भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

एकादशजपेद्रुद्रान्दशांशंगुग्गुलैर्घृतैः ॥ २२ ॥

४ शातातपस्मृतिः ॥

दद्याद्द्विजसहस्राय मिष्टान्नंद्विजभोजने ॥ २१ ॥ रुद्रजाप्यंलक्षपुष्पैः पूजयित्वाचत्र्यम्बकम् । एकादशजपेद्रुद्रान्दशांशंगुग्गुलैर्घृतैः ॥ २२ ॥ हुत्वाभिषेचनंकुर्यान्मन्त्रैर्वरुणदैवतैः । शान्तिकेगणशान्तिश्च ग्रहशान्तिकपूर्विका ॥ २३ ॥ धान्यदानेशुभंधान्यं खारीषष्टिमितंस्मृतम् । वस्त्रदानेपट्टवस्त्र द्वयंकर्पूरसंयुतम् ॥ २४ ॥ दशपञ्चाष्टचतुर उपवेश्यद्विजान्शुभान् । तेषामनुज्ञयासर्वं प्रायश्चित्तमुपक्रमेत् ॥ २५ ॥ विधायवैष्णवंश्राद्धं संकल्प्यनिजकाम्यया । धेनुंदद्याद्द्विजातिभ्यो दक्षिणांचापिशक्तितः ॥२६॥ अलंकृत्ययथाशक्ति वस्त्रालङ्करणैर्द्विजान् । याचेद्दण्डप्रमाणेन प्रायश्चित्तंयथादितम् ॥ २७ ॥ तेषामनुज्ञयाकृत्वा प्रायश्चित्तंयथाविधि ।


और ब्राह्मणों के भोजन में एक सहस्र ब्राह्मणों को मिष्टान्न देवे ॥२१॥ रुद्र देवता के जप में एक लक्ष फूलों से महादेव जी का पूजन करके ग्यारह रुद्रों का जप करे तथा गुग्गुल और घी से दशांश ॥ २२ ॥ होम करके वरुण देवता वाले मन्त्रों से अभिषेक करे और शांति के कर्म मे ग्रहों की शांति करके गण देवताओं की शान्ति करे ॥ २३ ॥ अन्न के दान में साठ मन शुभ जौ चावल गेहूं अन्न देना कहा है । वस्त्र के दान में कपूर सहित रेशम के दो वस्त्र (धोती दुपट्टा) देने कहे हैं ॥२४॥ दश, पांच, आठ, अथवा चार, श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणों को बैठा कर उन की आज्ञा से सब प्रकार के प्रायश्चित्त का आरम्भ करे ॥ २५ ॥ विष्णुक श्राद्ध करके अपनी कामना के अनुसार संकल्प करके ब्राह्मणों को गौ और शक्ति के अनुसार दक्षिणा देवे ॥ २६ ॥ अपनी शक्ति के अनुसार वस्त्र और आभूषण द्वारा ब्राह्मणों को शोभायमान करके उन से दण्ड (पाप) के प्रमाणानुसार शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त को मांगे ॥२७॥ उन की आज्ञा से विधि पूर्वक प्रायश्चित्त करके फिर प्रायश्चित्त की पूर्त्ति के

भाषाऽर्थसहिता ॥ ५

पुनस्तान्परिपूर्णार्थं मर्चयेद्विधिवद्विजान् ॥ २८ ॥
दद्याद्व्रतानिनामानि तेभ्यःश्रद्धासमन्वितः ।
संतुष्टाब्राह्मणादद्युरनुज्ञांव्रतकारिणे ॥ २९ ॥
जपच्छिद्रंतपश्चिद्रं यच्छिद्रंयज्ञकर्मणि ।
सर्वंभवतिनिश्छिद्रं यस्यचेच्छन्तिब्राह्मणाः ॥ ३० ॥
ब्राह्मणायानिभाषन्ते मन्यन्तेतानिदेवताः ।
सर्वदेवमयाविप्रा नतद्वचनमन्यथा ॥ ३१ ॥
उपवासोव्रतंचैव स्नानंतीर्थफलंतपः ।
विप्रैस्सम्पादितंयस्य सम्पन्नंतस्यतत्फलम् ॥ ३२ ॥
सम्पन्नमितियद्वाक्यं वदन्तिक्षितिदेवताः ।
प्रणम्यशिरसाधार्यमग्निष्टोमफलंलभेतू ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणाजङ्गमंतीर्थं निर्मलंसार्वकामिकम् ।
तेषांवाक्योदकेनैव शुद्ध्यन्तिमलिनाजनाः ॥ ३४ ॥


लिये उन ब्राह्मणों का विधिवत् पूजन करे ( अर्थात् जब प्रसन्न संतुष्ट हो कर ( संपूर्णमस्तु ) ऐसा आशीर्वाद देवें तो कार्य सफल होता है ) ॥ २८ ॥ प्रायश्चित्ती पुरुष अपने किये व्रत और नामों का श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मणों से निवेदन करे वा समर्पण करे कि यह सब आप लोगों का हो है । तब संतुष्ट हुए ब्राह्मण व्रत के करने वाले पुरुष को आज्ञा देवें कि तुम्हारा व्रत सफल हो ॥ २९ ॥ जप, तप, यज्ञ कर्म, इन में जो छिद्र ( न्यूनता ) होती है वह सब ब्राह्मणों की आज्ञा से पूर्ण हो जाती है ॥ ३० ॥ जो बात शुद्ध ब्राह्मण कहते हैं उसे देवता भी मानते हैं क्योंकि ब्राह्मण सब देवताओं के रूप हैं इस से उन का वचन अन्यथा [झूठा] नहीं हो सकता ॥३१॥ उपवास, व्रत, स्नान, तीर्थ का फल, ये सब जिसके ब्राह्मणों ने सफल कह दिये उस को इन का फल सिद्ध 'होजाता है ॥ ३२ ॥ जिस कर्म में भूमि के देवता ब्राह्मण ( सम्पन्नम् ) सिद्ध हुआ यह वाक्य कहदें उस वाक्य को प्रणाम करके जो शिर पर धारण करता है वह अग्निष्टोम यज्ञ के फल को प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥ संपूर्ण कामनाओं के देने वाले ब्राह्मण लोग निर्मल जंगम ( चेतन ) तीर्थ हैं उन के वाक्य रूपी जल से ही मलिन जन शुद्ध होजाते हैं ॥ ३४ ॥

६ शातातपस्मृतिः ॥

तेभ्योऽनुज्ञामभिप्राप्य प्रतिगृह्यतथाशिषः । भोजयित्वाद्द्विजान्शक्त्या भुञ्जीतसहबन्धुभिः ॥३५॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके साधा- रणविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

ब्रह्महानरकस्यान्ते पाण्डुकुष्ठीप्रजायते । प्रायश्चित्तंप्रकुर्वीत सततंतत्प्रशान्तये ॥ १ ॥ चत्वारःकलशाःकार्याः पञ्चरत्नसमन्विताः । पञ्चपल्लवसंयुक्ताः सितवस्त्रेणसंयुताः ॥ २ ॥ अश्वस्थानादिमृद्युक्तास्तीर्थोदकसुपूरिताः । कषायपञ्चकोपेता नानाविधफलान्विताः ॥ ३ ॥ सर्व्वौषधिसमायुक्ताः स्थाप्याःप्रतिदिशंद्विजैः । रौप्यमष्टदलं पद्मं मध्यकुम्भोपरिन्यसेत् ॥ ४ ॥ तस्योपरिन्यसेद्देवं ब्रह्माणंचचतुर्मुखम् ।


उन ब्राह्मणों से आज्ञा लेकर उन के आशीर्वाद को ग्रहण करके और अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपने बन्धुओं सहित स्वयं भोजन करे ॥ ३५ ॥

यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद मे कर्मविपाक विषयक साधारण विधि रूप प्रथमाध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

ब्रह्महत्यारा पुरुष नरक भोग के अन्त में श्वेत कुष्ठी होता है इस लिये वह पुरुष उस पाप के शान्त्यर्थ प्रायश्चित्त करे ॥१॥ पांचों रत्न पांच पल्लव और श्वेत वस्त्रों से युक्त चार तांबे के कलश लीपे हुये शुद्ध स्थल में स्थापित करे ॥२॥ गोशाला घुड़शालादि की सात मट्टी कलशों के नीचे धरे तथा तीर्थों के जल से कलशों को भरे और पांच कषाय (कसैली वस्तु) और अनेक प्रकार के फलों से संयुक्त करे ॥३॥ सब औषधियों से युक्त करके पूर्वादि चारों दिशाओं में उनको स्थापित करे और बीच में स्थापित किये पांचवें कलश पर चांदी का आठ दल का कमल रक्खे ॥ ४ ॥ उस कमल पर छः मासे सुवर्ण से बनायी

भाषासंहिता ॥ ३

पलाद्धार्द्धप्रमाणेन सुवर्णेनवनिर्मितम् ॥ ५ ॥ अर्चयेत्पुरुषसूक्तेन त्रिकालंप्रतिवासरम् । यजमानःशुभैर्गन्धैः पुष्पैर्धूपैर्यथाविधि ॥ ६ ॥ पूर्वादिकम्भेषुततो ब्राह्मणा ब्रह्मचारिणः । पठेयुःस्वस्ववेदांस्त ऋग्वेदप्रभृतीञ्शनैः ॥ ७ ॥ दशांशेनततोहोमो ग्रहशान्तिपुरःसरम् । मध्यकुम्भेविधातव्यो घृताक्तैस्तलव्रीहिभिः ॥ ८ ॥ द्वादशाहमिदंकर्म्म समाप्यद्विजपुङ्गवः । भद्रपीठेयजमानमभिषिञ्चेद्यथाविधि ॥ ९ ॥ ततोदद्याद्यथाशक्ति गोभूहेमतिलादिकम् । ब्राह्मणेभ्यस्तथादेयमाचार्याययथाविधि ॥ १० ॥ आदित्यावसवोरुद्रा विश्वेदेवामरुद्गणाः । प्रीताःसर्वेव्यपोहन्तु ममपापंसुदारुणम् ॥ ११ ॥


चार मुखों वाली ब्रह्मा जी की प्रतिमा स्थापित करे ॥ ५॥ यजमान पुरुष प्रति दिन तीनों काल में पुरुष सूक्त (सहस्र शीर्षा०) इत्यादि मन्त्रों द्वारा सुन्दर गन्ध, पुष्प, धूपों से ब्रह्मा जी का विधिवत् पूजन करै ॥ ६ ॥ साथ ही पूर्वादि दिशाओं में स्थापित चारों घटों के समीप चार ब्रह्मचारी ब्राह्मण ऋग्वेद आदि अपने २ वेदों को सावधान चित्त होके पढ़ें। अर्थात् पूर्व में ऋग्वेद, दक्षिण में यजुः, पश्चिम में साम और उत्तर में अथर्ववेद का पाठ करें ॥ ७ ॥ फिर ग्रहशांति पूर्वक मध्यस्थकलश के समीप दशांश होम घी मिले तिल और व्रीहि धानों से करै ॥८॥ बारह दिन में उत्तम धर्म निष्ठा ब्राह्मण इस कर्म को समाप्त करा के कल्याण कारी पीढ़ा (आराम चौकी) पर बैठे हुये यजमान का विधि पूर्वक अभिषेक करै ॥९॥ फिर शक्ति के अनुसार गौ, भूमि, सुवर्ण, तिल इन पदार्थों का दान ब्राह्मणों को और आचार्य गुरु को यजमान श्रद्धा से देवे ॥१०॥ १२ आदित्य ८ वसु ११ रुद्र १३ विश्वेदेव और ४९ मरुद्गण ये सब गण देवता मुझ पर प्रसन्न होकर मेरे दारुण कठिन भयंकर पाप को निवृत्त करें ॥ ११ ॥

८ शातातपस्मृतिः ॥

इत्युदीर्य्यमुहुर्भक्त्या तमाचार्य्यंक्षमापयेत् ।
एवंविधानेविहिते श्वेतकुष्ठीविशुद्ध्यति ॥ १२ ॥
कुष्ठोगोवधकारोस्यान्तरकान्तेऽस्यनिष्कृतिः ।
स्थापयेद्घटमेकन्तु पूर्वोक्तद्रव्यसंयुतम् ॥ १३ ॥
रक्तचन्दनलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पाम्बरान्वितम् ।
रक्तकुम्भन्तुतंकृत्वा स्थापयेद्दक्षिणांदिशम् ॥ १४ ॥
ताम्रपात्रंन्यसेत्तत्र तिलचूर्णेनपूरितम् ।
तस्योपरिन्यसेद्देवं हेमनिष्कमयंयमम् ।
यजेत्पुरुषसूक्तेन पापंमेशाम्यतामिति ॥ १५ ॥
सामपारायणंकुर्यात्कलशेतत्रसामवित् ।
दंशांशंसर्षपैर्हुत्वा पावमान्यभिषेचने ॥ १६ ॥
विहितेधर्मराजानमाचार्य्यायनिवेदयेत् ॥ १७ ॥
यमोऽपिमहिषारूढो दण्डपाणिर्भयावहः ।


इस प्रकार भक्ति श्रद्धा से बारंबार प्रार्थना करके गुरु जी से अपराध क्षमा करावे। ऐसा विधान करने से श्वेत कुष्ठी शुद्ध होजाता है ॥ १२ ॥ गोहत्या करनेवाला नरक भोग के अन्त जन्मान्तर में कुष्ठी होता है। उस समय निम्न प्रायश्चित्त करे- पूर्वोक्त पंचरत्नादि सहित एक कलश स्थापित करे ॥१३॥ उस पर लालचन्दन का लेपन कर कण्ठ में लाल वस्त्र लपेटे। ऊपर लाल पुष्प धरे। इस प्रकार कलश को रक्तवर्ण करके पूजन स्थान के दक्षिणभाग में स्थापित करे ॥ १४ ॥ कूटे हुए तिलों से भरा तांबे का पात्र उस कलश के ऊपर धरे उसके ऊपर एक तोला सुवर्ण से बनायी यमराज देवता की प्रतिमा स्थापित करके मेरा पाप शान्त हो, ऐसी प्रार्थना करके पुरुष सूक्त से यमदेवता का पूजन करे ॥१५॥ सामवेदी विद्वान् कलश के समीप में सामवेद का पारायण करे। इस प्रकार बारह दिन त्रिकाल पूजन करके अन्त में सर्षप-सरसों द्वारा दशांश का होम कर पावमानी ऋचाओं से ब्राह्मण लोग यजमान का अभिषेक करें ॥ १६ ॥ यह विधान होजाने पर धर्मराज की प्रतिमा आचार्य को देदेवे ॥ १७ ॥ दण्ड हाथ में लिये भैंसापर सवार दक्षिण दिशा के स्वामी भय कर यमराज मेरे पाप को

भाषाथैसहिता ॥ ९

दक्षिणशापतिर्देवो ममपापंव्यपोहतु ॥ १८ ॥ इत्युच्चार्य्यविसृज्यैनं मासं सद् भक्तिमाचरेत् । ब्रह्मगोवधयोरेषा प्रायश्चित्तेननिष्कृतिः ॥ १९ ॥ पितृहाचेतनाहीनो मातृहान्धःप्रजायते । नरकान्तेप्रकुर्वीत प्रायश्चित्तंयथाविधि ॥ २० ॥ प्राजापत्यानिकुर्वीत त्रिंशच्छाखाविधानतः । व्रतान्तेकारयेन्नावं सौवर्णीं पलसंमिताम् ॥ २१ ॥ कुम्भरौप्यमयंचैव ताम्रपात्राणिपूर्ववत् । निष्कडेम्नासुकर्त्तव्यो देवः श्रीवत्सलाञ्छनः ॥ २२ ॥ पट्टवस्त्रेणसवेष्ट्य पूजयेत्तांविधानतः । नावंद्विजायतांदद्यात्सर्वोपस्करसंयुताम् ॥ २३ ॥ वासुदेव ! जगन्नाथ ! सर्वभूताशयस्थित ! । पातकार्णवमग्नंमां तारयप्रणतार्त्तिहत् ॥ २४ ॥ इत्युदीर्य्यप्रणम्याथ ब्राह्मणायविसर्जयेत् । अन्येभ्योऽपियथाशक्ति विप्रेभ्योदक्षिणांददेत् ॥ २५ ॥

निवृत्त करें ॥१८॥ ऐसा उच्चारण करके देवता का विसर्जन कर एकमास उत्तम भक्ति से आचरण करे । ब्रह्महत्या और गोहत्या का यह प्रायश्चित्त है ॥ १९ ॥ पिता को मारनेवाला महा मूढ़ जड़ तथा माता को मारनेवाला नरकभोग की समाप्ति में जन्मान्ध होता है इससे विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करे ॥ २० ॥ अपनी वेद शाखा के विधान से प्रथम तीस प्राजापत्य व्रत करे । व्रत की समाप्ति में चार तोला सुवर्ण की एक नौका बनवावे ॥ २१ ॥ एक कलश चांदी का और पूर्ववत् चार कलश तांबे के स्थापित करे और एक तोला सुवर्ण की एक प्रतिमा विष्णु भगवान् की बनवावे॥ २२ ॥ फिर रेशमी वस्त्र से भगवत्प्रतिमा को आच्छादित करके विधि से पूजन करे फिर सब सामग्री सहित उस नौका को सुपात्र ब्राह्मण को दानकर देदेवे ॥२३॥ फिर प्रार्थना करे कि हे सब प्राणियों के हृदय में स्थित जगत् के नाथ वासुदेव भगवान् ! भक्त दुःखहारी आप पाप समुद्र में डूबे हुए मुझे पार करो ॥ २४ ॥ ऐसा बारम्बार कह कर प्रणाम करके उस प्रतिमा को सुपात्र ब्राह्मण को विसर्जन पूर्वक दान कर देवे । तथा अन्य ब्राह्मणों को भी यथाशक्ति दक्षिणा देवे ॥ २५ ॥

१० शातातपस्मृतिः ॥

हत्वावैबालकंसुप्तं स्वसृजातं चमूलजम् ।
तेनसंजायतेबन्ध्या मृतवत्साचनारकी ॥ २६ ॥
तत्पातकविनाशाय यथाकार्यंप्रयत्नतः ।
सौवर्णंबालकंकृत्वा दद्याद्दोलासमान्वितम् ॥ २७ ॥
अनड्वाहंततोदद्याद् वस्त्रद्वयसमन्वितम् ।
तत्पातकविनिर्मुक्ता पश्चाद्भवतिपुत्रिणी ॥ २८ ॥
पिताबन्दीकृतोयेन निबद्धोलोहशृङ्खलैः ।
चिरंकष्टतरंभुक्त्वा मृतस्तत्रैवमन्दिरे ॥ २९ ॥
तेनपापेनपापात्मा पतितोरौरवार्णवे ।
नरकान्तेभवेच्चिन्हं पङ्गुर्मूकोविचेतनः ॥ ३० ॥
तस्यपापविनिर्मुक्त्यै पिताकार्योहिरण्मयः ।
पितरंरथमारूढं विप्रायप्रतिपादयेत् ॥ ३१ ॥
स्वसृघातीतुबधिरो नरकान्तेप्रजायते ।


बहनाई के द्वारा भगिनी से उत्पन्न हुए अपने सोवे हुए भागिनेय (भानेज) बालक को जो मारडाले वह नरक भोग के बाद बन्ध्या स्त्री अथवा जो सन्तान हों वे मरजावें ऐसी होती है ॥ २६ ॥ उस पातक के विनाशार्थ जो प्रायश्चित्त यत्न पूर्वक करना चाहिये सो कहते हैं। एक सुवर्ण का बालक बनाके हिंडोले सहित दान करे ॥ २७ ॥ फिर दो वस्त्रों सहित एक बैल का दान करे । इस प्रायश्चित्त से उस पातक से मुक्त हुई पुत्रवती होजाती है ॥ २८ ॥ जिस पुरुष ने अपने पिता को लोहे की सांकरों से बांधकर कैद किया हो और वह बहुत काल तक अत्यन्त कष्ट भोग कर उसी हवालात में मरगया हो ॥ २९ ॥ वह पापी पुत्र उस महापाप से रौरव नरक में पड़ता है फिर नरक भोग के अन्त में मनुष्य जन्म होने पर लंगड़ा, मूक (गूंगा) तथा मूढता के चिन्ह युक्त होता है ॥ ३० ॥ उस पापसे छूटने के लिये वह अपने पिता की सुवर्ण की प्रतिमा बनवा कर और रथ में बैठा कर रथ सहित पिता की प्रतिमा को सुपात्र ब्राह्मण को दान कर देवे ॥ ३१ ॥ भगिनी को मारडालने वाला नरक भोगने पश्चात् मनुष्य जन्म होने पर बधिर होता है और भाई का वध करने पर

भाषार्थसहिता ॥ १९

मूकोभ्रातृवधेचैव तस्येयंनिष्कृतिःस्मृता ॥ ३२ ॥
तेनकार्यंविशुद्ध्यर्थं यतिचान्द्रायणं व्रतम् ।
व्रतान्तेपुस्तकंदद्यात्सुवर्णपलसंयुतम् ॥ ३३ ॥
इमंमन्त्रंसमुच्चार्य ब्रह्माणींतांविसर्जयेत् ।
सरस्वति ! जगन्मातः ! शब्दब्रह्माधिदैवते ! ॥ ३४ ॥
दुष्कर्म्मकारिणंपापं पाहिमांपरमेश्वरि ! ।
बालघातीचपुरुषो मृतवत्सःप्रजायते ॥ ३५ ॥
ब्राह्मणोद्वाहनंचैव कर्त्तव्यंतेनशुद्धये ।
श्रवणंहरिवंशस्य कर्त्तव्यंचयथाविधि ॥ ३६ ॥
महारुद्रजपंचव कारयेच्चयथाविधि ।
षडङ्गैकादशैरुद्रै रुद्रःसमभिधीयते ॥ ३७ ॥
रुद्रैस्तथैकादशभिर्महारुद्रःप्रकीर्तितः ।
एकादशभिरेतैस्तु अतिरुद्रश्चकथ्यते ॥ ३८ ॥
जुहुयाच्चदशांशेन पूर्वोक्ताज्याहुतीस्तथा ।


नरकान्त में मूक (गूगा) होता है उस का प्रायश्चित्त निम्न लिखित है ॥३२॥ उस को अपनी शुद्धि के लिये यतिचान्द्रायण (मध्यान्ह में एकबार एकमास तक आठ ग्रास भोजनरूप) व्रत करना चाहिये। फिर व्रतकी समाप्ति में चार तोला सुवर्ण सहित वेद की पुस्तक पर सरस्वती देवता का यथाविधि पूजन करके उस का दान करे ॥३३॥ फिर इस आगे लिखे मन्त्र (सरस्वति०) का उच्चारण करके सरस्वती देवी का विसर्जन करे कि हे शब्दब्रह्मरूप वेद की अधिष्ठात्री जगत् की माता परमेश्वरी सरस्वती ! दुष्कर्म करने वाले मुझ पापी की रक्षा करो ॥३४॥ बालक की हत्या करनेवाले पुरुष के सन्तान हो २ कर मर जाते हैं ॥३५ उसको अपनी शुद्धि के लिये ब्राह्मणों को कन्धेपर बैठा कर ले चलना आदि सेवा करनी चाहिये । और हरिवंशपुराण का विधिपूर्वक श्रद्धा से श्रवण करे ॥३६॥ और वह विधिपूर्वक महारुद्र जप करावे । षडङ्ग की ग्यारह रुद्री का पाठ रुद्र कहाता ॥ ३७ ॥ ग्यारह रुद्रों का (रुद्री के १२१ पाठ) महारुद्र कहाता और इन ग्यारह महारुद्रों का एक अतिरुद्र कहाता है ॥ ३८ ॥ महारुद्र वा

१२ शातातपस्मृतिः ॥

एकादशस्वर्णनिष्काः प्रदातव्यान्नदक्षिणाः ॥ ३६ ॥
पलान्येकादशतथा दद्याद्वित्तानुसारतः ।
अन्येभ्योऽपियथाशक्ति द्विजेभ्योदक्षिणांदिशेत् ॥४०॥
स्नापयेद्दम्पतॊपञ्चान्मन्त्रैर्वरुणदैवतैः ।
आचार्यायप्रदेयानि वस्त्रालङ्करणानिच ॥ ४१ ॥
गोत्रहापुरुषःकुष्ठो निर्वंशश्चोपजायते ।
सचपापविशुद्ध्यर्थं प्राजापत्यशतंचरेत् ॥ ४२ ॥
व्रतान्तेमेदिनींदत्त्वा शृणुयादथभारतम् ।
स्त्रीहन्ताचातिसारीस्यादश्वत्थान्रोपयेद्दश ॥ ४३ ॥
विप्रस्यबालकंहत्वा संहृतरत्नकाञ्चनम् ।
तेनैवजायतेमृत्युः पुत्राणांचपुनःपुनः ॥ ४४ ॥
तादृक्कर्म्मविनाशाय कार्यंतेनैवयततः ।
वृषोहैमेनसंयुक्तो दातव्योवस्त्रसंयुतः ॥ ४५ ॥

अतिरुद्र का दशांश होम करे और पूर्वोक्त घी की आहुतियों से भी होम करे तथा ग्यारह तोला सुवर्ण दक्षिणा में देवे ॥ ३९ ॥ यदि श्रीमान् हो तो ४४ चवालीश तोला सुवर्ण दक्षिणा देवे । जप पाठ करनेवालों से भिन्न सुपात्र ब्राह्मणों को भी यथाशक्ति दक्षिणा देवे ॥ ४० ॥ पश्चात् कुशका पुरोहित वरुण देवतावाले मन्त्रों से यजमान और पत्नी को स्नान करावे । तथा प्रायश्चित्त कर्त्ता अपने आचार्यों को वस्त्र और आभूषण देवे ॥४१॥ अपने गोत्री पुरुष की हत्या करनेवाला पुरुष नरकान्त में कुष्ठी और निर्वंश होता है । वह पाप से शुद्ध होने के लिये सौ प्राजापत्य व्रत करे ॥ ४२॥ फिर व्रत के अन्त में पृथिवी का दान देकर श्रद्धा से महाभारत का श्रवण करे । स्त्री हत्यारा अतीसार का रोगी होता है वह पीपल के दश वृक्षों को लगावे ॥ ४३ ॥ ब्राह्मण के बालक को मार डाले और उसके सुवर्ण रत्नादि आभूषण लेलेवे तो नरकान्त में होने वाले मनुष्य जन्मों में वार २ उत्पन्न हो २ कर उसके पुत्र मरते हैं कोई जीवित नहीं रहता ॥ ४४ ॥ उस पाप के नाशार्थ उस पापी को यत्न के साथ सुवर्ण तथा वस्त्रों से युक्त बैल का दान करना चाहिये ॥ ४५ ॥ शङ्कर की गौ

भाषार्थसहिता ॥ १३

दद्याच्चशर्कराधेनुं भोजयेच्चशतंद्विजान् ॥ ४६ ॥
राजहाक्षयरोगीस्यादेपातस्यचनिष्कृतिः ।
गोभूहिरण्यमिष्टान्नजलवस्त्रप्रदानतः ॥ ४७ ॥
घृतधेनुप्रदानेन तिलधेनुप्रदानतः ।
इत्यादिनाक्रमेणैव क्षयरोगःप्रशाम्यति ॥ ४८ ॥
रक्तार्बुदोवैश्यहन्ता जायतेसचमानवः ।
प्राजापत्यानिचत्वारि सप्तधान्यानिचोत्सृजेत् ॥ ४९ ॥
दण्डापतानकयुतः शूद्रहन्ताभवेन्नरः ।
प्राजापत्यंसकृच्चैव दद्याद्धेनुंतदक्षिणाम् ॥ ५० ॥
कारूणांचवधेचैव रूक्षभावःप्रजायते ।
तेनतत्पापशुद्ध्यर्थं दातव्योवृषभःसितः ॥ ५१ ॥
सर्वकार्येष्वसिद्धार्थो गजघातीभवेन्नरः ।
प्रासादंकारयित्वानु गणेशंप्रतिमांन्यसेत् ॥ ५२ ॥
अथवागणनाथस्य मन्त्रंलक्षमितंजपेत् ।


बनाकर दान करे और १०० ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥४६॥ राजहत्या करने वाला क्षयी रोगयुक्त होता, उस का प्रायश्चित्त यह है कि गौ, भूमि, सुवर्ण, मिष्टान्न, (लड्डूआदि) जल, और वस्त्रों के दान से ॥ ४७ ॥ घी की धेनु और तिलों की गौ बनाकर देने से इत्यादि क्रम से दान करने पर क्षयी रोग शान्त होजाता है ॥ ४८ ॥ वैश्य को मारनेवाला नरकान्त में रक्तार्बुद रोगी होता है वह चार प्राजापत्य व्रत करके सप्तधान्य (सतनजा) का दान करे ॥ ४९ ॥ शूद्र हत्या करनेवाला जन्मान्तर में दण्डाप्तानक रोगयुक्त होता, वह एक प्राजापत्य व्रत करके एक गो दक्षिणा देवे ॥ ५० ॥ कारीगरों का वध करनेपर शरीर में रूखापन होता है उस अपराधी को अपने उस पाप की शुद्धि के लिये श्वेत बैल का दान करना चाहिये ॥५१॥ हाथी की हत्या करने वाला जो कुछ काम करता है वही सिद्ध नहीं होता सभी निष्फल जाते हैं। वह एक ऊंचा मन्दिर बनवाकर गणेशजी की प्रतिमा की स्थापना करावे ॥५२॥ अथवा गणेश जी के मन्त्र का एक लक्ष जप करे वा करावे और सब देवतों की शान्तिपूर्वक धूपों

१४ शातातपस्मृतिः ॥

दशांशहोममन्नापूर्वैर्गणशान्तिपुरस्सरः ॥ ५३ ॥
उष्ट्रे विनिहतेचैव जायतेविकृतस्वरः ।
सतत्पापविशुद्ध्यर्थं दद्यात्कर्पूरजंफलम् ॥ ५४ ॥
अश्वेविनिहतेचैव वक्रकण्ठःप्रजायते ।
शतंफलानिदद्याच्च चन्दनान्यघनुत्तये ॥ ५५ ॥
महिषीघातनेचैव कृष्णगुल्मःप्रजायते ।
स्वशक्त्याचमहींदद्याद्रक्तवस्त्रद्वयं तथा ॥ ५६ ॥
खरेविनिहतेचैव खररोमाप्रजायते ।
निष्कत्रयस्यप्रकृतिं संप्रदद्याद्धिरण्मयीम् ॥ ५७ ॥
तरक्षौनिहतेचैव जायतेकेक्रेक्षणः ।
दद्याद्रत्नमयींधेनुं सततपातकशान्तये ॥ ५८ ॥
शूकरेनिहतेचैव दन्तुरोजायतेनरः ।
सदद्यात्तुविशुद्ध्यर्थं घृतकुम्भंसदक्षिणम् ॥ ५९ ॥
हरिणेनिहतेखञ्जः शृगालेतुविपादकः ।
अश्वस्तेनप्रदातव्यः सौवर्णोनिष्कसम्मितः ॥ ६० ॥


द्वारा दशांश होम करे ॥ ५३ ॥ ऊंट की हत्या करने पर तोतला होता है वह उस पाप की शुद्धि के लिये कपूर से प्रकट हुए फल का दान करे ॥ ५४ ॥ घोड़े के मारनेपर टेढ़े कण्ठवाला होता है वह पाप निवृत्त के लिये सौ फल और चन्दन का दान करे ॥ ५५ ॥ भैंसि की हत्या करने पर काला गुल्मरोग होता है वह पुरुष अपनी शक्ति के अनुसार भूमि का और दो लाल वस्त्रों का दान करे ॥ ५६ ॥ गधे के मारडालने पर गधे के से रोमोंवाला पुरुष जन्मान्तर में होता है वह तीन निष्क (अशर्फी) की गर्दभ प्रतिमा बनाकर दान करे ॥ ५७ ॥ चीते की हत्या करने पर जन्मान्तर में भेंड़ी वा टेढ़ी निगाहवाला होता है। वह उस पाप की शुद्धि के लिये रत्नों की गौ बनाकर दान करे ॥ ५८ ॥ सूकर की हत्या करने पर मनुष्य जन्मान्तर में बड़दन्ता होता है वह अपनी शुद्धि के लिये घी से भरा घड़ा दक्षिणा सहित दान करे ॥ ५९ ॥ हरिण की हत्या करने वाला लंगड़ा और शृगाल (गीदड़) की हत्या करनेवाला एक पग का होता है । उसको एक तोला सुवर्ण का घोड़ा बनवाकर दान करना चाहिये ॥ ६० ॥

भाषार्थसहिता ॥ १५

अजाभिघातनेचैव अधिकाङ्गःप्रजायते । अजातेनप्रदातव्या विचित्रवस्त्रसंयुता ॥ ६१ ॥ उरभ्रेनिहतेचैव पाण्डुरोगःप्रजायते । कस्तूरिकापलंदद्याद् ब्राह्मणायविशुद्धये ॥ ६२ ॥ मार्जारैनिहतेचैव जायतेपिङ्गलोचनः । तेनवैदूर्यरत्नानि दातव्यानिस्वशक्तितः ॥ ६३ ॥ जायतेचक्रपादस्तु निहतेशुनिमानवः । निष्कद्वयमितंदद्यान्नकुलंसविशुद्धये ॥ ६४ ॥ शशकेनिहतेचैव कुब्जकर्णस्तुजायते । निष्कत्रयमितंदद्यात्ससुवर्णंविशुद्धये ॥ ६५ ॥ नकुलस्याभिहनने जायतेवक्रमण्डलम् । शय्यांदद्यात्सविप्राय सोपधानांतूलिकाम् ॥ ६६ ॥ शयालुःसर्पहाद्याल्लोहदण्डंसदक्षिणम् । कुब्जोमूषकहाद्यात्सप्तधान्यंसकाञ्चनम् ॥ ६७ ॥


बकरी की हत्या करने पर अङ्गुष्ठा आदि अधिक अङ्गवाला वह जन्मता है इ- लिये वह कई रंगवाले वस्त्र सहित बकरी का दान करे ॥ ६१ ॥ मेढ़ा की ह- त्या करने पर जन्मान्तर में पाण्डुरोग होता है उस पाप की शुद्धि के लिये चार तोला कस्तूरी ब्राह्मण को दान करे ॥ ६२ ॥ बिलाव के मारडालने पर पीली आँखोंवाला जन्मान्तर में होता है। उस को अपनी शक्ति अनुसार वैडूर्य रत्नों का दान करना चाहिये ॥ ६३ ॥ कुत्ते की हत्या करने पर मनुष्य चक्र (पहिये जैसे) पगवाला होता है वह दो तोला सुवर्ण का न्योला बना कर अपनी शुद्धि के लिये दान करे ॥ ६४ ॥ शश (खरहा) के मारने पर कुबड़े कान वाला जन्मान्तर में होता है, वह अपनी शुद्धि के लिये तीन तोला सुवर्ण का दान करे ॥ ६५ ॥ न्योला के मारने पर जन्मान्तर में वक्रमण्डल रोग होता है इस से वह तोशक तकिया सहित नयी खटिया का दान करे ॥ ६६॥ सांप को मारने वाले को निद्रा अधिक तर घेरे रहती है। इस से वह दक्षिणा स- हित लोहे के दण्ड का दान करे। मूषक को मारने वाला कुबड़ा होता है वह सुवर्ण दक्षिणा सहित सतनजा का दान करे ॥ ६७ ॥

१६ शातातपस्मृतिः ॥

मयूरघातनेचाथ जायतेकृष्णमण्डलम् ।
निष्कतत्रयमितोदेयस्तेनस्वर्णमयःशिखी ॥ ६८ ॥
हंसघातीभवेद्यस्तु तस्यस्याच्छ्वेतमण्डलम् ।
रौप्यंपलत्रयमितं हंसंदद्याद्विशुद्धये ॥ ६६ ॥
कुक्कुटेनिहतेचैव वक्रनासःप्रजायते ।
पारावतंससौवर्णं प्रदद्यान्निष्कमात्रकम् ॥ ७० ॥
शुकसारिकयोर्घाती नरःस्खलितवाग्भवेत् ।
सच्छास्त्रपुस्तकंदद्यात्सर्वापायसदक्षिणाम् ॥ ७१ ॥
वकघातीदीर्घनासो दद्याद्गांधवलप्रभाम् ।
काकघातीकर्णहीनो दद्याद्गामसितप्रभाम् ॥ ७२ ॥
हिंसायांनिष्कृतिरियं ब्राह्मणेसमुदाहृता ।
तदर्द्धार्द्धप्रमाणेन क्षत्रियादिष्वनुक्रमात् ॥ ७३ ॥
क्षत्रियोमृगयांचक्रे मृगान्निघ्नन्नदुष्यति ।


मोर के मारने पर कृष्ण मण्डल रोग होता है उस को तीन तोले सुवर्ण का मोर बनवा के दान करना चाहिये ॥ ६८ ॥ जो हंस की हत्या करे उस के जन्मान्तर में श्वेतमण्डल रोग होता है वह अपनी शुद्धि के लिये बारह तोला चांदी का हंस बनवा के दान करे ॥ ६९ ॥ मुर्गा की हत्या करने पर जन्मान्तर में टेढ़ी नासिका वाला होता है। वह एक तोला सुवर्ण का कबूतर बना के दान करे ॥ ७० ॥ तोता और मैना का मारनेवाला पुरुष गूंगा होता है। वह दक्षिणा सहित सत्शास्त्र के पुस्तक का दान ब्राह्मण को देवे ॥ ७१ ॥ बगुला का मारनेवाला बड़ीनाकवाला होता है वह श्वेत गौ का दान करे। कौवे का मारनेवाला बधिर (बहरा) होता वह काली गौ का दान करे ॥ ७२ ॥ यहां तक ब्राह्मण के लिये हिंसा का प्रायश्चित्त कहा गया है। उससे आधा क्षत्रिय को तथा चौथाई प्रायश्चित्त वैश्य को करना चाहिये ॥७३॥ क्षत्रिय पुरुष वन जङ्गल में मृगादि को शिकार करता हुआ दूषित नहीं होता। युद्ध के मैदान में प्राप्त जो क्षत्रिय उस का जो धर्म है उस से वह भले

भाषार्थसंहिता ॥ ९७

तस्ययुद्धाङ्गणगतो योधर्मस्तेनमापयेत् ॥ ७४ ॥ गजादिकान्सप्तदश सप्तसप्तोत्तरान्क्रमात् । निघ्नन्नवाप्नोतिनरश्चिह्नानानिकथितानिच । मयूराद्यास्तथासप्त चतुर्दशोत्तरान्क्रमात् ॥ ७५ ॥ गर्भपातकरीनारी स्वदेहेभोगलिप्सया । सप्तजन्मावधिर्यावन्नरकान्तेहसन्तिका ॥ ७६ ॥ तत्पातकविनाशाय बालं कुर्याद्धिरण्मयम् ॥ ७७ ॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्म्मविपाके हिंसादि प्रायश्चित्तविधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ सुरापःश्यावदन्तःस्यात् प्राजापत्याष्टकंचरेत् । शर्करायास्तुलाःसप्त दद्यात्पापविशुद्धये ॥ १ ॥ जपित्वातुमहारुद्रं दशांशंजुहुयात्तिलैः ।


ही हिंसा करे ॥ ७४ ॥ हाथी आदि सत्रह परिगणितों को युद्ध में न मारे ( मनु० ७ । ९१-९३ तक में १७ को मारने का निषेध है ) और पिछले ब्राह्मणादि सात २ को मारता हुआ क्षत्रिय भी पूर्वोक्त चिह्नों वाला जन्मान्तर में होता है ( इसी अ० २ के ५२ श्लोक से लेके हाथी आदि १७ के वध के प्रायश्चित्त कहे हैं उन को क्षत्रिय भी शिकार आदि में न मारे ) ६८ श्लोक से लेकर कहे मोर आदि सात ओर उन से पहिले गिनाये चौदह को क्षत्रिय भी यदि मारेगा तो उस को भी पाप लगेगा और जन्मान्तर में वैसे २ चिह्नों वाला होगा ॥ ७५ ॥ अपने शरीर में काम भोग का सुख चाहती हुई नारी यदि गर्भपात करे तो सात जन्मों तक अगौठी बनती है ॥ ७६ ॥ उस पातक को नष्ट करने के लिये सुवर्ण का बालक बना कर वस्त्र सहित ब्राह्मण को दान करे ॥ ७७ ॥

यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में हिंसादिकर्मविपाक सम्बन्धी प्रायश्चित्तविधायक द्वितीयाध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

सुरा पीनेवाला ब्राह्मण नरक भोग के पश्चात् मनुष्य जन्म में काले दांतवाला होता वह अपने पातक की शुद्धि के लिये आठ प्राजापत्य व्रत और सातपसेरी शक्कर का दान करे ॥ १ ॥ फिर महारुद्र ( रुद्रो के १२१ पाठ ) जप

१८ शातातपस्मृतिः ॥

ततोऽभिषेकःकर्तव्यो मन्त्रैर्वारुणदैवतैः ॥ २ ॥
मद्यपोरक्तपित्तोस्यात्सदद्यात्सर्पिषोघटम् ।
मधुनोऽर्द्धघटंचैव सहिरण्यंविशुद्धये ॥ ३ ॥
अभक्ष्यभक्षणाच्चैव जायतेकृमिकोदरः ।
यथावत्तेनशुद्ध्यर्थमुपोष्यंभीष्मपञ्चकम् ॥ ४ ॥
उदक्यावेक्षितंभुक्त्वा जायतेकृमिलोदरः ।
गोमूत्रयावकाहारस्त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥ ५ ॥
भुक्त्वाचास्पृश्यसंयुक्तो जायतेकृमिलोदरः ।
त्रिरात्रंवैष्णवंकृत्वा सततपातकशान्तये ॥ ६ ॥
श्वमार्जाररादिभिःस्पृष्टं भुक्त्वादुर्गन्धवान्भवेत् ।
पीत्वात्रिरात्रंगोमूत्रं भोजयेद्ब्राह्मणत्रयम् ॥ ७ ॥
अनिवेद्यसुरादिभ्यो भुञ्जानोजायतेनरः ।
भोजयेत्त्रिशतान्विप्रान्सहस्रंतुप्रमाणतः ॥ ८ ॥
परान्नविघ्नकरणादजीर्णमभिजायते ।


करा के घृत मिले तिलों से दशांश होम करे। फिर वरुण देवतावाले मन्त्रों से यजमान का अभिषेक विद्वान् लोग करें ॥ २ ॥ मद्य पीनेवाला जन्मान्तर में रक्त पित्त रोगयुक्त होता है वह अपनी शुद्धि के लिये एक घड़ा भर घी और आधा घड़ा शहद का सुवर्ण सहित दान करे ॥ ३ ॥ अभक्ष्य भक्षण करने से जन्मान्तर में उदरकृमि रोग युक्त होता है । वह अपनी शुद्धि के लिये भीष्मपञ्चक के (कात्तिक शुक्ल ११ एकादशी से पौर्णमासी तक) पांच दिन यथावत् उपवास करे ॥ ४ ॥ रजस्वला के देखे हुए का भोजन करने पर पेट में कृमि रोगवाला होता है । वह गोमूत्र सहित कुलत्थ को तीनदिन तक खाता हुआ व्रत करे तो शुद्ध होता है ॥५॥ स्पर्श न करने योग्य चाण्डालादि के मेल में भोजन करने पर उदर कृमिरोग युक्त होता है । वह उस पातक की शान्ति के लिये विष्णुभगवान् की पूजा उपासना का व्रत तीन दिन करे ॥ ६ ॥ कुत्ता बिल्ली आदि का छुआ भोजन करके दुर्गन्ध युक्त होता है । वह तीन दिन तक गोमूत्र पीकर उपवास करके तीन ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥७॥ जो देवतादि को भोग वा देवेयज्ञादि न करके भोजन करता है वह नास्तिक होता, वह एक हजार वा तीनसौ ब्राह्मणों को भोजन कराये ॥८॥ अन्यके भोजन में वि-

भावार्थसहिता ॥ १९

लक्षहोमंसकुर्वीत प्रायश्चित्तंयथाविधि ॥ ९ ॥
मन्दोदराग्निर्भवति सतिद्रव्येकदन्नदः ।
प्राजापत्यत्रयं कुर्याद् भोजयेच्चशतंद्विजान् ॥ १० ॥
विषदःस्याच्छर्दिरोगो दद्याद्दशपयस्विनीः ।
मार्गहापादरोगोस्यात्सोऽश्वदानंसमाचरेत् ॥ ११ ॥
पिशुनोनरकस्यान्ते जायतेश्वासकासवान् ।
घृतंतेनप्रदातव्यं सहस्रपलसम्मितम् ॥ १२ ॥
द्यूतोऽपस्माररोगीस्यात्तत्पापविशुद्धये ।
ब्रह्मकूर्चत्रयंकृत्वा धेनुंदद्यात्सदक्षिणाम् ॥ १३ ॥
शूलीपरोपतापेन जायतेतत्प्रमोचने ।
सोऽन्नदानंप्रकुर्वीत तथारुद्रंजपेन्नरः ॥ १४ ॥
दावाग्निदायकश्चैव रक्तातीसारवान्भवेत् ।
तेनोदपानंकर्त्तव्यं रोपणीयस्तथावटः ॥ १५ ॥
सुरालयेजलेवापि सकृद्विष्टांकरोतियः ।


घ्र करने से अजीर्ण रोगी होता है। वह विधिपूर्वक एक लाख आहुति गायत्री से घी मिले तिलों का होम करे ॥९॥ द्रव्य नाम धन सम्पत्ति अच्छी होने पर भी निकृष्ट अन्न का दान करने वाला मन्दाग्नि रोग युक्त होता है वह तीन प्राजापत्य व्रत करके सौ १०० ब्राह्मण जिमावे ॥ १० ॥ विष देने वाला जन्मान्तर में वमन रोगी होता है। वह दूध देती हुई दश गौओं का दान करे। मार्ग को नष्ट करने वाला पगों में रोगी होता है वह घोड़े का दान करे ॥ ११ ॥ चुगली निन्दा करनेवाला नरक भोग के अन्त में श्वास कास (दमा) का रोगी होता है उसको एक मन भर ४० सेर घी का दान करना चाहिये ॥१२॥ जुआ खेलने वाला मृगी रोग युक्त होता है वह उस पाप की शुद्धि के लिये पराशरस्मृति के ११वें अ० में कहे तीन ब्रह्म कूर्च व्रत करके दक्षिणा सहित दूध देने वाली गौ का दान करे ॥ १३ ॥ अन्यों को दुःख देने वाला जन्मान्तर में शूल रोग युक्त होता है वह उस को छुड़ाने के लिये अन्न का दान और रुद्रों का पाठ करे ॥ १४ ॥ वन में आग लगाने वाला रक्तातीसार (रुधिर के दस्त) रोग युक्त होता है वह वटका वृक्ष लगावे और प्याऊ बैठावे ॥ १५ ॥ देव मन्दिर में वा जलाशय में एक बार भी

२० शातातपस्मृतिः ॥

गुदरोगोभवेत्तस्य पापरूपःसुदारुणः ॥ १६ ॥
मासंसुरार्चनेनैव गोदानद्वितयेनतु ।
प्राजापत्येनचैकेन शाम्यन्तिगुदजारुजः ॥ १७ ॥
गर्भस्तम्भकरीनारी काकवन्ध्याप्रजायते ।
तयाकार्यंप्रयत्नेन गोदानंविधिपूर्वकम् ॥ १८ ॥
गर्भपातनजारोगा यकृत्प्लीहजलोदराः ।
तेषांप्रशमनार्थाय प्रायश्चित्तमिदंस्मृतम् ॥ १९ ॥
एतेषुदद्याद्विप्राय जलधेनुंविधानतः ।
सुवर्णरूप्यताम्राणां पलत्रयसमन्विताम् ॥ २० ॥
प्रतिमाभङ्गकारीच व्रणकायःप्रजायते ।
संवत्सरत्रयंसिंचेदश्वत्थंप्रतिवासरम् ॥ २१ ॥
उद्वाहयेत्तमश्वत्थं स्वगृहोक्तविधानतः ।
तत्रसंस्थापयेद्देवं विघ्नराजंसुपूजितम् ॥ २२ ॥
दुष्टवादीखण्डितःस्यात्सर्वंदद्याद्विजातये ।


जो मल मूत्र त्याग करे उन के गुदेन्द्रिय में पाप रूप भयङ्कर रोग होता है ॥ १६ ॥ एक महीने तक देवता का पूजन करने, दो गो देने, और एक प्राजापत्य व्रत करने से गुदा के रोग शान्त होते हैं ॥ १७ ॥ गर्भस्थिति को रोकने वाली स्त्री काक वन्ध्या होती है । उस को यत्न के साथ विधि पूर्वक गोदान करने चाहिये ॥ १८ ॥ गर्भपात कराने से यकृत्-प्लीह-जलोदर रोग होते हैं उन की शान्ति के लिये आगे प्रायश्चित्त यह कहते हैं कि ॥१९॥ इन यकृत् आदि रोगों की शान्ति के लिये चार २ तोला सुवर्ण, चांदी और तांबा से युक्त विधि पूर्वक जल धेनु ब्राह्मण को देवे ॥ २० ॥ प्रतिमा को तोड़ने वाले के शरीर में अधिकांश फोड़ा फुंसी होते हैं वह पुरुष तीन वर्ष तक प्रति दिन पीपल वृक्ष के मूल में जल दिया करे ॥ २१ ॥ और अपने गृहासूत्रोक्त विधि से उस पीपल का विवाह करे । तथा उस पीपल के नीचे विघ्नों के राजा गणेश जी देवता का स्थापन करके पूजन करे ॥ २२ ॥ दुष्ट वचन बोलने वाला खण्डित ( अङ्गहीन ) होता है । वह दो घड़े दूध सहित आठ तोला चांदी

भाषार्थसहिता ॥ २१

रूप्यंपलद्वयंदुग्धं घटद्वयसमन्वितम् ॥ २३ ॥ खल्वाटःपरनिन्दायां धेनुंदद्यात्सकाञ्चनाम् । परोपहासकृत्काणः सगांदद्यात्समौक्तिकाम् ॥ २४ ॥ सभायांपक्षपातीच जायतेपक्षघातवान् । निष्कत्रयमितंहेम सदद्यात्सत्यवर्त्तिनाम् ॥ २५ ॥ इति शातातपोये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके प्रकीर्णप्रा- यश्चित्तं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ कुलघ्नो नरकस्यान्ते जायते विप्रहेमहृत् । सतुस्वर्णशतंदद्यात्कृत्वाचान्द्रायणत्रयम् ॥ १ ॥ औदुम्बरीताम्रचौरौ नरकान्तेप्रजायते । प्राजापत्यंसकृच्चैवं ताम्रंपलशतंदिशेत् ॥ २ ॥ कांस्यहारीचभवति पुण्डरीकसमन्वितः । कांस्यंपलशतंदद्यादुपोष्यादिवसंनरः ॥ ३ ॥ रीतिहृत्पिङ्गलाक्षःस्यादुपोष्यहरिवासरम् ।


सुपात्र ब्राह्मण को दान देवे ॥ २३ ॥ अन्य की निन्दा करने पर गंजा होता है तब सुवर्ण सहित दूध वाली गौ का दान करे । अन्यों का उपहास ( न- कलादि ) करने वाला काणा ( एकाक्ष ) होता है वह मोतियों सहित गौ का दान करे ॥ २४ ॥ सभा में पक्षपात करने वाला पक्षाघात राग युक्त होता है । वह सत्य के आचरणी सुपात्र ब्राह्मणों को तीन तोला सुवर्ण का दान करे ॥ २५ ॥ यह शातातपीय धर्मशास्त्र के कर्मविपाक विषय में मिश्रित प्राय- श्चित्त वर्णन तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥ ब्राह्मण का सुवर्ण चुराने वाला नरक भोग के अन्त में कुलघ्न (जिस से आगे कुल न चले) होता है। वह तीन चान्द्रायण व्रत करके सौ १०० अशर्फी सुवर्ण का दान करे ॥१॥ तांबे को चुराने वाला नरक भोग के अन्त में औदुम्बरी रोग युक्त होता है। वह प्राजापत्य व्रत करके चार सेर तांबे के पात्रों का दान करे ॥२॥ कांसे को चुरानेवाला पुण्डरीकरोग युक्त होता है वह एक दिन उपवास करके कांसे के चारसेर पात्रों का दान करे ॥ ३ ॥ पीतल चुरानेवाला पीली आंखों से युक्त

२२ शातातपस्मृतिः॥

रीतिंपलशतंदद्यादलङ्कृत्यद्विजंशुभम् ॥ ४ ॥
मुक्ताहारीचपुरुषो जायतेपिङ्गमूर्द्धजः ।
मुक्ताफलशतंदद्यादुपोष्यसविधानतः ॥ ५ ॥
त्रपुहारीचपुरुषो जायतेनेत्ररोगवान् ।
उपोष्यदिवसंचापि दद्यात्पलशतंत्रपु ॥ ६ ॥
सीसहारीचपुरुषो जायेतशीर्षरोगवान् ।
उपोष्यदिवसंदद्याद् घृतधेनुंविधानतः ॥ ७ ॥
दुग्धहारीचपुरुषो जायतेबहुमूत्रकः।
सद्याद्दुग्धधेनुंच ब्राह्मणावयथाविधि॥ ८ ॥
दधिचौरश्चपुरुषो जायतेमद्गवान्यतः ।
दधिधेनुःप्रदातव्या तेनविप्रायशुद्धये ॥ ९ ॥
मधुचोरस्तुपुरुषो जायतेदांतरोगवान् ।
सद्यान्मधुधेनुंच समुपोष्यद्विजातये ॥ १० ॥
इक्षोर्विकारहारीच भवेद्गुदरुगान्वितः ।


होता है। वह एकादशी के दिन उपवास करके पीतल के चार सेर पात्रों का सुपात्र ब्राह्मण को वस्त्रादि सहित दान करे ॥ ४ ॥ मोती चुरानेवाला पुरुष पीले केशोंवाला होता है। वह एक दिन उपवास करके विधिपूर्वक सौ १०० मोती का दान करे ॥ ५ ॥ रांगा का चुरानेवाला पुरुष नेत्र का रोगी होता वह एक दिन उपवास करके चार सेर रांगे का दान करे ॥ ६ ॥ सीसे का चुरानेवाला शिर के रोग से युक्त होता है वह एक दिन उपवास करके घी की कागद में रखकर विधिपूर्वक घी का दान करे ॥ ७ ॥ दूध चुरानेवाला बहुमूत्ररोग युक्त होता है वह विधिपूर्वक ब्राह्मण को दुग्ध धेनु का दान करे ॥८॥ दही चुराने से मनुष्य मन्द ( मदयुक्त ) होता है उसको अपनी शुद्धि के लिये दधि धेनु का ब्राह्मण के लिये दान देना चाहिये ॥ ९ ॥ शहद चुरानेवाला पुरुष दांत के रोग से युक्त होता है वह एक दिन उपवास करके ब्राह्मण को मधु धेनु देवे ॥ १० ॥ ईख के विकार रस गुड़ आदि को चुरानेवाला

भाषाधर्मसंहिता ॥ २३

गुड़धेनुःप्रदातव्या तेनतद्दोषशान्तये ॥ ११ ॥ लोहहारीचपुरुषो जायतेबर्बरोगवान् । लोहंपलशतंदद्यादुपोष्यसतुवासरम् ॥ १२ ॥ तैलचोरस्तुपुरुषोभवेत्कण्ड्वादिपीडितः । उपोष्यसतुविप्राय दद्यात्तैलघटद्वयम् ॥ १३ ॥ आमान्नहरणाच्चैव दन्तहीनःप्रजायते । सदद्यादश्विनौहेमनिष्कद्वयविनिर्मितौ ॥ १४ ॥ पक्वान्नहरणाञ्चैव जिह्वारोगःप्रजायते । गायत्र्याःसजपेल्लक्षं दशांशंजुहुयात्तिलैः ॥ १५ ॥ फलहारीचपुरुषो जायतेव्रणिताङ्गुलिः । नानाफलानामयुतं सदद्यादथद्विजन्मने ॥ १६ ॥ ताम्बूलहरणाञ्चैव श्वेतोष्ठःसंप्रजायते । सदक्षिणांप्रदद्याच्च विद्रुमस्यद्वयंवरम् ॥ १७ ॥ शाकहारीचपुरुषो जायतेनीललोचनः ।


उदर में गुल्मरोग युक्त होता है उसको अपने दोष की शान्ति के लिये गुड़ धेनु का दान करना चाहिये ॥ ११ ॥ लोहा चुरानेवाला पुरुष बर्बरोगवाला होता है वह एक दिन उपवास करके चार सेर लोहे का दान करे ॥ १२ ॥ तैल चुरानेवाला पुरुष खुजली के राखादि से पीड़ित होता है वह दिनभर उपवास करके दो घड़े तेल ब्राह्मण को दान करे ॥ १३॥ कच्चा अन्न चुरानेवाला दांतों से हीन होता है । वह आठ तोला सुवर्ण से अश्विनी कुमार देवों की प्रतिमा बनाके दान करे ॥ १४ ॥ पकाया अन्न चुराने से जीभ में रोग होता है वह एक लाख गायत्री का जप करके घी युक्त तिलों से दशांश होम करे ॥१५॥ फल चुरानेवाला अंगुलियों में फोड़ा फुंसी युक्त होता है वह अनेक प्रकार के दशहजार फलों का दान ब्राह्मण को देवे ॥ १६ ॥ पान ( ताम्बूल ) चुराने से श्वेत ओठोंवाला होता है वह दो उत्तम मूंगा (पन्नादी) दक्षिणा देवे ॥१७॥ शाक चुरानेवाला पुरुष नीली आंखों से युक्त होता है । वह ब्राह्मण को दो महार-