अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 476, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९१
राजास्वर्गमवाप्नोति प्राप्नोतिपरिपालनात् ॥ ९ ॥
नस्नानेननमौनेन नैवाग्निपरिचर्य्यया ।
ब्रह्मचारीदिवंयाति सयातिगुरुपूजनात् ॥ १० ॥
नाग्निशुश्रूषयाक्षान्त्या स्नानेनविविधेनच ।
वानप्रस्थोदिवंयाति यातिभोजनवर्जनात् ॥ ११ ॥
नदण्डैर्नचमौनेन शून्यागाराश्रयेणच ।
यतिःसिद्धिमवाप्नोति योगेनाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ १२ ॥
नयज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्वन्हिशुश्रूषयातथा ।
गृहीस्वर्गमवाप्नोति यथाचातिथिपूजनात् ॥ १३ ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गृहस्थोऽतिथिमागतम् ।
आहारशयनाद्येन विधिवत्प्रतिपूजयेत् ॥ १४ ॥
सायंप्रातश्चजुहुयादग्निहोत्रंयथाविधि ।
दर्शञ्चपूर्णमासंच जुहुयाद्विधिवत्तथा ॥ १५ ॥
के यज्ञों से राजा स्वर्ग को प्राप्त नहीं होता किन्तु धर्मानुसार ठीक २ प्रजा की रक्षा करने से राजा को स्वर्ग प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ स्नान (शुद्धि) मौन रहना और अग्नि की सेवा (समिदाधान) इन से ब्रह्मचारी स्वर्ग में नहीं जाता किन्तु गुरु की सेवा पूजा करने से स्वर्ग में जाता है ॥ १० ॥ अग्नि की सेवा (पञ्चाग्निताप) क्षमा, और अनेक प्रकार के वार २ स्नान करने से वानप्रस्थ स्वर्ग में तिस प्रकार नहीं जाता कि जैसे भोजन के त्याग से जाता है अर्थात् उपवासों द्वारा इन्द्रियों की चंचलता मिटती है परमार्थ के विचारों में विघ्न नहीं होता ॥ ११ ॥ तीन दण्डों से, मौन से, और शून्य स्थान में रहने से सन्यासी सिद्धि को प्राप्त नहीं होता किन्तु योगाभ्यास से ही सर्वोत्तम गति वा सिद्धि को प्राप्त होता है ॥ १२ ॥ दक्षिणा वाले बड़े २ यज्ञों और ग्रीष्मकाल अग्रियों की सेवा रूप अग्निहोत्र से गृहस्थ पुरुष वैसा स्वर्ग में प्राप्त नहीं होता कि जैसा अतिथि के पूजन से उस को स्वर्ग होता है ॥ १३ ॥ तिस से गृहस्थ पुरुष आये हुये अतिथि को सम्पूर्ण यत्न से भोजन और शय्या आदि देकर विधि पूर्वक पूजन करे ॥ १४ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल से अग्निहोत्र करे और दर्शेटि तथा पूर्णमासेष्टियों को भी विधिपूर्वक प्रतिमास किया करे ॥ १५ ॥