अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 478, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ १३
यदाहारोभवेत्तेन पूजयेत्पितृदेवताः ।
तेनैवपूजयेन्नित्यमतिथिंसमुपागतम् ॥ ३ ॥
ग्रामादाहृत्यवाश्नीयादष्टौग्रासान्समाहितः ।
स्वाध्यायंचतथाकुर्याज्जटाश्चैवबिभृयात्तथा ॥ ४ ॥
तपसाशोषयेन्नित्यं स्वयञ्चैवकलेवरम् ।
आर्द्रवासास्तुहेमन्ते ग्रीष्मेपञ्चतपास्तथा ॥ ५ ॥
प्रावृष्याकाशशायीच नक्ताशांचसदाभवेत् ।
चतुर्थकालिकोवास्यात् षष्ठकालिकएववा ॥ ६ ॥
कृच्छ्रैर्वापिनयेत्कालं ब्रह्मचर्यञ्चपालयेत् ।
एवंनीत्वावनेकालं द्विजोग्रह्माश्रमीभवेत् ॥ ७ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
कृत्वेष्टिंविधिवत्पश्चात् सर्ववेदसदक्षिणाम् ।
जो फल मूल आदि अपना भोजन हो उसी से पितर, देवता, और आये हुये अतिथि का नित्य पूजन करे ॥ ३ ॥ अथवा सावधान रहता हुआ ग्रामस्थ द्विजों के घरों से लाकर आठ ग्रास भोजन प्रतिदिन एकवार खाया करे। वेदको नित्य पढ़े और शिर पर जटाओं को रखा लेवे ॥ ४ ॥ तप से अपने शरीर को सुखा देवे, शीत काल में आर्द्र (भीगे) वस्त्र पहिने और ग्रीष्म (गरमी) में पंचाग्नि को तपे अर्थात् चारों दिशा में अग्नि सिलगावे बीच में आसन डाल कर बैठे ऊपर से सूर्य का घाम होवे ॥५॥ वर्षा में आकाश खुले (मैदान) में लेटे और सदैव रात्रि में ही भोजन करे अथवा चौथे काल में वा छठे काल में एक बार भोजन करे ॥६॥ अथवा कृच्छ्र व्रत के नियम से ही अपने काल को बितावे और ब्रह्मचर्य का पालन करे इस प्रकार ब्राह्मण अपने वानप्रस्थ समय को बिताकर संन्यास आश्रम का ग्रहण करे ॥ ७ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥
वानप्रस्थ का नियम पूरा होने पश्चात् सर्ववेदस नाम अपना सब पदार्थ जिस में दक्षिणा देदिया जाय ऐसी प्राजापत्या इष्टि करके और अपने आ-त्मा में ही अग्नियों का विधिपूर्वक समारोप करके संन्यास आश्रम को