अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 536, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ लिखितस्मृतिः ॥
शावेनशुध्यतेसूतिर्नसूतिःशावशोधिनी ॥ ९० ॥
षष्ठेनशुद्ध्येतैकाहं पञ्चमेद्व्यहमेवतु ।
चतुर्थेसप्तरात्रंस्यात् त्रिपुरुषंदशमेऽहनि ॥ ९१ ॥
मरणारब्धमाशौचं संयोगोयस्यनाग्निभिः ।
आदाहात्तस्यविज्ञेयं यस्यवैतानिकोविधिः ॥ ९२ ॥
आमंमांसंघृतंक्षौद्रं स्नेहाश्चफलसंभवाः ।
अन्त्यभाण्डस्थिताह्येते निष्क्रान्ताःशुचयःस्मृताः ॥९३॥
मार्जनौरजसासक्तं स्नानवस्त्रघटोदकम् ।
नवाम्भसितथाचैव हन्तिपुण्यंदिवाकृतम् ॥ ९४ ॥
दिवाकपित्थच्छायायां रात्रौदधिशमीषुच ।
धात्रीफलेषुसर्व्वत्र अलक्ष्मीर्वसतेसदा ॥ ९५ ॥
यत्रयत्रचसंकीर्णमात्मानंमन्यतेद्विजः ।
तत्रतत्रतिलैर्होमं गायत्र्यष्टशतंजपेत् ॥ ९६ ॥
इतिश्रीमहर्षिलिखितप्रोक्तं धर्मशास्त्रं समाप्तम् ॥
मरण सूतक में जन्म सूतक हो जाय तो मरण सूतक के शेष दिनों में ही जन्म सूतक की शुद्धि होजाती है और जन्म सूतक के दिनों से मरण सूतक निवृत्त नहीं होता अर्थात् जन्म सूतक छोटा और मरण सूतक बड़ा है ॥ ९० ॥
छठी पीढ़ी वालों को एक दिन का, पांचवीं में दो दिन का, चौथी में सात दिन का और तीसरी में दश दिन का सूतक लगता है ॥९१॥ जो अग्निहोत्री न हो उसे मरण के समय से और जो वेदोक्त अग्निहोत्र करता है उस को दाह के समय से सूतक लगता है ॥९२॥ कच्चा मांस, घृत, शहद, फलों से निकले तैल, अन्य किसी नीच के पात्र में रक्खे हुए ये सब पात्र से निकाल लेने पर शुद्ध हैं ॥९३॥
स्नान का शुद्ध वस्त्र, घड़े का जल, और नया जल, इन में यदि मार्जनी (बुहारी) की धूल लग जाय तो उस दिनमें किये पुण्य को नष्ट करता है ॥९४॥
दिन में कैथ की छाया में रात्रि में दही, तथा छोंकर में, आंवले के फल में, दिन रात दोनों समय अलक्ष्मी (दरिद्रता) बसती है ॥९५॥ जिस २ निकृष्ट कर्म के करने में ब्राह्मण अपने को लज्जा, शंका, संकोच, हुआ माने वहां २ तिलों से होम करे और आठ सौ गायत्री जपै ॥ ९६ ॥
यह महर्षिलिखितके कहे धर्मशास्त्र का पं० भीमसेनशर्मकृत भाषानुबाद पूराहुआ ॥