अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ शंखस्मृतिः ॥
मनसःसंयमस्तज्ज्ञैर्धारणेतिनिगद्यते ।
संहारश्चेन्द्रियाणांच प्रत्याहारःप्रकीर्तितः ॥१५॥
हृदिस्थध्यानयोगेन देवदेवस्यदर्शनम् ।
ध्यानंप्रोक्तंप्रवक्ष्यामि ध्यानयोगमतःपरम् ॥१६॥
हृदिस्थादेवतास्सर्वा हृदिप्राणाःप्रतिष्ठिताः ।
हृदिज्योतींषि सूर्यश्च हृदिसर्वंप्रतिष्ठितम् ॥१७॥
स्वदेहमरणिंकृत्वा प्रणवंचोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्विष्णुंपश्येद्वृदिस्थितम् ॥१८॥
हृद्यर्कश्चन्द्रमासूर्यः सोमोमध्येहुताशनः ।
तेजोमध्येस्थितंसत्त्वं सत्त्वमध्यस्थितोऽच्युतः ॥१९॥
अणोरणीयान्महतोमहीयानात्मास्यजन्तौर्निहितोगुहायाम्।
तेजोमयंपश्यतिवीतशोको धातुःप्रसादान्महिमानमात्मनः॥२०
वासुदेवस्तमोऽन्धानां प्रत्यक्षोनैवजायते ।
अज्ञानपटसंवीतैरिन्द्रियैर्विषयेप्सुभिः ॥२१॥
एषवैपुरुषोविष्णुर्व्यक्ताव्यक्तःसनातनः ।
संयमके जानने वाले मन के रोकने को धारणा कहते हैं, विषयों से इन्द्रियों के हटाने को प्रत्याहार कहते हैं ॥ १५ ॥ हृदय में ध्यान के योग से ब्रह्म के साक्षात् करने को ध्यान कहते हैं। इससे आगे ध्यानयोग को कहते हैं ॥१६॥ सब देवता, प्राण, तारागण, और सूर्य ये सब अध्यात्म रूप से हृदय में भी स्थित हैं ॥१७॥ अपने शरीर को नीचे की अधरारणी और ओंकार को ऊपर की अरणी मानके ध्यान के निरन्तर मन्थन रूप अभ्याससे हृदयमें स्थित विष्णु भगवान् के दिव्य रूप को देखे ॥१८॥ सूर्य, चन्द्रमा, फिर सूर्य, चन्द्रमा और इन चारों के बीच में अग्नि हृदय में रहते हैं। तेज के मध्य में सत्व गुण स्थित है, सत्त्वगुण में अच्युत (विष्णु) स्थित हैं ॥१९॥ छोटे से भी छोटा बड़ों से भी बड़ा आत्मा इस मनुष्य के हृदय में ठहरा हुआ है, नष्ट हो गया है शोक जिस का ऐसा पुरुष तेजोरूप आत्मा की महिमा को विधाता की दयासे देखता है ॥२०॥ अज्ञानान्धकार मे अन्धे हुए मनुष्यों को वासुदेव भगवान् प्रत्यक्ष नहीं होते, क्योंकि उन के विषय भोगों के लालची इन्द्रिय अज्ञानरूपी वस्त्रों से ढंपे हैं ॥ २१ ॥ यह पुरुष [ हृदय में सोने वाला ] विष्णु ( व्यापक ) प्रकट