भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसंहिता ॥ १५

कल्याणंचाप्यकल्याणं तयोरेवनचिन्तयेत् ॥८॥
सर्वभूतसमोमैत्रः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
ध्यानयोगरतोभिक्षुः प्राप्नोतिपरमाङ्गतिम् ॥९॥
जन्मनायस्तुनिर्मुक्तो मरणेनतथैवच ।
आधिभिर्व्याधिभिश्चैव तंदेवाब्राह्मणंविदुः ॥१०॥
अशुचित्वंशरीरस्य प्रियाप्रियविपर्ययः ।
गर्भवासेचवसतिस्तस्मान्मुच्येतनान्यथा ॥११॥
जगदेतन्निराक्रन्दं नतुसारमनर्थकम् ।
भोक्तव्यमितिनिर्द्दिष्टो मुच्यतेनात्रसंशयः ॥१२॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्चकिल्विषम् ।
प्रत्याहारेणसंसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥१३॥
सव्याहृतिंसप्रणवां गायत्रींशिरसासह ।
त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ॥१४॥


कुछ भी चिन्तन न करे ॥ ८ ॥ सब प्राणियों पर सम दृष्टि रक्खे, सब को मित्र माने; मट्टी का ढेला, पत्थर, सोना, इनको एकसा समझे । ध्यान और योगाभ्यास में तत्पर रहे ऐसा जो भिक्षु संन्यासी है वह परमगति को प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ जीवते ही जो जन्म मरण के बन्धनों से मुक्त है, मन की पीड़ा और देह के रोग भी जिस को नहीं सताते, देवता लोग उसी को ब्राह्मण कहते हैं ॥ १० ॥ शरीर का अशुद्ध होना, प्रिय के स्थान में अप्रिय और अप्रिय के स्थान में प्रिय हो, मलिन स्थान गर्भ में वास होना, इन सब से संन्यास के बिना नहीं छूट सकता ॥११॥ यह जगत् बड़ा दारुण है, इसमें कुछ सार नहीं और अनर्थ रूप है। इसमें कर्मफल भोगना अवश्य है, इस बुद्धि से जो दुःख भोगता है, वह मुक्त होता है इस में संदेह नहीं है ॥ १२ ॥ प्राणायामों द्वारा इन्द्रियों के दोषोंको, और धारणाओं से शारीरकादि पापोंको भस्म करे । प्रत्याहार से संगों को और ध्यान द्वारा ईश्वर विरोधी नास्तिकता आदि को नष्ट करे ॥१३॥ प्राणोंको रोककर सात व्याहृति, ओंकार, और (आपोज्योती०) इस शिरोमन्त्र सहित गायत्री के तीन बार पढ़ने को प्राणायाम कहते हैं ॥१४॥