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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

६ लिखितस्मृतिः ॥

तस्मिन्नहनिकर्तव्या दानपिण्डोदकक्रियाः ॥ ३४ ॥ वर्षवृद्ध्यभिषेकादि कर्तव्यमधिकेनतु । अधिमासेतुपूर्वं स्याच्छ्राद्धं संवत्सरादपि ॥ ३५ ॥ सएवहेयोदिष्टस्य येनकेनतुकर्मणा । अभिघातान्तरंकार्यं तत्रैवाहःकृतंभवेत् ॥ ३६ ॥ शालाग्नौपच्यतेह्यन्नं लौकिकेवाऽथसंशयः । यस्मिन्नेवपचेदन्नं तस्मिन्होमोविधीयते ॥ ३७ ॥ वैदिकेलौकिकेवापि नित्यंहुत्वाह्यतन्द्रितः । वैदिकेस्वर्गमाप्नोति लौकिकेहन्तिकिल्विषम् ॥ ३८ ॥ अग्नौव्याहृतिभिःपूर्वं हुत्वा मन्त्रैस्तुशाकलैः । संविभागंतुभूतेभ्यस्ततोऽश्नीयादनग्निमान् ॥ ३९ ॥ उच्छेषणंतु नोत्तिष्ठेद्यावद्विप्रविसर्जनम् ।


की मृत्यु हो, उसी राशिके उसी दिनमें, गोदानादि पिण्ड दान (तर्पण) करे ॥३४॥ वर्ष की वृद्धि में अभिषेक ( स्नान ) आदि अधिक के साथ अधिक करै । यदि अधिक (मल) मास आन पड़े, तो वर्ष पूर्त्ति से पहिले भी श्राद्ध होवे ॥ ३५ ॥ जिस किसी कर्म के कारण विहित श्राद्ध का वही दिन ( जो वर्ष से पहिले आया हो ) त्याग देना चाहिये । मरने के दिन तिथि की हानि हो गयी हो, तो अगले दिन क्षयाह श्राद्ध करे, तब वही क्षयाह माना जायगा ॥३६॥ अग्नि-शाला में विधि पूर्वक स्थापित अग्नि में अथवा लौकिक अग्नि में प्रतिदिन अन्न पकाया जाय ? ऐसा सन्देह हो, तो समाधान यह है कि आहिताग्नि न हो, तो लौकिकाग्नि में पकावे, और जिस अग्नि में अन्न पकावे, उसी में होम करना शास्त्र में कहा है ॥ ३७ ॥ वैदिक ( स्थापित ) वा लौकिक अग्नि में आलस्य को छोड़कर नित्य होम करे। वैदिक अग्निमें पञ्चमहायज्ञादिसम्बन्धी होम करने वाले को स्वर्ग मिलता और लौकिक अग्निमें होम करनेसे पाप नष्ट होता है ॥३८॥ अनाहिताग्नि पुरुष प्रथम लौकिक अग्नि में पृथक् २ तीन व्याहृतियों से, तथा एक साथ तीनों व्याहृति से, ऐसे चार आहुति देकर (देवकृतस्यैनसो०) इत्यादि शाकल होम की छः आहुति देके प्राजापत्य और स्विष्टकृत दो आहुति देवे । इस प्रकार देव यज्ञ की बारह आहुति देवे, तत्पश्चात् भूमि पर बलिदेना रूप भूतयज्ञ करके भोजन करे ॥ ३९ ॥ जब तक निमन्त्रित ब्राह्मणों को

भाषाधर्मसंहिता ॥ 9

ततोग्रहवलिंकुर्यादिति धर्म्मोव्यवस्थितः ॥ ४० ॥
दर्भाःकृष्णाजिनंमन्त्रा ब्राह्मणाश्चविशेषतः ।
नैतेनिर्म्माल्यतांयान्ति नियोक्तव्याःपुनःपुनः ॥ ४१ ॥
पानमाचमनंकुर्यात् कुशपाणिस्सदाद्विजः ।
भुक्त्वाप्युच्छिष्टतांयाति एषएवविधिःसदा ॥ ४२ ॥
पानआचमनेचैव तर्पणेदैविकेसदा ।
कुशहस्तोनदुष्येत यथापाणिस्तथाकुशः ॥४३॥
वामपाणौकुशान्कृत्वा दक्षिणेनउस्पृशेत् ।
आचमन्तिचयेमूढा रुधिरेणाचमन्तिते ॥४४॥
नीवीमध्येपुयेदर्भा ब्रह्मसूत्रेषुयेकृताः ।
पवित्रांस्तान्विजानीयाद्यथाकायस्तथाकुशाः ॥४५॥
पिण्डेकृतास्तुयेदर्भा यैःकृतंपितृतर्पणम् ।
मूत्रोच्छिष्टपुरीषंच तेषांत्यागोविधीयते ॥४६॥

भोजन कराके विसर्जन न हो जाय, तब तक जूठन न उठावे, उस के पश्चात् ग्रह-वलि करे, यही धर्म की व्यवस्था है ॥४०॥ दर्भ, काले हिरन का चर्म, वेदमन्त्र और विशेष कर ब्राह्मण, ये सब वार २ कार्यों में नियुक्त करने से अशुद्धि को प्राप्त नहीं होते, इस से वार २ धर्म सम्बन्धी काम में इन को नियुक्त करे ॥ ४१ ॥ ब्राह्मणादि द्विज सदैव कुशों को हाथ में लेकर जलपान और आचमन करें। भोजन के अनन्तर भी मनुष्य उच्छिष्ट हो जाता है, इससे आचमन का वही विधान सदा करे ॥४२॥ जल पीने, आचमन करने और सदा देवतर्पण में कुशों को हाथ में लिये मनुष्य दूषित नहीं होता, क्योंकि जैसा हाथ वैसेही कुश होते हैं ॥ ४३ ॥ बांये हाथ में कुशा लेकर दहिने हाथ से आचमन करे । जो मूर्ख लोग इस प्रकार आचमन करते हैं वे मानों रुधिर से आचमन करते हैं, अर्थात् दहिने हाथ में ही कुश रखता हुआ आचमन करे यही ठीक है ॥४४॥ नीवी कटि( कटिबंधन ) में और जनेउ में, जो कुश बंधे हों, उन को पवित्र जानना चाहिये, क्योंकि कुश देह के समान ही हैं ॥ ४५ ॥ जो कुश श्राद्ध के पिण्डों पर रक्खे गये हों, या जिन से पितरों का तर्पण किया हो, अथवा जिन को लेकर मल मूत्र का त्याग किया हो उन कुशों का त्याग कहा है ॥ ४६ ॥

लिखितस्मृतिः ॥

देवपूर्वन्तुयच्छ्राद्धमदैवंचापियद्भवेत् ।
ब्रह्मचारीभवेत्तत्र कुर्याच्छ्राद्धन्तुपैतृकम् ॥४७॥
मातुःश्राद्धन्तुपूर्वंस्यात्पितॄणांतदनन्तरम् ।
ततोमातामहानांच वृद्धौश्राद्धत्रयंस्मृतम् ॥४८॥
क्रतुर्दक्षोवसुःसत्यः कालकामौधुरिलोचनौ ।
पुरूरवार्द्रवाश्चैव विश्वेदेवाःप्रकीर्तिताः ॥४९॥
आगच्छन्तुमहाभागा विश्वेदेवामहाबलाः ।
येयत्रविहिताःश्राद्धे सावधानाभवन्तुते ॥५०॥
इष्टिश्राद्धेक्रतुर्दक्षो वसुःसत्यश्चवैदिके ।
कालःकामोऽग्निकार्येषु काम्येषुधूरिलोचनौ ॥५१॥
पुरूरवार्द्रवाश्चैव पार्वणेषुनियोजयेत् ॥५२॥
यस्यास्तुनभवेद्भ्राता नविज्ञायेतवापिता ।
नोपयच्छेततांप्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशंकया ॥ ५३ ॥
अभ्रातृकांप्रदास्यामि तुभ्यंकन्यामलङ्कृताम् ।
अस्यांयोजायतेपुत्रः समेपुत्रोभविष्यति ॥ ५४ ॥


जो श्राद्ध विश्वेदेव पूर्वक हो वा विश्वदेव पूर्वक न हो । उन दोनों प्रकार के श्राद्धों में पुरुष ब्रह्मचारी रहे और पितरों के निमित्त श्राद्ध करे ॥४७॥ प्रथम माता का श्राद्ध करके पीछे पितरों का करे । फिर मातामहों ( नानाआदि३ ) का श्राद्ध करे, इसप्रकार वृद्धिश्राद्ध ( नांदीमुख ) में तीन श्राद्ध होते हैं ॥४८॥ क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, धूरि, लोचन, पुरूरवा, आर्द्रवा, ये विश्वेदेवाओं के विशेष नाम कहे हैं॥४९॥वे महाबलवान् और महाभाग्यशाली विश्वेदेवा आवें, जो जिस श्राद्ध में कहे हैं, वे सावधान होवें ॥५०॥ दर्शपौर्णमासादि दृष्टियों सम्बन्धी पिण्डपितृयज्ञादि श्राद्ध में क्रतु, और दक्ष, वेदोक्त श्राद्ध में वसु, सत्य, अग्नि के कार्यों में काल, काम, काम्य कर्मों सम्बन्धी श्राद्धों में धूरि, लोचन॥५१॥ पार्वणश्राद्ध में पुरूरवा और आर्द्रवा विश्वेदेवा नियुक्त करने ( बुलाने ) चाहिये ॥ ५२ ॥ जिस कन्या के कोई सहोदर भाई न हो और जिसका पिता भी मर गया हो, उस कन्या के साथ बुद्धिमान् मनुष्य कन्या ही उत्पन्न होने की शंका से विवाह न करे ॥ ५३ ॥ जिसके कोई भाई नहीं है, ऐसी इस वस्त्र और आभूषणों से शोभित कन्या तुमको देता हूं, इस में जो पुत्र हो, वह मेरा पुत्र होगा, इस प्रतिज्ञा से जो कन्या विवाही जाय उसे पुत्रिका कहते हैं ॥५४॥

द्वितीयंतुपितुस्तस्या स्तृतीयन्तत्पितुःपितुः ॥ ५५ ॥

भाषार्थसहिता ॥

मातुःप्रथमतःपिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः ।
द्वितीयंतुपितुस्तस्या स्तृतीयन्तत्पितुःपितुः ॥ ५५ ॥
मृन्मयेषुचपात्रेषु श्राद्धेयोभोजयेत्पितॄन् ।
अन्नदातापुरोधाश्च भोक्ताचनरकंव्रजेत् ॥ ५६ ॥
अलाभेमृन्मयंन्दद्यादनुज्ञातस्तुतैर्द्विजैः ।
घृतेनप्रोक्षणंकार्यं मृदःपात्रंपवित्रकम् ॥ ५७ ॥
श्राद्धंकृत्वापरश्राद्धे यस्तुभुञ्जीतविह्वलः ।
पतन्तिपितरस्तस्य लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ५८ ॥
श्राद्धंदत्त्वाचभुक्त्वाच अध्वानंयोऽधिगच्छति ।
भवन्तिपितरस्तस्य तन्मासंपांसुभोजनाः ॥ ५९ ॥
पुनर्भोजनमध्वानं भाराध्ययनमैथुनम् ।
दानंप्रतिग्रहंहोमं श्राद्धभुक्त्वाष्टवर्जयेत् ॥ ६० ॥
अध्वगामीभवेदश्वः पुनर्भॊक्ताचवायसः ।


उस पुत्रिका का पुत्र पहिला पिण्ड अपनी माता को, दूसरा पिण्ड माता के पिता को, तीसरा माता के बाबा को देवे ॥५५॥ श्राद्ध के समय मट्टी के पात्रों में जो पितृ ब्राह्मणों को जिमावे तो वह अन्नदाता, पुरोहित, और भोजन करने वाला ये तीनों नरक में जाते हैं ॥ ५६ ॥ यदि कांसे पीतल आदि के पात्र न मिलें तो ब्राह्मणों की आज्ञा से मट्टी के पात्रों में भी भोजन करा देवे । यदि मट्टी के पात्र को घी से छिड़क ले तो पवित्र हो जाता है ॥५७ ॥ जो मनुष्य स्वयं श्राद्ध करके दूसरे के यहां श्राद्ध में लोभ से व्याकुल होकर भोजन करे तो नष्ट हुआ है पिण्ड और जलदान जिनका ऐसे उसके पितर नरक में जाते हैं ॥ ५८ ॥ श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन करा के वा अन्य के श्राद्ध में स्वयं भोजन खाकर जो मार्गमें चलता है उस के पितर उस महीने भर धूली फांकते हैं ॥ ५९ ॥ श्राद्ध में भोजन करने वाला ब्राह्मण इन आठ कामों को त्याग देवे । दुबारा भोजन, मार्ग में चलना, बोझा उठाना, वेदवेदाङ्ग पढ़ना, मैथुन करना, दान देना, दान लेना, और होम करना ॥ ६० ॥ श्राद्ध में खाकर जो मार्ग में चले वह जन्मान्तर में घोड़ा, जो उसी दिन पुनः

१० लिखितस्मृतिः ॥

कर्मकृज्जायतेदासः स्त्रीगमनेचसूकरः ॥ ६१ ॥ दशकृत्वःपिबेदापः सावित्र्याचाभिमन्त्रिताः । ततःसन्ध्यामुपासीत शुध्येततदनन्तरम् ॥ ६२ ॥ आर्द्रवासास्तुयत्कुर्याद्बहिर्जानूचयत्कृतम् । सर्वंतन्निष्फलंकुर्याज्जपंहोमंप्रतिग्रहम् ॥ ६३ ॥ चान्द्रायणंनवश्राद्धे पराकोमासिकेतथा । पक्षत्रयेतुकृच्छ्रंस्यात् षण्मासेकृच्छ्रमेवच ॥ ६४ ॥ ऊनाब्दिकेद्विरात्रंस्यादेकाहःपुनराब्दिकै । शावेमासंतर्भुक्त्वावा पादकृच्छ्रोविधीयते ॥ ६५ ॥ सर्पविप्रहतानांच शृङ्गिदंष्ट्रिसरीसृपैः । आत्मनस्त्यागिनांचैव श्राद्धमेषांनकारयेत् ॥ ६६ ॥ गोभिर्हतंतथोद्वृद्धं ब्राह्मणेनतुघातितम् । तंस्पृशन्तिचय्येविप्रा गोजाश्वाश्चभवन्तितै ॥ ६७ ॥


भोजन करै वह काक, जो बोझा उठानादि कर्म करै वह शूद्र, स्त्री का संग करै वह सूकर होता है ॥ ६१ ॥ श्राद्ध में भोजन करके फिर भोजनादि आठ काम करने वाला पुरुष गायत्री से दशवार पढ़ २ के जल पीवे और फिर संध्या करके शुद्ध होता है ॥ ६२ ॥ गीले वस्त्र पहन कर और गोड़ों से बाहर हाथ रख कर जो जप होम तथा प्रतिग्रह (दान लेना आदि) करै वह सब काम उस का निष्फल हो जाता है ॥ ६३ ॥ नव श्राद्ध (त्रयोदशाह) में जीम कर चान्द्रायण, मासिक श्राद्ध एकोद्दिष्ट में जीम कर पराक, मृत्यु के पश्चात् डेढ महीने के श्राद्ध में और छः महीने के श्राद्ध में जीम कर कृच्छ्रव्रत करै ॥ ६४ ॥ ऊनाब्दिक (११) महीने के श्राद्ध में खाकर तीन दिन और वर्षी में खाकर एक दिन व्रत करै और एक महिने के भीतर मरने के सूतक में खाकर आधा अथवा पाद कृच्छ्रव्रत करना कहा है ॥६५॥ सर्प, ब्राह्मण, सींगवाले, दांतों वाले, सरीसृप (सांप का भेद) इन से मरे और अपने को मार डालने वाले जो मनुष्य हैं इन का श्राद्ध न करै ॥६६॥ गौके मारे, फांसी से मरे, ब्राह्मण ने जिनको मार डाला हो उन का जो ब्राह्मण स्पर्श करें वे जन्मान्तर में गौ, बकरा और घोड़ा होते हैं ६७

भाषार्थसहिता ॥ ११

अग्निदाता तथा चान्ये पाशच्छेदकराश्च ये । तप्तकृच्छ्रेण शुध्यन्ति मनुराहप्रजापतिः ॥ ६८ ॥ त्र्यहमुष्णं पिबेदापस्त्र्यहमुष्णं पयःपिबेत् । त्र्यहमुष्णं घृतं पीत्वा वायुभक्षो दिनत्रयम् ॥ ६९ ॥ गोभूहिरण्यहरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य च । यमुद्दिश्य त्यजेत्प्राणांस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥ ७० ॥ उद्यताः सह धावन्तो सर्वे ये शस्त्रपाणयः । यद्येकोऽपि हनेत्तत्र सर्वे ते ब्रह्मघातकाः ॥७१॥ बहूनां शस्त्रघातानां यद्येको मर्मघातकः । सर्वे ते शुद्धिमिच्छन्ति स एको ब्रह्मघातकः ॥७२॥ पतितान्नं यदा भुङ्क्ते भुङ्क्ते चाण्डालवेश्मनि । समासार्द्धं चरेद्वारि मासं कामकृतेन तु ॥७३॥ यो येन पतितेनैव संसर्गं याति मानवः । सतस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गविशुद्धये ॥७४॥ ब्रह्महापातकिस्पर्शे स्नानं येन विधीयते ।


सर्पादि से मरोंका दाह करने वाला तथा अन्य जन जो फांसीको काटने वाले हैं वे तप्तकृच्छ्रव्रत से शुद्ध होते हैं यह बात प्रजा के पति मनुजी ने कही है ॥ ६८ ॥ तीन दिन गर्म जल, तीन दिन गर्म दूध. तीन दिन गर्म घी पीवे और तीन दिन वायु को भक्षण करै यह तप्तकृच्छ्रव्रत का लक्षण है ॥६९॥ गौ, पृथिवी, सुवर्ण, स्त्री, खेत, घर, इन के हरलेने पर जिस का सताया हुआ मनुष्य प्राणों को त्यागे उस को ब्रह्म हत्या का अपराधी कहते हैं ॥ ७० ॥ अनेक मनुष्य शस्त्र ले २ कर एक संग किसी पर हमला करें उन में से यदि एक पुरुष भी मार डाले तो वे हमला करने वाले सब हत्या के अपराधी हैं ॥ ७१ ॥ हथियार से मारने वाले बहुतों में यदि एक कोई मर्म स्थान में मारे जिससे वह मरजावे तो वह मर्मघाती एकही दोषी है अन्य सब निर्दोष शुद्ध हैं ॥७२॥ जो पतितका अन्न खाय वा चाण्डालके घरमें अज्ञानसे खावे तो पन्द्रह दिन और जानकर खावे तो एकमास जलमात्र पीकर व्रत करे ॥ ७३ ॥ जो मनुष्य जिस पतित के साथ खान पानादि में मेल करता है वह उसी पतित के लिये कहा प्रायश्चित्त संसर्ग से हुए दोष की शुद्धि के लिये करे ॥७४॥ जिस ब्रह्महत्यारेका स्पर्श करनेसे स्नान करना कहा है उसी उच्छिष्ट पतितने स्पर्श किया

१२ | लिखितस्मृतिः ॥

तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टः प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥७५॥
ब्रह्महाचसुरापेयी स्तेयीचगुरुतल्पगः ।
महान्तिपातकान्याहुस्तत्संसर्गीचपञ्चमः ॥७६॥
स्नेहाद्वायदिवालोभाद् भयादज्ञानतोऽपिवा ।
कुर्वन्त्यनुग्रहंयेच तत्पापन्तेषुगच्छति ॥७७॥
उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टो ब्राह्मणस्तुकदाचन ।
तत्क्षणात्कुरुतेस्नानमाचामेनशुचिर्भवेत् ॥७८॥
कुब्जवामनषण्ढेषु गद्गदेषुजडेषुच ।
जात्यन्धेबधिरेमूके नदोषःपरिवेदने ॥७९॥
क्लीवेदेशान्तरस्थेच पतितेव्रजितेपिवा ।
योगशास्त्राभियुक्तेच नदोषःपरिवेदने ॥८०॥
पूरणेकूपवापीनां वृक्षच्छेदनपातने ।
विक्रीणीतगजंचाश्वं गोवधंतस्यनिर्दिशेत् ॥८१॥
पादेऽङ्गरोमवपनं द्विपादेश्मश्रुकेवलम् ।


हो तो प्राजापत्य व्रत करे ॥ ७५ ॥ ब्रह्महत्यारा, बार २ समझ पूर्वक मदिरा पीने वाला, सुवर्ण का चोर, गुरु पत्नी से संयोग करने वाला और पांचवां इन का संसर्गी मेली ये पांच महापातकी कहाते हैं ॥ ७६ ॥ प्रीति से, लोभ से, भय से, अथवा अज्ञान से, जो अपराधी पर कृपा करते हैं अर्थात् पाप का प्रायश्चित्त नहीं कराते वह अपराधी का पाप उन प्रायश्चित्त न कराने वालों को लगता है ॥ ७७ ॥ यदि कभी उच्छिष्ट ब्राह्मण को अन्य उच्छिष्ट मनुष्य छूलेवे तो उसी क्षण स्नान कर आचमन करने से शुद्ध होता है ॥७८॥ कुबड़ा, बिलंदिया, नपुंसक, तोतला, महामूर्ख, जन्मांध, बहरा, गूंगा, इन के परिवेदन में अर्थात् बड़ा भाई कुब्जादि हो तो छोटे भाई का उस से पहिले विवाह करलेने में कुछ दोष नहीं है । तथा यदि बड़ा भाई क्लीव (हिजड़ा) हो, देशांतर में रहता हो, पतितहो, संन्यासी हो गया हो, और योगाभ्यास में लगा हो तो भी परिवेदन में दोष नहीं है ॥ ७९ । ८० ॥ बावड़ी और कूपों को बन्द करना, काटकर वृक्षों को गिराना, हाथी और घोड़े को बेचना इन कामों को जो करे वह गो हत्या का प्रायश्चित्त करे ॥ ८१ ॥

पाद (चौथाई) कृच्छ्र में सब अंग के रोमों का मुंडन, द्विपाद आधे कृच्छ्र में डाढी मूछों का, त्रिपाद (पौन) कृच्छ्र में शिखा को छोड़कर सब केशों का और चौथे (संपूर्ण

तृतीयेतुशिखावर्जं चतुर्थेतुशिखावपः ॥ ८२ ॥

भाषाथंसहिता ॥ १३

तृतीयेतुशिखावर्जं चतुर्थेतुशिखावपः ॥ ८२ ॥ चाण्डालोदकसंस्पर्शे स्नानंनयेनविधीयते । तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टः प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ ८३ ॥ चाण्डालस्पृष्टभाण्डस्थं यत्तोयं पिबतिद्विजः । तत्क्षणात्क्षिप्तयेत्तु प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ ८४ ॥ यदि नोत्क्षिप्यतेतोयं शरीरेतस्यजीर्य्यति । प्राजापत्यंनदातव्यं कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ॥ ८५ ॥ चरेत्सान्तपनंविप्रः प्राजापत्यंतुक्षत्रियः । तदर्धंतुचरेद्वैश्यः पादंशूद्रेतुदापयेत् ॥ ८६ ॥ रजस्वलायदास्पृष्टा शुनासूकरवायसैः । उपोष्यूरजनीमेकां पञ्चगव्येनशुध्यति ॥ ८७ ॥ आजानुतःस्नानमात्रमानाभेस्तुविशेषतः । अतऊर्ध्वं त्रिरात्रंस्यान्मदिरास्पर्शनेमतम् ॥ ८८ ॥ बालश्चैवदशाहेतु पञ्चत्वंय दिगच्छति । सद्यएवविशुध्येत नाशौचंनोदकक्रिया ॥ ८९ ॥ शावसूतकउत्पन्ने सूतकंतुयदाभवेत् ।


कृच्छ्र) में शिखा सहित सब बालों का मुंडन कराना चाहिये ॥८२॥ चांडाल के जल को छूने से ब्राह्मण स्नान करे और उच्छिष्ट चाण्डाल यदि ब्राह्मण को छूले तो प्राजापत्य व्रत करै ॥८३॥ चांडाल ने स्पर्श किये पात्र का जल जो ब्राह्मण पीले यदि उस को उसी क्षण में वमन करदे तो प्राजापत्य व्रत करै ॥८४॥ और यदि वमन न करै किन्तु वह जल उस के शरीर में ही पचजाय तो सांतपन कृच्छ्र करै प्राजापत्य नहीं ॥ ८५ ॥ इसी उक्त दोष पर ब्राह्मण सांतपन कृच्छ्र क्षत्रिय प्राजापत्य, वैश्य आधा प्राजापत्य और शूद्र चौथाई प्राजापत्य व्रत करै ॥८६॥ जिस समय रजस्वला स्त्री को कुत्ता, सूकर, काक, ये छू लें तो एक रात भर उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होती है ॥८७॥ यदि घोंटू तक मदिरा छू जाय तो स्नान मात्र शुद्धि करे, यदि किसी ब्राह्मण के शरीर में पगों से नाभि तक छुआय तो विशेष कर स्नान से ही शुद्धि है और नाभि से ऊपर के अंग में छुआये तो तीन दिन रात उपवास करे ॥ ८८ ॥ यदि उत्पन्न हो कर दश दिन के भीतर बालक मर जाय तो उसी समय स्नान वस्त्रादि की शुद्धि कर ले उस का सूतक नहीं लगता और जलदान ( तिलाञ्जलि ) भी न करे ॥ ८९ ॥ यदि

षष्ठेनशुद्ध्येतैकाहं पञ्चमेद्व्यहमेवतु ।

१४ लिखितस्मृतिः ॥

शावेनशुध्यतेसूतिर्नसूतिःशावशोधिनी ॥ ९० ॥
षष्ठेनशुद्ध्येतैकाहं पञ्चमेद्व्यहमेवतु ।
चतुर्थेसप्तरात्रंस्यात् त्रिपुरुषंदशमेऽहनि ॥ ९१ ॥
मरणारब्धमाशौचं संयोगोयस्यनाग्निभिः ।
आदाहात्तस्यविज्ञेयं यस्यवैतानिकोविधिः ॥ ९२ ॥
आमंमांसंघृतंक्षौद्रं स्नेहाश्चफलसंभवाः ।
अन्त्यभाण्डस्थिताह्येते निष्क्रान्ताःशुचयःस्मृताः ॥९३॥
मार्जनौरजसासक्तं स्नानवस्त्रघटोदकम् ।
नवाम्भसितथाचैव हन्तिपुण्यंदिवाकृतम् ॥ ९४ ॥
दिवाकपित्थच्छायायां रात्रौदधिशमीषुच ।
धात्रीफलेषुसर्व्वत्र अलक्ष्मीर्वसतेसदा ॥ ९५ ॥
यत्रयत्रचसंकीर्णमात्मानंमन्यतेद्विजः ।
तत्रतत्रतिलैर्होमं गायत्र्यष्टशतंजपेत् ॥ ९६ ॥
इतिश्रीमहर्षिलिखितप्रोक्तं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥


मरण सूतक में जन्म सूतक हो जाय तो मरण सूतक के शेष दिनों में ही जन्म सूतक की शुद्धि होजाती है और जन्म सूतक के दिनों से मरण सूतक निवृत्त नहीं होता अर्थात् जन्म सूतक छोटा और मरण सूतक बड़ा है ॥ ९० ॥
छठी पीढ़ी वालों को एक दिन का, पांचवीं में दो दिन का, चौथी में सात दिन का और तीसरी में दश दिन का सूतक लगता है ॥९१॥ जो अग्निहोत्री न हो उसे मरण के समय से और जो वेदोक्त अग्निहोत्र करता है उस को दाह के समय से सूतक लगता है ॥९२॥ कच्चा मांस, घृत, शहद, फलों से निकले तैल, अन्य किसी नीच के पात्र में रक्खे हुए ये सब पात्र से निकाल लेने पर शुद्ध हैं ॥९३॥
स्नान का शुद्ध वस्त्र, घड़े का जल, और नया जल, इन में यदि मार्जनी (बुहारी) की धूल लग जाय तो उस दिनमें किये पुण्य को नष्ट करता है ॥९४॥
दिन में कैथ की छाया में रात्रि में दही, तथा छोंकर में, आंवले के फल में, दिन रात दोनों समय अलक्ष्मी (दरिद्रता) बसती है ॥९५॥ जिस २ निकृष्ट कर्म के करने में ब्राह्मण अपने को लज्जा, शंका, संकोच, हुआ माने वहां २ तिलों से होम करे और आठ सौ गायत्री जपै ॥ ९६ ॥
यह महर्षिलिखितके कहे धर्मशास्त्र का पं० भीमसेनशर्मकृत भाषानुबाद पूराहुआ ॥

अथ दक्षस्मृतिप्रारंभः ॥


सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः सर्ववेदविदांवरः ।
पारगःसर्वविद्यानां दक्षो नामप्रजापतिः ॥ १ ॥
उत्पत्तिःप्रलयश्चैव स्थितिःसंहारएवच ।
आत्माचात्मनितिष्ठेत आत्माब्रह्मण्यवस्थितः ॥ २ ॥
ब्रह्मचारीगृहस्थश्च वानप्रस्थोयतिस्तथा ।
एतेषांतुहितार्थाय धर्मशास्त्रमकल्पयत् ॥ ३ ॥
जातमात्रःशिशुस्तावद्यावदष्टौसमावयः ।
सहिगर्भसमोज्ञेयो व्यक्तिमात्रप्रदर्शितः ॥ ४ ॥
भक्ष्याभक्ष्येत्तथापेये वाच्यावाच्येतथाऽनृते ।
अस्मिन्बालेनदोषःस्यात्सयावन्नोपनीयते ॥ ५ ॥
उपनीतेतुदोषोऽस्ति क्रियमाणैर्विगर्हितैः ।


श्रीः शुभम् । संपूर्ण शास्त्रों को यथार्थ जानने वाले, सब वेद वेत्ताओं में श्रेष्ठ और सब विद्याओं के पार पहुंचे हुए दक्ष नामक प्रजापति हुए हैं ॥१॥

उत्पत्ति, प्रलय ( मरना ) स्थिति, संहार ( पांच महाभूतों का प्रलय ) इनके करने में समर्थ जिन दक्ष के आत्मा (देह) में साक्षात् परमात्मा ठहरे थे और जिनका आत्मा धर्म में स्थित था ॥२॥ उन दक्ष प्रजापति जी ने, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी, इन चारों आश्रमों के हितार्थ धर्मशास्त्र को रचा है ॥३॥

जब तक आठ वर्ष की अवस्था हो तब तक बालक पैदा हुये के समान है क्योंकि उसे गर्भ तुल्य ही जाने उस का एक आकार मात्र ही दीखता है ॥४॥ भक्ष्य अभक्ष्य, पीने न पीने योग्य, कहने न कहने योग्य, सत्य और झूठ में इस बालक को जनेऊ होने से पहिले दोष नहीं लगता है ॥५॥ जनेऊ हुए पीछे जो निन्दित काम करे तो उस को दोष लगते हैं । और सोलह वर्ष की

२ दक्षस्मृतिः ॥

अप्राप्तव्यवहारोऽसौ बालःषोडशवार्षिकः ॥ ६ ॥ स्वीकरोतियदावेदं चरेद्वेदव्रतानिच । ब्रह्मचारीभवेत्तावदूर्ध्वंस्नातोभवेद्गृही ॥ ७ ॥ द्विविधोब्रह्मचारीस्यादाद्योह्युपकुर्वाणकः । द्वितीयोनैष्ठिकश्चैव तस्मिन्नेवव्रतेस्थितः ॥ ८ ॥ त्रयाणामानुलोम्येन प्रातिलोम्येनवापुनः । प्रतिलोमंव्रतंतस्य सभवेत्पापकृत्तमः ॥ ६ ॥ योगृहाश्रममास्थाय ब्रह्मचारीभवेत्पुनः । नयतिर्नवनस्थश्च ससर्वाश्रमवर्जितः ॥ १० ॥ अनाश्रमीनतिष्ठेत क्षणमेकमपिद्विजः । आश्रमेणविनातिष्ठन् प्रायश्चित्तीयतेहिसः ॥ ११ ॥ जपेहोमेतथादाने स्वाध्यायेचरतःसदा । नासौफलमवाप्नोति कुर्वाणोप्याऽऽश्रमाच्च्युतः ॥१२॥ मेखलाजिनदण्डैश्च ब्रह्मचारीतिलक्ष्यते


आयु तक यह बालक संसारी व्यवहारों के लायक नहीं होता ॥ ६ ॥ जब यह बालक वेद का प्रारंभ करै तब वेदोक्त ब्रह्मचर्याश्रम के नियम व्रतों को भी करै और ब्रह्मचारी रहे फिर समावर्त्तन स्नान करके गृहस्थ बने ॥ ७ ॥ दो प्रकार का ब्रह्मचारी होता है एक उपकुर्वाणक, दूसरा नैष्ठिक जो जन्म भर ब्रह्मचारी ही रहे जप तप वेदाध्ययनादि करता रहे ॥ ८ ॥ ब्रह्मचारी से गृहस्थ वानप्रस्थ संन्यास ऐसे क्रम से तीनों आश्रमों में प्रवेश करना उत्तम है । यदि कोई गृहस्थ से ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थ होकर गृहस्थ बने तो वह बड़ा पापी है ॥९॥ जो गृहस्थ होकर फिर ब्रह्मचारी बने और संन्यासी अथवा वानप्रस्थ न बने वह सब आश्रमों से रहित है ॥ १० ॥ ब्राह्मणादि द्विज एक क्षण भर भी आश्रम से हीन न रहे क्योंकि आश्रम के बिना रहता हुआ द्विज प्रायश्चित्तके योग्य हो जाता है ॥११॥ आश्रम के बिना जप, होम, दान, और वेद के पाठ में तत्पर ब्राह्मणादि द्विज कर्म को करता हुआ भी फल को प्राप्त नहीं होता ॥ १२ ॥ मेखला मृगचर्म, दंड, इन चिन्हों से ब्रह्मचारी, बांस की छड़ी और

'भाषार्थसहिता ॥

गृहस्थोयष्टिवेदायैर्नखलोमैर्वनाश्रमी ॥ १३ ॥ त्रिदण्डेनयतिश्चैवं लक्षणानिपृथक्पृथक् । यस्यैतल्लक्षणंनास्ति प्रायश्चित्तीनचाऽऽश्रमी ॥१४॥ उक्तंकर्मक्रमेणैव यःकालऋषिभिः स्मृतः । द्विजानांचहितार्थाय दक्षस्तुस्वयमब्रवीत् ॥ १५ ॥ इति दाक्षे धर्म्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ प्रातरुत्थायकत्र्तव्यं यद्विजेनदिनेदिने । तत्सर्वंसंप्रवक्ष्यामि द्विजानामुपकारकम् ॥ १ ॥ उदयास्तमितंयावन्नविप्रःक्षणिकोभवेत् । नित्यनैमित्तिकैयुक्तः काम्यैश्चान्यैरगर्हितैः ॥ २ ॥ संध्याद्यंवैश्वदेवान्तं स्वकंकर्मसमाचरेत् । स्वकंकर्मपरित्यज्य यदन्यत्कुरुतेद्विजः । अज्ञानादथवालोभात् सतेनपतितोभवेत् ॥ ३ ॥ दिवसस्याद्यभागेतु कृत्यंतस्योपदिश्यते ।


वेद पुस्तकादि के धारण करने से गृहस्थ नख तथा केश लोमों के धारण से वानप्रस्थ जाना जाता है ॥१३॥ और त्रिदण्ड के धारण से संन्यासी ये चारों आश्रमों के पृथक् २ लक्षण हैं। जिस के शरीर के साथ ये लक्षण नहीं हैं वह प्रायश्चित्त के योग्य है ॥ १४ ॥ ऋषियों ने कर्मों के क्रम से जो २ समय जिस २ काम के लिये कहा है ब्राह्मणादि द्विजों के हित के अर्थ दक्ष प्रजापति स्वयं उस क्रम को कहते हैं ॥ १५ ॥

यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में प्रथम अध्याय पूरा हुआ ॥

प्रातःकाल से उठकर जो २ धर्म युक्त काम द्विजों को प्रतिदिन करने चाहिये उन द्विजों के उपकारी सब कामों को हम कहते हैं ॥ १ ॥ सूर्य के उदय से लेकर अस्त होने पर्यन्त ब्राह्मण एक क्षण भर भी व्यर्थ न गमावे किंतु नित्य ( संध्या आदि ) नैमित्तिक ( जात कर्मादि ) काम्य कर्म ( यज्ञादि ) सत् शास्त्राभ्यासादि इन में युक्त ( लगा ) रहे ॥२॥ संध्योपासन से लेके वैश्वदेव पर्यन्त जो अपना नित्य कर्म है उसे करै, क्योंकि अपने कर्मको छोड़ कर जो ब्राह्मण अज्ञान से अथवा लोभ से अन्य वर्ण का कर्म करता है वह उस कर्म के करने से पतित हो जाता है ॥ ३ ॥ उस ब्राह्मण को दिन के

द्वितीयेचतृतीयेच चतुर्थेपञ्चमेतथा ॥ ४ ॥

४ दक्षस्मृतिः ॥

द्वितीयेचतृतीयेच चतुर्थेपञ्चमेतथा ॥ ४ ॥
षष्ठेचसप्तमेचैव त्वष्टमेचपृथक्पृथक् ।
विभागेष्वेषुयत्कर्म तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ ५ ॥
उषःकालेचसम्प्राप्ते शौचंकृत्वायथार्थवत् ।
ततःस्नानंप्रकुर्वीत दन्तधावनपूर्वकम् ॥ ६ ॥
अत्यन्तमलिनःकायो नवछिद्रसमन्वितः ।
स्रवत्येवदिवारात्रौ प्रातःस्नानंविशोधनम् ॥ ७ ॥
क्लिद्यन्तिहिप्रसुप्तस्य चेन्द्रियाणिस्रवन्तिच ।
अङ्गानिसमतांयान्ति उत्तमान्यधमानिच ॥ ८ ॥
नानास्वेदसमाकीर्णः शयनादुत्थितःपुमान् ।
अस्नात्वा नाचरेत्किञ्चिज्जपहोमादिकंद्विजः ॥ ९ ॥
प्रातरुत्थाययोविप्रः सन्ध्यास्नायीभवेत्सदा ।
सप्तजन्मकृतंपापं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥ १० ॥
उषस्युपासित्स्नानं सन्ध्यायामुदितेरवौ ।


प्रथम, दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें और आठवें, इन भागों में पृथक् २ जो २ कर्म धर्म शास्त्रों के अनुसार उपदेश किये गये हैं उन सब को क्रम से हम कहेंगे ॥ ४ ॥ ५ ॥ प्रातः सूर्योदय से चार घड़ी पहिले जाग कर शास्त्र में कहे अनुसार मल मूत्र त्यागादि रूप यथावत् शौच करके दंत धावन पूर्वक स्नान करे ॥ ६ ॥ यह देह मलिनता निकलने के नौ दरवाजों से युक्त होने के कारण अत्यन्त मलिन है, रात दिन शरीर से मलिनता निकलती है, प्रातःकाल का स्नान इस का शोधन करने वाला है ॥ ७ ॥ सोते हुये मनुष्य के इन्द्रिय मलिनता से गीले हो जाते और लार आदि टपक ने लगती है । उत्तम, अधम, सब अंग शिथिल होजाते हैं ॥ ८ ॥ सोकर उठा मनुष्य अनेक प्रकार के पसीनादि से युक्त हो जाता है । इस लिये स्नान किये बिना ब्राह्मण किंचित भी जप होमादि कर्म न करे ॥ ९ ॥ जो ब्राह्मण प्रातःकाल ही उठकर नित्यनियम से सन्ध्या स्नान निरन्तर किया करे वह सात जन्म तक में किये पाप को तीन वर्षों में नष्ट कर देता है ॥ १० ॥ प्रतिदिन प्रातःकाल बादल पीले होते ही और सायंकाल में सूर्य के अस्त होने

भाषार्थसहिता ॥ ५

प्राजापत्येनतत्तुल्यं सर्वपापापनोदनम् ॥ ११ ॥
प्रातःस्नानंप्रशंसन्ति दृष्टादृष्टकरंहितत् ।
सर्वमर्हतिशुद्धात्मा प्रातःस्नायीजपादिकम् ॥ १२ ॥
गुणादशस्नानपरस्यसाधो रूपंचशौचंचबलंचतेजः ।
आरोग्यमायुश्चमलोलुपत्वं दुःस्वप्नघातश्चतपश्चमेधाः॥१३॥
मनःप्रसादजननं रूपसौभाग्यवर्धनम् ।
दुःखशोकापहंस्नानं मानदंज्ञानदंतथा ॥ १४ ॥
आग्नेयंभस्मनास्नानमवगाह्यचवारुणम् ।
आपोहिष्ठेतिचब्राह्मं वायव्यंगोरजःस्मृतम् ॥ १५ ॥
यत्तसातपवर्षंतु तत्स्नानंदिव्यमुच्यते ।
पञ्चस्नानानिपुण्यानि मनुःस्वायंभुवोऽब्रवीत् ॥ १६ ॥
आपस्नानंव्रतस्नानं मन्त्रस्नानंतथैवच ।

से पहिले जो स्नान करता है वह स्नान प्राजापत्य व्रत के तुल्य सब पापोंका नाशक है ॥ ११ ॥ प्रत्यक्ष परोक्ष फल देने वाला जो प्रातःकाल का स्नान उस की सब विद्वान् लोग प्रशंसा करते हैं । प्रातःकाल स्नान करने वाला मनुष्य देह की पवित्रता से संपूर्ण जप आदि कर्म करने योग्य होता है ॥१२ ॥ स्नान में तत्पर कुटिलतारहित साधु मनुष्य में ये दश उत्तम गुण होते हैं कि रूप, शुद्धि, बल, तेज, नीरोगता, अवस्था, लालचछूटना, मन की शुद्धि से बुरे स्वप्नों का न होना, तप, और तीक्ष्ण बुद्धि होना ॥ १३ ॥ मन को प्रसन्न करने, रूप तथा सौभाग्य को बढ़ाने, दुःख तथा शोक का नाश करने, मान और ज्ञान का देने वाला, प्रातःकाल का स्नान है ॥ १४ ॥ भस्म से स्नान करना आग्नेय स्नान, जलाशय में अवगाहन करके स्नान करना वारुण, (आपोहिष्ठा०) इत्यादि मन्त्रों को पढ़ २ के स्नान करना ब्राह्म, और गौओं के खुरों से उडी धूलि को शरीर पर लेना, वायव्य, स्नान कहाता है ॥१५॥ घाम होने पर वर्षा भी हो उस में स्नान करना, दिव्य स्नान है । स्वायंभुव मनुने ये पांच स्नान पुण्य करने वाले कहे हैं ॥ १६ ॥ आप (जल से) स्नान, व्रत स्नान, (व्रतों के द्वारा मन वाणी शरीरों की शुद्धि) और मन्त्र स्नान, (मन्त्रों के जपादि द्वारा शुद्धि) इन तीन स्नानों में जल स्नान गृहस्थ के लिये, व्रत

दक्षस्मृतिः ॥

आपस्नानंगृहस्थस्य व्रतमन्त्रैतपस्विनाम् ॥ १७ ॥
कनिष्ठादेशिन्यङ्गुष्ठमूलान्यग्रं करस्यच ।
प्रजापतिपितृब्रह्मदेवतीर्थान्यनुक्रमात् ॥ १८ ॥
दानंप्रतिग्रहोहोमो भोजनंबलिकंतथा ।
साङ्गुष्ठंतुसदाकार्यमापतेत्तदधोऽन्यथा ॥ १९ ॥
स्नानादनन्तरंतावदुपस्पर्शनमुच्यते ।
अनेनतुविधानेन स्वाचान्तःशुचितामियात् ॥ २० ॥
उदकएवोदकस्थश्चेत्स्थलस्थश्चस्थलेशुचिः ।
पादौस्थाप्योभयत्रैव आचम्योभयतःशुचिः ॥ २१ ॥
प्रक्षाल्यहस्तौपादौच त्रिःपिबेदम्बुवीक्षितम् ।
संहताङ्गुष्ठमूलेन द्विःप्रमृज्यात्ततोमुखम् ॥ २२ ॥
संहत्यतिसृभिःपूर्वमास्यमेवमुपस्पृशेत् ।
अङ्गुष्ठेनप्रदेशिन्या घ्राणंपश्चादुपस्पृशेत् ॥ २३ ॥
अङ्गुष्ठानामिकाभ्यांच चक्षुःश्रोत्रेपुनःपुनः ।


स्नान, मन्त्रस्नान, तपस्वियों के लिये हैं ॥ १७ ॥ कनिष्ठा, प्रदेशिनी, अंगुष्ठ, इन के मूल में और सब अंगुलियों के अग्रभाग में क्रम से प्रजापति, पितर, ब्रह्म और देवों के तीर्थ माने जाते हैं। इस लिये कनिष्ठा अंगुली के मूल से प्रजापतिको, प्रदेशिनी के मूलसे पितरोंको, अंगुष्ठके मूलसे ब्रह्माको, और हाथ के अग्रभागसे देवोंकेलिये जलदान करे ॥१८॥ दानदेना, दानलेना, भोजन करना, बलि धरना, होम करना, इन कामोंको अंगुष्ठ सहित सब अंगुलियोंसे करे,। अन्यथा करने से अधोगति में पड़ेगा ॥ १९ ॥ स्नानके अनन्तर आचमन करने का विधान कहते हैं ठीक इस के आगे कहे विधान से आचमन करने पर मनुष्य सम्यक् शुद्ध हो जाता है ॥२०॥ जलाशय के भीतर वा स्थल में जहां बैठ कर आचमन करे वहां पग जमाकर आचमन करे, तो बाहर भीतरसे शुद्ध होजाता है।२१। हाथ और पगों को धो कर अंगुलियों से मिलाये हुये अंगुष्ठ के मूल भाग से जल को देख २ कर तीनवार पीवे, फिर अंगुलियों के अग्रभाग में जल लगा २ कर दोवार मुखको शुद्ध करे ॥२२॥ फिर अनामिका, मध्यमा, प्रदेशिनी, इनतीन अंगुलियों से मुखका, अंगुष्ठ और प्रदेशिनी से नासिका के दोनों छिद्रों का,

भाषार्थसंहिता ॥ ७

नाभिंकनिष्ठाङ्गुष्ठाभ्यां हृदयं तु तलेन वै ॥ २४ ॥
सर्वाभिश्चशिरः पश्चाद्बाहूचाग्रेणसंस्पृशेत् ।
सन्ध्यायांचप्रभातेच मध्यान्हेचततःपुनः ॥ २५ ॥
हृद्गाभिःपूयतेविप्रः कण्ठगाभिश्चभूमिपः ।
वैश्यःप्राशितमात्राभिर्जिह्वागाभिःस्त्रियोऽङ्घ्रिजाः ॥२६॥
योनसन्ध्यामुपासीत ब्राह्मणोहिविशेषतः ।
सजीवन्नेवशूद्रःस्यान्मृतःश्वाचैवजायते ॥ २७ ॥
सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हःसर्वकर्मसु ।
यदन्यत्कुरुतेकर्म नतस्यफलभाग्भवेत् ॥ २८ ॥
सन्ध्याकर्मावसानेतु स्वयंहोमोविधीयते ।
स्वयंहोमेफलंयत्तु तदन्येननजायते ॥ २९ ॥
ऋत्विक्पुत्रोगुरुर्भ्राता भागिनेयोऽथविट्पतिः ।
एभिरेवहुतंयत्तु तद्हुतंस्वयमेवतु ॥ ३० ॥


अंगूठा और अनामिका से बारम्बार नेत्र और कानों का, पहिले दहिने नेत्र दहिने कान का पश्चात् वाम का, स्पर्श करे, और अंगूठा और कनिष्ठका से नाभिका, और हाथके तलसे हृदय का स्पर्श करै ॥ २३ । २४ ॥ सब अंगुलियों से शिरका, हाथ के अग्रभाग से दोनों भुजाओं का स्पर्श करे । सायं सन्ध्या के समय, प्रातःकाल और मध्यान्ह में पूर्वोक्त प्रकार से आचमन तथा इन्द्रियस्पर्श करै ॥२५॥ हृदय तक पहुंचने वाले जल के आचमन से ब्राह्मण, कंठ तक पहुंचने वाले से क्षत्रिय, प्राशित ( जो मुख में ही रहै ) मात्र जल से वैश्य, और जिह्वा का स्पर्श जिस से हो, उस जल के आचमन से स्त्री और शूद्र-पवित्र होते हैं ॥ २६ ॥ जो ब्राह्मण विशेष कर संध्योपासन नहीं करता वह जीता ही शूद्र है और मरकर कुत्ता की योनि में जन्म लेता है ॥२७॥ संध्याहीन मनुष्य नित्य अशुद्ध तथा सब कर्मों के अयोग्य है और वह जो कुछ अन्य कर्म करता है उस के फलका भी भागी नहीं होता है ॥ २८ ॥ संध्यः के पीछे स्वयं होम करना कहा है, क्योंकि जो फल स्वयं होम करने का है, वह अन्य से कराने पर नहीं होता ॥ २९ ॥ ऋत्वज, अध्वर्यु, अपना पुत्र, गुरु, भाई; भानजा, और जामाता इन प्रतिनिधियों द्वारा जो होम कराया गया हो, वह स्वयं किये के तुल्य ही है ॥ ३०॥

८ | दक्षस्मृतिः ॥

देवकार्यंततःकृत्वा गुरुमङ्गलवीक्षणम् ।
देवकार्यस्यसर्वस्य पूर्वाह्नस्तुविधीयते ॥३१॥
देवकार्याणिपूर्वाह्ने मनुष्याणांतुमध्यमे ।
पितॄणामपराह्णेतु कार्याण्येतानियततः ॥३२॥
पौर्वाह्निकंतुयत्कर्म तद्यदासायमाचरेत् ।
नतस्यफलमाप्नोति बन्ध्यास्त्रीमैथुनंयथा ॥३३॥
दिवसस्याद्यभागेतु सर्वमेतद्विधीयते ।
द्वितीयेचैवभागेतु वेदाभ्यासोविधीयते ॥३४॥
वेदाभ्यासोहिविप्राणां परमंतपउच्यते ।
ब्रह्मयज्ञःसविज्ञेयः षडङ्गसहितस्तुयः ॥३५॥
वेदस्वीकरणंपूर्वं विचारोऽभ्यसनंजपः ।
प्रदानंचैवशिष्येभ्यो वेदाभ्यासोहिपञ्चधा ॥३६॥
समित्पुष्पकुशादीनां सकालःपरिकीर्त्तितः ।
तृतीयेचैवभागेतु पोष्यवर्गान्नसाधनम् ॥३७॥


फिरदेव कार्य करके गुरु और मंगल वस्तु (गौआदि) का दर्शन करे, सब देव कार्य मध्यान्ह से पूर्व ही समय में करना कहा है ॥३१॥ देव कार्य पूर्वाह्न में, मनुष्यों के अतिथि यज्ञादि कार्य मध्य दिन में, पितरों के कार्य मध्यान्ह के पीछे तीसरे पहर में यत्न से करे ॥३२॥ पूर्वाह्न में कर्तव्य कर्म को सायंकाल में जो मनुष्य आलस्यादि से करे, वह उस के फल को इस प्रकार प्राप्त नहीं होता कि जैसे बंध्या स्त्री मैथुन से गर्भ धारण फल को नहीं पाती ॥ ३३ ॥ दिन के पहिले भाग में यह पूर्वोक्त सब कर्त्तव्य कहा और दिन के दूसरेभाग में नियम से वेद का अभ्यास करे ॥ ३४ ॥ नियम से वेद का अभ्यास करना ब्राह्मणों का परम तप कहा है, यदि वेद के छः अंगों ( व्याकरण आदि ) सहित वह वेदाभ्यास किया जाय, तो वही ब्रह्मयज्ञ जानो ॥ ३५ ॥ वेद का अभ्यास पांच प्रकार का है । १-वेद का स्वीकार (गुरुमुख से वेद पढ़ना) २-वेदार्थ का विचार, ३-वेद को बार २ घोषण करना रूप अभ्यास, ४-जप और ५-शिष्यों को पढ़ाना ॥ ३६ ॥ ढांककी समिधा, फूल, कुशा, इन को जहां तहां से लाकर संग्रह भी दिन के द्वितीय भाग में करे । पोष्यवर्ग (पालन के योग्य माता आदि ) के लिये अन्न का प्रबन्ध दिन के तीसरे भाग में करें ॥ ३७ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ९

मातापितागुरुर्भार्या प्रजादीनःसमाश्रितः ।
अभ्यागतोऽतिथिश्वाग्निः पोष्यवर्गउदाहृतः ॥३८॥
ज्ञातिर्बन्धुजनःक्षीणस्तथाऽनाथःसमाश्रितः ।
अन्योऽपिधनयुक्तस्य पोष्यवर्गउदाहृतः ॥३९॥
सार्वभौतिकमन्नाद्यं कर्तव्यंगृहमेधिना ।
ज्ञानविद्भ्यःप्रदातव्यमन्यथानरकंव्रजेत् ॥४०॥
भरणंपोष्यवर्गस्य प्रशस्तंस्वर्गसाधनम् ।
नरकःपीडनेचास्य तस्माद्यत्नेनतंभरेत् ॥४१॥
सजीवतीयएवैको बहुभिश्चोपजीव्यते ।
जीवन्तोऽपिमृतास्त्वन्ये पुरुषाःसोदरम्भराः ॥४२॥*
बह्वर्थंजीव्यतेकिश्चित्कुटुम्बार्थंतथाऽपरैः ।
आत्माऽर्थेन्योनशक्नोति स्वोदरेणापिदुःखितः ॥४३॥
दीनानाथविशिष्टेभ्यो दातव्यंभूतिमिच्छता ।


माता, पिता, गुरु, स्त्री, संतान, दीन, अनाथ, समाश्रित (दास) अभ्यागत, अतिथि और अग्नि यह सब पोष्य वर्ग कहाता है ॥ ३८ ॥ अपने कुल के वा सम्बन्धियों में जो धन हीन दरिद्र वा क्षीण (असमर्थ) अनाथ और समाश्रित शरणागत, ये अन्य भी धनी पुरुष के लिये पोष्य वर्ग कहा है। अर्थात् ३८ श्लोक का पोष्य वर्ग सर्वसाधारण गृहस्यों के लिये है और धनी के लिये ३८। ३९। दोनों में कहा पोष्य वर्ग जानो ॥ ३९ ॥ गृहस्थ को चाहिये कि सब प्राणियों की तृप्ति के लिये भक्ष्य अन्न आदि विशेष कर बनावे और ज्ञानियों को देवे, अन्यथा जो करै वह नरक में जाता है ॥४०॥ पोष्य वर्गका पालन करना स्वर्ग का उत्तम साधन है और पोष्य वर्ग को दुःख पहुंचाने से नरक होता है, इस से पोष्य वर्ग का बड़े यत्न से पालन करै ॥ ४१ ॥ जिस एक पुरुष के सहारे से बहुतों का जीवन हो, वह एक जानो वास्तव में जीवित है और अन्य अपना ही पेट भरने वाले पुरुष जीते हुए भी मृतक (मुर्दा ही) हैं ॥ ४२ ॥ कोई लोग बहुतों के लिये जीविका करते तथा कोई कुटुम्ब के पालनार्थ करते हैं और कोई अपने पेट को हीं भरने में दुःखी रहते, अपने निर्वाह के लिये भी समर्थ नहीं होते ॥४३॥ यदि अपनी वृद्धि चाहे, तो दीन

१० दक्षस्मृतिः ॥

अदत्तदानाजायन्ते परभाग्योपजीविनः ॥४४॥ यदद्दासि विशिष्टेभ्यो यज्जुहोषि दिनेदिने । यत्तद्वित्तमहंमन्ये शेषंकस्यापिरक्षसि ॥४५॥ चतुर्थेऽह्नस्तथाभागे स्नानार्थंमृदमाहरेत् । तिलपुष्पकुशादीनि स्नायाच्चाकृत्रिमेजले ॥४६॥ मृत्तिकाःसप्तनग्राह्या वल्मीकान्मूषकस्थलात् । अन्तर्जलाच्चमार्गान्ताद् वृक्षमूलात्सुरलयात् ॥४७॥ परशौचावशिष्टाच श्रेयस्कामैः सदाबुधैः । शुचिदेशात्तुसंग्राह्या मृत्तिकास्नानहेतवे ॥४८॥ अश्वक्रान्तेरथक्रान्ते विष्णुकान्तेवसुन्धरे ! । मृत्तिके ! हरमेपापं यन्मयापूर्वसञ्चितम् ॥४९॥ उद्धृतासिवराहेण कृष्णेनशतबाहुना ।

अनाथार्थ, और सज्जन विद्वानों को देवे क्योंकि जिन्हों ने दान नहीं दिया वे पराये भाग्य से जीने वाले पराधीनता के लिये ही पैदा होते हैं ॥ ४४ ॥ जो सज्जनों, विद्वानों, धर्मात्माओं को देता है और जो प्रतिदिन होम करता है उसी को हम तेरा धन मानते हैं, शेष धन तो किसी अन्य का है, जिस की तू रक्षा करता है ॥ ४५ ॥ दिन के चौथे भाग में स्नान के लिये मट्टी लावे तथा तिल, फूल, कुश आदि लावे और ऐसे जल में स्नान करै जो कृत्रिम (बनाये कूप आदि का ) न हो किन्तु स्वयं बहती नदी आदि में स्नान करे ॥ ४६ ॥ कीड़ों के बिलों से, मूषों के घरों से, जल के भीतर से, मार्ग के बीच से, वृक्ष की जड़ से, देव मन्दिर से, और अन्य के हाथ मांजने से बची इन सात स्थानों से अपना कल्याण चाहने वाले विचार शील पुरुष स्नानादि के लिये सदा ही मट्टी न लेवें । किन्तु स्नान के लिये किसी शुद्ध स्थान से मट्टी लेनी चाहिये ॥ ४७ । ४८ ॥ घोड़ा वा रथ जिस पर चलते, विष्णु भगवान् ने अवतार ले २ कर जिसपर आक्रमण-पराक्रम किये दिखाये ऐसी हे पृथिवी ! हे मृत्तिके ! मेरे जो पूर्व संचित पाप हैं, उन को दूर करो ॥४९॥ हे मृत्तिके ! कृष्ण वाराह अवतार धारी शत बाहू भगवान् ने तुम्हारा उद्धार किया है । हे मृत्तिके ! मैं प्रजा और धन के निमित्त तुम को ग्रहण करता हूं । इस

भाषासंहिता ॥ ११

मृत्तिकेप्रतिगृह्णामि प्रजयाचधनेनच ॥५०॥ नित्यंनैमित्तिकंकाम्यं त्रिविधंस्नानमुच्यते । तेषांमध्येतयन्नित्यं तत्पुनर्भिद्यतेत्रिधा ॥५१॥ मलापकर्षणंपूर्वं मन्त्रवत्तुजलेस्मृतम् । सन्ध्ययोरुभयोःस्नानं स्नानभेदाःप्रकीर्तिताः॥५२॥ मार्जनंजलमध्येतु प्राणायामोयतस्ततः । उपस्थानंततःपश्चाद् गायत्रीजपउच्यते ॥ ५३ ॥ सवितादेवतायस्या मुखमग्निरुदाहृतः । विश्वामित्रऋषिश्चन्दो गायत्रीसाविशिष्यते ॥ ५४ ॥ अङ्गारकदिनेप्राप्ते कृष्णपक्षेचतुर्दशी । यमुनायांविशेषेण नियतोनियताशनः ॥ ५५ ॥ यमायधर्मराजाय मृत्यवेचान्तकायच । वैंवस्वतायकालाय सर्वभूतक्षयायच ॥ ५६ ॥ औदुम्बरायदध्नाय नीलायपरमेष्ठिने ॥ वृकोदरायचित्राय चित्रगुप्तायवापुनः ॥ ५७ ॥ एकैकस्यतिलैर्मिश्रान् दद्यात्रीनष्टवाञ्जलीन् ।


प्रकार इन दो मन्त्रों को पढ़ के स्नान के लिये हाथ में मृत्तिका लेवे ॥५०॥ नित्य, नैमित्तिक, काम्य, तीन प्रकार का स्नान कहा है । इन तीनों में जो नित्य स्नान है, वहभी तीन प्रकार का होता है ॥ ५१ ॥ मलापकर्षाद्येस्नान, मंत्रों सहित जलाशय में स्नान, और दोनों संध्याओं के समय शुद्ध्यर्थ स्ना- न करना, ये तीनभेद नित्य स्नानके कहे हैं ॥५२॥ जलके बीच मार्जन, फिर जल में, अथवा बाहर प्राणायाम करे. फिर सूर्यनारायण का उपस्थान करके पश्चात् गायत्री का जप करना कहा है ॥ ५३ ॥ सविता, जिस का देवता, अग्नि जिस का मुख, विश्वामित्र, जिस के ऋषि, जो त्रिपाद् गायत्री छंद है, वह (तत्सवि- तुर्व०) गायत्री सर्वोत्तम है ॥ ५४ ॥ जब कभी कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को मंग- लवार आजाय, उसी दिन थोड़ा नियत भोजन करने वाला सावधान जिते- न्द्रिय हुआ पुरुष अपसव्य हो कर विशेष कर यमुना नदी पर जाके (ओंय-