अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 479, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ शंखस्मृतिः ॥
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य द्विजोब्रह्माश्रमीभवेत् ॥ १ ॥
विधूमेन्यस्तमुसले व्यङ्गारेभुक्तवज्जने ।
अतीतेपात्रसम्पाते नित्यंभिक्षांयतिश्चरेत् ॥ २ ॥
सप्तगारांश्चरेद्भैक्षं भिक्षितंनानुभिक्षयेत् ।
नव्यथेच्चतथाऽलाभे यथालब्धेनवर्तयेत् ॥ ३ ॥
नास्वादयेत्तथैवान्नं नाश्नीयात्कस्यचिद्गृहे ।
मृन्मयालाबुपात्राणि यतीनांचविनिर्दिशेत् ॥ ४ ॥
तेषांसंमार्जनाच्छुद्धिरद्भिर्श्चैवप्रकीर्तिता ।
कौपीनाच्छादनंवासा विभृयादव्यथञ्चरन् ॥५॥
शून्यागारनिकेतःस्याद्यत्रसायंगृहोमुनिः ॥६॥
दृष्टिपूतंन्यसेत्पादं वस्त्रपूतंजलंपिबेत् ।
सत्यपूतांवदेद्वाचं मनःपूतंसमाचरेत् ॥७॥
चन्दनेनतुलिप्ताङ्गं वास्यैवं चैवतक्षतः ।
ग्रहण करे ॥ १ ॥ जब ग्राम में धूम उठना बन्द हो जाय, ऊखली से चावल निकाल कर मूसल भी जहां के तहां रख दिये हों, मनुष्यों ने भोजन भी कर लिये हों, रसोई या जल के पात्रों का इधर उधर ले जाना भी बन्द हो गया हो, तब संन्यासी भिक्षा के लिये नित्य गाम में जावे ॥२॥ सात घरों से भिक्षा मांगे, जिस के घर में भिक्षा मांग चुका हो फिर वहां से भिक्षा न मांगे, भिक्षा के न मिलने से दुःखी न हो और जितना मिले उतने से ही सन्तोष मान कर निर्वाह करे ॥ ३ ॥ अन्न को स्वाद ले २ कर न खाये, किसी के घर निमन्त्रित हो भोजन न करे और मिट्टी अथवा तुम्बी के पात्र यतियों के लिये शास्त्र में कहे हैं उन्हीं पात्रों से जलपानादि काम करे ॥४॥ और उन पात्रों की शुद्धि केवल जल से धोने से हो जाती है और सुख दुःख न मान कर उदासीन दशा में विचरता हुआ संन्यासी कौपीन और गुदड़ी दो ही वस्त्रों को धारण करे ॥ ५ ॥ जिस में अन्य कोई न रहता हो ऐसे शून्य घर में रात को रहे । जहां सायंकाल हो जाय वहीं ठहर जावे, मौन रहे ॥ ६ ॥ दृष्टि से देखकर मार्ग में पग रक्खे, वस्त्र से छानकर जल पीवे, सत्य वाणी बोले, और शुद्ध मन से विचरण करे ॥ ७ ॥ कोई पुरुष संन्यासी के किसी अंग में चन्दन लगाता हो, वा किसी अङ्ग को कोई काटता हो तो उन दोनों का भला बुरा