भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषाऽर्थसहिता ॥ ५

पुनस्तान्परिपूर्णार्थं मर्चयेद्विधिवद्विजान् ॥ २८ ॥
दद्याद्व्रतानिनामानि तेभ्यःश्रद्धासमन्वितः ।
संतुष्टाब्राह्मणादद्युरनुज्ञांव्रतकारिणे ॥ २९ ॥
जपच्छिद्रंतपश्चिद्रं यच्छिद्रंयज्ञकर्मणि ।
सर्वंभवतिनिश्छिद्रं यस्यचेच्छन्तिब्राह्मणाः ॥ ३० ॥
ब्राह्मणायानिभाषन्ते मन्यन्तेतानिदेवताः ।
सर्वदेवमयाविप्रा नतद्वचनमन्यथा ॥ ३१ ॥
उपवासोव्रतंचैव स्नानंतीर्थफलंतपः ।
विप्रैस्सम्पादितंयस्य सम्पन्नंतस्यतत्फलम् ॥ ३२ ॥
सम्पन्नमितियद्वाक्यं वदन्तिक्षितिदेवताः ।
प्रणम्यशिरसाधार्यमग्निष्टोमफलंलभेतू ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणाजङ्गमंतीर्थं निर्मलंसार्वकामिकम् ।
तेषांवाक्योदकेनैव शुद्ध्यन्तिमलिनाजनाः ॥ ३४ ॥


लिये उन ब्राह्मणों का विधिवत् पूजन करे ( अर्थात् जब प्रसन्न संतुष्ट हो कर ( संपूर्णमस्तु ) ऐसा आशीर्वाद देवें तो कार्य सफल होता है ) ॥ २८ ॥ प्रायश्चित्ती पुरुष अपने किये व्रत और नामों का श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मणों से निवेदन करे वा समर्पण करे कि यह सब आप लोगों का हो है । तब संतुष्ट हुए ब्राह्मण व्रत के करने वाले पुरुष को आज्ञा देवें कि तुम्हारा व्रत सफल हो ॥ २९ ॥ जप, तप, यज्ञ कर्म, इन में जो छिद्र ( न्यूनता ) होती है वह सब ब्राह्मणों की आज्ञा से पूर्ण हो जाती है ॥ ३० ॥ जो बात शुद्ध ब्राह्मण कहते हैं उसे देवता भी मानते हैं क्योंकि ब्राह्मण सब देवताओं के रूप हैं इस से उन का वचन अन्यथा [झूठा] नहीं हो सकता ॥३१॥ उपवास, व्रत, स्नान, तीर्थ का फल, ये सब जिसके ब्राह्मणों ने सफल कह दिये उस को इन का फल सिद्ध 'होजाता है ॥ ३२ ॥ जिस कर्म में भूमि के देवता ब्राह्मण ( सम्पन्नम् ) सिद्ध हुआ यह वाक्य कहदें उस वाक्य को प्रणाम करके जो शिर पर धारण करता है वह अग्निष्टोम यज्ञ के फल को प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥ संपूर्ण कामनाओं के देने वाले ब्राह्मण लोग निर्मल जंगम ( चेतन ) तीर्थ हैं उन के वाक्य रूपी जल से ही मलिन जन शुद्ध होजाते हैं ॥ ३४ ॥