अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० शङ्खस्मृतिः ॥
स्नानंसमाचरेद्यस्तु क्रियाङ्गंतत्प्रकीर्तितम् ॥ ५ ॥
मलापकर्षणार्थाय स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम् ।
मलापकर्षणार्थाय प्रवृत्तिस्तस्यनान्यथा ॥ ६ ॥
सरित्सुदेवखातेषु तीर्थेषुचनदीषुच ।
क्रियास्नानंसमुद्दिष्टं स्नानंतत्रमहाक्रिया ॥ ७ ॥
तत्रकाम्यंतुकर्त्तव्यं यथावद्विधिवोदितम् ।
नित्यंनैमित्तिकंचैव क्रियाङ्गंमलकर्षणम् ॥ ८ ॥
तीर्थाभावेतुकर्त्तव्यमुष्णोदकपरोदकैः ।
स्नानंतुवन्हितप्तेन तथैवपरवारिणा ॥ ९ ॥
शरीरशुद्धिर्विज्ञेया नतुस्नानफलंलभेत् ।
अद्भिर्गात्राणिशुद्ध्यन्ति तीर्थस्नानात्फलंभवेत् ॥ १० ॥
सरःसुदेवखातेषु तीर्थेषुचनदीषुच ।
स्नानमेवक्रियातस्मात्स्नानात्पुण्यफलंसमृतम् ॥११॥
पूजने के अर्थ जो मनुष्य स्नान करे उस स्नान को क्रियांग कहते हैं ॥ ५ ॥
मैल के दूर करने के लिये उबटना वा तैल मर्दन पूर्वक जो स्नान है उसे मलकर्षण स्नान कहते हैं क्योंकि उस स्नान करने में मनुष्य की प्रवृत्ति मैल दूर करने के लिये है अन्यथा नहीं है ॥ ६ ॥ नदी, देवताओं के खोदे कुण्ड, तीर्थ, और छोटी २ नदी, इन में किया स्नान क्रिया स्नान कहाता है क्योंकि इन में स्नान करना उत्तम कर्म है ॥ ७ ॥ उन में पूर्वोक्त नदी आदि में ही काम्य स्नान यथोचित विधि से करना चाहिये । नित्य, नैमित्तिक, क्रियांग, और मलकर्षण ये चार प्रकार के स्नान ॥ ८ ॥ नदी घाट आदि के अभाव में गर्म जल से अथवा नदी आदि से भिन्न किसीप्रकार के जल से भी कर लेवे । अग्नि से तपाये तथा अन्य मनुष्य के निकाले जल से जो स्नान करना है ॥९॥ उस से शरीर की शुद्धि मात्र जानो किन्तु स्नान का विशेष फल वहां नहीं मिलता है । क्योंकि जलों से केवल गात्र शुद्ध होते हैं और तीर्थ स्नान से विशेष फल मिलता है ॥ १० ॥ सरोवर, देवताओं के खोदे तालाब, तीर्थ, नदी, इन में स्नान करना ही उत्तम कर्म है इस कारण स्नान करने से पुण्य फल है ॥११॥