भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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६ लिखितस्मृतिः ॥

तस्मिन्नहनिकर्तव्या दानपिण्डोदकक्रियाः ॥ ३४ ॥ वर्षवृद्ध्यभिषेकादि कर्तव्यमधिकेनतु । अधिमासेतुपूर्वं स्याच्छ्राद्धं संवत्सरादपि ॥ ३५ ॥ सएवहेयोदिष्टस्य येनकेनतुकर्मणा । अभिघातान्तरंकार्यं तत्रैवाहःकृतंभवेत् ॥ ३६ ॥ शालाग्नौपच्यतेह्यन्नं लौकिकेवाऽथसंशयः । यस्मिन्नेवपचेदन्नं तस्मिन्होमोविधीयते ॥ ३७ ॥ वैदिकेलौकिकेवापि नित्यंहुत्वाह्यतन्द्रितः । वैदिकेस्वर्गमाप्नोति लौकिकेहन्तिकिल्विषम् ॥ ३८ ॥ अग्नौव्याहृतिभिःपूर्वं हुत्वा मन्त्रैस्तुशाकलैः । संविभागंतुभूतेभ्यस्ततोऽश्नीयादनग्निमान् ॥ ३९ ॥ उच्छेषणंतु नोत्तिष्ठेद्यावद्विप्रविसर्जनम् ।


की मृत्यु हो, उसी राशिके उसी दिनमें, गोदानादि पिण्ड दान (तर्पण) करे ॥३४॥ वर्ष की वृद्धि में अभिषेक ( स्नान ) आदि अधिक के साथ अधिक करै । यदि अधिक (मल) मास आन पड़े, तो वर्ष पूर्त्ति से पहिले भी श्राद्ध होवे ॥ ३५ ॥ जिस किसी कर्म के कारण विहित श्राद्ध का वही दिन ( जो वर्ष से पहिले आया हो ) त्याग देना चाहिये । मरने के दिन तिथि की हानि हो गयी हो, तो अगले दिन क्षयाह श्राद्ध करे, तब वही क्षयाह माना जायगा ॥३६॥ अग्नि-शाला में विधि पूर्वक स्थापित अग्नि में अथवा लौकिक अग्नि में प्रतिदिन अन्न पकाया जाय ? ऐसा सन्देह हो, तो समाधान यह है कि आहिताग्नि न हो, तो लौकिकाग्नि में पकावे, और जिस अग्नि में अन्न पकावे, उसी में होम करना शास्त्र में कहा है ॥ ३७ ॥ वैदिक ( स्थापित ) वा लौकिक अग्नि में आलस्य को छोड़कर नित्य होम करे। वैदिक अग्निमें पञ्चमहायज्ञादिसम्बन्धी होम करने वाले को स्वर्ग मिलता और लौकिक अग्निमें होम करनेसे पाप नष्ट होता है ॥३८॥ अनाहिताग्नि पुरुष प्रथम लौकिक अग्नि में पृथक् २ तीन व्याहृतियों से, तथा एक साथ तीनों व्याहृति से, ऐसे चार आहुति देकर (देवकृतस्यैनसो०) इत्यादि शाकल होम की छः आहुति देके प्राजापत्य और स्विष्टकृत दो आहुति देवे । इस प्रकार देव यज्ञ की बारह आहुति देवे, तत्पश्चात् भूमि पर बलिदेना रूप भूतयज्ञ करके भोजन करे ॥ ३९ ॥ जब तक निमन्त्रित ब्राह्मणों को