अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 529, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ 9
ततोग्रहवलिंकुर्यादिति धर्म्मोव्यवस्थितः ॥ ४० ॥
दर्भाःकृष्णाजिनंमन्त्रा ब्राह्मणाश्चविशेषतः ।
नैतेनिर्म्माल्यतांयान्ति नियोक्तव्याःपुनःपुनः ॥ ४१ ॥
पानमाचमनंकुर्यात् कुशपाणिस्सदाद्विजः ।
भुक्त्वाप्युच्छिष्टतांयाति एषएवविधिःसदा ॥ ४२ ॥
पानआचमनेचैव तर्पणेदैविकेसदा ।
कुशहस्तोनदुष्येत यथापाणिस्तथाकुशः ॥४३॥
वामपाणौकुशान्कृत्वा दक्षिणेनउस्पृशेत् ।
आचमन्तिचयेमूढा रुधिरेणाचमन्तिते ॥४४॥
नीवीमध्येपुयेदर्भा ब्रह्मसूत्रेषुयेकृताः ।
पवित्रांस्तान्विजानीयाद्यथाकायस्तथाकुशाः ॥४५॥
पिण्डेकृतास्तुयेदर्भा यैःकृतंपितृतर्पणम् ।
मूत्रोच्छिष्टपुरीषंच तेषांत्यागोविधीयते ॥४६॥
भोजन कराके विसर्जन न हो जाय, तब तक जूठन न उठावे, उस के पश्चात् ग्रह-वलि करे, यही धर्म की व्यवस्था है ॥४०॥ दर्भ, काले हिरन का चर्म, वेदमन्त्र और विशेष कर ब्राह्मण, ये सब वार २ कार्यों में नियुक्त करने से अशुद्धि को प्राप्त नहीं होते, इस से वार २ धर्म सम्बन्धी काम में इन को नियुक्त करे ॥ ४१ ॥ ब्राह्मणादि द्विज सदैव कुशों को हाथ में लेकर जलपान और आचमन करें। भोजन के अनन्तर भी मनुष्य उच्छिष्ट हो जाता है, इससे आचमन का वही विधान सदा करे ॥४२॥ जल पीने, आचमन करने और सदा देवतर्पण में कुशों को हाथ में लिये मनुष्य दूषित नहीं होता, क्योंकि जैसा हाथ वैसेही कुश होते हैं ॥ ४३ ॥ बांये हाथ में कुशा लेकर दहिने हाथ से आचमन करे । जो मूर्ख लोग इस प्रकार आचमन करते हैं वे मानों रुधिर से आचमन करते हैं, अर्थात् दहिने हाथ में ही कुश रखता हुआ आचमन करे यही ठीक है ॥४४॥ नीवी कटि( कटिबंधन ) में और जनेउ में, जो कुश बंधे हों, उन को पवित्र जानना चाहिये, क्योंकि कुश देह के समान ही हैं ॥ ४५ ॥ जो कुश श्राद्ध के पिण्डों पर रक्खे गये हों, या जिन से पितरों का तर्पण किया हो, अथवा जिन को लेकर मल मूत्र का त्याग किया हो उन कुशों का त्याग कहा है ॥ ४६ ॥