भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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६ शातातपस्मृतिः ॥

तेभ्योऽनुज्ञामभिप्राप्य प्रतिगृह्यतथाशिषः । भोजयित्वाद्द्विजान्शक्त्या भुञ्जीतसहबन्धुभिः ॥३५॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके साधा- रणविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

ब्रह्महानरकस्यान्ते पाण्डुकुष्ठीप्रजायते । प्रायश्चित्तंप्रकुर्वीत सततंतत्प्रशान्तये ॥ १ ॥ चत्वारःकलशाःकार्याः पञ्चरत्नसमन्विताः । पञ्चपल्लवसंयुक्ताः सितवस्त्रेणसंयुताः ॥ २ ॥ अश्वस्थानादिमृद्युक्तास्तीर्थोदकसुपूरिताः । कषायपञ्चकोपेता नानाविधफलान्विताः ॥ ३ ॥ सर्व्वौषधिसमायुक्ताः स्थाप्याःप्रतिदिशंद्विजैः । रौप्यमष्टदलं पद्मं मध्यकुम्भोपरिन्यसेत् ॥ ४ ॥ तस्योपरिन्यसेद्देवं ब्रह्माणंचचतुर्मुखम् ।


उन ब्राह्मणों से आज्ञा लेकर उन के आशीर्वाद को ग्रहण करके और अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपने बन्धुओं सहित स्वयं भोजन करे ॥ ३५ ॥

यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद मे कर्मविपाक विषयक साधारण विधि रूप प्रथमाध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

ब्रह्महत्यारा पुरुष नरक भोग के अन्त में श्वेत कुष्ठी होता है इस लिये वह पुरुष उस पाप के शान्त्यर्थ प्रायश्चित्त करे ॥१॥ पांचों रत्न पांच पल्लव और श्वेत वस्त्रों से युक्त चार तांबे के कलश लीपे हुये शुद्ध स्थल में स्थापित करे ॥२॥ गोशाला घुड़शालादि की सात मट्टी कलशों के नीचे धरे तथा तीर्थों के जल से कलशों को भरे और पांच कषाय (कसैली वस्तु) और अनेक प्रकार के फलों से संयुक्त करे ॥३॥ सब औषधियों से युक्त करके पूर्वादि चारों दिशाओं में उनको स्थापित करे और बीच में स्थापित किये पांचवें कलश पर चांदी का आठ दल का कमल रक्खे ॥ ४ ॥ उस कमल पर छः मासे सुवर्ण से बनायी