अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 667, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ २१
रूप्यंपलद्वयंदुग्धं घटद्वयसमन्वितम् ॥ २३ ॥ खल्वाटःपरनिन्दायां धेनुंदद्यात्सकाञ्चनाम् । परोपहासकृत्काणः सगांदद्यात्समौक्तिकाम् ॥ २४ ॥ सभायांपक्षपातीच जायतेपक्षघातवान् । निष्कत्रयमितंहेम सदद्यात्सत्यवर्त्तिनाम् ॥ २५ ॥ इति शातातपोये धर्मशास्त्रे कर्मविपाके प्रकीर्णप्रा- यश्चित्तं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ कुलघ्नो नरकस्यान्ते जायते विप्रहेमहृत् । सतुस्वर्णशतंदद्यात्कृत्वाचान्द्रायणत्रयम् ॥ १ ॥ औदुम्बरीताम्रचौरौ नरकान्तेप्रजायते । प्राजापत्यंसकृच्चैवं ताम्रंपलशतंदिशेत् ॥ २ ॥ कांस्यहारीचभवति पुण्डरीकसमन्वितः । कांस्यंपलशतंदद्यादुपोष्यादिवसंनरः ॥ ३ ॥ रीतिहृत्पिङ्गलाक्षःस्यादुपोष्यहरिवासरम् ।
सुपात्र ब्राह्मण को दान देवे ॥ २३ ॥ अन्य की निन्दा करने पर गंजा होता है तब सुवर्ण सहित दूध वाली गौ का दान करे । अन्यों का उपहास ( न- कलादि ) करने वाला काणा ( एकाक्ष ) होता है वह मोतियों सहित गौ का दान करे ॥ २४ ॥ सभा में पक्षपात करने वाला पक्षाघात राग युक्त होता है । वह सत्य के आचरणी सुपात्र ब्राह्मणों को तीन तोला सुवर्ण का दान करे ॥ २५ ॥ यह शातातपीय धर्मशास्त्र के कर्मविपाक विषय में मिश्रित प्राय- श्चित्त वर्णन तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥ ब्राह्मण का सुवर्ण चुराने वाला नरक भोग के अन्त में कुलघ्न (जिस से आगे कुल न चले) होता है। वह तीन चान्द्रायण व्रत करके सौ १०० अशर्फी सुवर्ण का दान करे ॥१॥ तांबे को चुराने वाला नरक भोग के अन्त में औदुम्बरी रोग युक्त होता है। वह प्राजापत्य व्रत करके चार सेर तांबे के पात्रों का दान करे ॥२॥ कांसे को चुरानेवाला पुण्डरीकरोग युक्त होता है वह एक दिन उपवास करके कांसे के चारसेर पात्रों का दान करे ॥ ३ ॥ पीतल चुरानेवाला पीली आंखों से युक्त
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