भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषार्थसंहिता ॥ २९

सव्याहृतिकांसप्रणवां गायत्रीं शिरसासह् ।
ये जपन्ति सदा तेषां न भयं विद्यते क्वचित् ॥ १४ ॥
शतंजप्त्वा तु सा देवी दिनपापप्रणाशिनी ।
सहस्रंजप्त्वा तु तथा पातकेभ्यः समुद्धरेत् ॥ १५ ॥
दशसहस्रंजप्त्वा तु सर्वकल्मषनाशिनी ।
सुवर्णस्तेयकृद्विप्रो ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ १६ ॥
सुरापश्च विशुद्ध्येत लक्षजाप्यान्न संशयः ।
प्राणायामत्रयं कृत्वा स्नानकाले समाहितः ॥ १७ ॥
अहोरात्रकृतात्पापान्तत्क्षणादेव मुच्यते ।
सव्याहृतिकाः सप्रणवाः प्राणायामास्तु षोडश ॥ १८ ॥
अपि भ्रूणहनं मासान्पुनन्त्यहरहः कृताः ।
हुता देवी विशेषेण सर्वकामप्रदायिनी ॥ १९ ॥
सर्वपापक्षयकरी वरदा भक्तवत्सला ।
शान्तिकामस्तु जुहुयात्सावित्रीमक्षतैः शुचिः ॥ २० ॥
हन्तुकामोऽपमृत्युञ्च घृतेन जुहुयात्तथा ।

व्याहृति प्रणव शिरो मन्त्र इन सबके सहित गायत्री को जो मनुष्य सदैव जपते हैं उन को कहीं भी भय नहीं होता ॥१४॥ सौ बार जपी हुई गायत्री दिन के पापों को नष्ट करती है हजार बार जपी हुई पातकी से उद्धार करती है ॥१५॥ दश हजार बार जपी हुई सब पापों का नाश करती है । सुवर्ण की चोरी, ब्रह्महत्या गुरुपत्नी गमन ॥१६॥ मदिरा पान इन महापातकों का भी कर्त्ता ब्राह्मण लक्ष गायत्री का जप करने से निस्संदेह शुद्ध हो जाता है । स्नान के समय सावधानी से तीन प्राणायाम करके ॥१७॥ एक रात दिन में किये पाप से उसी क्षण में छूट जाता है। व्याहृति और ॐकार सहित सोलह प्राणायाम ॥१८॥ प्रति दिन करने से एक मास में भ्रूण गर्भ की हत्या करने वाले को भी शुद्ध निर्दोष कर देते हैं। और गायत्री से किया होम सब कामनाओं का देने वाला होता है ॥१९॥ भक्ति है प्यारी जिस को ऐसी वर देने वाली गायत्री की अधिष्ठात्री देवता सब पापों को क्षय करती है । जो मनुष्य शान्ति चाहे वह शुद्ध होकर गायत्री का होम बिना कुटे जौ वा धानों से करे ॥२०॥ जो पुरुष अकाल मृत्यु को दूर किया चाहे, वह घी से, लक्ष्मी