अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 477, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें९२ | शंखस्मृतिः ॥
यजेतपशुबन्धैश्च चातुर्मास्यैस्तथैव च ।
त्रैवार्षिकाधिकान्नस्तु पिबेत्सोममतन्द्रितः ॥ १६ ॥
इष्टिं वैश्वानरीं कुर्यात्तथाचाल्पधनो द्विजः ।
न भिक्षेत धनं शूद्रात्सर्वं दद्याच्च भिक्षितम् ॥ १७ ॥
वृतन्तु न त्यजेद्विद्वानृत्विजं पूर्वमेव च ।
कर्मणा जन्मना शुद्धं विद्यया च वृणीत तम् ॥ १८ ॥
एतैरेव गुणैर्युक्तं धर्मार्जितधनं तथा ।
याजयीत सदा विप्रो ग्राह्यस्तस्मात्प्रतिग्रहः ॥ १९ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥ १ ॥
पुत्रेषु दारान् निक्षिप्य तया वानुगतो वनम् ।
अग्नीनुपचरेन्नित्यं वन्यमाहारमाहरेत् ॥ २ ॥
पशुबन्ध यज्ञों और चातुर्मास्य यज्ञों के वैश्वदेवादि चारों पर्वों द्वारा ईश्वर की पूजा करे और तीन वर्ष के निर्वाह से अधिक अन्न का सञ्चय रखने वाला पुरुष हो तो आलस्य छोड़ कर सोम अर्थात् अग्निष्टोम यज्ञ करे ॥ १६ ॥
यदि थोड़े धन वाला ब्राह्मण होतो वैश्वानरी इष्टि कल्पशास्त्र में लिखे अनुसार करे और यज्ञ के लिये शूद्र से धन न मांगे और द्विजों से मांगा भिक्षा का सब धन यज्ञ के अन्त में दान करदेवे ॥ १७ ॥ विद्वान् मनुष्य विधि से वरण (स्वीकार) किये ऋत्विज का त्याग न करे । जन्म तथा कर्म से शुद्ध हो तथा विद्या से पूर्ण हो उसी ऋत्विज का वर्ण करे ॥ १८ ॥ इन्हीं पूर्व गुणों से जो युक्त हो, तथा धर्मानुकूल उपाय से जिस ने धन का संचय किया हो उसी को विद्वान् ब्राह्मण सदैव यज्ञ करावे और उसी से प्रतिग्रह-दान लेवे ॥ १९ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
गृहस्थ पुरुष जब अपने देह में वली (त्वचा की सकुड़न) पलित (बालों का सफेद होना) देखे और पुत्र के पुत्र या कन्या हो जाय, तब वह वन में चला जावे अर्थात् वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण करे ॥ १ ॥ पुत्रों के समीप अपनी स्त्री को सौंप कर अथवा स्त्री को भी संग लेकर वनमें जाकर श्रौतस्मार्त अग्नियों की सेवा करे अर्थात् वन में भी विधिपूर्वक अग्निहोत्र कियाकरे और जो वनमें पैदा हों उन कन्द मूल आदिका ही भोजन करे ॥ २ ॥