अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१० शंखस्मृतिः ॥
पञ्चयज्ञविधानेन तत्पापंतस्यनश्यति ॥ २ ॥ देवयज्ञोभूतयज्ञः पितृयज्ञस्तथैवच । ब्रह्मयज्ञोनृयज्ञश्च पञ्चयज्ञाःप्रकीर्तिताः ॥ ३ ॥ होमोदैवोबलिर्भौतः पित्र्यःपिण्डक्रियास्मृतः । स्वाध्यायोब्रह्मयज्ञश्च नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ ४॥ वानप्रस्थोब्रह्मचारी यतिश्चैवतथाद्विजः । गृहस्थस्यप्रसादेन जीवन्त्येतेयथाविधि ॥ ५ ॥ गृहस्थएवयजते गृहस्थस्तप्यतेतपः । ददातिचगृहस्थश्च तस्माच्छ्रेयान्गृहाश्रमी ॥ ६ ॥ यथाभर्त्ताप्रभुःस्त्रीणां वर्णानांब्राह्मणोयथा । अतिथिस्तद्वदेवास्य गृहस्थस्यप्रभुःस्मृतः ॥ ७ ॥ नव्रतैनोपवासैश्च धर्मेणविविधेनच । नारीस्वर्गमवाप्नोति प्राप्नोतिपतिपूजनात् ॥ ८ ॥ नव्रतैनोपवासैश्च नचयज्ञैःपृथग्विधैः ।
हत्याओं सम्बन्धी पाप नष्ट हो जाता है ॥ २ ॥ देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, और मनुष्ययज्ञ, ये पांच महायज्ञ कहाते हैं ॥ ३ ॥ लवण रहित भोजन के वस्तु भात आदि का होम देवयज्ञ, उन २ के नाम से भूमि या पत्तों पर ग्रास धरना भूतयज्ञ, पितरों के लिये अपसव्य से पिण्डदान को पितृयज्ञ, विधिपूर्वक वेदादि का पाठ ब्रह्मयज्ञ और अतिथि का भोजनादि से सत्कार पूजन, मनुष्ययज्ञ कहाता है ॥ ४ ॥ वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, और सन्यासी ये तीनों, द्विज गृहस्थ के भिक्षारूप प्रसाद से यथाविधि (यथार्थ से) जीवते हैं ॥ ५ ॥ गृहस्थ ही यज्ञ करता, गृहस्थ ही तप करता और गृहस्थ ही दान देता है तिस से गृहस्थाश्रम ही सब से उत्तम है ॥ ६ ॥ जैसे स्त्रियों का रक्षक पति, जैसे वर्णों का रक्षक ब्राह्मण है इसी प्रकार गृहस्थ का प्रभु अतिथि कहाताहै ॥७॥ व्रत उपवास और अनेक प्रकारके धर्मसेवन से स्त्री स्वर्गको प्राप्त नहीं होती किन्तु श्रद्धाभक्ति के साथ तन मन धन से पतिकी सेवा पूजा से स्त्री को निश्चित स्वर्ग होता है ॥८॥ व्रत, उपवास, और अपने किये अनेक प्रकार