अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 663, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसंहिता ॥ ९७
तस्ययुद्धाङ्गणगतो योधर्मस्तेनमापयेत् ॥ ७४ ॥ गजादिकान्सप्तदश सप्तसप्तोत्तरान्क्रमात् । निघ्नन्नवाप्नोतिनरश्चिह्नानानिकथितानिच । मयूराद्यास्तथासप्त चतुर्दशोत्तरान्क्रमात् ॥ ७५ ॥ गर्भपातकरीनारी स्वदेहेभोगलिप्सया । सप्तजन्मावधिर्यावन्नरकान्तेहसन्तिका ॥ ७६ ॥ तत्पातकविनाशाय बालं कुर्याद्धिरण्मयम् ॥ ७७ ॥ इति शातातपीये धर्मशास्त्रे कर्म्मविपाके हिंसादि प्रायश्चित्तविधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ सुरापःश्यावदन्तःस्यात् प्राजापत्याष्टकंचरेत् । शर्करायास्तुलाःसप्त दद्यात्पापविशुद्धये ॥ १ ॥ जपित्वातुमहारुद्रं दशांशंजुहुयात्तिलैः ।
ही हिंसा करे ॥ ७४ ॥ हाथी आदि सत्रह परिगणितों को युद्ध में न मारे ( मनु० ७ । ९१-९३ तक में १७ को मारने का निषेध है ) और पिछले ब्राह्मणादि सात २ को मारता हुआ क्षत्रिय भी पूर्वोक्त चिह्नों वाला जन्मान्तर में होता है ( इसी अ० २ के ५२ श्लोक से लेके हाथी आदि १७ के वध के प्रायश्चित्त कहे हैं उन को क्षत्रिय भी शिकार आदि में न मारे ) ६८ श्लोक से लेकर कहे मोर आदि सात ओर उन से पहिले गिनाये चौदह को क्षत्रिय भी यदि मारेगा तो उस को भी पाप लगेगा और जन्मान्तर में वैसे २ चिह्नों वाला होगा ॥ ७५ ॥ अपने शरीर में काम भोग का सुख चाहती हुई नारी यदि गर्भपात करे तो सात जन्मों तक अगौठी बनती है ॥ ७६ ॥ उस पातक को नष्ट करने के लिये सुवर्ण का बालक बना कर वस्त्र सहित ब्राह्मण को दान करे ॥ ७७ ॥
यह शातातपीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में हिंसादिकर्मविपाक सम्बन्धी प्रायश्चित्तविधायक द्वितीयाध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
सुरा पीनेवाला ब्राह्मण नरक भोग के पश्चात् मनुष्य जन्म में काले दांतवाला होता वह अपने पातक की शुद्धि के लिये आठ प्राजापत्य व्रत और सातपसेरी शक्कर का दान करे ॥ १ ॥ फिर महारुद्र ( रुद्रो के १२१ पाठ ) जप