भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥

मातुःप्रथमतःपिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः ।
द्वितीयंतुपितुस्तस्या स्तृतीयन्तत्पितुःपितुः ॥ ५५ ॥
मृन्मयेषुचपात्रेषु श्राद्धेयोभोजयेत्पितॄन् ।
अन्नदातापुरोधाश्च भोक्ताचनरकंव्रजेत् ॥ ५६ ॥
अलाभेमृन्मयंन्दद्यादनुज्ञातस्तुतैर्द्विजैः ।
घृतेनप्रोक्षणंकार्यं मृदःपात्रंपवित्रकम् ॥ ५७ ॥
श्राद्धंकृत्वापरश्राद्धे यस्तुभुञ्जीतविह्वलः ।
पतन्तिपितरस्तस्य लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ५८ ॥
श्राद्धंदत्त्वाचभुक्त्वाच अध्वानंयोऽधिगच्छति ।
भवन्तिपितरस्तस्य तन्मासंपांसुभोजनाः ॥ ५९ ॥
पुनर्भोजनमध्वानं भाराध्ययनमैथुनम् ।
दानंप्रतिग्रहंहोमं श्राद्धभुक्त्वाष्टवर्जयेत् ॥ ६० ॥
अध्वगामीभवेदश्वः पुनर्भॊक्ताचवायसः ।


उस पुत्रिका का पुत्र पहिला पिण्ड अपनी माता को, दूसरा पिण्ड माता के पिता को, तीसरा माता के बाबा को देवे ॥५५॥ श्राद्ध के समय मट्टी के पात्रों में जो पितृ ब्राह्मणों को जिमावे तो वह अन्नदाता, पुरोहित, और भोजन करने वाला ये तीनों नरक में जाते हैं ॥ ५६ ॥ यदि कांसे पीतल आदि के पात्र न मिलें तो ब्राह्मणों की आज्ञा से मट्टी के पात्रों में भी भोजन करा देवे । यदि मट्टी के पात्र को घी से छिड़क ले तो पवित्र हो जाता है ॥५७ ॥ जो मनुष्य स्वयं श्राद्ध करके दूसरे के यहां श्राद्ध में लोभ से व्याकुल होकर भोजन करे तो नष्ट हुआ है पिण्ड और जलदान जिनका ऐसे उसके पितर नरक में जाते हैं ॥ ५८ ॥ श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन करा के वा अन्य के श्राद्ध में स्वयं भोजन खाकर जो मार्गमें चलता है उस के पितर उस महीने भर धूली फांकते हैं ॥ ५९ ॥ श्राद्ध में भोजन करने वाला ब्राह्मण इन आठ कामों को त्याग देवे । दुबारा भोजन, मार्ग में चलना, बोझा उठाना, वेदवेदाङ्ग पढ़ना, मैथुन करना, दान देना, दान लेना, और होम करना ॥ ६० ॥ श्राद्ध में खाकर जो मार्ग में चले वह जन्मान्तर में घोड़ा, जो उसी दिन पुनः