भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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पृष्ठ 486

भाषार्थसहिता ॥ २१

तीर्थंप्राप्यानुषङ्गेण स्नानंतीर्थेसमाचरेत् ।
स्नानजंफलमाप्नोति तीर्थयात्राफलंनतु ॥ १२ ॥
सर्वतीर्थानिपुण्यानि पापाघ्नानिसदानृणाम् ।
परस्पराऽनपेक्षाणि कथितानिमनीषिभिः ॥ १३ ॥
सर्वेप्रस्रवणाःपुण्याः सरांसिचशिलोच्चयाः ।
नद्यःपुण्यास्तथासर्वा जाह्नवीतुविशेषतः ॥ १४ ॥
यस्यपादौचहस्तौच मनश्चैवसुसंयतम् ।
विद्यातपश्चकीर्त्तिश्च सतीर्थफलमश्नुते ॥ १५ ॥
नृणांपापकृतांतीर्थे पापस्यशमनंभवेत् ।
यथोक्तफलदंतीर्थं भवेच्छुद्धात्मनांनृणाम् ॥ १६ ॥

इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

क्रियास्नानंतुवक्ष्यामि यथावद्विधिपूर्वकम् ।
मृद्भिरद्भिश्कतर्व्यं शौचमादौयथाविधि ॥ १ ॥
जलेनिमग्नउन्मज्य उपस्पृश्ययथाविधि ।


अकस्मात् अन्य कार्य वश तीर्थ में जाकर जो स्नान करे वह स्नान के फल को तो प्राप्त होगा, पर तीर्थयात्रा का फल उस को नहीं मिलेगा ॥१२॥
सब तीर्थ पवित्र, सदैव मनुष्यों के पापनाशक और परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा न रखने वाले महात्माओं ने कहे हैं ॥ १३ ॥ झरने, सरोवर, पर्वत, नदी, ये सब पुण्यदायक हैं और विशेष कर गंगा जी पवित्र हैं ॥ १४ ॥ जिस के पग, हाथ और मन, ये वशीभूत हैं जो विद्या, तप और कीर्त्ति वाला है वही तीर्थ के फल को भोगता है ॥ १५ ॥ पापी मनुष्यों के पाप की शान्ति (नाश) तीर्थ में हो जाती है । और शुद्ध है मन जिन का ऐसे मनुष्यों को तीर्थ यथोक्त फल का देने वाला होता है ॥ १६ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥

अब क्रियास्नान को यथावत् विधिपूर्वक कहते हैं । प्रथम मट्टी और जल से विधिपूर्वक शरीर की शुद्धि करे ॥ १ ॥ जल में गोता लगा कर और बाहर निकल कर विधिपूर्वक आचमन करके जल का आवाहन करे । उसको