अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 490, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ २५
कनिष्ठाङ्गुष्ठयोगेन स्पृशेत्स्कन्धद्वयंततः ॥ ८ ॥ सर्वासामेवयोगेन नाभिंचहृदयंतथा । संस्पृशेच्चतथामूर्ध्नि एषआचमनेविधिः ॥ ९ ॥ त्रिःप्राश्नीयाद्यदम्भस्तु प्रीतास्तेनास्यदेवताः । ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रश्च भवन्तीत्यनुशुश्रुम ॥ १० ॥ गङ्गाचयमुनाचैव प्रियेतेपरिमार्जनात् । नासत्यदस्रौप्रीयेते स्पृष्टेनामापुटद्वये ॥ ११ ॥ स्पृष्टेलोचनयुग्मेतु प्रीयेते शशिभास्करौ । कर्णयुग्मेतथास्पृष्टे प्रीयेतेऽनिलानलौ ॥ १२ ॥ स्कन्धयोःस्पर्शानादस्य प्रीयन्तेसर्वदेवताः । मूर्ध्नःसंस्पर्शनादस्य प्रीतस्तुपुरुषोभवेत् ॥ १३ ॥ विनायज्ञोपवीतेन तथामुक्ताशिखोद्विजः । अप्रक्षालितपादस्तु आचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत् ॥ १४ ॥ बहिर्जानुरुपस्पृश्य एकहस्तार्पितैर्जलैः ।
दोनों कन्धों का स्पर्श करे ॥८॥ पांचो अंगुलियों को मिला के नाभि, हृदय, और मस्तक का स्पर्श करे यह आचमन का विधि है, यह इन्द्रियस्पर्श आचमन का अंग है। मलमूत्र त्याग के बाद शुद्धि करके ऐसा आचमन सदा ही कर्त्तव्य है ॥९॥ तीन बार आचमन में जल पीने से ब्रह्मा, विष्णु, शिव ये तीनों देवता इस मनुष्य पर प्रसन्न होते हैं, यह हम ने सुना है ॥१०॥ और मार्जन करने से गंगा, यमुना दोनों, और दोनों नासिका के दो छिद्रों के स्पर्श से अश्विनीकुमार प्रसन्न होते हैं ॥११॥ दोनों नेत्रों के स्पर्श से चन्द्रमा, सूर्य, दोनों कानों के स्पर्श करने से वायु और अग्नि देवता प्रसन्न होते हैं ॥ १२ ॥ दोनों कंधों के स्पर्श से सब देवता; और मस्तक के स्पर्श से मनुष्य पर परमेश्वर प्रसन्न होता है॥१३॥ बिना यज्ञोपवीत, चोटी में गांठ दिये बिना, और पग धोए बिना आचमन किये पर भी मनुष्य अशुद्ध रहता है ॥ १४ ॥ गोड़ों से बाहर हाथ किये एक हाथ से लिये जलों से, जूता पहिने हुए, और खड़ा हो कर, जो आचमन
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