे, वस्त्र से छानकर जल पीवे, सत्य वाणी बोले, और शुद्ध मन से विचरण करे ॥ ७ ॥ कोई पुरुष संन्यासी के किसी अंग में चन्दन लगाता हो, वा किसी अङ्ग को कोई काटता हो तो उन दोनों का भला बुरा

भाषार्थसंहिता ॥ १५

कल्याणंचाप्यकल्याणं तयोरेवनचिन्तयेत् ॥८॥
सर्वभूतसमोमैत्रः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
ध्यानयोगरतोभिक्षुः प्राप्नोतिपरमाङ्गतिम् ॥९॥
जन्मनायस्तुनिर्मुक्तो मरणेनतथैवच ।
आधिभिर्व्याधिभिश्चैव तंदेवाब्राह्मणंविदुः ॥१०॥
अशुचित्वंशरीरस्य प्रियाप्रियविपर्ययः ।
गर्भवासेचवसतिस्तस्मान्मुच्येतनान्यथा ॥११॥
जगदेतन्निराक्रन्दं नतुसारमनर्थकम् ।
भोक्तव्यमितिनिर्द्दिष्टो मुच्यतेनात्रसंशयः ॥१२॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्चकिल्विषम् ।
प्रत्याहारेणसंसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥१३॥
सव्याहृतिंसप्रणवां गायत्रींशिरसासह ।
त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ॥१४॥


कुछ भी चिन्तन न करे ॥ ८ ॥ सब प्राणियों पर सम दृष्टि रक्खे, सब को मित्र माने; मट्टी का ढेला, पत्थर, सोना, इनको एकसा समझे । ध्यान और योगाभ्यास में तत्पर रहे ऐसा जो भिक्षु संन्यासी है वह परमगति को प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ जीवते ही जो जन्म मरण के बन्धनों से मुक्त है, मन की पीड़ा और देह के रोग भी जिस को नहीं सताते, देवता लोग उसी को ब्राह्मण कहते हैं ॥ १० ॥ शरीर का अशुद्ध होना, प्रिय के स्थान में अप्रिय और अप्रिय के स्थान में प्रिय हो, मलिन स्थान गर्भ में वास होना, इन सब से संन्यास के बिना नहीं छूट सकता ॥११॥ यह जगत् बड़ा दारुण है, इसमें कुछ सार नहीं और अनर्थ रूप है। इसमें कर्मफल भोगना अवश्य है, इस बुद्धि से जो दुःख भोगता है, वह मुक्त होता है इस में संदेह नहीं है ॥ १२ ॥ प्राणायामों द्वारा इन्द्रियों के दोषोंको, और धारणाओं से शारीरकादि पापोंको भस्म करे । प्रत्याहार से संगों को और ध्यान द्वारा ईश्वर विरोधी नास्तिकता आदि को नष्ट करे ॥१३॥ प्राणोंको रोककर सात व्याहृति, ओंकार, और (आपोज्योती०) इस शिरोमन्त्र सहित गायत्री के तीन बार पढ़ने को प्राणायाम कहते हैं ॥१४॥

१६ शंखस्मृतिः ॥

मनसःसंयमस्तज्ज्ञैर्धारणेतिनिगद्यते ।
संहारश्चेन्द्रियाणांच प्रत्याहारःप्रकीर्तितः ॥१५॥
हृदिस्थध्यानयोगेन देवदेवस्यदर्शनम् ।
ध्यानंप्रोक्तंप्रवक्ष्यामि ध्यानयोगमतःपरम् ॥१६॥
हृदिस्थादेवतास्सर्वा हृदिप्राणाःप्रतिष्ठिताः ।
हृदिज्योतींषि सूर्यश्च हृदिसर्वंप्रतिष्ठितम् ॥१७॥
स्वदेहमरणिंकृत्वा प्रणवंचोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्विष्णुंपश्येद्वृदिस्थितम् ॥१८॥
हृद्यर्कश्चन्द्रमासूर्यः सोमोमध्येहुताशनः ।
तेजोमध्येस्थितंसत्त्वं सत्त्वमध्यस्थितोऽच्युतः ॥१९॥
अणोरणीयान्महतोमहीयानात्मास्यजन्तौर्निहितोगुहायाम्।
तेजोमयंपश्यतिवीतशोको धातुःप्रसादान्महिमानमात्मनः॥२०
वासुदेवस्तमोऽन्धानां प्रत्यक्षोनैवजायते ।
अज्ञानपटसंवीतैरिन्द्रियैर्विषयेप्सुभिः ॥२१॥
एषवैपुरुषोविष्णुर्व्यक्ताव्यक्तःसनातनः ।


संयमके जानने वाले मन के रोकने को धारणा कहते हैं, विषयों से इन्द्रियों के हटाने को प्रत्याहार कहते हैं ॥ १५ ॥ हृदय में ध्यान के योग से ब्रह्म के साक्षात् करने को ध्यान कहते हैं। इससे आगे ध्यानयोग को कहते हैं ॥१६॥ सब देवता, प्राण, तारागण, और सूर्य ये सब अध्यात्म रूप से हृदय में भी स्थित हैं ॥१७॥ अपने शरीर को नीचे की अधरारणी और ओंकार को ऊपर की अरणी मानके ध्यान के निरन्तर मन्थन रूप अभ्याससे हृदयमें स्थित विष्णु भगवान् के दिव्य रूप को देखे ॥१८॥ सूर्य, चन्द्रमा, फिर सूर्य, चन्द्रमा और इन चारों के बीच में अग्नि हृदय में रहते हैं। तेज के मध्य में सत्व गुण स्थित है, सत्त्वगुण में अच्युत (विष्णु) स्थित हैं ॥१९॥ छोटे से भी छोटा बड़ों से भी बड़ा आत्मा इस मनुष्य के हृदय में ठहरा हुआ है, नष्ट हो गया है शोक जिस का ऐसा पुरुष तेजोरूप आत्मा की महिमा को विधाता की दयासे देखता है ॥२०॥ अज्ञानान्धकार मे अन्धे हुए मनुष्यों को वासुदेव भगवान् प्रत्यक्ष नहीं होते, क्योंकि उन के विषय भोगों के लालची इन्द्रिय अज्ञानरूपी वस्त्रों से ढंपे हैं ॥ २१ ॥ यह पुरुष [ हृदय में सोने वाला ] विष्णु ( व्यापक ) प्रकट