अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषार्थसहिता ॥ १३
यदाहारोभवेत्तेन पूजयेत्पितृदेवताः ।
तेनैवपूजयेन्नित्यमतिथिंसमुपागतम् ॥ ३ ॥
ग्रामादाहृत्यवाश्नीयादष्टौग्रासान्समाहितः ।
स्वाध्यायंचतथाकुर्याज्जटाश्चैवबिभृयात्तथा ॥ ४ ॥
तपसाशोषयेन्नित्यं स्वयञ्चैवकलेवरम् ।
आर्द्रवासास्तुहेमन्ते ग्रीष्मेपञ्चतपास्तथा ॥ ५ ॥
प्रावृष्याकाशशायीच नक्ताशांचसदाभवेत् ।
चतुर्थकालिकोवास्यात् षष्ठकालिकएववा ॥ ६ ॥
कृच्छ्रैर्वापिनयेत्कालं ब्रह्मचर्यञ्चपालयेत् ।
एवंनीत्वावनेकालं द्विजोग्रह्माश्रमीभवेत् ॥ ७ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
कृत्वेष्टिंविधिवत्पश्चात् सर्ववेदसदक्षिणाम् ।
जो फल मूल आदि अपना भोजन हो उसी से पितर, देवता, और आये हुये अतिथि का नित्य पूजन करे ॥ ३ ॥ अथवा सावधान रहता हुआ ग्रामस्थ द्विजों के घरों से लाकर आठ ग्रास भोजन प्रतिदिन एकवार खाया करे। वेदको नित्य पढ़े और शिर पर जटाओं को रखा लेवे ॥ ४ ॥ तप से अपने शरीर को सुखा देवे, शीत काल में आर्द्र (भीगे) वस्त्र पहिने और ग्रीष्म (गरमी) में पंचाग्नि को तपे अर्थात् चारों दिशा में अग्नि सिलगावे बीच में आसन डाल कर बैठे ऊपर से सूर्य का घाम होवे ॥५॥ वर्षा में आकाश खुले (मैदान) में लेटे और सदैव रात्रि में ही भोजन करे अथवा चौथे काल में वा छठे काल में एक बार भोजन करे ॥६॥ अथवा कृच्छ्र व्रत के नियम से ही अपने काल को बितावे और ब्रह्मचर्य का पालन करे इस प्रकार ब्राह्मण अपने वानप्रस्थ समय को बिताकर संन्यास आश्रम का ग्रहण करे ॥ ७ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥
वानप्रस्थ का नियम पूरा होने पश्चात् सर्ववेदस नाम अपना सब पदार्थ जिस में दक्षिणा देदिया जाय ऐसी प्राजापत्या इष्टि करके और अपने आ-त्मा में ही अग्नियों का विधिपूर्वक समारोप करके संन्यास आश्रम को
१४ शंखस्मृतिः ॥
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य द्विजोब्रह्माश्रमीभवेत् ॥ १ ॥
विधूमेन्यस्तमुसले व्यङ्गारेभुक्तवज्जने ।
अतीतेपात्रसम्पाते नित्यंभिक्षांयतिश्चरेत् ॥ २ ॥
सप्तगारांश्चरेद्भैक्षं भिक्षितंनानुभिक्षयेत् ।
नव्यथेच्चतथाऽलाभे यथालब्धेनवर्तयेत् ॥ ३ ॥
नास्वादयेत्तथैवान्नं नाश्नीयात्कस्यचिद्गृहे ।
मृन्मयालाबुपात्राणि यतीनांचविनिर्दिशेत् ॥ ४ ॥
तेषांसंमार्जनाच्छुद्धिरद्भिर्श्चैवप्रकीर्तिता ।
कौपीनाच्छादनंवासा विभृयादव्यथञ्चरन् ॥५॥
शून्यागारनिकेतःस्याद्यत्रसायंगृहोमुनिः ॥६॥
दृष्टिपूतंन्यसेत्पादं वस्त्रपूतंजलंपिबेत् ।
सत्यपूतांवदेद्वाचं मनःपूतंसमाचरेत् ॥७॥
चन्दनेनतुलिप्ताङ्गं वास्यैवं चैवतक्षतः ।
ग्रहण करे ॥ १ ॥ जब ग्राम में धूम उठना बन्द हो जाय, ऊखली से चावल निकाल कर मूसल भी जहां के तहां रख दिये हों, मनुष्यों ने भोजन भी कर लिये हों, रसोई या जल के पात्रों का इधर उधर ले जाना भी बन्द हो गया हो, तब संन्यासी भिक्षा के लिये नित्य गाम में जावे ॥२॥ सात घरों से भिक्षा मांगे, जिस के घर में भिक्षा मांग चुका हो फिर वहां से भिक्षा न मांगे, भिक्षा के न मिलने से दुःखी न हो और जितना मिले उतने से ही सन्तोष मान कर निर्वाह करे ॥ ३ ॥ अन्न को स्वाद ले २ कर न खाये, किसी के घर निमन्त्रित हो भोजन न करे और मिट्टी अथवा तुम्बी के पात्र यतियों के लिये शास्त्र में कहे हैं उन्हीं पात्रों से जलपानादि काम करे ॥४॥ और उन पात्रों की शुद्धि केवल जल से धोने से हो जाती है और सुख दुःख न मान कर उदासीन दशा में विचरता हुआ संन्यासी कौपीन और गुदड़ी दो ही वस्त्रों को धारण करे ॥ ५ ॥ जिस में अन्य कोई न रहता हो ऐसे शून्य घर में रात को रहे । जहां सायंकाल हो जाय वहीं ठहर जावे, मौन रहे ॥ ६ ॥ दृष्टि से देखकर मार्ग में पग रक्खे, वस्त्र से छानकर जल पीवे, सत्य वाणी बोले, और शुद्ध मन से विचरण करे ॥ ७ ॥ कोई पुरुष संन्यासी के किसी अंग में चन्दन लगाता हो, वा किसी अङ्ग को कोई काटता हो तो उन दोनों का भला बुरा
भाषार्थसंहिता ॥ १५
कल्याणंचाप्यकल्याणं तयोरेवनचिन्तयेत् ॥८॥
सर्वभूतसमोमैत्रः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
ध्यानयोगरतोभिक्षुः प्राप्नोतिपरमाङ्गतिम् ॥९॥
जन्मनायस्तुनिर्मुक्तो मरणेनतथैवच ।
आधिभिर्व्याधिभिश्चैव तंदेवाब्राह्मणंविदुः ॥१०॥
अशुचित्वंशरीरस्य प्रियाप्रियविपर्ययः ।
गर्भवासेचवसतिस्तस्मान्मुच्येतनान्यथा ॥११॥
जगदेतन्निराक्रन्दं नतुसारमनर्थकम् ।
भोक्तव्यमितिनिर्द्दिष्टो मुच्यतेनात्रसंशयः ॥१२॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्चकिल्विषम् ।
प्रत्याहारेणसंसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥१३॥
सव्याहृतिंसप्रणवां गायत्रींशिरसासह ।
त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ॥१४॥
कुछ भी चिन्तन न करे ॥ ८ ॥ सब प्राणियों पर सम दृष्टि रक्खे, सब को मित्र माने; मट्टी का ढेला, पत्थर, सोना, इनको एकसा समझे । ध्यान और योगाभ्यास में तत्पर रहे ऐसा जो भिक्षु संन्यासी है वह परमगति को प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ जीवते ही जो जन्म मरण के बन्धनों से मुक्त है, मन की पीड़ा और देह के रोग भी जिस को नहीं सताते, देवता लोग उसी को ब्राह्मण कहते हैं ॥ १० ॥ शरीर का अशुद्ध होना, प्रिय के स्थान में अप्रिय और अप्रिय के स्थान में प्रिय हो, मलिन स्थान गर्भ में वास होना, इन सब से संन्यास के बिना नहीं छूट सकता ॥११॥ यह जगत् बड़ा दारुण है, इसमें कुछ सार नहीं और अनर्थ रूप है। इसमें कर्मफल भोगना अवश्य है, इस बुद्धि से जो दुःख भोगता है, वह मुक्त होता है इस में संदेह नहीं है ॥ १२ ॥ प्राणायामों द्वारा इन्द्रियों के दोषोंको, और धारणाओं से शारीरकादि पापोंको भस्म करे । प्रत्याहार से संगों को और ध्यान द्वारा ईश्वर विरोधी नास्तिकता आदि को नष्ट करे ॥१३॥ प्राणोंको रोककर सात व्याहृति, ओंकार, और (आपोज्योती०) इस शिरोमन्त्र सहित गायत्री के तीन बार पढ़ने को प्राणायाम कहते हैं ॥१४॥
१६ शंखस्मृतिः ॥
मनसःसंयमस्तज्ज्ञैर्धारणेतिनिगद्यते ।
संहारश्चेन्द्रियाणांच प्रत्याहारःप्रकीर्तितः ॥१५॥
हृदिस्थध्यानयोगेन देवदेवस्यदर्शनम् ।
ध्यानंप्रोक्तंप्रवक्ष्यामि ध्यानयोगमतःपरम् ॥१६॥
हृदिस्थादेवतास्सर्वा हृदिप्राणाःप्रतिष्ठिताः ।
हृदिज्योतींषि सूर्यश्च हृदिसर्वंप्रतिष्ठितम् ॥१७॥
स्वदेहमरणिंकृत्वा प्रणवंचोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्विष्णुंपश्येद्वृदिस्थितम् ॥१८॥
हृद्यर्कश्चन्द्रमासूर्यः सोमोमध्येहुताशनः ।
तेजोमध्येस्थितंसत्त्वं सत्त्वमध्यस्थितोऽच्युतः ॥१९॥
अणोरणीयान्महतोमहीयानात्मास्यजन्तौर्निहितोगुहायाम्।
तेजोमयंपश्यतिवीतशोको धातुःप्रसादान्महिमानमात्मनः॥२०
वासुदेवस्तमोऽन्धानां प्रत्यक्षोनैवजायते ।
अज्ञानपटसंवीतैरिन्द्रियैर्विषयेप्सुभिः ॥२१॥
एषवैपुरुषोविष्णुर्व्यक्ताव्यक्तःसनातनः ।
संयमके जानने वाले मन के रोकने को धारणा कहते हैं, विषयों से इन्द्रियों के हटाने को प्रत्याहार कहते हैं ॥ १५ ॥ हृदय में ध्यान के योग से ब्रह्म के साक्षात् करने को ध्यान कहते हैं। इससे आगे ध्यानयोग को कहते हैं ॥१६॥ सब देवता, प्राण, तारागण, और सूर्य ये सब अध्यात्म रूप से हृदय में भी स्थित हैं ॥१७॥ अपने शरीर को नीचे की अधरारणी और ओंकार को ऊपर की अरणी मानके ध्यान के निरन्तर मन्थन रूप अभ्याससे हृदयमें स्थित विष्णु भगवान् के दिव्य रूप को देखे ॥१८॥ सूर्य, चन्द्रमा, फिर सूर्य, चन्द्रमा और इन चारों के बीच में अग्नि हृदय में रहते हैं। तेज के मध्य में सत्व गुण स्थित है, सत्त्वगुण में अच्युत (विष्णु) स्थित हैं ॥१९॥ छोटे से भी छोटा बड़ों से भी बड़ा आत्मा इस मनुष्य के हृदय में ठहरा हुआ है, नष्ट हो गया है शोक जिस का ऐसा पुरुष तेजोरूप आत्मा की महिमा को विधाता की दयासे देखता है ॥२०॥ अज्ञानान्धकार मे अन्धे हुए मनुष्यों को वासुदेव भगवान् प्रत्यक्ष नहीं होते, क्योंकि उन के विषय भोगों के लालची इन्द्रिय अज्ञानरूपी वस्त्रों से ढंपे हैं ॥ २१ ॥ यह पुरुष [ हृदय में सोने वाला ] विष्णु ( व्यापक ) प्रकट
भाषार्थसहिता ॥ ९३
एषधाताविधाताच पुराणोनिष्कलःशिवः ॥२२॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
यंवैविदित्त्वानबिभेतिमृत्योर्नान्यः पन्थाविद्यतेऽनाय २३
पृथिव्यापस्तथातेजो वायुराकाशमेवच ।
पञ्चैतानिविजानीयान्महाभूतानिपण्डितः ॥२४॥
चक्षुःश्रोत्रं स्पर्शनंच रसनं घ्राणमेवच ।
बुद्धीन्द्रियाणिजानीयात्पञ्चैमानिशरीरके ॥२५॥
रूपंशब्दस्तथास्पर्शो रसोगन्धस्तथैवच ।
इन्द्रियार्थान्विजानीयात्पञ्चैत्रसततं बुधः ॥ २६ ॥
हस्तौपादावुपस्थंच जिह्वापायुस्तथैवच ।
कर्मेन्द्रियाणिपञ्चैव नित्यमस्मिञ्शरीरके ॥ २७ ॥
मनोबुद्धिस्तथैवात्मा ह्यव्यक्तंचतथैवच ।
इन्द्रियेभ्यःपराणीह चत्वारिकथितानिच ॥ २८ ॥
चतुर्विंशत्यर्थेतानि तत्त्वानिकथितानिच ।
और अप्रकट सगुण तथा निर्गुणरूपों से नित्य है । यही धाता, विधाता, प्राचीन, कलाहीन और कल्याण स्वरूप है ॥ २२ ॥ इस को मैं महान् सूर्य के समान तेज वाला और तमोगुण से परे जानता हूं कि जिस को जान कर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता और इस से भिन्न मोक्ष के लिये कोई मार्ग नहीं है ॥ २३ ॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, इन पांच को पण्डित लोग महा भूत जानें ॥२४॥ १-नेत्र, २-कान, ३-त्वचा, ४-रसना, (जिह्वा के अग्र भाग में रहता इन्द्रिय ) ५-घ्राण ( नाक के अग्र भाग में रहता है ) इन पांचो को इस शरीर में ज्ञान इन्द्रिय जानना चाहिये ॥ २५ ॥ रूप, शब्द, स्पर्श, रस, गंध, इन पांचों को उक्त इन्द्रियों के पांच विषय पण्डित लोग निरन्तर जानें ॥ २६ ॥ हाथ, पांव, उपस्थ, जिह्वा, और गुदा ये पांच इस शरीर में नित्य सम्बद्ध कर्मेन्द्रिय कहाते हैं ॥ २७ ॥ मन, बुद्धि, आत्मा, ( महत्तत्त्व ) अव्यक्त ( प्रधान ) ये चार तत्त्व इन्द्रियों से परे [सूक्ष्म या कारण रूप] कहे हैं ॥२८॥ ये पूर्वोक्त चौबीस तत्त्व कहाते हैं, और आत्मा जो पुरुष ( ईश्वर है वह
३
१८ शंखस्मृतिः ॥
तथात्मानंतदृत्यतीतं पुरुषंपञ्चविंशकम् ॥ २९ ॥
यन्तुज्ञात्वाविमुच्यन्ते येजनाःसाधुवृत्तयः ।
तदिदंपरमंगुह्यमेतदक्षरमुत्तमम् ॥ ३० ॥
अशब्दरसमस्पर्शमरूपंगन्धवर्जितम् ।
निर्दुःखमसुखंशुद्धं तद्विष्णोःपरमंपदम् ॥ ३१ ॥
अजंनिरञ्जनंशान्तमव्यक्तन्ध्रुवमक्षरम् ।
अनादिनिधनंब्रह्म तद्विष्णोःपरमंपदम् ॥ ३२ ॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवन्धनः ।
सोऽध्वनःपारमाप्नोति तद्विष्णोःपरमंपदम् ॥ ३३ ॥
वालाग्रशतशोभागः कल्पितस्तुसहस्रधा ।
तस्यापिशतमाद्भागाज्जीवःसूक्ष्मउदाहृतः ॥ ३४ ॥
इन्द्रियेभ्यःपराह्यर्था अर्थेभ्यश्चपरम्मनः ।
मनसस्तुपराबुद्धिर्बुद्धेरात्मातथापरः ॥ ३५ ॥
महतःपरमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषःपरः ।
पञ्चीसवां उक्त चौबीस तत्त्वों से परे है ॥ २९ ॥ जो मनुष्य साधु नाम शुद्ध स्वभाव के हैं वे जिस को जान कर मुक्त होते हैं। सो यह ब्रह्म परम (श्रेष्ठ) गुप्त अविनाशी और सर्वोत्तम है ॥ ३० ॥ उस आत्मा में शब्द नहीं, रस नहीं, स्पर्श नहीं, रूप नहीं, गन्ध नहीं है जिसमें, न दुःख है न सुख है वही विष्णु व्यापक परमात्मा का शुद्ध परम पद है ॥ ३१ ॥ जो जन्म और कर्मों की वासनाओं से शून्य, शान्त, अप्रत्यक्ष, नित्य, अविनाशी है, जिसके आदि और अन्तभी नहीं हैं और जो ब्रह्मरूप है वही विष्णु भगवान् का परमपद है ॥ ३२ ॥ जिस मनुष्य का विज्ञान ही सारथि है और प्रग्रह (लगाम की रश्मी) से जिस का मन बंधा है वही संसार मार्ग के परले छोर पर वर्त्तमान उस विष्णु भगवान् के परम पद को प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥ बाल ( केश ) के अग्रभाग के एक हजार टुकड़े किये जायं उन में से एक टुकड़े का जो सौवां भाग उससे भी सूक्ष्म ( छोटा ) जीव कहा है ॥ ३४ ॥ इन्द्रियों से परे नाम सूक्ष्म कारण रूप अर्थ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध नामक विषय) हैं अर्थों से परे सूक्ष्म कारण मन, मनसे परे बुद्धि और बुद्धि से परे सूक्ष्म कारण (महतत्त्व) वा जीव पदवाच्य आत्मा है ॥ ३५ ॥ महत्तत्त्व से परे सूक्ष्म कारण अव्यक्त नाम प्रधान व प्रकृति है, अव्यक्त से परे सूक्ष्म
भाषाधर्मसंहिता ॥ १९
पुरुषान्नपरंकिञ्चित् साकाष्ठासापरागतिः ॥ ३६ ॥
एषसर्वेषुभूतेषु तिष्ठत्यविकलःसदा ।
दृश्यतेत्वग्र्ययाबुद्ध्या सूक्ष्मयासूक्ष्मदर्शिभिः ॥ ३७ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
नित्यंनैमित्तिकंकाम्यं क्रियाङ्गमलकर्षणम् ।
क्रियास्नानं तथाषष्ठं षोढास्नानंप्रकीर्त्तितम् ॥ १ ॥
अस्नातःपुरुषोऽनर्हो जप्यौग्निहवनादिषु ।
प्रातःस्नानंतदर्थंच नित्यस्नानंप्रकीर्त्तितम् ॥ २ ॥
चण्डालशवपूयाद्यं स्पृष्ट्वास्नानंरजस्वलाम् ।
स्नानाऽनर्हस्तुयःस्नाति स्नानंनैमित्तिकंचतत् ॥ ३ ॥
पुण्यस्नानादिकंस्नानं दैवज्ञविधिचोदितम् ।
तद्धिकाम्यंसमुद्दिष्टं नाकामस्तत्प्रयोजयेत् ॥ ४ ॥
जप्तुकामःपवित्राणि अर्चिष्यन्देवतापितॄन् ।
पुरुष है । और पुरुष नाम (ब्रह्म) से परे सूक्ष्म कारण और कुछ नहीं है किन्तु वही स्थिरता की अन्तिम सीमा और वही परम गति है ॥ ३६ ॥ वह परमात्मा इन सब चराचर भूतों में सदैव अविकल एकमा कपड़ों में कपास वा सूत के समान ठहरा हुआ है । सूक्ष्म बुद्धि वाले मनुष्य, नवीन सूक्ष्म बुद्धि से उस ब्रह्म को देखते हैं ॥ ३७ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियांग, मलकर्षण, क्रियास्नान, यह छः प्रकार का स्नान कहाता है ॥ १ ॥ बिना स्नान किये मनुष्य जप सन्ध्या तथा अग्निहोत्र आदि के करने में अयोग्य होता है इसलिये सदा प्रातःकाल का स्नान नित्य स्नान कहाता है ॥ २ ॥ चांडाल, [ भंगी ] शव, [मुर्दा] पूय, राध-पीव, और रजस्वला स्त्री इनको स्पर्श (छू) कर स्नान के पीछेभी जो स्नान करे वह स्नान नैमित्तिक कहाता है ॥३॥ पुष्य नक्षत्र आदिके समयमें जो ज्योतिष शास्त्र में कहा स्नान है वह काम्य है और निष्काम मनुष्य उस काम्य स्नान को कदापि न करे ॥ ४ ॥ पवित्र मन्त्रों के जपनेके लिये अथवा देवता और पितरों के
२० शङ्खस्मृतिः ॥
स्नानंसमाचरेद्यस्तु क्रियाङ्गंतत्प्रकीर्तितम् ॥ ५ ॥
मलापकर्षणार्थाय स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम् ।
मलापकर्षणार्थाय प्रवृत्तिस्तस्यनान्यथा ॥ ६ ॥
सरित्सुदेवखातेषु तीर्थेषुचनदीषुच ।
क्रियास्नानंसमुद्दिष्टं स्नानंतत्रमहाक्रिया ॥ ७ ॥
तत्रकाम्यंतुकर्त्तव्यं यथावद्विधिवोदितम् ।
नित्यंनैमित्तिकंचैव क्रियाङ्गंमलकर्षणम् ॥ ८ ॥
तीर्थाभावेतुकर्त्तव्यमुष्णोदकपरोदकैः ।
स्नानंतुवन्हितप्तेन तथैवपरवारिणा ॥ ९ ॥
शरीरशुद्धिर्विज्ञेया नतुस्नानफलंलभेत् ।
अद्भिर्गात्राणिशुद्ध्यन्ति तीर्थस्नानात्फलंभवेत् ॥ १० ॥
सरःसुदेवखातेषु तीर्थेषुचनदीषुच ।
स्नानमेवक्रियातस्मात्स्नानात्पुण्यफलंसमृतम् ॥११॥
पूजने के अर्थ जो मनुष्य स्नान करे उस स्नान को क्रियांग कहते हैं ॥ ५ ॥
मैल के दूर करने के लिये उबटना वा तैल मर्दन पूर्वक जो स्नान है उसे मलकर्षण स्नान कहते हैं क्योंकि उस स्नान करने में मनुष्य की प्रवृत्ति मैल दूर करने के लिये है अन्यथा नहीं है ॥ ६ ॥ नदी, देवताओं के खोदे कुण्ड, तीर्थ, और छोटी २ नदी, इन में किया स्नान क्रिया स्नान कहाता है क्योंकि इन में स्नान करना उत्तम कर्म है ॥ ७ ॥ उन में पूर्वोक्त नदी आदि में ही काम्य स्नान यथोचित विधि से करना चाहिये । नित्य, नैमित्तिक, क्रियांग, और मलकर्षण ये चार प्रकार के स्नान ॥ ८ ॥ नदी घाट आदि के अभाव में गर्म जल से अथवा नदी आदि से भिन्न किसीप्रकार के जल से भी कर लेवे । अग्नि से तपाये तथा अन्य मनुष्य के निकाले जल से जो स्नान करना है ॥९॥ उस से शरीर की शुद्धि मात्र जानो किन्तु स्नान का विशेष फल वहां नहीं मिलता है । क्योंकि जलों से केवल गात्र शुद्ध होते हैं और तीर्थ स्नान से विशेष फल मिलता है ॥ १० ॥ सरोवर, देवताओं के खोदे तालाब, तीर्थ, नदी, इन में स्नान करना ही उत्तम कर्म है इस कारण स्नान करने से पुण्य फल है ॥११॥
भाषार्थसहिता ॥ २१
तीर्थंप्राप्यानुषङ्गेण स्नानंतीर्थेसमाचरेत् ।
स्नानजंफलमाप्नोति तीर्थयात्राफलंनतु ॥ १२ ॥
सर्वतीर्थानिपुण्यानि पापाघ्नानिसदानृणाम् ।
परस्पराऽनपेक्षाणि कथितानिमनीषिभिः ॥ १३ ॥
सर्वेप्रस्रवणाःपुण्याः सरांसिचशिलोच्चयाः ।
नद्यःपुण्यास्तथासर्वा जाह्नवीतुविशेषतः ॥ १४ ॥
यस्यपादौचहस्तौच मनश्चैवसुसंयतम् ।
विद्यातपश्चकीर्त्तिश्च सतीर्थफलमश्नुते ॥ १५ ॥
नृणांपापकृतांतीर्थे पापस्यशमनंभवेत् ।
यथोक्तफलदंतीर्थं भवेच्छुद्धात्मनांनृणाम् ॥ १६ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
क्रियास्नानंतुवक्ष्यामि यथावद्विधिपूर्वकम् ।
मृद्भिरद्भिश्कतर्व्यं शौचमादौयथाविधि ॥ १ ॥
जलेनिमग्नउन्मज्य उपस्पृश्ययथाविधि ।
अकस्मात् अन्य कार्य वश तीर्थ में जाकर जो स्नान करे वह स्नान के फल को तो प्राप्त होगा, पर तीर्थयात्रा का फल उस को नहीं मिलेगा ॥१२॥
सब तीर्थ पवित्र, सदैव मनुष्यों के पापनाशक और परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा न रखने वाले महात्माओं ने कहे हैं ॥ १३ ॥ झरने, सरोवर, पर्वत, नदी, ये सब पुण्यदायक हैं और विशेष कर गंगा जी पवित्र हैं ॥ १४ ॥ जिस के पग, हाथ और मन, ये वशीभूत हैं जो विद्या, तप और कीर्त्ति वाला है वही तीर्थ के फल को भोगता है ॥ १५ ॥ पापी मनुष्यों के पाप की शान्ति (नाश) तीर्थ में हो जाती है । और शुद्ध है मन जिन का ऐसे मनुष्यों को तीर्थ यथोक्त फल का देने वाला होता है ॥ १६ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में आठवां अध्याय पूरा हुआ ॥
अब क्रियास्नान को यथावत् विधिपूर्वक कहते हैं । प्रथम मट्टी और जल से विधिपूर्वक शरीर की शुद्धि करे ॥ १ ॥ जल में गोता लगा कर और बाहर निकल कर विधिपूर्वक आचमन करके जल का आवाहन करे । उसको
२२ शंखस्मृतिः ॥
जलस्यावाहनंकुर्यात्तत्प्रवक्ष्याम्यतःपरम् ॥ २ ॥
प्रपद्येवरुणंदेवमम्भसांपतिमूर्जितम् ।
याचितंदेहिमेतीर्थं सर्वपापापनुत्तये ॥ ३ ॥
तीर्थमावाहयिष्यामि सर्वाघविनिषूदनम् ।
सान्निध्यमस्मिन्सत्तोये भजत्वंमदनुग्रहात् ॥ ४ ॥
रुद्रान्प्रपद्येवरदान्सर्वानप्सुसदस्तथा ।
सर्वानप्सुसदश्चैव प्रपद्येप्रणतःस्थितः ॥ ५ ॥
देवमप्सुसदंवन्हिं प्रपद्येऽघनिषूदनम् ।
आपःपुण्याःपवित्राश्च प्रपद्येशरणंतथा ॥ ६ ॥
रुद्राश्चाग्निश्चसर्पाश्च वरुणश्चापएवच ।
शमयन्त्वाशुमेपापं मांरक्षन्तुचसर्वशः ॥ ७ ॥
इत्येवमुक्त्वाकर्त्तव्यं ततःसम्मार्जनंजले ।
आपोहिष्ठेतितिसृभिर्यथावदनुपूर्वशः ॥ ८ ॥
हिरण्यवर्णेतिवदेदग्निञ्चतितिसृभिस्तथा ।
पूर्वरूप से कहते हैं कि ॥ २ ॥ बड़े और जलों के पति वरुण देव की मैं शरण होता हूं । हे वरुणदेव ! जिस तीर्थ को मैं चाहूं सम्पूर्ण पापों के दूर करने के अर्थ उसी तीर्थ को आप मुझे दीजिये ॥३॥ सम्पूर्ण पापों के दूर करने वाले तीर्थ का मैं आवाहन करता हूं । हे तीर्थ ! मेरे पर अनुग्रह करके इस उत्तम जल के समीप आइये ॥ ४ ॥ जल में रहते हुए रुद्रों की शरण लेता तथा जल के निवासी अन्य देवताओं को भी मैं नमस्कार करता हुआ शरणागत होता हूं ॥ ५ ॥ जल के भीतर व्यापक पाप के नाश करने वाले अग्नि देवता के भी मैं शरण होता हूं । और पुण्य रूप और पवित्र जलों के भी मैं शरण होता हूं ॥ ६ ॥ रुद्र, अग्नि, सर्प, वरुण, और जल ये सब देवता मेरे पापों का शीघ्र नाश करें और मेरी चारों ओर से रक्षा करें ॥ ७ ॥ ऐसे कह कर फिर जलाशय में घुस कर ( आपोहिष्ठा० ऋ० प्र० ७ अ० ६ । व० ५ ) इत्यादि तीन ऋचाओं के क्रम से यथोक्त ( भली प्रकार ) मार्जन करे ॥ ८ ॥ ( हिरण्यवर्णा० अप्रिरथ० ऋ० ४ । ३ । २५ ) इत्यादि तीन ऋचा (शन्नो देवी०
भाषार्थसहिता ॥ २३
शन्नोदेवीतित्वतथा शन्नआपस्तथैवच ॥ ९ ॥
इदमपःप्रवहत स्तथामन्त्रमुदीरयेत् ।
एवंमन्त्रान्समुच्चार्य छन्दांसिस्तृषिदेवताः ॥ १० ॥
अघमर्षणसूक्तस्य संस्मरेत्प्रयतःसदा ।
छन्दआनुष्टुभन्तस्य ऋषिस्त्वैवाघमर्षणः ॥ ११ ॥
देवताभाववृत्तस्तु पापघ्नस्यप्रकीर्त्तितः ।
ततोम्भसिनिमग्नस्तु त्रिःपठेद्घमर्षणम् ॥ १२ ॥
यथाश्वमेधःक्रतुराट् सर्वपापप्रणाशनः ।
तथाघमर्पणसूक्तं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १३ ॥
अनेनस्नात्वाऽम्मध्ये स्नानवान्धौतवाससा ।
परिवर्त्तितवासास्तु तीर्थतीरमुपस्पृशेत् ॥ १४ ॥
उदकस्याप्रदानाञ्च स्नानशाटीन्नपीडयेत् ।
अनेनविधिनास्नानन्तीर्थस्यफलमश्नुते ॥ १५ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि शुभामाचमनक्रियाम् ।
यजु० ३६ । १२ ) - ( शन्न आपः ) इन मन्त्रों को पढ़े ॥९॥ ( इदमपः प्रवहत० ऋ० १ । ६ । ५ ) इस मन्त्र को कहै इसप्रकार मन्त्रों का उच्चारण करके छन्द ऋषि, और देवता जो ॥ १० ॥ अघमर्षण सूक्त के हैं उन को सावधानी से सदैव स्मरण करै । अघमर्षण सूक्त का छन्द अनुष्टुप् , ऋषि अघमर्षण है ॥११॥ पाप के नाशक अघमर्षण सूक्त का भाववृत्त देवता कहा है । फिर जल में गोता लगाये हुए तीन बार अघमर्षण सूक्त को पढ़ै ॥ १२ ॥ जैसे यज्ञों में सब से बड़ा यज्ञ अश्वमेध सब पापों का नाशक है इसी प्रकार अघमर्षण सूक्त सब पापों का नाशक है ॥ १३ ॥ इस विधि से जल में स्नान करके धौत वस्त्र को बदल कर तीर्थ के तीर पर आचमन करै ॥ १४ ॥ और जल दान (तर्पण) किये बिना स्नान की धोती को न निचोड़े जो इस विधि से स्नान करता है वही तीर्थ के फल को भोगता है ॥१५॥
यह शंखस्मृति के भावानुवाद में नवमा अध्याय पूरा हुआ ॥
इस से आगे शोभन आचमन के कर्म को कहते हैं कनिष्ठिका छोटी
२४ शंखस्मृतिः ॥
कायंकनिष्ठिकामूले तीर्थमुक्तंमनीषिभिः ॥ १ ॥
अङ्गुष्ठमूलेचतथा प्राजापत्यंविचक्षणैः ।
अङ्गुल्यग्रेस्मृतं दैवं पित्र्यंतर्जनिमूलके ॥ २ ॥
प्राजापत्येनतीर्थेन त्रिःप्राश्नीयाज्जलं द्विजः ।
द्विःप्रमृज्यमुखंपश्चात्खान्यद्भिःसमुपस्पृशेत् ॥ ३ ॥
हृद्गाभिःपूयतेविप्रः कण्ठगाभिश्चभूमिपः ।
तालुगाभिस्तथावैश्यः शूद्रःस्पृष्टाभिरन्ततः ॥ ४ ॥
अन्तर्जानुःशुचौदेशे प्राङ्मुखःसुसमाहितः ।
उदङ्मुखोवाप्रयतो दिशश्चानवलोकयन् ॥ ५ ॥
अद्भिःसमुद्धताभिस्तु हीनाभिःफेनबुद्बुदैः ।
वह्निनाचाप्यतप्ताभिरक्षाराभिरुपस्पृशेत् ॥ ६ ॥
तर्जन्यङ्गुष्ठयोगेन स्पृशेन्नासापुटद्वयम् ।
अङ्गुष्ठमध्यायोगेन स्पृशेन्नेत्रद्वयंततः ॥ ७ ॥
अङ्गुष्ठानामिकायोगे श्रवणौसमुपस्पृशेत् ।
अंगुलि के मूल (जड़) में काय तीर्थ महात्मा लोगों ने कहा है ॥ १ ॥ अंगूठे की जड़ में प्राजापत्य तीर्थ और अंगुलियों के अग्रभाग में देव तीर्थ और तर्जनी (अंगूठे के पास की अंगुली) की जड़ में पितृ तीर्थ पण्डितों ने कहा है ॥ २ ॥ प्राजापत्य तीर्थ से तीन बार द्विज पुरुष जल पीवे फिर दो बार मुख को पोंछ कर कान आदि छिद्रों का दहिने हाथ में जल लगा २ के स्पर्श करे ॥ ३ ॥ हृदय तक जाने वाले जलों से ब्राह्मण, कंठ तक जाने वाले जलों से क्षत्रिय, तालू तक जाने वालों से वैश्य और मुख पर स्पर्श किये जलों से शूद्र पवित्र होता है ॥ ४ ॥ गोड़ों के भीतर हाथ किये और सावधानी से पूर्व वा उत्तर दिशा की ओर मुख किये मनको वश में रख के बैठा दिशाओं को न देखता हुआ मनुष्य ॥५॥ कूप से निकाले, झाग बुल बुला जिन में नहीं, जो जल गर्म न किये हों, और खारे भी न हों ऐसे जलों से आचमन करे॥६॥ अंगूठा और तर्जनी को मिला कर (दोनों से) नासिका के दोनों छिद्रों का, बीच की अंगुली और अंगूठे से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे ॥ ७ ॥ अंगूठा और अनामिका के योग से दोनों कानों का, कनिष्ठिका अंगुली और अंगूठे के योग से
भाषार्थसहिता ॥ २५
कनिष्ठाङ्गुष्ठयोगेन स्पृशेत्स्कन्धद्वयंततः ॥ ८ ॥ सर्वासामेवयोगेन नाभिंचहृदयंतथा । संस्पृशेच्चतथामूर्ध्नि एषआचमनेविधिः ॥ ९ ॥ त्रिःप्राश्नीयाद्यदम्भस्तु प्रीतास्तेनास्यदेवताः । ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रश्च भवन्तीत्यनुशुश्रुम ॥ १० ॥ गङ्गाचयमुनाचैव प्रियेतेपरिमार्जनात् । नासत्यदस्रौप्रीयेते स्पृष्टेनामापुटद्वये ॥ ११ ॥ स्पृष्टेलोचनयुग्मेतु प्रीयेते शशिभास्करौ । कर्णयुग्मेतथास्पृष्टे प्रीयेतेऽनिलानलौ ॥ १२ ॥ स्कन्धयोःस्पर्शानादस्य प्रीयन्तेसर्वदेवताः । मूर्ध्नःसंस्पर्शनादस्य प्रीतस्तुपुरुषोभवेत् ॥ १३ ॥ विनायज्ञोपवीतेन तथामुक्ताशिखोद्विजः । अप्रक्षालितपादस्तु आचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत् ॥ १४ ॥ बहिर्जानुरुपस्पृश्य एकहस्तार्पितैर्जलैः ।
दोनों कन्धों का स्पर्श करे ॥८॥ पांचो अंगुलियों को मिला के नाभि, हृदय, और मस्तक का स्पर्श करे यह आचमन का विधि है, यह इन्द्रियस्पर्श आचमन का अंग है। मलमूत्र त्याग के बाद शुद्धि करके ऐसा आचमन सदा ही कर्त्तव्य है ॥९॥ तीन बार आचमन में जल पीने से ब्रह्मा, विष्णु, शिव ये तीनों देवता इस मनुष्य पर प्रसन्न होते हैं, यह हम ने सुना है ॥१०॥ और मार्जन करने से गंगा, यमुना दोनों, और दोनों नासिका के दो छिद्रों के स्पर्श से अश्विनीकुमार प्रसन्न होते हैं ॥११॥ दोनों नेत्रों के स्पर्श से चन्द्रमा, सूर्य, दोनों कानों के स्पर्श करने से वायु और अग्नि देवता प्रसन्न होते हैं ॥ १२ ॥ दोनों कंधों के स्पर्श से सब देवता; और मस्तक के स्पर्श से मनुष्य पर परमेश्वर प्रसन्न होता है॥१३॥ बिना यज्ञोपवीत, चोटी में गांठ दिये बिना, और पग धोए बिना आचमन किये पर भी मनुष्य अशुद्ध रहता है ॥ १४ ॥ गोड़ों से बाहर हाथ किये एक हाथ से लिये जलों से, जूता पहिने हुए, और खड़ा हो कर, जो आचमन
४
२६ | शंखस्मृतिः ॥
सोपानत्कस्तथातिष्ठन्नैवशुद्धिमवाप्नुयात् ॥ १५ ॥
आचम्यचपुराप्रोक्तं तीर्थसम्मार्जनंतुयत् ।
उपस्पृशेत्ततःपश्चान्मन्त्रेणानेनधर्मतः ॥ १६ ॥
अन्तश्चरसिभूतेषु गुहायांविश्वतोमुखः ।
त्वंयज्ञस्त्वंवषट्कार आपोज्योतीरसोमृतम् ॥१७॥
आचम्यचततःपश्चादादित्याभिमुखोजलम् ।
उदुत्यंजांतवेदसमिति मन्त्रेणनिक्षिपेत् ॥ १८ ॥
एषएवविधिःप्रोक्तः सन्ध्ययोश्चद्विजातिषु ।
पूर्वासन्ध्यांजपंस्तिष्ठेदासीनःपश्चिमांतथा ॥ १९ ॥
ततोजपेत्पवित्राणि पवित्रंवाथ शक्तितः ।
ऋषयोदीर्घसन्ध्यत्वादीर्घमायुरवाप्नुयुः ॥ २० ॥
सर्ववेदपवित्राणि वक्ष्याम्यहमतःपरम् ।
येषांजपैश्चहोमैश्च पूयन्तेमानवाःसदा ॥ २१ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
करै वह शुद्ध नहीं होता ॥ १५ ॥ आचमन के पीछे जो तीर्थ के जलसे मार्जन कहा है तिस को करके धर्म पूर्वक इस मन्त्र से आचमन करे ॥ १६ ॥ हे सर्वत्र व्यापक जल ! तुम सब भूतों के हृदय में विचरते हो, यज्ञ, वषट्कार, ज्योति, रस, अमृत, आदि रूप तुम ही हो ॥ १७ ॥ फिर आचमन के पीछे सूर्य के सामने मुख करके (उदुत्यंजांतवेदसं०) मन्त्र से जल को फेंके अर्थात् सूर्य देवता को अर्घ देवे ॥ १८ ॥ द्विजातियों में दोनों काल की संध्याओं का यही विधि कहा है । प्रातःकाल की संध्या में खड़ा हो कर और सायंकाल की संध्या में बैठ कर गायत्री का जप करे ॥ १९ ॥ फिर पवित्र मन्त्रों को वा किसी एक पवित्र मन्त्र को शक्ति के अनुसार जपे । ऋषि लोग दीर्घ संध्या (सन्ध्या के समय ईश्वर का अधिक ध्यान) करने से दीर्घ (अधिक) अवस्थाको प्राप्त हुए हैं ॥ २० ॥ इस से आगे सम्पूर्ण वेद में जो पवित्र मन्त्र हैं तिन को कहते हैं जिन के जप और होम से सदैव मनुष्य पवित्र होते हैं ॥ २१ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में दशवां अध्याय पूरा हुआ ॥
भाषार्थसहिता ॥ २७
अघमर्षणंदेवकृतं शुद्धवत्यस्तरत्समाः । कूष्माण्ड्यःपावमान्यश्च सावित्र्यश्चतथैवच ॥ १ ॥ त्र्यभिष्वंद्रुपदाञ्चैव, स्तोमानिव्याहृतीस्तथा । भारुण्डानिचसामानि गायत्रीचौशनंतथा ॥ २ ॥ पुरुषवृतंचभाषंच तथासोमव्रतानिच । अब्लिङ्गंबार्हस्पत्यंच वाक्सूक्तममृतंतथा ॥ ३ ॥ शतरुद्रीयमथर्वशिरस्त्रिसुपर्णंमहाव्रतम् । गोसूक्तमश्वसूक्तंच इन्द्रसूक्तंचसामनी ॥ ४ ॥ त्रीण्याज्यदोहानिरथन्तरंच अग्निव्रतंवामदेवव्रतंच । एतानिगीतानिपुनन्तिजन्तून् जातिस्मरत्वंलभतेयदिच्छेत् ॥ ५ ॥
इति श्रीशाङ्खे धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ इतिवेदपवित्राण्यभिहितानि । एभ्यस्सावित्री विशिष्यते ॥ १ ॥
अघमर्षण. (ऋतं च सत्यं चा० ऋ० ८।८।४८) इत्यादि तीन ऋचा, (देवकृतस्यैनसो० यजु० ८।१३) इत्यादि पूरी एककण्डिका कः मन्त्र,— शुद्धवती (एतान्विन्द्रंस्तवाम० ऋ० मं० ८। सू० ९४।१-९) इत्यादि तीन ऋचा (तरत्समन्दी धा० ऋ० अ० ७। अ० १।१९) इत्यादि चार ऋचा — कूष्मांडी ऋचा, ऋ० मण्डल ९ (स्वादिष्ठया०) इत्यादि अन्त तक ११३ पवमान सूक्त — और सावित्री सविता देवतावाले (विश्वानिदेवसवितः०) इत्यादि मन्त्र ॥ १ ॥ द्रुपदादिव मुमुचानः० शु० यज् ० २०।२०) स्तोम, व्याहृती, भारुण्डसामगान,— गायत्री और उशना का मन्त्र ॥ २ ॥ पुरुषसूक्त, भाष, सोमव्रत, जल देवता वाले मन्त्र बृहस्पति देवता के मन्त्र, वागम्भृणी सूक्त, अमृत सूक्त ॥ ३ ॥ शतरुद्रीय अध्याय (नमस्ते रुद्र०) इत्यादि, अथर्व शिर, त्रिसुपर्ण, महाव्रत, गोसूक्त, अश्वसूक्त, दोनो साम ॥ ४ ॥ तीनों आज्य दोह, रथन्तर अग्निव्रत, वामदेव व्रत, ये अघमर्षण आदि सब गाने (पढ़ने) से जीवों को पवित्र करते हैं और जो इच्छा करे वह इनके जपसे पूर्व जन्म में मैं किस जाति में और किस देश में उत्पन्न हुआ था यह जान लेता है ॥ ५ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
ये सब वेद में पवित्र मन्त्र कहे हैं। इन सब में गायत्री श्रेष्ठ है ॥ १ ॥
२८ शंखस्मृतिः ॥
नास्त्यघमर्षणात्परमन्तर्जले ॥२॥ नसावित्र्याः समं जप्यं न व्याहृतिसमं हुतम् ॥ ३ ॥ कुशशय्यामासीनः कुशोत्तरीयवान् कुशपवित्रपाणिः प्राङ्मुखः सूर्याभिमुखो वा ऽक्षमालामुपादाय देवताध्यायी जपं कुर्यात् ॥ ४ ॥ सुवर्णमणिमुक्तास्फटिकपद्माक्षरुद्राक्षपुत्रजीवकानामन्यतमेनादाय मालां कुर्यात् ॥५॥ कुशग्रन्थिं कृत्वा वामहस्तोपयमैर्वा गणयेत् ॥६॥ आदौ देवता ऋषिश्च्छन्दः स्मरेत् ॥ ७ ॥ ततः सप्रणवां सव्याहृतिकामाद्यन्तं च शिरसा गायत्रीमावर्तयेत् ॥ ८ ॥ अस्यास्याः सविता देवता ऋषिर्विश्वामित्रो गायत्री छन्दः ॥ ९ ॥ ओं कारः प्रणवाख्यः ॥ १० ॥ ओं भूः । ओं भुवः । ओं स्वः । ओं महः । ओं जनः । ओं तपः । ओं सत्यमिति व्याहृतयः ॥११॥ ओं आपोज्योतीरसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोमिति शिरः ॥ १२ ॥ भवन्ति चात्र श्लोकाः ॥ १३ ॥
जल के भीतर के जपों में अघमर्षण से बढ़ दूसरा नहीं है ॥२॥ गायत्री के समान अन्य मन्त्र का जप नहीं है और व्याहृतियों के समान अन्य होम नहीं है ॥३॥ कुशासन पर बैठ कुश का दुपट्टा कन्धे पर धर कुश की पवित्रियों को धारण कर पूर्व को वा सूर्य के सम्मुख मुख कर के रुद्राक्ष की माला को लेकर देवता का ध्यान करता हुआ मूल गायत्री वा अपने गुरु मन्त्र का जप करे ॥ ४ ॥ सुवर्ण, मूंगा, मोती, स्फटिक, कमलगट्टा, रुद्राक्ष, अहेड़ के फल, जीवक, इन में से किसी एक को लेकर जप की माला बनावे ॥ ५ ॥ अथवा कुश की रस्सी में दी गांठों से अथवा बायें हाथ की अंगुलियों से गिनती करे ॥ ६ ॥ प्रथम मन्त्र के देवता, ऋषि, छन्द, इन का स्मरण करे ॥ ७ ॥ फिर आदि से व्याहृतियों सहित और अन्त में शिरः मन्त्र (आपोज्योती०) सहित गायत्री का जप करे ॥ ८ ॥ इस (तत्सवितुः) इस का सविता देवता, विश्वामित्र ऋषि, और गायत्री छन्द है ॥ ९ ॥ ॐकार का नाम प्रणव है ॥ १० ॥ ॐभूः, ॐभुवः, ॐस्वः, ॐमहः, ॐजनः, ॐतपः, ॐसत्यम् । ये सात व्याहृति कहाती हैं ॥११॥ (ॐ आपोज्योती रसोऽमृतं भूर्भुवःस्वरोम्) इस को गायत्री का शिरो मन्त्र कहते हैं ॥ १२ ॥ यही बात श्लोकों में भी कही है ॥ १३ ॥
भाषार्थसंहिता ॥ २९
सव्याहृतिकांसप्रणवां गायत्रीं शिरसासह् ।
ये जपन्ति सदा तेषां न भयं विद्यते क्वचित् ॥ १४ ॥
शतंजप्त्वा तु सा देवी दिनपापप्रणाशिनी ।
सहस्रंजप्त्वा तु तथा पातकेभ्यः समुद्धरेत् ॥ १५ ॥
दशसहस्रंजप्त्वा तु सर्वकल्मषनाशिनी ।
सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ १६ ॥
सुरापश्च विशुद्ध्येत लक्षजाप्यान्न संशयः ।
प्राणायामत्रयं कृत्वा स्नानकाले समाहितः ॥ १७ ॥
अहोरात्रकृतात्पापान्तत्क्षणादेव मुच्यते ।
सव्याहृतिकाः सप्रणवाः प्राणायामास्तु षोडश ॥ १८ ॥
अपि भ्रूणहनं मासान्पुनन्त्यहरहः कृताः ।
हुता देवी विशेषेण सर्वकामप्रदायिनी ॥ १९ ॥
सर्वपापक्षयकरी वरदा भक्तवत्सला ।
शान्तिकामस्तु जुहुयात्सावित्रीमक्षतैः शुचिः ॥ २० ॥
हन्तुकामोऽपमृत्युञ्च घृतेन जुहुयात्तथा ।
व्याहृति प्रणव शिरो मन्त्र इन सबके सहित गायत्री को जो मनुष्य सदैव जपते हैं उन को कहीं भी भय नहीं होता ॥१४॥ सौ बार जपी हुई गायत्री दिन के पापों को नष्ट करती है हजार बार जपी हुई पातकी से उद्धार करती है ॥१५॥ दश हजार बार जपी हुई सब पापों का नाश करती है । सुवर्ण की चोरी, ब्रह्महत्या गुरुपत्नी गमन ॥१६॥ मदिरा पान इन महापातकों का भी कर्त्ता ब्राह्मण लक्ष गायत्री का जप करने से निस्संदेह शुद्ध हो जाता है । स्नान के समय सावधानी से तीन प्राणायाम करके ॥१७॥ एक रात दिन में किये पाप से उसी क्षण में छूट जाता है। व्याहृति और ॐकार सहित सोलह प्राणायाम ॥१८॥ प्रति दिन करने से एक मास में भ्रूण गर्भ की हत्या करने वाले को भी शुद्ध निर्दोष कर देते हैं। और गायत्री से किया होम सब कामनाओं का देने वाला होता है ॥१९॥ भक्ति है प्यारी जिस को ऐसी वर देने वाली गायत्री की अधिष्ठात्री देवता सब पापों को क्षय करती है । जो मनुष्य शान्ति चाहे वह शुद्ध होकर गायत्री का होम बिना कुटे जौ वा धानों से करे ॥२०॥ जो पुरुष अकाल मृत्यु को दूर किया चाहे, वह घी से, लक्ष्मी
३० | शङ्खस्मृतिः ॥
श्रीकामस्तुतथापद्मैर्विल्वैःकाञ्चनकामुकः ॥ २१ ॥ ब्रह्मवर्चसकामस्तु पयसाजुहुयात्तथा । घृतप्लुतैस्तिलैर्वह्निं जुहुयात्सुसमाहितः ॥ २२ ॥ गायत्र्ययुतहोमाच्च सर्वपापःप्रमुच्यते । पापात्मालक्षहोमेन पातकेभ्यःप्रमुच्यते ॥ २३ ॥ अभीष्टंलोकमाप्नोति प्राप्नुयात्काममीप्सितम् । गायत्रीवेदजननी गायत्रीपापनाशिनी ॥ २४ ॥ गायत्र्याःपरमंनास्ति दिविचेहचपावनम् । हस्तत्राणप्रदादेवी पततांनरकार्णवे ॥ २५ ॥ तस्मान्नामभ्यसेन्नित्यं ब्राह्मणोनियतःशुचिः । गायत्रीजाप्यनिरतं हव्यकव्येषुभोजयेत् ॥ २६ ॥ तस्मिन्नन्तिष्ठतेपापमम्बुबिन्दुरिवपुष्करे ॥ २७ ॥ जप्येनैवतुसंसिध्येद् ब्राह्मणोनात्रसंशयः ।
को चाहने वाला कमलों से सुवर्ण को चाहने वाला विल्व फलों से गायत्री मन्त्र द्वारा होम करे ॥२१॥ जो ब्रह्म तेज को चाहे, वह दूध से गायत्री द्वारा होम करे और भली प्रकार सावधानी से घी मिले तिलों से ॥ २२ ॥ दश हजार गायत्री द्वारा किये होम से सब पापों से छूट जाता है। और बड़ा पापी मनुष्य भी लक्ष गायत्री के होम से पातकों से छूट जाता है ॥ २३ ॥ तथा वह वाँछित लोक को और वाञ्छित फल को प्राप्त होता है। गायत्री वेदों की माता और पापों को नाश करने वाली है ॥ २४ ॥ इस लोक तथा परलोक-स्वर्ग में गायत्री से अधिक पवित्र करने वाला कोई नहीं है। नरक रूप समुद्र में गिरने वाले मनुष्यों को हाथ पकड़ कर रक्षा करने वाली गायत्री ही है ॥ २५ ॥ तिस से नियम पूर्वक शुद्धता से ब्राह्मण नित्य गायत्री का अभ्यास नाम जप करे । गायत्री के जप में तत्पर ब्राह्मण को हव्य (जो अन्न देवताओं के लिये बनाया हो ) और कव्य (जो पितरों के निमित्त हो) सो जिमावे ॥ २६ ॥ क्योंकि उस ब्राह्मण में पाप इस प्रकार नहीं ठहरते जैसे कमल के पत्ते पर जल की बूंद ॥ २७ ॥ जप से ही ब्राह्मण सिद्धि को प्राप्त हो जाता है इसमें संशय नहीं है, वह ब्राह्मण चाहे अन्य कोई पुण्य का काम
कुर्यादन्यन्नवाकुर्यान् मैत्रोब्राह्मणउच्यते ॥ २८ ॥
उपांशुःस्याच्छतगुणः साहस्त्रोमानसःस्मृतः ।
नोच्चैर्जपंबुधःकुर्यात्सावित्र्यास्तुविशेषतः ॥ २९ ॥
सावित्रीजप्यनिरतः स्वर्गमाप्नोतिमानवः ।
गायत्रीजाप्यनिरतो मोक्षोपायंचविन्दति ॥ ३० ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नातःप्रयतमानसः ।
गायत्रींतुजपेद्भक्त्या सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ ३१ ॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
स्नातःकृतजप्यस्तदनु प्राङ्मुखो दिव्येन तीर्थेन देवानु-
दकेन तर्पयेत् ॥ १ ॥ अथ तर्पणविधिः॥२॥ ओं० भगवन्तं
शेषं तर्पयामि ॥ ३ ॥ कालाग्निरुद्रंतुततो रुक्मभौमंतथैवच ।
श्वेतभौमंततःप्रोक्तं पातालानांचसप्तकम् ॥ ४ ॥
जम्बूद्वीपं ततःप्रोक्तं शाकद्वीपंततःपरम् ।
गोमेदपुष्करंतद्वच्छाकाख्यंचततःपरम् ॥ ५ ॥
करे वा न करे तो भी उस को मित्र कहते हैं ॥ २८ ॥ वाणी से साफ २ बोलने की अपेक्षा उपांशु (मन्द) जप सौगुणा और मानस (मन २ में) जप करना हजार गुणा अधिक फल दायक कहा है । ज्ञानवान् मनुष्य ऊंचे स्वर से जप न करे और गायत्रीका जप तो ऊंचे स्वर से विशेष कर कदापि न करे ॥२९॥ गायत्री के जप में तत्पर मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता और गायत्री के जपमें तत्पर मनुष्य मोक्ष के उपाय को भी प्राप्त होता है ॥ ३० ॥ तिससे सब प्रयत्न से स्नान के पीछे मन को रोक कर भक्ति से सब पापों के नाश करने वाली गायत्री को जपे ॥ ३१ ॥
यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में बारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
स्नान और सन्ध्योपासन जप करके पूर्वाभिमुख बैठा पुरुष देवतीर्थ से देवताओं का जल से तर्पण करे ॥ १ ॥ अब तर्पणविधि कहते हैं ॥ २ ॥ ओं भगवान् शेषको तृप्त करता हूं ॥ ३ ॥ फिर कालाग्निरुद्र, रुक्मभौम, श्वेतभौम, सातों पाताल सब को क्रम से तृप्त करें अर्थात् (अतलं तर्पयामि) इत्यादि रीति से पृथक् २ सबका तर्पण करे ॥ ४ ॥ फिर जम्बूद्वीप, शाकद्वीप, गोमेद, पुष्कर, और शाक, इन को पृथक् २ जलदान से तृप्त करे ॥ ५ ॥
३२ | संस्कारविधिः ॥
शार्व्वरं ततः स्वधामानं ततो हिरण्यरोगणं ततः कल्पस्थायिनो लोकांस्तर्पयेत् ॥ ६ ॥ लवणोदकं ततः क्षीरोदं ततो घृतोदं तत इक्षुदं ततः स्वादूदं तत इति सप्त समुद्रकं प्रत्यृचं पुरुषसूक्तेनोदकाञ्जलीन् दद्यात्, पुष्पाणि च तथा भक्त्या॥७॥ अथ कृतापसव्यो दक्षिणामुखोऽन्तर्जानुः पित्र्येण पितॄणां यथाश्रद्धं प्रकाममुदकं दद्यात् ॥ ८ ॥ सौवर्णेन पात्रेण राजतेनौदुम्बरेण खड्गपात्रेणान्यपात्रेण वोदकं पितृतीर्थं स्पृशन्दद्यात् ॥९॥ पित्रे पितामहाय प्रपितामहाय मात्रे पितामह्यै प्रपितामह्यै मातामहाय प्रमातामहाय वृद्धप्रमातामहाय मातामह्यै प्रमातामह्यै वृद्धप्रमातामह्यै सप्रभान्पुरुषान् पितृपक्षे यावतां नाम जानीयात् पितृपक्षाणां तर्पणं कृत्वा गुरूणां मातृपक्षाणां तर्पणं कुर्यात् ॥१०॥ मातृपक्षाणां तर्पणं कृत्वा सम्बन्धिबान्धवानां कुर्यात् तेषां कृत्वा सुहृदां कुर्यात् ॥ ११ ॥ भवन्ति चात्र श्लोकाः ॥ १२ ॥
फिर शार्वर, स्वधामा, हिरण्यरोमा, कल्पतक ठहरने वाले लोक, इन सबको तृप्त कर देवे। फिर लवणोद, क्षीरोद, घृतोद, इक्षुद, इन सात समुद्रों को तृप्त करे । फिर परमेश्वर की पुरुष सूक्त (सहस्रशीर्षा०) के प्रत्येक मन्त्रसे जलकी अञ्जली देवे और अञ्जलि के साथ भक्ति से पुष्पों को समर्पण करे ॥ ७ ॥ फिर अपसव्य हो कर दक्षिण को मुख किये और गोड़ेके भीतर हाथ करके पितृतीर्थ से उत्तम श्रद्धाके साथ यथेष्ट जल पितरों को देवे ॥ ८ ॥ सुवर्ण, चांदी, गूलर, गैंडा, इन सुवर्णादि के पात्रों से अथवा किसी अन्य तांबादिके पात्र से पितृ तीर्थ का स्पर्श करते हुए जलको देवे ॥ ९ ॥ पिता, पितामह, (दादा) प्रपितामह (पड़दादा) माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, (नाना) प्रमातामह, (पड़नाना) वृद्धप्रमातामह, मातामही (नानी) प्रमातामही, (पड़नानी) वृद्धप्रमातामही, सात पीढ़ी तक पिता के पक्ष में जितनों का नाम जानता हो, पितृपक्ष वालोंका तर्पण करके, गुरु और मातृपक्षवालों का तर्पण करे ॥ १० ॥ और मातृपक्षवालों का तर्पण करके अन्य सम्बन्धि तथा बान्धवोंका तर्पण करे ॥ ११ ॥ इस तर्पणके विषयमें श्लोक भी प्रमाण हैं ॥१२॥