भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषार्थसहिता ॥ २३

शन्नोदेवीतित्वतथा शन्नआपस्तथैवच ॥ ९ ॥
इदमपःप्रवहत स्तथामन्त्रमुदीरयेत् ।
एवंमन्त्रान्समुच्चार्य छन्दांसिस्तृषिदेवताः ॥ १० ॥
अघमर्षणसूक्तस्य संस्मरेत्प्रयतःसदा ।
छन्दआनुष्टुभन्तस्य ऋषिस्त्वैवाघमर्षणः ॥ ११ ॥
देवताभाववृत्तस्तु पापघ्नस्यप्रकीर्त्तितः ।
ततोम्भसिनिमग्नस्तु त्रिःपठेद्घमर्षणम् ॥ १२ ॥
यथाश्वमेधःक्रतुराट् सर्वपापप्रणाशनः ।
तथाघमर्पणसूक्तं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १३ ॥
अनेनस्नात्वाऽम्मध्ये स्नानवान्धौतवाससा ।
परिवर्त्तितवासास्तु तीर्थतीरमुपस्पृशेत् ॥ १४ ॥
उदकस्याप्रदानाञ्च स्नानशाटीन्नपीडयेत् ।
अनेनविधिनास्नानन्तीर्थस्यफलमश्नुते ॥ १५ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि शुभामाचमनक्रियाम् ।


यजु० ३६ । १२ ) - ( शन्न आपः ) इन मन्त्रों को पढ़े ॥९॥ ( इदमपः प्रवहत० ऋ० १ । ६ । ५ ) इस मन्त्र को कहै इसप्रकार मन्त्रों का उच्चारण करके छन्द ऋषि, और देवता जो ॥ १० ॥ अघमर्षण सूक्त के हैं उन को सावधानी से सदैव स्मरण करै । अघमर्षण सूक्त का छन्द अनुष्टुप् , ऋषि अघमर्षण है ॥११॥ पाप के नाशक अघमर्षण सूक्त का भाववृत्त देवता कहा है । फिर जल में गोता लगाये हुए तीन बार अघमर्षण सूक्त को पढ़ै ॥ १२ ॥ जैसे यज्ञों में सब से बड़ा यज्ञ अश्वमेध सब पापों का नाशक है इसी प्रकार अघमर्षण सूक्त सब पापों का नाशक है ॥ १३ ॥ इस विधि से जल में स्नान करके धौत वस्त्र को बदल कर तीर्थ के तीर पर आचमन करै ॥ १४ ॥ और जल दान (तर्पण) किये बिना स्नान की धोती को न निचोड़े जो इस विधि से स्नान करता है वही तीर्थ के फल को भोगता है ॥१५॥

यह शंखस्मृति के भावानुवाद में नवमा अध्याय पूरा हुआ ॥
इस से आगे शोभन आचमन के कर्म को कहते हैं कनिष्ठिका छोटी