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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पादन्तुशूद्रहत्यायामुदक्यागमनेतथा ।

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४१

अर्द्धमेवसदाकुर्यात्स्त्रीवधेपुरुषस्तथा ॥ ८ ॥
पादन्तुशूद्रहत्यायामुदक्यागमनेतथा ।
गोवधेचतथाकुर्यात्परदारगतस्तथा ॥ ९ ॥
पशून्हत्वातथाग्राम्यान् मासंकृत्वाविचक्षणः ।
आरण्थानांवधेतद्वत्तदर्धंतुविधीयते ॥ १० ॥
हत्वाद्विजंतथासर्पंजलेशयविलेशयान् ।
सप्तरात्रं तथाकुर्याद्व्रतंब्रह्महणस्तथा ॥ ११ ॥
अनस्थ्नांशकटंहत्वा सास्थ्नांदशशतंतथा ।
ब्रह्महत्याव्रतंकुर्यात्पूर्णंसंवत्सरंनरः ॥ १२ ॥
यस्ययस्यचवर्णस्य वृत्तिच्छेदंसमाचरेत् ।
तस्यतस्यवधेप्रोक्तं प्रायश्चित्तंसमाचरेत् ॥ १३ ॥
अपहृत्यतुवर्णानां भुवंप्राप्यप्रमादतः ।
प्रायश्चित्तंवधेप्रोक्तं ब्राह्मणानुमतंचरेत् ॥ १४ ॥
गोजाश्वस्यापहरणो मणेर्नांरजतस्य च ।
जलापहरणेचैव कुर्यात्संवत्सरव्रतम् ॥ १५ ॥
तिलानांधान्यवस्त्राणांमद्यानामामिषस्यच ।


मारने में उक्त में से आधा व्रत करे ॥ ८ ॥ शूद्र की हत्या, रजस्वला स्त्री के गमन, गोवध, और परस्त्री के गमन में उक्त में से चौथाई व्रत को करे ॥९॥ गांव के तथा बन के पशुओं को एक मास तक मार कर उक्त आधा व्रत कहा है ॥१०॥ पक्षी, सांप, जल और बिल में रहने वाले जीव, इन को मार कर ब्रह्महत्या का व्रत सात दिन तक करे ॥ ११ ॥ बिना हड्डी वाले जीवों की भरी गाड़ी और हाड़ वालों के एक हज़ार को मार कर मनुष्य एक वर्ष तक सम्पूर्ण ब्रह्म हत्या का व्रत करे ॥ १२ ॥ जिस २ वर्ण की जीविका में हानि करे, उसी २ वर्ण की हत्या का प्रायश्चित्त करे ॥१३॥ वर्णों की भूमि को चोरी से अनजाने लेकर ब्राह्मणों की आज्ञा से हत्या का जो प्रायश्चित्त है उस को करे ॥ १४ ॥ गौ, बकरी, घोड़ा, मणी, चांदी, जल, इन की जो चोरी करे वह एक वर्ष तक उक्त व्रत करे ॥ १५ ॥ तिल, अन्न, वस्त्र, मदिरा, मांस, इन

४८ शंखस्मृति ॥

संवत्सराद्धं कुर्वीत व्रतमेतत्समाहितः ॥ १६ ॥ तृणेक्षुकाष्ठतक्राणां रसानामपहारकः । मासमेकंव्रतं कुर्याद्गन्धानांसर्पिषांतथा ॥ १७ ॥ लवणानांगुडानांच मूलानांकुसुमस्यच । मासाद्धंतुव्रतं कुर्यादेतदेवसमाहितः ॥ १८ ॥ लोहानांवैदलानांच सूत्राणांचर्मणांतथा । एकरात्रंव्रतं कुर्यादेतदेवसमाहितः ॥ १९ ॥ भुक्त्वापलाण्डुलशुनं मद्यंचकवकानिच । नारंमलंतथामांसं विड्वराहंखरंतथा ॥ २० ॥ गौधेरकुञ्जरोष्ट्रंच सर्वंपञ्चनखंतथा । क्रव्यादंकुक्कुटंग्राम्यं कुर्यात्संवत्सरव्रतम् ॥ २१ ॥ भक्ष्याःपञ्चनखास्त्वेते गोधाकच्छपशल्लकः । खड्‌गश्चशशकश्चैव तान्हत्वाचाचरेद्व्रतम् ॥ २२ ॥ हंसंमद्गुंबकं काकं काकोलंखञ्जरीटकम् । मत्स्यादांश्चतथामत्स्यान्बलाक्रंशुकसारिके ॥ २३ ॥


की चोरी करके छः महीने तक सावधानी से उक्त व्रत करै ॥ १६ ॥ तृण, गांठ, काठ, मठा, रस, सुगन्ध, घी इन का चोर एक महीना तक व्रत करै ॥ १७ ॥ लवण, गुड़, मूल, फूल, इन की चोरी करने वाला सावधानी से पन्द्रह दिन यही व्रत करै ॥ १८ ॥ लोहे के पात्र बांस के पात्र, सूत, चाम, इन की चोरी करने वाला सावधान हो कर एकदिनरात यही व्रत करै ॥ १९ ॥ पलाण्डु, (प्याज) लहशुन, मदिरा, कवक (कटफल) मनुष्य का मल, मनुष्य का मांस विष्ठा खाने वाले सूकर और गधा का मांस इन को खा कर ॥ २० ॥ गोधेय (गोह का बच्चा) हाथी, ऊंट, सब पांच नखवाले, कच्चा मांस खाने वाले जीव, और गांव का मुरगा इन सब का मांस खा कर एक वर्ष तक उक्त व्रत करै ॥ २१ ॥ परन्तु गोह, कछुआ, सेही, गेंडा, खरगोश, ये पांच नखों वाले पांच भक्ष्य हैं और इन पांचों को मारकर भी एकवर्ष तक व्रत को करै ॥ २२ ॥ हंस-मद्गुर, (मत्स्यभेद या जलकाक) बगुला, बलाका, कौआ, काकोल, (सर्प) खञ्जरीट (खञ्जन पक्षि) मछलीको खानेवाली - मछली, तोता, सारिका (मैना,)॥ २३ ॥

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४९

चक्रवाकंप्रप्लवंकौकं मण्डूकंभुजगंतथा ।
मासमेकंव्रतंकुर्याद्धेनञ्चैवनभक्षयेत् ॥ २४ ॥
राजीवान्सिंहतुण्डांश्च शकुलांश्चतथैवच ।
पाठीनरोहितौभक्ष्यो मनुष्येषुपरिकीर्तितौ ॥ २५ ॥
जलेचरांश्चजलजान् मुखाग्रनखविष्किरान् ।
रक्तपादान्जालपादान्सप्ताहांतव्रतमाचरेत् ॥ २६ ॥
तित्तिरिंचमयूरंच लावकंचकपिञ्जलम् ।
वार्ध्रीणसंवर्त्तकंच भक्ष्यानाहयमस्तथा ॥ २७ ॥
भुक्त्वाचोभयतोदन्त मन्यैकशफदीर्घोर्णः ।
तथाभुक्त्वातुमांसांश्च मासाद्धैव्रतमाचरेत् ॥ २८ ॥
स्वयंमृतंष्टथामांसं माहिषंवाजमेवच ।
गौरचक्षीरंविवत्सायाः संधिन्थाश्चतथापयः ॥ २९ ॥
संधिन्यमेध्यमशित्वा पक्षंतुव्रतमाचरेत् ।
क्षीराणियान्यभक्ष्याणि तद्विकाराननेबुधः ॥ ३० ॥
सप्तरात्रंव्रतंकुर्याह्येतत्परिकीर्त्तितम् ।


चक्रवा, प्लव (जल का पंछी) कंक (बगुला) मेढक, सर्प इनको खाकर एक महीना तक व्रत करे और आगे इनको कभी न खावै ॥ २४ ॥ राजीव, सिंहतुंड, श-कुल, पाठीन, रोहित, इन२ नामों वाली मच्छी भक्ष्य कही हैं ॥ २५ ॥ जल में विचरने और जल में पैदा होने वाले, मुख के अग्रभाग में जो नख उनसे खोदने वाले जिनके पग लाल हों, और जिनके जाल के समान पग हों, उन पक्षियों का मांस खाकर सात दिन व्रत करे ॥ २६ ॥ तीतर, मोर, लावक (लावपंछी) कपिंजल, वा-र्ध्रीणस, बत्तक, ये यमराजने भक्ष्य कहे हैं ॥ २७ ॥ जिनके दोनों ओर दांत होते, जिनके एक जुड़े खुर होते, जो एक ओर दानवाले हैं इनका मांस खाकर पंद्रह दिन व्रत करे ॥ २८ ॥ स्वयं मरे जीवका मांस, भैंस और बकरेका मांस, जिस का बछड़ा मरगयाहो अथवा जो संधिनी (गाभिन हो जाने पर दूध देती हो) उस गौ का दूध ॥ २९ ॥ संधिनी गौ का अशुद्ध मूत्रादि इनको खाकर पंद्रह दिन व्रत करे और जो दूध अभक्ष्य हैं उनके विकार (दही, मट्ठा, कढ़ी आदि) को खाकर बुद्धिमान् पुरुष ॥ ३० ॥ सात दिन तक उक्त व्रतको करे। जिसका लाल गोंड़, और जो गोंड़ वृक्षके

५२ | शंखस्मृतिः ॥

लोहितान्वृक्षनिर्यासान्व्रश्चनप्रभवांस्तथा ॥ ३१ ॥
केवलानिचशुक्तानि तथापर्युषितंचयत् ।
गुडशुक्तंतथाभुक्त्वा त्रिरात्रंचव्रतीभवेत् ॥ ३२ ॥
दधिभक्ष्यंचशुक्तेषु यच्चान्यद्दधिसंभवम् ।
गुडशुक्तंतुभक्ष्यंस्यात् ससर्पिष्कमितिस्थितिः ॥ ३३ ॥
यवगोधूमजाःसर्वे विकाराःपयसश्चये ।
राजवाड्वकुल्यंच भक्ष्यंपर्युषितंभवेत् ॥ ३४ ॥
सजीवपक्वंमांसंच सर्वयत्नेनवर्जयेत् ।
संवत्सरंव्रतंकुर्यात् प्राश्यैतानज्ञानतस्तुतान् ॥ ३५ ॥
शूद्रान्नंब्राह्मणोभुक्त्वा तथारङ्गावतारिणः ।
चिकित्सकस्यक्षुद्रस्य तथास्त्रीमृगजीविनः ॥ ३६ ॥
षण्डस्यकुलटायाश्च तथाबन्धनचारिणः ।
वद्धस्यचैवचौरस्य अवीरायाःस्त्रियस्तथा ॥ ३७ ॥
चर्मकारस्यवेनस्य क्लीवस्यपतितस्यच ।
रुक्मकारस्यधूर्त्तस्य तथावार्द्धुपिकस्यच ॥ ३८ ॥
कदर्यस्यनृशंसस्य वेश्यायाःकितवस्यच ।


गोंदने से निकलेहों ॥३१॥ केवल शुक्त (खटाये हुए) और वासी पदार्थ, खटाया बिगड़ा हुआ गुड़ का विकार इन को खाकर तीन दिन व्रत करे ॥ ३२ ॥ विकार से खटाये हुए पदार्थों में दही, तथा दही से बने कढ़ी, रायतादि, घी जिस में मिला हो ऐसा खटाया गुड़ ये शुक्तों में भक्ष्य कहे हैं ॥ ३३ ॥ जौ, गेहूं, दूध,-इन से बने सब विकार और राजवाड़व नामक जीव का मांस ये वासी (धरे हुए) भी भक्ष्य हैं ॥३४॥ जीते जीवों के पकाये मांस को सब प्रकार त्याग देवे और इन पूर्वोक्त अभक्ष्य पदार्थों को ज्ञान पूर्वक खावे तो एक वर्ष तक व्रत करे ॥३५॥ शूद्र, रंगावतारी (नाटकी) वैद्य, क्षुद्रबुद्धि, स्त्री को नचा के तथा मृगों को मार के जीविका करने वाला ॥३६॥ नपुंसक, व्यभिचारिणी स्त्री, बन्धन चारी, (डाकिये) कैदी चोर, पति पुत्र हीन स्त्री, ॥ ३७ ॥ चमार, वेन, क्लीव, (नामर्द) पतित, सुनार, धूर्त्त नाम अन्य की हानि करने वाला, व्याज लेने वाला, ॥ ३८ ॥ कंजूस, हिंसक, वेश्या, जुवारी, इन शूद्रादि

भाषार्थसहिता ॥ ५१

गणान्नंभूमिपालान्न मन्नंचैवम्प्रजीविनाम् ॥ ३९ ॥
मौञ्जिकानांसूतिका नं भुक्त्वामा संव्रतंचरेत् ।
शूद्रस्यसततं भुक्त्वा षण्मासान्व्रतमाचरेत् ॥ ४० ॥
वैश्यस्यतुतथाभुक्त्वा त्रीन्मासान्व्रतमाचरेत् ।
क्षत्रियस्यतथाभुक्त्वा द्वौमासौव्रतमाचरेत् ॥ ४१ ॥
ब्राह्मणस्यतथाभुक्त्वा मासमेकंव्रतंचरेत् ।
आपःसुराभाजनस्थाः पीत्वापक्षंव्रतंचरेत् ॥ ४२ ॥
मद्यभाण्डगताःपीत्वा सप्तरात्रंव्रतंचरेत् ।
शूद्रोच्छिष्टाशनेमासं पक्षमेकंतथाविशः ॥ ४३ ॥
क्षत्रियस्यतुसप्ताहं ब्राह्मणस्यतथादिनम् ।
अग्रश्राद्धाशनेविद्वान् मासमेकंव्रतीभवेत् ॥ ४४ ॥
परिवित्तिःपरिवेत्ता ययाचपरिविन्दति ।
व्रतंसंवत्सरंकुर्य्युर्दातृयाजकपञ्चमाः ॥ ४५ ॥
काकोच्छिष्टंगवाघ्रातं भुक्त्वापक्षंव्रतीभवेत् ।


का अन्न, बहुत मनुष्यों के चन्द का अन्न, राजा का अन्न शिकारी कुत्ते रखने वालों का अन्न, ॥३९॥ सूत के व्यापारी और सूतिका का अन्न खाकर एक मास तक व्रत करे और निरन्तर शूद्र के अन्न को खाकर छ मास तक व्रत करे ॥४०॥ वैश्यका अन्न निरन्तर खाकर तीन महीने और क्षत्रिय का अन्न निरन्तर खाकर दो महीने व्रत करे ॥ ४१ ॥ ब्राह्मणका अन्न निरन्तर खाकर एक महीने तक व्रत करे और मदिरा के पात्र में रक्खा जल पीकर पन्द्रह दिन तक व्रत करे । ४२॥ गुड़ की मदिरा के पात्र का जलपीकर सातदिन व्रत करे । शूद्रका उच्छिष्ट खाकर एक महीना और वैश्य का उच्छिष्ट खाकर पन्द्रह दिन व्रत करे ॥ ४३ ॥ क्षत्रिय का उच्छिष्ट अन्न खाकर सात दिन, ब्राह्मण का उच्छिष्ट अन्न खाकर एक दिन और अद्यादशाह के श्राद्ध में खाकर एक महीना ज्ञानवान् मनुष्य व्रत करे ॥ ४४ ॥ परिवेत्ता परिवित्ति जिस स्त्री के साथ परिवित्ति ने जेठे भाई से पहिले विवाह किया हो वह स्त्री कन्या का दाता और पांचवा याजक (विवाह पढ़ने वाला ) ये पांचों एक वर्ष तक व्रत करें ॥ ४५ ॥ कौवे का उच्छिष्ट, गौ का सूँघा अन्न इन को खाकर पंद्रह दिन व्रत करे और बाल कीड़ा, मूसा, हत इन में जो दूषित हो अर्थात बाल आदि पड़ गये हों

५२ | शंखस्मृतिः ॥

दूषितंकेशकीटैश्च मूषिकालाङ्गुलेनच ॥ ४६ ॥
मक्षिकामशकेनापि त्रिरात्रंतुव्रतीभवेत् ।
वृथाकृसरसंयावपायसापूपशष्कुलीः ॥ ४७ ॥
भुक्त्वात्रिरात्रंकुर्वीत व्रतमेतत्समाहितः ।
नील्याचैवक्षतोविप्रः शुनादष्टस्तथैवच ॥ ४८ ॥
त्रिरात्रंतुव्रतं कुर्यात् पुंश्चलीदशनक्षतः ।
पादप्रतापनंकृत्वा वह्निकृत्वात्तथाप्यधः ॥ ४९ ॥
कुशैःप्रमृज्यपादौच दिनमेकंव्रतीभवेत् ।
नीलीवस्त्रंपरीधाय भुक्त्वास्नानार्हमस्तथा ॥ ५० ॥
त्रिरात्रंव्रतं कुर्याच्छित्वागुल्मलतास्तथा ।
अध्यास्यशयनंयानमासनंपादुकेतथा ॥ ५१ ॥
पलाशन्वादिजंपृष्ट्वात्रिरात्रंतुव्रतीभवेत् ।
वाग्दुष्टंभाजदुष्टंच भाजनेभावदूषिते ।
भुक्त्वाऽन्नंब्राह्मणः पश्चात्त्रिरात्रंतुव्रतीभवेत् ॥ ५२ ॥
क्षत्रियस्तुरणेदत्वा पृष्ठंप्राणपरायणः ।

वा सूयादि ने खाया हो ॥ ४६ ॥ मक्खी मच्छर इनके पड़जाने से दूषित हुए को खा कर तीन दिन व्रत करे और वृथा (केवल अपने लिये) कृसर, (मिले हुए दाल तिल चावल की खिचड़ी) संयाव (सोहनभोग) खीर, पूआ, पूरी, ॥४७॥ इनको खा कर सावधानी से तीन दिन तक व्रत करे । जिस ब्राह्मण के शरीर में नील की लकड़ी से घाव हो जाय वा जिस को कुत्ता काटे ॥ ४८ ॥ वह तीन दिन व्रत करे, जिसके पुंश्चली (वेश्या आदि व्यभिचारिणी) के दांतों से घाव हो जाय और नीचे अग्नि रखकर जो पग तपाये ॥४९॥ वह कुशाओं से पगों को शुद्ध कर के एक दिन व्रत करे । और नील का रंगा वस्त्र पहन कर और जिस के छूने से स्नान करना योग्य है उस का अन्न खा कर ॥ ५०॥ तीन दिन व्रत करे गुल्म (गुच्छे) लता, इन को काट कर शय्या (खटिया) सवारी, आसन पट्ठा वा पलन और खड़ाऊं इन पर बैठ कर ॥ ५१ ॥ यदि ये खटिया आदि सब पलाश (ढाक) के काष्ठादि से बनी हों तो तीनदिन व्रत करे । वाणी से और भावना से दूषित पदार्थ को, खाके तथा भाव से दूषित पात्र में अर्थात् जो निन्दित घृणित नाम से बोला गयाहो । खाकर ब्राह्मण तीन दिन व्रत करे ॥ ५२ ॥ और अपने प्राणों की रक्षा में तत्पर क्षत्रिय रण

भाषाधर्मसंहिता ॥ ५३

संवत्सरंव्रतंकुर्याच्छित्त्वावृक्षंफलप्रदम् ॥ ५३ ॥
दिवाचमैथुनंगत्वा स्नात्वानग्नस्तथाम्भसि ।
नग्नांपरस्त्रियंदृष्ट्वा दिनमेकंव्रतीभवेत् ॥ ५४ ॥
क्षिप्त्याग्नावशुचिद्रव्यं तदेवाम्भसिमानवः ।
मासमेकंव्रतंकुर्यादुपक्रुध्यत्तथागुरुम् ॥ ५५ ॥
पातावशेषंपानीयं पीत्वाचब्राह्मणःक्वचित् ।
त्रिरात्रंतुव्रतंकुर्याद्वामहस्तेनवापुनः ॥ ५६ ॥
एकपङ्क्त्युपविष्टेषु विषमंयःप्रयच्छति ।
सचनावदसौपक्षं कुर्यात्तुब्राह्मणोव्रतम् ॥ ५७ ॥
धारयित्वा तुलाधार्यं विषमं कारयेद्बुधः ।
सुरालवणमद्यानां दिनमेकंव्रतीभवेत् ॥ ५८ ॥
मांसस्यविक्रयं कृत्वा कुर्याञ्चैवमहाव्रतम् ।
विक्रीयपणिनामद्यं तिलस्यचतथाचरेत् ॥ ५९ ॥
हुंकारंब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारंचगरीयसः ।
दिनमेकंव्रतंकुर्यात् प्रयतःसुसमाहितः ॥ ६० ॥
प्रेतस्यप्रेतकार्याणि अकृत्वाधनहारकः ।

( युद्ध ) में पीठ दे कर भाग आवै तो एक वर्ष तक व्रत करै, फल देने हुए वृक्ष को काट कर ॥ ५३ ॥ दिन में मैथुन करके, नंगा होकर जलाशय में स्नान करके और अन्य की स्त्री को नंगी देखकर एक दिन व्रत करे ॥ ५४ ॥ अग्नि और जल में अशुद्ध पदार्थ डाल कर, और गुरु पर क्रोध करके एक मास तक व्रत करे ॥ ५५ ॥ और पीने में बचे पानी को ब्राह्मण कदाचित् पीकर, और बाये हाथ से जल पीकर तीन दिन व्रत करै ॥ ५६ ॥ एक पङ्क्ति में बैठे हुओं के आगे जो विषम किसी मित्र या प्रतिष्ठित को उत्तम पदार्थ तथा अन्यों को साधारण वस्तु परोसे जिसको अच्छा परोसा हो वह और परोसने वाला दोनों पन्द्रह दिन व्रत करें ॥ ५७ ॥ तौला को रखकर जो कम तुलवावे तथा सुरा, मदिरा, लवण, मद्य, इनको बेंचै या बिकवावे वह एक दिन व्रत करै ॥ ५८ ॥ मांस को बेंच कर महाव्रत करे । अपने हाथ से मदिरा और तिलों को बेंच कर भी महाव्रत करे ॥ ५९ ॥ और ब्राह्मण को हुंः और बड़े प्रतिष्ठित पुरुष को तू कह कर सावधान होके एकाग्र मन से एक दिन व्रत करै ॥ ६० ॥ मरे मनुष्य के दाहादि कर्म न करके उस के धनादि सामान को लेने

५४ शंखस्मृतिः ॥

वर्णानांयद्व्रतंप्रोक्तं तद्व्रतंप्रयतःचरेत् ॥ ६१ ॥
कृत्वापापंनगूहेत गूह्यमानंविवर्द्धते ।
कृत्वापापंबुधःकुर्यात् पर्षदोऽनुमतंव्रतम् ॥६२॥
तस्करश्वापदाकीर्णे बहुव्यालमृगेवने ।
नव्रतंब्राह्मणःकुर्यात् प्राणव्याधाभयात्सदा ॥६३॥
सर्वत्रजीवनंरक्षेज्जीवन्पापमपोहति ।
व्रतैःकृच्छ्रैश्चदानैश्च इत्याहभगवान्यमः ॥६४॥
शरीरंधर्मसर्वस्वं रक्षणीयं प्रयत्नतः ।
शरीरात्स्रवतेधर्मः पर्वतात्सलिलंयथा ॥६५॥
आलोच्यधर्मशास्त्राणि समेत्यब्राह्मणैःसह ।
प्रायश्चित्तंद्विजोदद्यात् स्वेच्छयानकदाचन ॥६६॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
त्र्यहं त्रिषवणस्नायी स्नानेस्नानेऽघमर्षणम् ।
निमग्नस्त्रिःपठेद्प्सु नभुञ्जीतदिनत्रम् ॥१॥
वीरासनंचतिष्ठेत गांदद्याच्चपयस्विनीम् ।


वाला. ब्राह्मणादि वर्णों को जो २ व्रत कहा है उसी को मन लगाके करे ॥६१॥ पाप को करके न छिपावे क्योंकि छिपाने से पाप बढ़ता है। इस कारण पाप को करके ज्ञानवान् पुरुष धर्मसभा की अनुमति से व्रत करे ॥ ६२ ॥ चोर, भड़िया, सांप मृग ये जिस में हों ऐसे वन में ब्राह्मण प्राणों के भय से सदैव व्रत न करे ॥ ६३ ॥ क्योंकि जीवन की रक्षा सब जगह करनी चाहिये जीवित रहता हुआ मनुष्य कृच्छ्र प्राजापत्यादि व्रतों तथा दानों के द्वारा पाप को दूर कर सकता है यह बात भगवान् धर्मशास्त्रकर्त्ता यम ने कही है ॥६४॥ धर्म का सर्वस्व जो शरीर है उस की प्रयत्न से रक्षा करनी चाहिये। शरीर से धर्म इस प्रकार निकलता है जैसे पर्वत में से जल के झरने निकलते हैं ॥६५॥ इस से ब्राह्मणों के संग मिल के धर्मशास्त्रों को देख विचार कर विद्वान् ब्राह्मण अपराधी को प्रायश्चित्त बतावे किन्तु अपनी इच्छा से कभी न बतावे ॥६६॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सत्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥

तीन दिन तक त्रिकाल स्नान करे और तीनों स्नानों में जल में डूबा हुआ तीन २ वार अघमर्षण सूक्त जपे और तीन दिन तक भोजन न करे निराहार व्रत करे ॥१॥ वीरासन से बैठा रहे और दूध देती गौ का दान करे

भाषार्थसंहिता ॥ ५५

अघमर्षणमित्येतद् व्रतंसर्वाघनाशनम् ॥२॥
त्र्यहंसायंत्र्यहंप्रातस्त्र्यहमद्यादयाचितम् ।
त्र्यहंपरंचनाश्नीयात्प्राजापत्यंचरन्व्रतम् ॥३॥
त्र्यहमुष्णंपिवेत्तोयं त्र्यहमुष्णंघृतंपिवेत् ।
त्र्यहमुष्णंपयःपीत्वा वायुभक्षस्त्र्यहंभवेत् ॥ ४ ॥
तप्तकृच्छ्रं विजानीयाच्छीतैः शीतमुदाहृतम् ।
द्वादशाहोपवासेन पराकःपरिकीर्तितः ॥ ५ ॥
विधिनोदकसिद्धान्नं समश्नीयात्प्रयत्नतः ।
सकृद्वासोदकान्मासं कृच्छ्रंवारुणमुच्यते ॥ ६ ॥
विल्वैरामलकैर्वापि पद्माक्षैरथवाशुभैः ।
मासेनलोकेऽतिकृच्छ्रः कथ्यतेबुद्धिसत्तमैः ॥ ७ ॥
गोमूत्रंगोमयंक्षीरं दधिसर्पिःकुशोदकम् ।
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सांतपनंस्मृतम् ॥ ८ ॥
एतैस्तुत्र्यहमभ्यस्तं महासांतपनंस्मृतम् ।

यह तीन दिन का अघमर्षण व्रत सब पापों का नाशक है ॥ २ ॥ जो मनुष्य प्राजापत्य व्रत करे वह तीन दिन तक सायंकाल, तीन दिन तक प्रातःकाल, तीन दिनतक जो विनामांगे मिले उसे खावे और तीनदिन तक सर्वथा भोजन न करे निराहार रहे ॥३॥ तीनदिन तक गर्म जल, तीनदिन गर्म घी, तीनदिन गौकागर्म दूध पीवे और तीन दिन वायु मात्र का भक्षण करे अन्य कुछ न खावे ॥४॥ इस को तप्तकृच्छ कहते और पूर्वोक्त क्रमसे यदि शीतल जल आदि पीवे तो शीत कृच्छ कहा जायगा । और बारह दिनके उपवास से शुद्ध पराक कृच्छ्र व्रत कहाता है ॥ ५ ॥ विधि पूर्वक जल से बनाये अन्न को बड़े यत्न से जो खावे यदि वह मनुष्य एक महीने तक सोदक करे अर्थात् भोजन के बिना अन्न न पीवे उसे वारुण कृच्छ्र कहते हैं ॥ ६ ॥ बेल, आंवले, अच्छे कमलगट्टे, इन को एक महीने खाने से बुद्धिमानों ने अतिकृच्छ्र कहा है ॥ ७ ॥ गोमूत्र गोबर, दूध, दही, घी, कुशा का जल इन सब को एक दिन खाना और एक दिन का उपवास करना इस को सांतपन कृच्छ्र कहते हैं ॥ ८ ॥ तीन दिन तक इन के करने से महासांतपन कहाता है । तिलों का खल बिना जल का मठा.

५६ शंखस्मृतिः ॥

पिण्याकंवामतक्रांबुसक्तूनांप्रतिवासरम् ॥ ९ ॥ उपवासान्तराभ्यामात्तुलारुरुषउच्यते । गोपुरीषाशनोभूत्वा मासंनित्यंसमाहितः ॥ १० ॥ व्रतंतुयावकंकुर्यात्सर्वपापापनुत्तये । ग्रासंचन्द्रकलावृद्ध्या प्राश्नीयाद्वर्द्धयन्सदा ॥ ११ ॥ ह्रासयेच्चकलावृद्ध्या व्रतंचान्द्रायणंचरन् । मुण्डस्त्रिपवणस्नायी अधःशायोजितेन्द्रियः ॥ १२ ॥ स्त्रीशूद्रपतितानांच वर्जयेत्परिभाषणम् । पवित्राणिजपेच्छक्त्या जुहुयाच्चैवशक्तिः ॥ १३ ॥ अयंविधिःसविज्ञेयः सर्वकृच्छ्रेषुसर्वदा । पापात्मानस्तुपापेभ्यः कृच्छ्रैःसंतारितानराः ॥ १४ ॥ गतपापादिवंयान्ति नात्रकार्याविचारणा । शंखप्रोक्तमिदंशास्त्रं योऽधीतेबुद्धिमान्नरः ॥ १५ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तस्स्वर्गलोकेमहीयते ॥ १६ ॥ इतिशांखेधर्मशास्त्रेअष्टादशोऽध्यायः॥१८॥इतिशंखस्मृतिःसमाप्ता॥

सत्तू इन के प्रतिदिन ॥९॥ बीच २ में उपवास करके अभ्यास (करना) से तुला- पुरुष व्रत कहा है । गोवर को एक महीने तक प्रतिदिन सावधानी से खाकर ॥१०॥ सब पापों के नाश के लिये इस यावक व्रत को करे । चन्द्रमा की कला की वृद्धि के साथ २ एक २ ग्राम प्रति दिन बढ़ाकर खावे ॥११॥ और कला की हानि के साथ २ एक २ ग्राम प्रति दिन वह पुरुष घटावे जो चान्द्रायण व्रत करे । मुंडन किये हुये त्रिकाल स्नान करे भूमि पर सोवेइन्द्रियों को जीते ॥१२॥ स्त्री, शूद्र, पतित नीच इनके संग न बोले पवित्रता के मन्त्र स्तोत्र आदि को जपे और यथा शक्ति होम करे ॥ १३ ॥ यह विधान सब कृच्छ्रों में सदैव जानो । कृच्छ्रों के प्रताप से पापों से छूटे पापी पुरुष ॥१४॥ नष्ट हुआ है पाप जिन का ऐसे होकर स्वर्ग में जाते हैं इस में कुछ सन्देह नहीं है। शंख ऋषि के कहे इस शास्त्र को जो बुद्धिमान् नर पढ़ता है ॥ १५ ॥ वह सब पापों से पृथक् होकर स्वर्गलोक में पूजता है ॥१६॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में अठारहवां अध्याय पूरा हुआ और यह ग्रन्थ भी समाप्त हुआ ॥

अथलिखितस्मृतिप्रारम्भः॥


इष्टापूर्त्तेतुकर्तव्ये ब्राह्मणेनप्रयत्नतः।
इष्टेनलभतेस्वर्गं पूर्त्तमौक्षमवाप्नुयात् ॥ १ ॥
एकाहमपिकर्त्तव्यं भूमिष्ठमुदकंशुभम् ।
कुलानितारयेत्सप्त यत्रगौर्वितृषाभवन् ॥ २ ॥
भूमिदानेनयेलोका गोदानेनचकीर्त्तिताः।
तांल्लोकान्प्राप्नुयान्मर्त्यः पादपानांप्ररोपणे ॥ ३ ॥
वापीकूपतड़ागानि देवतायतनानिच ।
पतितान्युद्धरेद्यस्तु सपूर्त्तफलमश्नुते ॥ ४ ॥
अग्निहोत्रंतपःसत्यं वेदानांचैवपालनम् ।
आतिथ्यंवैश्वदेवंच इष्टमित्यभिधीयते ॥ ५ ॥
इष्टापूर्त्तेद्विजातीनां सामान्योधर्मउच्यते।

ब्राह्मण प्रयत्न से इष्ट ( श्रौत अग्निहोत्रादि ) और पूर्त ( कूप बन वाना प्याऊ बैठाना आदि ) धर्म के कामों को बड़े यत्न से करै क्योंकि इष्ट से स्वर्ग मिलता और पूर्त से मोक्षको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ जिसमे एक गौ की प्यास निवृत्त होजाय इतना जल यदि एक दिन भी पृथिवी में जो करदे, वह सात कुलों को तारता है ॥ २ ॥ भूमि और गौ के दान से जिन लोकों के भोग मिलते हैं उन्हीं लोकों को वृक्षों के लगाने से मनुष्य प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ बावड़ी, कुआ, तालाब, और देवताओं के मन्दिर, इन में जो २ टूटे फूटे पुराने हो गये हों, उन की जो ठीक २ मरम्मत करै, वह भी पूर्त कर्मों के फल को भोगता है ॥ ४ ॥ अग्निहोत्र, तप, सत्य, वेदों की रक्षा, अभ्यागत का सत्कार और वैश्वदेव, इन सब को इष्ट कहते हैं ॥ ५ ॥ द्विजातियों के इष्ट और पूर्त ( वापी कूप तालाब देव मन्दिरादि का बनवाना ) साधारण धर्म

२ लिखितस्मृतिः ॥

अधिकारोभवेच्छूद्रः पूर्त्तेधर्मेनवैदिके ॥ ६ ॥ यावदस्थिमनुष्यस्य गंगातोयेषुतिष्ठति । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ७ ॥ देवतानांपितॄणांच जलेद्याज्जलाञ्जलिम् । असंस्कृतमृतानांच स्थलेद्याज्जलाञ्जलिम् ॥ ८ ॥ एकादशाहेप्रेतस्य यस्यचोत्सृजतेवृषः । मुच्यतेप्रेतलोकात्तु पितृलोकंसगच्छति ॥ ९ ॥ एष्टव्याबहवःपुत्रा यद्येकोपिगयांव्रजेत् । यजेतवाश्वमेधेन नीलंवावृषमुत्सृजेत् ॥ १० ॥ वाराणस्यांप्रविष्टस्तु कदाचिन्निनिक्रमेद्यदि । हसन्तिस्तस्यभूतानि अन्योन्यंकरताडनैः ॥ ११ ॥ गयाशिरेतुयत्किंचिन्नाम्नापिण्डन्तुनिर्वपेत् । नरकस्थोदिवंयाति स्वर्गस्थोमोक्षमाप्नुयात् ॥ १२ ॥ आत्मनोवापरस्यापि गयाक्षेत्रेयतस्ततः ।


कहे हैं । शूद्र मनुष्य पूर्त धर्म का अधिकारी है वेदोक्त इष्ट धर्म का नहीं ॥६॥
मनुष्य की हड्डी जब तक गंगा जल में पड़ी रहती है उतने ही हजार वर्ष तक
वह स्वर्ग लोक में पूजता है ॥ ७ ॥ देवता और पितरों को जलाशय में, और
संस्कार से पहिले जो मरे हों, उन को स्थल में तर्पण के समय जल की अंजली
देवे ॥ ८ ॥ जिस मनुष्य के मरने पर ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग होता है वह प्रेत
योनि से छूट कर पितृलोक में जाता है ॥९॥ बहुत से पुत्रों की इच्छा करनी
चाहिये, यदि उन में से एक भी गया को जाय, वा अश्वमेध यज्ञ करे, अथवा
नील बैल का उत्सर्ग करे, वही पुत्र पिता को तारने वाला होता है ॥ १० ॥
कोई मनुष्य काशी में जाकर यदि कदाचित् वहां से निकल आता है तो
उस को सब भूत आपस में ताली देकर हंसते हैं ॥ ११ ॥ गया में जाकर जिस
किसी के नाम से पिण्ड दान करै, यदि वह नरक में हो तो स्वर्ग में जाता
और स्वर्ग में हो तो मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥ अपने कुल के वा अन्य इष्ट
मित्र सम्बन्धी आदि जिस किसी के नाम से गया में पिण्ड देवे, वह पिण्डदान

भाषार्थसहिता ॥ ३

यन्नाम्नापातयेत्पिण्डं तंनयेद्ब्रह्मशाश्वतम् ॥ १३ ॥
लोहितोयस्तुवर्णेन शंखवर्णखुरस्तथा ।
लाङ्गूलशिरसोश्चैव संवनीलवृषःस्मृतः ॥ १४ ॥
नवश्राद्धंन्त्रिपक्षेच द्वादशस्वेवमासिकम् ।
षण्मासेचाब्दिकंचैव श्राद्धान्येतानिषोडश ॥ १५ ॥
यस्यैतानिनकुर्वीत एकोद्दिष्टानिषोडश ।
पिशाचत्वंस्थिरन्तस्य दत्तैःश्राद्धशतैरपि ॥ १६ ॥
सपिण्डीकरणादूर्ध्वं प्रतिसंवत्सरंद्विजः ।
मातापित्रोःपृथक्कूर्यादेकोद्दिष्टंमृतेऽहनि ॥ १७ ॥
वर्षेवर्षेतुकर्तव्यं मातापित्रोस्तुसन्ततम् ।
अदैवंभाजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकन्तुनिर्वपेत् ॥ १८ ॥
संक्रान्तावुपरागेच पर्वण्यपिमहालये ।
निर्व्वाप्यास्तुत्रयःपिण्डा एकत्रस्तुक्षयेऽहनि ॥ १९ ॥
एकोद्दिष्टंपरित्यज्य पार्व्वणंकुरुतेद्विजः ।
अकृतन्तद्विजानीयात् समातापितृघातकः ॥ २० ॥
अमावास्याक्षयोयस्य प्रेतपक्षेऽथवायदि ।

उस को सनातन ब्रह्म को पहुंचाता है ॥ १३ ॥ जिस का रंग लाल हो खुर पूंछ, शिर ये सफेद हों, उसे नील बैल कहते हैं ॥ १४॥ एक ग्यारहवें दिन का नवक श्राद्ध,–द्वितीय १॥ महीने में, बारह महीनों के बारह, छठे महिने की पूर्त्ति के दिन १ और एक वर्षी ये सोलह एकोद्दिष्ट श्राद्ध हैं ॥ १५ ॥ जिस के ये सोलह एकोद्दिष्ट नहीं किये गये हों, उस को सैकड़ो श्राद्ध देने पर भी प्रेत योनि नहीं छूटती है ॥ १६ ॥ सपिण्डी श्राद्ध किये पीछे प्रति वर्ष माता पिता के मरने के दिन में पृथक् २ एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया करे ॥ १७ ॥ माता पिता का श्राद्ध वर्ष २ में निरन्तर करे और विश्वेदेवा को छोड़ के श्राद्ध में ब्राह्मण जिमावे और एक पिण्ड देवे ॥ १८ ॥ संक्रान्ति, ग्रहण, पर्व्वदिन (अमावास्या) महालय (कनागत) इन में पितृपक्ष में तीन पिण्ड और मातृ पक्ष में तीन पिण्ड देवे और पिता माता के मरने के दिन ॥ १९ ॥ एकाद्दिष्ट को छोड़ कर पार्व्वण श्राद्ध करता है, उस श्राद्ध को नहीं किया जानो क्योंकि वह पुत्र माता पिता का मारने वाला है ॥ २० ॥ जो अमावास्या को

लिखितस्मृतिः ॥

सपिण्डीकरणादूर्ध्वं तस्योक्तःपार्वणोविधिः ॥ २१ ॥ त्रिदण्डग्रहणादेव प्रेतत्वन्नैवजायते । अहन्येकादशेप्राप्ते पार्वणंतुविधीयते ॥ २२ ॥ यस्यसंवत्सरादर्वाक् सपिण्डीकरणंस्मृतम् । प्रत्यहन्तत्सोदकुंभं दद्यात्संवत्सरंद्विजः । पत्याचैकेनकर्तव्यं सपिण्डीकरणंस्त्रियाः ॥ २३ ॥ पितामह्यापितत्तस्मिन्सत्येवन्तुक्षयेऽहनि । तस्यांसत्यांप्रकर्त्तव्यं तस्याःश्वश्वेतिनिश्चितम् ॥ २४ ॥ विवाहेचैवन्निर्वृत्ते चतुर्थेऽहनिरात्रिषु । एकत्वंसागताभर्त्तुः पिण्डेगोत्रेचसूतके ॥ २५ ॥ स्वगोत्राद्भ्रश्यतेनारी उद्वाहात्सप्तमेपदे । भर्तृगोत्रेणकर्त्तव्या दानपिण्डोदकक्रियाः ॥ २६ ॥ द्विमातुःपिण्डदानंतु पिण्डेपिण्डेद्विनामतः ।


अथवा कनागतों में मरे उसके निमित्त सपिण्डी श्राद्ध किये पीछे मरने के दिन भी पार्वण करे ॥ २१ ॥ अपने कुल का पितादि कोई पुरुष संन्यासी हो हो जाने बाद मरे तो वह प्रेतयोनि में नहीं जाता, इस से उसके दशगात्रादि न करे, किन्तु ग्यारहवें दिन पार्वण श्राद्ध करे ॥२२॥ एक वर्ष से पहिले ही जिस का सपिण्डी करना कहा है उस के लिये ब्राह्मणादि द्विज प्रति दिन जल से भरा घट दान करे। स्त्री का सपिण्डीकरण श्राद्ध एक पति के संग ही करै ॥२३॥ यदि पति जीता हो, तो क्षयाह श्राद्ध पितामही के संग करै, यदि पितामही (दादी) भी विद्यमान हो, तो उस की सासु के संग सपिण्डीश्राद्ध करै ॥२४॥ विवाह हो जाने पर चौथे दिन की रात्रि में वह स्त्री पति के संग पिण्ड, गोत्र, और सूतक में एक हो जाती है अर्थात् चतुर्थी कर्म के समय स्त्री अपने पति के पिण्ड-गोत्र और सूतक में मिल जाती है ॥ २५ ॥ विवाह के पीछे सप्तपदी कर्म हो जाने पर कन्या पिता के गोत्र से भ्रष्ट हो जाती है । इस कारण सप्तपदी के पश्चात् मरे, तो पति के गोत्र से ही उसके निमित्त दान पिण्ड और तिलाञ्जलि आदि जलदान कर्म करे ॥२६॥ जिस के दो 'माता' हों, वह प्रत्येक पिण्ड में दोनों का नाम ले लेकर दो पिण्ड देवे । पिता, बाबा, पड़बाबा, माता,

भाषार्थसहिता ॥ ५

षण्णांदेयास्त्रयःपिण्डा एवं दातानमुह्यति ॥ २७ ॥
अथचेन्मन्त्रविद्युक्तः शारीरैःपङ्क्तिदूषणैः ।
अदोषन्तंयमःप्राह पङ्क्तिपावनएवसः ॥ २८ ॥
अग्नौकरणशेषन्तु पितृपात्रेप्रदापयेत् ।
प्रतिपाद्येपितॄणांच नदद्याद्वैश्वदेविके ॥ २९ ॥
अग्न्यभावेतुविप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् ।
योह्यग्निःसद्विजोविप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ॥ ३० ॥
अजस्यदक्षिणेकर्णे पाणौविप्रस्यदक्षिणे ।
रजतेचसुवर्णेच नित्यंवसतिपावकः ॥ ३१ ॥
यत्रयत्रप्रदातव्यं श्राद्धंकुर्वीतपार्वणम् ।
तत्रमातामहानांच कर्त्तव्यमभयंसदा ॥ ३२ ॥
अपुत्रायेमृताःकेचित्पुरुषावास्त्रियोपिवा ।
तेभ्यएवप्रदातव्यमेकोद्दिष्टंनपार्वणम् ॥ ३३ ॥
यस्मिन्त्राशिगतेसूर्ये विपत्तिःस्याद्द्विजन्मनः ।


दादी, पड़दादी, इन छः को तीन २ पिण्ड देवे, ऐसा करने से दाता मोह को प्राप्त नहीं होता ॥२७॥ यदि वेद मन्त्रों को पढ़ने जानने वाला-सुपात्र विद्वान् हीनाङ्गादि पङ्क्ति दूषण चिन्हों से युक्त हो तो भी यमराज ने उसे निर्दोष कहा है क्योंकि वेदाध्ययन द्वारा पवित्र होने से वह पंक्ति को पवित्र करने वाला है ॥ २८ ॥ अग्नौ करण का शेष अन्न पितृपात्र में छोड़ देवे। पितरों को जो अन्नादि देना हो, वह विश्वेदेवाओं को न देवे ॥ २९ ॥ यदि श्राद्ध के समय किसी कारण अग्नि प्राप्त न हो, तो अग्नौ करण की दो आहुति मन्त्र पढ़ के ब्राह्मण के हाथ में देदेवे, क्योंकि वेद के तत्त्वदर्शी विद्वानों ने अग्नि और ब्राह्मण को तुल्य ही कहा है ॥ ३० ॥ बकरा के दहिने कान में ब्राह्मण के दहिने हाथ में चांदी और सुवर्ण में नित्य ही अग्नि देवता वास करता है ॥३१॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्री न होकर पार्वण श्राद्ध करै वह जिस २ समय पार्वण करे वहां २ ननसारे के मातामहादि तीनों कोभी अभयकरै अर्थात् उनको भी पिण्डदेवे ॥३२॥ अपने कुल में जो पुरुष वा स्त्री पुत्र हीन रहते हुए मरे हों, उन के निमित्त एकोद्दिष्ट करै, पार्वण नहीं ॥ ३३ ॥ जिस राशि के सूर्य में ब्राह्मणादि द्विज

६ लिखितस्मृतिः ॥

तस्मिन्नहनिकर्तव्या दानपिण्डोदकक्रियाः ॥ ३४ ॥ वर्षवृद्ध्यभिषेकादि कर्तव्यमधिकेनतु । अधिमासेतुपूर्वं स्याच्छ्राद्धं संवत्सरादपि ॥ ३५ ॥ सएवहेयोदिष्टस्य येनकेनतुकर्मणा । अभिघातान्तरंकार्यं तत्रैवाहःकृतंभवेत् ॥ ३६ ॥ शालाग्नौपच्यतेह्यन्नं लौकिकेवाऽथसंशयः । यस्मिन्नेवपचेदन्नं तस्मिन्होमोविधीयते ॥ ३७ ॥ वैदिकेलौकिकेवापि नित्यंहुत्वाह्यतन्द्रितः । वैदिकेस्वर्गमाप्नोति लौकिकेहन्तिकिल्विषम् ॥ ३८ ॥ अग्नौव्याहृतिभिःपूर्वं हुत्वा मन्त्रैस्तुशाकलैः । संविभागंतुभूतेभ्यस्ततोऽश्नीयादनग्निमान् ॥ ३९ ॥ उच्छेषणंतु नोत्तिष्ठेद्यावद्विप्रविसर्जनम् ।


की मृत्यु हो, उसी राशिके उसी दिनमें, गोदानादि पिण्ड दान (तर्पण) करे ॥३४॥ वर्ष की वृद्धि में अभिषेक ( स्नान ) आदि अधिक के साथ अधिक करै । यदि अधिक (मल) मास आन पड़े, तो वर्ष पूर्त्ति से पहिले भी श्राद्ध होवे ॥ ३५ ॥ जिस किसी कर्म के कारण विहित श्राद्ध का वही दिन ( जो वर्ष से पहिले आया हो ) त्याग देना चाहिये । मरने के दिन तिथि की हानि हो गयी हो, तो अगले दिन क्षयाह श्राद्ध करे, तब वही क्षयाह माना जायगा ॥३६॥ अग्नि-शाला में विधि पूर्वक स्थापित अग्नि में अथवा लौकिक अग्नि में प्रतिदिन अन्न पकाया जाय ? ऐसा सन्देह हो, तो समाधान यह है कि आहिताग्नि न हो, तो लौकिकाग्नि में पकावे, और जिस अग्नि में अन्न पकावे, उसी में होम करना शास्त्र में कहा है ॥ ३७ ॥ वैदिक ( स्थापित ) वा लौकिक अग्नि में आलस्य को छोड़कर नित्य होम करे। वैदिक अग्निमें पञ्चमहायज्ञादिसम्बन्धी होम करने वाले को स्वर्ग मिलता और लौकिक अग्निमें होम करनेसे पाप नष्ट होता है ॥३८॥ अनाहिताग्नि पुरुष प्रथम लौकिक अग्नि में पृथक् २ तीन व्याहृतियों से, तथा एक साथ तीनों व्याहृति से, ऐसे चार आहुति देकर (देवकृतस्यैनसो०) इत्यादि शाकल होम की छः आहुति देके प्राजापत्य और स्विष्टकृत दो आहुति देवे । इस प्रकार देव यज्ञ की बारह आहुति देवे, तत्पश्चात् भूमि पर बलिदेना रूप भूतयज्ञ करके भोजन करे ॥ ३९ ॥ जब तक निमन्त्रित ब्राह्मणों को

भाषाधर्मसंहिता ॥ 9

ततोग्रहवलिंकुर्यादिति धर्म्मोव्यवस्थितः ॥ ४० ॥
दर्भाःकृष्णाजिनंमन्त्रा ब्राह्मणाश्चविशेषतः ।
नैतेनिर्म्माल्यतांयान्ति नियोक्तव्याःपुनःपुनः ॥ ४१ ॥
पानमाचमनंकुर्यात् कुशपाणिस्सदाद्विजः ।
भुक्त्वाप्युच्छिष्टतांयाति एषएवविधिःसदा ॥ ४२ ॥
पानआचमनेचैव तर्पणेदैविकेसदा ।
कुशहस्तोनदुष्येत यथापाणिस्तथाकुशः ॥४३॥
वामपाणौकुशान्कृत्वा दक्षिणेनउस्पृशेत् ।
आचमन्तिचयेमूढा रुधिरेणाचमन्तिते ॥४४॥
नीवीमध्येपुयेदर्भा ब्रह्मसूत्रेषुयेकृताः ।
पवित्रांस्तान्विजानीयाद्यथाकायस्तथाकुशाः ॥४५॥
पिण्डेकृतास्तुयेदर्भा यैःकृतंपितृतर्पणम् ।
मूत्रोच्छिष्टपुरीषंच तेषांत्यागोविधीयते ॥४६॥

भोजन कराके विसर्जन न हो जाय, तब तक जूठन न उठावे, उस के पश्चात् ग्रह-वलि करे, यही धर्म की व्यवस्था है ॥४०॥ दर्भ, काले हिरन का चर्म, वेदमन्त्र और विशेष कर ब्राह्मण, ये सब वार २ कार्यों में नियुक्त करने से अशुद्धि को प्राप्त नहीं होते, इस से वार २ धर्म सम्बन्धी काम में इन को नियुक्त करे ॥ ४१ ॥ ब्राह्मणादि द्विज सदैव कुशों को हाथ में लेकर जलपान और आचमन करें। भोजन के अनन्तर भी मनुष्य उच्छिष्ट हो जाता है, इससे आचमन का वही विधान सदा करे ॥४२॥ जल पीने, आचमन करने और सदा देवतर्पण में कुशों को हाथ में लिये मनुष्य दूषित नहीं होता, क्योंकि जैसा हाथ वैसेही कुश होते हैं ॥ ४३ ॥ बांये हाथ में कुशा लेकर दहिने हाथ से आचमन करे । जो मूर्ख लोग इस प्रकार आचमन करते हैं वे मानों रुधिर से आचमन करते हैं, अर्थात् दहिने हाथ में ही कुश रखता हुआ आचमन करे यही ठीक है ॥४४॥ नीवी कटि( कटिबंधन ) में और जनेउ में, जो कुश बंधे हों, उन को पवित्र जानना चाहिये, क्योंकि कुश देह के समान ही हैं ॥ ४५ ॥ जो कुश श्राद्ध के पिण्डों पर रक्खे गये हों, या जिन से पितरों का तर्पण किया हो, अथवा जिन को लेकर मल मूत्र का त्याग किया हो उन कुशों का त्याग कहा है ॥ ४६ ॥

लिखितस्मृतिः ॥

देवपूर्वन्तुयच्छ्राद्धमदैवंचापियद्भवेत् ।
ब्रह्मचारीभवेत्तत्र कुर्याच्छ्राद्धन्तुपैतृकम् ॥४७॥
मातुःश्राद्धन्तुपूर्वंस्यात्पितॄणांतदनन्तरम् ।
ततोमातामहानांच वृद्धौश्राद्धत्रयंस्मृतम् ॥४८॥
क्रतुर्दक्षोवसुःसत्यः कालकामौधुरिलोचनौ ।
पुरूरवार्द्रवाश्चैव विश्वेदेवाःप्रकीर्तिताः ॥४९॥
आगच्छन्तुमहाभागा विश्वेदेवामहाबलाः ।
येयत्रविहिताःश्राद्धे सावधानाभवन्तुते ॥५०॥
इष्टिश्राद्धेक्रतुर्दक्षो वसुःसत्यश्चवैदिके ।
कालःकामोऽग्निकार्येषु काम्येषुधूरिलोचनौ ॥५१॥
पुरूरवार्द्रवाश्चैव पार्वणेषुनियोजयेत् ॥५२॥
यस्यास्तुनभवेद्भ्राता नविज्ञायेतवापिता ।
नोपयच्छेततांप्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशंकया ॥ ५३ ॥
अभ्रातृकांप्रदास्यामि तुभ्यंकन्यामलङ्कृताम् ।
अस्यांयोजायतेपुत्रः समेपुत्रोभविष्यति ॥ ५४ ॥


जो श्राद्ध विश्वेदेव पूर्वक हो वा विश्वदेव पूर्वक न हो । उन दोनों प्रकार के श्राद्धों में पुरुष ब्रह्मचारी रहे और पितरों के निमित्त श्राद्ध करे ॥४७॥ प्रथम माता का श्राद्ध करके पीछे पितरों का करे । फिर मातामहों ( नानाआदि३ ) का श्राद्ध करे, इसप्रकार वृद्धिश्राद्ध ( नांदीमुख ) में तीन श्राद्ध होते हैं ॥४८॥ क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, धूरि, लोचन, पुरूरवा, आर्द्रवा, ये विश्वेदेवाओं के विशेष नाम कहे हैं॥४९॥वे महाबलवान् और महाभाग्यशाली विश्वेदेवा आवें, जो जिस श्राद्ध में कहे हैं, वे सावधान होवें ॥५०॥ दर्शपौर्णमासादि दृष्टियों सम्बन्धी पिण्डपितृयज्ञादि श्राद्ध में क्रतु, और दक्ष, वेदोक्त श्राद्ध में वसु, सत्य, अग्नि के कार्यों में काल, काम, काम्य कर्मों सम्बन्धी श्राद्धों में धूरि, लोचन॥५१॥ पार्वणश्राद्ध में पुरूरवा और आर्द्रवा विश्वेदेवा नियुक्त करने ( बुलाने ) चाहिये ॥ ५२ ॥ जिस कन्या के कोई सहोदर भाई न हो और जिसका पिता भी मर गया हो, उस कन्या के साथ बुद्धिमान् मनुष्य कन्या ही उत्पन्न होने की शंका से विवाह न करे ॥ ५३ ॥ जिसके कोई भाई नहीं है, ऐसी इस वस्त्र और आभूषणों से शोभित कन्या तुमको देता हूं, इस में जो पुत्र हो, वह मेरा पुत्र होगा, इस प्रतिज्ञा से जो कन्या विवाही जाय उसे पुत्रिका कहते हैं ॥५४॥

द्वितीयंतुपितुस्तस्या स्तृतीयन्तत्पितुःपितुः ॥ ५५ ॥

भाषार्थसहिता ॥

मातुःप्रथमतःपिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः ।
द्वितीयंतुपितुस्तस्या स्तृतीयन्तत्पितुःपितुः ॥ ५५ ॥
मृन्मयेषुचपात्रेषु श्राद्धेयोभोजयेत्पितॄन् ।
अन्नदातापुरोधाश्च भोक्ताचनरकंव्रजेत् ॥ ५६ ॥
अलाभेमृन्मयंन्दद्यादनुज्ञातस्तुतैर्द्विजैः ।
घृतेनप्रोक्षणंकार्यं मृदःपात्रंपवित्रकम् ॥ ५७ ॥
श्राद्धंकृत्वापरश्राद्धे यस्तुभुञ्जीतविह्वलः ।
पतन्तिपितरस्तस्य लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ५८ ॥
श्राद्धंदत्त्वाचभुक्त्वाच अध्वानंयोऽधिगच्छति ।
भवन्तिपितरस्तस्य तन्मासंपांसुभोजनाः ॥ ५९ ॥
पुनर्भोजनमध्वानं भाराध्ययनमैथुनम् ।
दानंप्रतिग्रहंहोमं श्राद्धभुक्त्वाष्टवर्जयेत् ॥ ६० ॥
अध्वगामीभवेदश्वः पुनर्भॊक्ताचवायसः ।


उस पुत्रिका का पुत्र पहिला पिण्ड अपनी माता को, दूसरा पिण्ड माता के पिता को, तीसरा माता के बाबा को देवे ॥५५॥ श्राद्ध के समय मट्टी के पात्रों में जो पितृ ब्राह्मणों को जिमावे तो वह अन्नदाता, पुरोहित, और भोजन करने वाला ये तीनों नरक में जाते हैं ॥ ५६ ॥ यदि कांसे पीतल आदि के पात्र न मिलें तो ब्राह्मणों की आज्ञा से मट्टी के पात्रों में भी भोजन करा देवे । यदि मट्टी के पात्र को घी से छिड़क ले तो पवित्र हो जाता है ॥५७ ॥ जो मनुष्य स्वयं श्राद्ध करके दूसरे के यहां श्राद्ध में लोभ से व्याकुल होकर भोजन करे तो नष्ट हुआ है पिण्ड और जलदान जिनका ऐसे उसके पितर नरक में जाते हैं ॥ ५८ ॥ श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन करा के वा अन्य के श्राद्ध में स्वयं भोजन खाकर जो मार्गमें चलता है उस के पितर उस महीने भर धूली फांकते हैं ॥ ५९ ॥ श्राद्ध में भोजन करने वाला ब्राह्मण इन आठ कामों को त्याग देवे । दुबारा भोजन, मार्ग में चलना, बोझा उठाना, वेदवेदाङ्ग पढ़ना, मैथुन करना, दान देना, दान लेना, और होम करना ॥ ६० ॥ श्राद्ध में खाकर जो मार्ग में चले वह जन्मान्तर में घोड़ा, जो उसी दिन पुनः

१० लिखितस्मृतिः ॥

कर्मकृज्जायतेदासः स्त्रीगमनेचसूकरः ॥ ६१ ॥ दशकृत्वःपिबेदापः सावित्र्याचाभिमन्त्रिताः । ततःसन्ध्यामुपासीत शुध्येततदनन्तरम् ॥ ६२ ॥ आर्द्रवासास्तुयत्कुर्याद्बहिर्जानूचयत्कृतम् । सर्वंतन्निष्फलंकुर्याज्जपंहोमंप्रतिग्रहम् ॥ ६३ ॥ चान्द्रायणंनवश्राद्धे पराकोमासिकेतथा । पक्षत्रयेतुकृच्छ्रंस्यात् षण्मासेकृच्छ्रमेवच ॥ ६४ ॥ ऊनाब्दिकेद्विरात्रंस्यादेकाहःपुनराब्दिकै । शावेमासंतर्भुक्त्वावा पादकृच्छ्रोविधीयते ॥ ६५ ॥ सर्पविप्रहतानांच शृङ्गिदंष्ट्रिसरीसृपैः । आत्मनस्त्यागिनांचैव श्राद्धमेषांनकारयेत् ॥ ६६ ॥ गोभिर्हतंतथोद्वृद्धं ब्राह्मणेनतुघातितम् । तंस्पृशन्तिचय्येविप्रा गोजाश्वाश्चभवन्तितै ॥ ६७ ॥


भोजन करै वह काक, जो बोझा उठानादि कर्म करै वह शूद्र, स्त्री का संग करै वह सूकर होता है ॥ ६१ ॥ श्राद्ध में भोजन करके फिर भोजनादि आठ काम करने वाला पुरुष गायत्री से दशवार पढ़ २ के जल पीवे और फिर संध्या करके शुद्ध होता है ॥ ६२ ॥ गीले वस्त्र पहन कर और गोड़ों से बाहर हाथ रख कर जो जप होम तथा प्रतिग्रह (दान लेना आदि) करै वह सब काम उस का निष्फल हो जाता है ॥ ६३ ॥ नव श्राद्ध (त्रयोदशाह) में जीम कर चान्द्रायण, मासिक श्राद्ध एकोद्दिष्ट में जीम कर पराक, मृत्यु के पश्चात् डेढ महीने के श्राद्ध में और छः महीने के श्राद्ध में जीम कर कृच्छ्रव्रत करै ॥ ६४ ॥ ऊनाब्दिक (११) महीने के श्राद्ध में खाकर तीन दिन और वर्षी में खाकर एक दिन व्रत करै और एक महिने के भीतर मरने के सूतक में खाकर आधा अथवा पाद कृच्छ्रव्रत करना कहा है ॥६५॥ सर्प, ब्राह्मण, सींगवाले, दांतों वाले, सरीसृप (सांप का भेद) इन से मरे और अपने को मार डालने वाले जो मनुष्य हैं इन का श्राद्ध न करै ॥६६॥ गौके मारे, फांसी से मरे, ब्राह्मण ने जिनको मार डाला हो उन का जो ब्राह्मण स्पर्श करें वे जन्मान्तर में गौ, बकरा और घोड़ा होते हैं ६७