अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 487, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२२ शंखस्मृतिः ॥
जलस्यावाहनंकुर्यात्तत्प्रवक्ष्याम्यतःपरम् ॥ २ ॥
प्रपद्येवरुणंदेवमम्भसांपतिमूर्जितम् ।
याचितंदेहिमेतीर्थं सर्वपापापनुत्तये ॥ ३ ॥
तीर्थमावाहयिष्यामि सर्वाघविनिषूदनम् ।
सान्निध्यमस्मिन्सत्तोये भजत्वंमदनुग्रहात् ॥ ४ ॥
रुद्रान्प्रपद्येवरदान्सर्वानप्सुसदस्तथा ।
सर्वानप्सुसदश्चैव प्रपद्येप्रणतःस्थितः ॥ ५ ॥
देवमप्सुसदंवन्हिं प्रपद्येऽघनिषूदनम् ।
आपःपुण्याःपवित्राश्च प्रपद्येशरणंतथा ॥ ६ ॥
रुद्राश्चाग्निश्चसर्पाश्च वरुणश्चापएवच ।
शमयन्त्वाशुमेपापं मांरक्षन्तुचसर्वशः ॥ ७ ॥
इत्येवमुक्त्वाकर्त्तव्यं ततःसम्मार्जनंजले ।
आपोहिष्ठेतितिसृभिर्यथावदनुपूर्वशः ॥ ८ ॥
हिरण्यवर्णेतिवदेदग्निञ्चतितिसृभिस्तथा ।
पूर्वरूप से कहते हैं कि ॥ २ ॥ बड़े और जलों के पति वरुण देव की मैं शरण होता हूं । हे वरुणदेव ! जिस तीर्थ को मैं चाहूं सम्पूर्ण पापों के दूर करने के अर्थ उसी तीर्थ को आप मुझे दीजिये ॥३॥ सम्पूर्ण पापों के दूर करने वाले तीर्थ का मैं आवाहन करता हूं । हे तीर्थ ! मेरे पर अनुग्रह करके इस उत्तम जल के समीप आइये ॥ ४ ॥ जल में रहते हुए रुद्रों की शरण लेता तथा जल के निवासी अन्य देवताओं को भी मैं नमस्कार करता हुआ शरणागत होता हूं ॥ ५ ॥ जल के भीतर व्यापक पाप के नाश करने वाले अग्नि देवता के भी मैं शरण होता हूं । और पुण्य रूप और पवित्र जलों के भी मैं शरण होता हूं ॥ ६ ॥ रुद्र, अग्नि, सर्प, वरुण, और जल ये सब देवता मेरे पापों का शीघ्र नाश करें और मेरी चारों ओर से रक्षा करें ॥ ७ ॥ ऐसे कह कर फिर जलाशय में घुस कर ( आपोहिष्ठा० ऋ० प्र० ७ अ० ६ । व० ५ ) इत्यादि तीन ऋचाओं के क्रम से यथोक्त ( भली प्रकार ) मार्जन करे ॥ ८ ॥ ( हिरण्यवर्णा० अप्रिरथ० ऋ० ४ । ३ । २५ ) इत्यादि तीन ऋचा (शन्नो देवी०