अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 491, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ | शंखस्मृतिः ॥
सोपानत्कस्तथातिष्ठन्नैवशुद्धिमवाप्नुयात् ॥ १५ ॥
आचम्यचपुराप्रोक्तं तीर्थसम्मार्जनंतुयत् ।
उपस्पृशेत्ततःपश्चान्मन्त्रेणानेनधर्मतः ॥ १६ ॥
अन्तश्चरसिभूतेषु गुहायांविश्वतोमुखः ।
त्वंयज्ञस्त्वंवषट्कार आपोज्योतीरसोमृतम् ॥१७॥
आचम्यचततःपश्चादादित्याभिमुखोजलम् ।
उदुत्यंजांतवेदसमिति मन्त्रेणनिक्षिपेत् ॥ १८ ॥
एषएवविधिःप्रोक्तः सन्ध्ययोश्चद्विजातिषु ।
पूर्वासन्ध्यांजपंस्तिष्ठेदासीनःपश्चिमांतथा ॥ १९ ॥
ततोजपेत्पवित्राणि पवित्रंवाथ शक्तितः ।
ऋषयोदीर्घसन्ध्यत्वादीर्घमायुरवाप्नुयुः ॥ २० ॥
सर्ववेदपवित्राणि वक्ष्याम्यहमतःपरम् ।
येषांजपैश्चहोमैश्च पूयन्तेमानवाःसदा ॥ २१ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
करै वह शुद्ध नहीं होता ॥ १५ ॥ आचमन के पीछे जो तीर्थ के जलसे मार्जन कहा है तिस को करके धर्म पूर्वक इस मन्त्र से आचमन करे ॥ १६ ॥ हे सर्वत्र व्यापक जल ! तुम सब भूतों के हृदय में विचरते हो, यज्ञ, वषट्कार, ज्योति, रस, अमृत, आदि रूप तुम ही हो ॥ १७ ॥ फिर आचमन के पीछे सूर्य के सामने मुख करके (उदुत्यंजांतवेदसं०) मन्त्र से जल को फेंके अर्थात् सूर्य देवता को अर्घ देवे ॥ १८ ॥ द्विजातियों में दोनों काल की संध्याओं का यही विधि कहा है । प्रातःकाल की संध्या में खड़ा हो कर और सायंकाल की संध्या में बैठ कर गायत्री का जप करे ॥ १९ ॥ फिर पवित्र मन्त्रों को वा किसी एक पवित्र मन्त्र को शक्ति के अनुसार जपे । ऋषि लोग दीर्घ संध्या (सन्ध्या के समय ईश्वर का अधिक ध्यान) करने से दीर्घ (अधिक) अवस्थाको प्राप्त हुए हैं ॥ २० ॥ इस से आगे सम्पूर्ण वेद में जो पवित्र मन्त्र हैं तिन को कहते हैं जिन के जप और होम से सदैव मनुष्य पवित्र होते हैं ॥ २१ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में दशवां अध्याय पूरा हुआ ॥