भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषाथंसहिता ॥ १३

तृतीयेतुशिखावर्जं चतुर्थेतुशिखावपः ॥ ८२ ॥ चाण्डालोदकसंस्पर्शे स्नानंनयेनविधीयते । तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टः प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ ८३ ॥ चाण्डालस्पृष्टभाण्डस्थं यत्तोयं पिबतिद्विजः । तत्क्षणात्क्षिप्तयेत्तु प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥ ८४ ॥ यदि नोत्क्षिप्यतेतोयं शरीरेतस्यजीर्य्यति । प्राजापत्यंनदातव्यं कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ॥ ८५ ॥ चरेत्सान्तपनंविप्रः प्राजापत्यंतुक्षत्रियः । तदर्धंतुचरेद्वैश्यः पादंशूद्रेतुदापयेत् ॥ ८६ ॥ रजस्वलायदास्पृष्टा शुनासूकरवायसैः । उपोष्यूरजनीमेकां पञ्चगव्येनशुध्यति ॥ ८७ ॥ आजानुतःस्नानमात्रमानाभेस्तुविशेषतः । अतऊर्ध्वं त्रिरात्रंस्यान्मदिरास्पर्शनेमतम् ॥ ८८ ॥ बालश्चैवदशाहेतु पञ्चत्वंय दिगच्छति । सद्यएवविशुध्येत नाशौचंनोदकक्रिया ॥ ८९ ॥ शावसूतकउत्पन्ने सूतकंतुयदाभवेत् ।


कृच्छ्र) में शिखा सहित सब बालों का मुंडन कराना चाहिये ॥८२॥ चांडाल के जल को छूने से ब्राह्मण स्नान करे और उच्छिष्ट चाण्डाल यदि ब्राह्मण को छूले तो प्राजापत्य व्रत करै ॥८३॥ चांडाल ने स्पर्श किये पात्र का जल जो ब्राह्मण पीले यदि उस को उसी क्षण में वमन करदे तो प्राजापत्य व्रत करै ॥८४॥ और यदि वमन न करै किन्तु वह जल उस के शरीर में ही पचजाय तो सांतपन कृच्छ्र करै प्राजापत्य नहीं ॥ ८५ ॥ इसी उक्त दोष पर ब्राह्मण सांतपन कृच्छ्र क्षत्रिय प्राजापत्य, वैश्य आधा प्राजापत्य और शूद्र चौथाई प्राजापत्य व्रत करै ॥८६॥ जिस समय रजस्वला स्त्री को कुत्ता, सूकर, काक, ये छू लें तो एक रात भर उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होती है ॥८७॥ यदि घोंटू तक मदिरा छू जाय तो स्नान मात्र शुद्धि करे, यदि किसी ब्राह्मण के शरीर में पगों से नाभि तक छुआय तो विशेष कर स्नान से ही शुद्धि है और नाभि से ऊपर के अंग में छुआये तो तीन दिन रात उपवास करे ॥ ८८ ॥ यदि उत्पन्न हो कर दश दिन के भीतर बालक मर जाय तो उसी समय स्नान वस्त्रादि की शुद्धि कर ले उस का सूतक नहीं लगता और जलदान ( तिलाञ्जलि ) भी न करे ॥ ८९ ॥ यदि