अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 664, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ शातातपस्मृतिः ॥
ततोऽभिषेकःकर्तव्यो मन्त्रैर्वारुणदैवतैः ॥ २ ॥
मद्यपोरक्तपित्तोस्यात्सदद्यात्सर्पिषोघटम् ।
मधुनोऽर्द्धघटंचैव सहिरण्यंविशुद्धये ॥ ३ ॥
अभक्ष्यभक्षणाच्चैव जायतेकृमिकोदरः ।
यथावत्तेनशुद्ध्यर्थमुपोष्यंभीष्मपञ्चकम् ॥ ४ ॥
उदक्यावेक्षितंभुक्त्वा जायतेकृमिलोदरः ।
गोमूत्रयावकाहारस्त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ॥ ५ ॥
भुक्त्वाचास्पृश्यसंयुक्तो जायतेकृमिलोदरः ।
त्रिरात्रंवैष्णवंकृत्वा सततपातकशान्तये ॥ ६ ॥
श्वमार्जाररादिभिःस्पृष्टं भुक्त्वादुर्गन्धवान्भवेत् ।
पीत्वात्रिरात्रंगोमूत्रं भोजयेद्ब्राह्मणत्रयम् ॥ ७ ॥
अनिवेद्यसुरादिभ्यो भुञ्जानोजायतेनरः ।
भोजयेत्त्रिशतान्विप्रान्सहस्रंतुप्रमाणतः ॥ ८ ॥
परान्नविघ्नकरणादजीर्णमभिजायते ।
करा के घृत मिले तिलों से दशांश होम करे। फिर वरुण देवतावाले मन्त्रों से यजमान का अभिषेक विद्वान् लोग करें ॥ २ ॥ मद्य पीनेवाला जन्मान्तर में रक्त पित्त रोगयुक्त होता है वह अपनी शुद्धि के लिये एक घड़ा भर घी और आधा घड़ा शहद का सुवर्ण सहित दान करे ॥ ३ ॥ अभक्ष्य भक्षण करने से जन्मान्तर में उदरकृमि रोग युक्त होता है । वह अपनी शुद्धि के लिये भीष्मपञ्चक के (कात्तिक शुक्ल ११ एकादशी से पौर्णमासी तक) पांच दिन यथावत् उपवास करे ॥ ४ ॥ रजस्वला के देखे हुए का भोजन करने पर पेट में कृमि रोगवाला होता है । वह गोमूत्र सहित कुलत्थ को तीनदिन तक खाता हुआ व्रत करे तो शुद्ध होता है ॥५॥ स्पर्श न करने योग्य चाण्डालादि के मेल में भोजन करने पर उदर कृमिरोग युक्त होता है । वह उस पातक की शान्ति के लिये विष्णुभगवान् की पूजा उपासना का व्रत तीन दिन करे ॥ ६ ॥ कुत्ता बिल्ली आदि का छुआ भोजन करके दुर्गन्ध युक्त होता है । वह तीन दिन तक गोमूत्र पीकर उपवास करके तीन ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥७॥ जो देवतादि को भोग वा देवेयज्ञादि न करके भोजन करता है वह नास्तिक होता, वह एक हजार वा तीनसौ ब्राह्मणों को भोजन कराये ॥८॥ अन्यके भोजन में वि-