अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 537, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ दक्षस्मृतिप्रारंभः ॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः सर्ववेदविदांवरः ।
पारगःसर्वविद्यानां दक्षो नामप्रजापतिः ॥ १ ॥
उत्पत्तिःप्रलयश्चैव स्थितिःसंहारएवच ।
आत्माचात्मनितिष्ठेत आत्माब्रह्मण्यवस्थितः ॥ २ ॥
ब्रह्मचारीगृहस्थश्च वानप्रस्थोयतिस्तथा ।
एतेषांतुहितार्थाय धर्मशास्त्रमकल्पयत् ॥ ३ ॥
जातमात्रःशिशुस्तावद्यावदष्टौसमावयः ।
सहिगर्भसमोज्ञेयो व्यक्तिमात्रप्रदर्शितः ॥ ४ ॥
भक्ष्याभक्ष्येत्तथापेये वाच्यावाच्येतथाऽनृते ।
अस्मिन्बालेनदोषःस्यात्सयावन्नोपनीयते ॥ ५ ॥
उपनीतेतुदोषोऽस्ति क्रियमाणैर्विगर्हितैः ।
श्रीः शुभम् । संपूर्ण शास्त्रों को यथार्थ जानने वाले, सब वेद वेत्ताओं में श्रेष्ठ और सब विद्याओं के पार पहुंचे हुए दक्ष नामक प्रजापति हुए हैं ॥१॥
उत्पत्ति, प्रलय ( मरना ) स्थिति, संहार ( पांच महाभूतों का प्रलय ) इनके करने में समर्थ जिन दक्ष के आत्मा (देह) में साक्षात् परमात्मा ठहरे थे और जिनका आत्मा धर्म में स्थित था ॥२॥ उन दक्ष प्रजापति जी ने, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी, इन चारों आश्रमों के हितार्थ धर्मशास्त्र को रचा है ॥३॥
जब तक आठ वर्ष की अवस्था हो तब तक बालक पैदा हुये के समान है क्योंकि उसे गर्भ तुल्य ही जाने उस का एक आकार मात्र ही दीखता है ॥४॥ भक्ष्य अभक्ष्य, पीने न पीने योग्य, कहने न कहने योग्य, सत्य और झूठ में इस बालक को जनेऊ होने से पहिले दोष नहीं लगता है ॥५॥ जनेऊ हुए पीछे जो निन्दित काम करे तो उस को दोष लगते हैं । और सोलह वर्ष की