भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषाधर्मसंहिता ॥ १९

पुरुषान्नपरंकिञ्चित् साकाष्ठासापरागतिः ॥ ३६ ॥
एषसर्वेषुभूतेषु तिष्ठत्यविकलःसदा ।
दृश्यतेत्वग्र्ययाबुद्ध्या सूक्ष्मयासूक्ष्मदर्शिभिः ॥ ३७ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
नित्यंनैमित्तिकंकाम्यं क्रियाङ्गमलकर्षणम् ।
क्रियास्नानं तथाषष्ठं षोढास्नानंप्रकीर्त्तितम् ॥ १ ॥
अस्नातःपुरुषोऽनर्हो जप्यौग्निहवनादिषु ।
प्रातःस्नानंतदर्थंच नित्यस्नानंप्रकीर्त्तितम् ॥ २ ॥
चण्डालशवपूयाद्यं स्पृष्ट्वास्नानंरजस्वलाम् ।
स्नानाऽनर्हस्तुयःस्नाति स्नानंनैमित्तिकंचतत् ॥ ३ ॥
पुण्यस्नानादिकंस्नानं दैवज्ञविधिचोदितम् ।
तद्धिकाम्यंसमुद्दिष्टं नाकामस्तत्प्रयोजयेत् ॥ ४ ॥
जप्तुकामःपवित्राणि अर्चिष्यन्देवतापितॄन् ।


पुरुष है । और पुरुष नाम (ब्रह्म) से परे सूक्ष्म कारण और कुछ नहीं है किन्तु वही स्थिरता की अन्तिम सीमा और वही परम गति है ॥ ३६ ॥ वह परमात्मा इन सब चराचर भूतों में सदैव अविकल एकमा कपड़ों में कपास वा सूत के समान ठहरा हुआ है । सूक्ष्म बुद्धि वाले मनुष्य, नवीन सूक्ष्म बुद्धि से उस ब्रह्म को देखते हैं ॥ ३७ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियांग, मलकर्षण, क्रियास्नान, यह छः प्रकार का स्नान कहाता है ॥ १ ॥ बिना स्नान किये मनुष्य जप सन्ध्या तथा अग्निहोत्र आदि के करने में अयोग्य होता है इसलिये सदा प्रातःकाल का स्नान नित्य स्नान कहाता है ॥ २ ॥ चांडाल, [ भंगी ] शव, [मुर्दा] पूय, राध-पीव, और रजस्वला स्त्री इनको स्पर्श (छू) कर स्नान के पीछेभी जो स्नान करे वह स्नान नैमित्तिक कहाता है ॥३॥ पुष्य नक्षत्र आदिके समयमें जो ज्योतिष शास्त्र में कहा स्नान है वह काम्य है और निष्काम मनुष्य उस काम्य स्नान को कदापि न करे ॥ ४ ॥ पवित्र मन्त्रों के जपनेके लिये अथवा देवता और पितरों के