अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 489, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ शंखस्मृतिः ॥
कायंकनिष्ठिकामूले तीर्थमुक्तंमनीषिभिः ॥ १ ॥
अङ्गुष्ठमूलेचतथा प्राजापत्यंविचक्षणैः ।
अङ्गुल्यग्रेस्मृतं दैवं पित्र्यंतर्जनिमूलके ॥ २ ॥
प्राजापत्येनतीर्थेन त्रिःप्राश्नीयाज्जलं द्विजः ।
द्विःप्रमृज्यमुखंपश्चात्खान्यद्भिःसमुपस्पृशेत् ॥ ३ ॥
हृद्गाभिःपूयतेविप्रः कण्ठगाभिश्चभूमिपः ।
तालुगाभिस्तथावैश्यः शूद्रःस्पृष्टाभिरन्ततः ॥ ४ ॥
अन्तर्जानुःशुचौदेशे प्राङ्मुखःसुसमाहितः ।
उदङ्मुखोवाप्रयतो दिशश्चानवलोकयन् ॥ ५ ॥
अद्भिःसमुद्धताभिस्तु हीनाभिःफेनबुद्बुदैः ।
वह्निनाचाप्यतप्ताभिरक्षाराभिरुपस्पृशेत् ॥ ६ ॥
तर्जन्यङ्गुष्ठयोगेन स्पृशेन्नासापुटद्वयम् ।
अङ्गुष्ठमध्यायोगेन स्पृशेन्नेत्रद्वयंततः ॥ ७ ॥
अङ्गुष्ठानामिकायोगे श्रवणौसमुपस्पृशेत् ।
अंगुलि के मूल (जड़) में काय तीर्थ महात्मा लोगों ने कहा है ॥ १ ॥ अंगूठे की जड़ में प्राजापत्य तीर्थ और अंगुलियों के अग्रभाग में देव तीर्थ और तर्जनी (अंगूठे के पास की अंगुली) की जड़ में पितृ तीर्थ पण्डितों ने कहा है ॥ २ ॥ प्राजापत्य तीर्थ से तीन बार द्विज पुरुष जल पीवे फिर दो बार मुख को पोंछ कर कान आदि छिद्रों का दहिने हाथ में जल लगा २ के स्पर्श करे ॥ ३ ॥ हृदय तक जाने वाले जलों से ब्राह्मण, कंठ तक जाने वाले जलों से क्षत्रिय, तालू तक जाने वालों से वैश्य और मुख पर स्पर्श किये जलों से शूद्र पवित्र होता है ॥ ४ ॥ गोड़ों के भीतर हाथ किये और सावधानी से पूर्व वा उत्तर दिशा की ओर मुख किये मनको वश में रख के बैठा दिशाओं को न देखता हुआ मनुष्य ॥५॥ कूप से निकाले, झाग बुल बुला जिन में नहीं, जो जल गर्म न किये हों, और खारे भी न हों ऐसे जलों से आचमन करे॥६॥ अंगूठा और तर्जनी को मिला कर (दोनों से) नासिका के दोनों छिद्रों का, बीच की अंगुली और अंगूठे से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे ॥ ७ ॥ अंगूठा और अनामिका के योग से दोनों कानों का, कनिष्ठिका अंगुली और अंगूठे के योग से