अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 530, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८
लिखितस्मृतिः ॥
देवपूर्वन्तुयच्छ्राद्धमदैवंचापियद्भवेत् ।
ब्रह्मचारीभवेत्तत्र कुर्याच्छ्राद्धन्तुपैतृकम् ॥४७॥
मातुःश्राद्धन्तुपूर्वंस्यात्पितॄणांतदनन्तरम् ।
ततोमातामहानांच वृद्धौश्राद्धत्रयंस्मृतम् ॥४८॥
क्रतुर्दक्षोवसुःसत्यः कालकामौधुरिलोचनौ ।
पुरूरवार्द्रवाश्चैव विश्वेदेवाःप्रकीर्तिताः ॥४९॥
आगच्छन्तुमहाभागा विश्वेदेवामहाबलाः ।
येयत्रविहिताःश्राद्धे सावधानाभवन्तुते ॥५०॥
इष्टिश्राद्धेक्रतुर्दक्षो वसुःसत्यश्चवैदिके ।
कालःकामोऽग्निकार्येषु काम्येषुधूरिलोचनौ ॥५१॥
पुरूरवार्द्रवाश्चैव पार्वणेषुनियोजयेत् ॥५२॥
यस्यास्तुनभवेद्भ्राता नविज्ञायेतवापिता ।
नोपयच्छेततांप्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशंकया ॥ ५३ ॥
अभ्रातृकांप्रदास्यामि तुभ्यंकन्यामलङ्कृताम् ।
अस्यांयोजायतेपुत्रः समेपुत्रोभविष्यति ॥ ५४ ॥
जो श्राद्ध विश्वेदेव पूर्वक हो वा विश्वदेव पूर्वक न हो । उन दोनों प्रकार के श्राद्धों में पुरुष ब्रह्मचारी रहे और पितरों के निमित्त श्राद्ध करे ॥४७॥ प्रथम माता का श्राद्ध करके पीछे पितरों का करे । फिर मातामहों ( नानाआदि३ ) का श्राद्ध करे, इसप्रकार वृद्धिश्राद्ध ( नांदीमुख ) में तीन श्राद्ध होते हैं ॥४८॥ क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, धूरि, लोचन, पुरूरवा, आर्द्रवा, ये विश्वेदेवाओं के विशेष नाम कहे हैं॥४९॥वे महाबलवान् और महाभाग्यशाली विश्वेदेवा आवें, जो जिस श्राद्ध में कहे हैं, वे सावधान होवें ॥५०॥ दर्शपौर्णमासादि दृष्टियों सम्बन्धी पिण्डपितृयज्ञादि श्राद्ध में क्रतु, और दक्ष, वेदोक्त श्राद्ध में वसु, सत्य, अग्नि के कार्यों में काल, काम, काम्य कर्मों सम्बन्धी श्राद्धों में धूरि, लोचन॥५१॥ पार्वणश्राद्ध में पुरूरवा और आर्द्रवा विश्वेदेवा नियुक्त करने ( बुलाने ) चाहिये ॥ ५२ ॥ जिस कन्या के कोई सहोदर भाई न हो और जिसका पिता भी मर गया हो, उस कन्या के साथ बुद्धिमान् मनुष्य कन्या ही उत्पन्न होने की शंका से विवाह न करे ॥ ५३ ॥ जिसके कोई भाई नहीं है, ऐसी इस वस्त्र और आभूषणों से शोभित कन्या तुमको देता हूं, इस में जो पुत्र हो, वह मेरा पुत्र होगा, इस प्रतिज्ञा से जो कन्या विवाही जाय उसे पुत्रिका कहते हैं ॥५४॥