भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषार्थसहिता ॥ ९३

एषधाताविधाताच पुराणोनिष्कलःशिवः ॥२२॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
यंवैविदित्त्वानबिभेतिमृत्योर्नान्यः पन्थाविद्यतेऽनाय २३
पृथिव्यापस्तथातेजो वायुराकाशमेवच ।
पञ्चैतानिविजानीयान्महाभूतानिपण्डितः ॥२४॥
चक्षुःश्रोत्रं स्पर्शनंच रसनं घ्राणमेवच ।
बुद्धीन्द्रियाणिजानीयात्पञ्चैमानिशरीरके ॥२५॥
रूपंशब्दस्तथास्पर्शो रसोगन्धस्तथैवच ।
इन्द्रियार्थान्विजानीयात्पञ्चैत्रसततं बुधः ॥ २६ ॥
हस्तौपादावुपस्थंच जिह्वापायुस्तथैवच ।
कर्मेन्द्रियाणिपञ्चैव नित्यमस्मिञ्शरीरके ॥ २७ ॥
मनोबुद्धिस्तथैवात्मा ह्यव्यक्तंचतथैवच ।
इन्द्रियेभ्यःपराणीह चत्वारिकथितानिच ॥ २८ ॥
चतुर्विंशत्यर्थेतानि तत्त्वानिकथितानिच ।


और अप्रकट सगुण तथा निर्गुणरूपों से नित्य है । यही धाता, विधाता, प्राचीन, कलाहीन और कल्याण स्वरूप है ॥ २२ ॥ इस को मैं महान् सूर्य के समान तेज वाला और तमोगुण से परे जानता हूं कि जिस को जान कर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता और इस से भिन्न मोक्ष के लिये कोई मार्ग नहीं है ॥ २३ ॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, इन पांच को पण्डित लोग महा भूत जानें ॥२४॥ १-नेत्र, २-कान, ३-त्वचा, ४-रसना, (जिह्वा के अग्र भाग में रहता इन्द्रिय ) ५-घ्राण ( नाक के अग्र भाग में रहता है ) इन पांचो को इस शरीर में ज्ञान इन्द्रिय जानना चाहिये ॥ २५ ॥ रूप, शब्द, स्पर्श, रस, गंध, इन पांचों को उक्त इन्द्रियों के पांच विषय पण्डित लोग निरन्तर जानें ॥ २६ ॥ हाथ, पांव, उपस्थ, जिह्वा, और गुदा ये पांच इस शरीर में नित्य सम्बद्ध कर्मेन्द्रिय कहाते हैं ॥ २७ ॥ मन, बुद्धि, आत्मा, ( महत्तत्त्व ) अव्यक्त ( प्रधान ) ये चार तत्त्व इन्द्रियों से परे [सूक्ष्म या कारण रूप] कहे हैं ॥२८॥ ये पूर्वोक्त चौबीस तत्त्व कहाते हैं, और आत्मा जो पुरुष ( ईश्वर है वह