भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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१० लिखितस्मृतिः ॥

कर्मकृज्जायतेदासः स्त्रीगमनेचसूकरः ॥ ६१ ॥ दशकृत्वःपिबेदापः सावित्र्याचाभिमन्त्रिताः । ततःसन्ध्यामुपासीत शुध्येततदनन्तरम् ॥ ६२ ॥ आर्द्रवासास्तुयत्कुर्याद्बहिर्जानूचयत्कृतम् । सर्वंतन्निष्फलंकुर्याज्जपंहोमंप्रतिग्रहम् ॥ ६३ ॥ चान्द्रायणंनवश्राद्धे पराकोमासिकेतथा । पक्षत्रयेतुकृच्छ्रंस्यात् षण्मासेकृच्छ्रमेवच ॥ ६४ ॥ ऊनाब्दिकेद्विरात्रंस्यादेकाहःपुनराब्दिकै । शावेमासंतर्भुक्त्वावा पादकृच्छ्रोविधीयते ॥ ६५ ॥ सर्पविप्रहतानांच शृङ्गिदंष्ट्रिसरीसृपैः । आत्मनस्त्यागिनांचैव श्राद्धमेषांनकारयेत् ॥ ६६ ॥ गोभिर्हतंतथोद्वृद्धं ब्राह्मणेनतुघातितम् । तंस्पृशन्तिचय्येविप्रा गोजाश्वाश्चभवन्तितै ॥ ६७ ॥


भोजन करै वह काक, जो बोझा उठानादि कर्म करै वह शूद्र, स्त्री का संग करै वह सूकर होता है ॥ ६१ ॥ श्राद्ध में भोजन करके फिर भोजनादि आठ काम करने वाला पुरुष गायत्री से दशवार पढ़ २ के जल पीवे और फिर संध्या करके शुद्ध होता है ॥ ६२ ॥ गीले वस्त्र पहन कर और गोड़ों से बाहर हाथ रख कर जो जप होम तथा प्रतिग्रह (दान लेना आदि) करै वह सब काम उस का निष्फल हो जाता है ॥ ६३ ॥ नव श्राद्ध (त्रयोदशाह) में जीम कर चान्द्रायण, मासिक श्राद्ध एकोद्दिष्ट में जीम कर पराक, मृत्यु के पश्चात् डेढ महीने के श्राद्ध में और छः महीने के श्राद्ध में जीम कर कृच्छ्रव्रत करै ॥ ६४ ॥ ऊनाब्दिक (११) महीने के श्राद्ध में खाकर तीन दिन और वर्षी में खाकर एक दिन व्रत करै और एक महिने के भीतर मरने के सूतक में खाकर आधा अथवा पाद कृच्छ्रव्रत करना कहा है ॥६५॥ सर्प, ब्राह्मण, सींगवाले, दांतों वाले, सरीसृप (सांप का भेद) इन से मरे और अपने को मार डालने वाले जो मनुष्य हैं इन का श्राद्ध न करै ॥६६॥ गौके मारे, फांसी से मरे, ब्राह्मण ने जिनको मार डाला हो उन का जो ब्राह्मण स्पर्श करें वे जन्मान्तर में गौ, बकरा और घोड़ा होते हैं ६७