भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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२ दक्षस्मृतिः ॥

अप्राप्तव्यवहारोऽसौ बालःषोडशवार्षिकः ॥ ६ ॥ स्वीकरोतियदावेदं चरेद्वेदव्रतानिच । ब्रह्मचारीभवेत्तावदूर्ध्वंस्नातोभवेद्गृही ॥ ७ ॥ द्विविधोब्रह्मचारीस्यादाद्योह्युपकुर्वाणकः । द्वितीयोनैष्ठिकश्चैव तस्मिन्नेवव्रतेस्थितः ॥ ८ ॥ त्रयाणामानुलोम्येन प्रातिलोम्येनवापुनः । प्रतिलोमंव्रतंतस्य सभवेत्पापकृत्तमः ॥ ६ ॥ योगृहाश्रममास्थाय ब्रह्मचारीभवेत्पुनः । नयतिर्नवनस्थश्च ससर्वाश्रमवर्जितः ॥ १० ॥ अनाश्रमीनतिष्ठेत क्षणमेकमपिद्विजः । आश्रमेणविनातिष्ठन् प्रायश्चित्तीयतेहिसः ॥ ११ ॥ जपेहोमेतथादाने स्वाध्यायेचरतःसदा । नासौफलमवाप्नोति कुर्वाणोप्याऽऽश्रमाच्च्युतः ॥१२॥ मेखलाजिनदण्डैश्च ब्रह्मचारीतिलक्ष्यते


आयु तक यह बालक संसारी व्यवहारों के लायक नहीं होता ॥ ६ ॥ जब यह बालक वेद का प्रारंभ करै तब वेदोक्त ब्रह्मचर्याश्रम के नियम व्रतों को भी करै और ब्रह्मचारी रहे फिर समावर्त्तन स्नान करके गृहस्थ बने ॥ ७ ॥ दो प्रकार का ब्रह्मचारी होता है एक उपकुर्वाणक, दूसरा नैष्ठिक जो जन्म भर ब्रह्मचारी ही रहे जप तप वेदाध्ययनादि करता रहे ॥ ८ ॥ ब्रह्मचारी से गृहस्थ वानप्रस्थ संन्यास ऐसे क्रम से तीनों आश्रमों में प्रवेश करना उत्तम है । यदि कोई गृहस्थ से ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थ होकर गृहस्थ बने तो वह बड़ा पापी है ॥९॥ जो गृहस्थ होकर फिर ब्रह्मचारी बने और संन्यासी अथवा वानप्रस्थ न बने वह सब आश्रमों से रहित है ॥ १० ॥ ब्राह्मणादि द्विज एक क्षण भर भी आश्रम से हीन न रहे क्योंकि आश्रम के बिना रहता हुआ द्विज प्रायश्चित्तके योग्य हो जाता है ॥११॥ आश्रम के बिना जप, होम, दान, और वेद के पाठ में तत्पर ब्राह्मणादि द्विज कर्म को करता हुआ भी फल को प्राप्त नहीं होता ॥ १२ ॥ मेखला मृगचर्म, दंड, इन चिन्हों से ब्रह्मचारी, बांस की छड़ी और