अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 483, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ शंखस्मृतिः ॥
तथात्मानंतदृत्यतीतं पुरुषंपञ्चविंशकम् ॥ २९ ॥
यन्तुज्ञात्वाविमुच्यन्ते येजनाःसाधुवृत्तयः ।
तदिदंपरमंगुह्यमेतदक्षरमुत्तमम् ॥ ३० ॥
अशब्दरसमस्पर्शमरूपंगन्धवर्जितम् ।
निर्दुःखमसुखंशुद्धं तद्विष्णोःपरमंपदम् ॥ ३१ ॥
अजंनिरञ्जनंशान्तमव्यक्तन्ध्रुवमक्षरम् ।
अनादिनिधनंब्रह्म तद्विष्णोःपरमंपदम् ॥ ३२ ॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवन्धनः ।
सोऽध्वनःपारमाप्नोति तद्विष्णोःपरमंपदम् ॥ ३३ ॥
वालाग्रशतशोभागः कल्पितस्तुसहस्रधा ।
तस्यापिशतमाद्भागाज्जीवःसूक्ष्मउदाहृतः ॥ ३४ ॥
इन्द्रियेभ्यःपराह्यर्था अर्थेभ्यश्चपरम्मनः ।
मनसस्तुपराबुद्धिर्बुद्धेरात्मातथापरः ॥ ३५ ॥
महतःपरमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषःपरः ।
पञ्चीसवां उक्त चौबीस तत्त्वों से परे है ॥ २९ ॥ जो मनुष्य साधु नाम शुद्ध स्वभाव के हैं वे जिस को जान कर मुक्त होते हैं। सो यह ब्रह्म परम (श्रेष्ठ) गुप्त अविनाशी और सर्वोत्तम है ॥ ३० ॥ उस आत्मा में शब्द नहीं, रस नहीं, स्पर्श नहीं, रूप नहीं, गन्ध नहीं है जिसमें, न दुःख है न सुख है वही विष्णु व्यापक परमात्मा का शुद्ध परम पद है ॥ ३१ ॥ जो जन्म और कर्मों की वासनाओं से शून्य, शान्त, अप्रत्यक्ष, नित्य, अविनाशी है, जिसके आदि और अन्तभी नहीं हैं और जो ब्रह्मरूप है वही विष्णु भगवान् का परमपद है ॥ ३२ ॥ जिस मनुष्य का विज्ञान ही सारथि है और प्रग्रह (लगाम की रश्मी) से जिस का मन बंधा है वही संसार मार्ग के परले छोर पर वर्त्तमान उस विष्णु भगवान् के परम पद को प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥ बाल ( केश ) के अग्रभाग के एक हजार टुकड़े किये जायं उन में से एक टुकड़े का जो सौवां भाग उससे भी सूक्ष्म ( छोटा ) जीव कहा है ॥ ३४ ॥ इन्द्रियों से परे नाम सूक्ष्म कारण रूप अर्थ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध नामक विषय) हैं अर्थों से परे सूक्ष्म कारण मन, मनसे परे बुद्धि और बुद्धि से परे सूक्ष्म कारण (महतत्त्व) वा जीव पदवाच्य आत्मा है ॥ ३५ ॥ महत्तत्त्व से परे सूक्ष्म कारण अव्यक्त नाम प्रधान व प्रकृति है, अव्यक्त से परे सूक्ष्म