भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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पृष्ठ 539

'भाषार्थसहिता ॥

गृहस्थोयष्टिवेदायैर्नखलोमैर्वनाश्रमी ॥ १३ ॥ त्रिदण्डेनयतिश्चैवं लक्षणानिपृथक्पृथक् । यस्यैतल्लक्षणंनास्ति प्रायश्चित्तीनचाऽऽश्रमी ॥१४॥ उक्तंकर्मक्रमेणैव यःकालऋषिभिः स्मृतः । द्विजानांचहितार्थाय दक्षस्तुस्वयमब्रवीत् ॥ १५ ॥ इति दाक्षे धर्म्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ प्रातरुत्थायकत्र्तव्यं यद्विजेनदिनेदिने । तत्सर्वंसंप्रवक्ष्यामि द्विजानामुपकारकम् ॥ १ ॥ उदयास्तमितंयावन्नविप्रःक्षणिकोभवेत् । नित्यनैमित्तिकैयुक्तः काम्यैश्चान्यैरगर्हितैः ॥ २ ॥ संध्याद्यंवैश्वदेवान्तं स्वकंकर्मसमाचरेत् । स्वकंकर्मपरित्यज्य यदन्यत्कुरुतेद्विजः । अज्ञानादथवालोभात् सतेनपतितोभवेत् ॥ ३ ॥ दिवसस्याद्यभागेतु कृत्यंतस्योपदिश्यते ।


वेद पुस्तकादि के धारण करने से गृहस्थ नख तथा केश लोमों के धारण से वानप्रस्थ जाना जाता है ॥१३॥ और त्रिदण्ड के धारण से संन्यासी ये चारों आश्रमों के पृथक् २ लक्षण हैं। जिस के शरीर के साथ ये लक्षण नहीं हैं वह प्रायश्चित्त के योग्य है ॥ १४ ॥ ऋषियों ने कर्मों के क्रम से जो २ समय जिस २ काम के लिये कहा है ब्राह्मणादि द्विजों के हित के अर्थ दक्ष प्रजापति स्वयं उस क्रम को कहते हैं ॥ १५ ॥

यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में प्रथम अध्याय पूरा हुआ ॥

प्रातःकाल से उठकर जो २ धर्म युक्त काम द्विजों को प्रतिदिन करने चाहिये उन द्विजों के उपकारी सब कामों को हम कहते हैं ॥ १ ॥ सूर्य के उदय से लेकर अस्त होने पर्यन्त ब्राह्मण एक क्षण भर भी व्यर्थ न गमावे किंतु नित्य ( संध्या आदि ) नैमित्तिक ( जात कर्मादि ) काम्य कर्म ( यज्ञादि ) सत् शास्त्राभ्यासादि इन में युक्त ( लगा ) रहे ॥२॥ संध्योपासन से लेके वैश्वदेव पर्यन्त जो अपना नित्य कर्म है उसे करै, क्योंकि अपने कर्मको छोड़ कर जो ब्राह्मण अज्ञान से अथवा लोभ से अन्य वर्ण का कर्म करता है वह उस कर्म के करने से पतित हो जाता है ॥ ३ ॥ उस ब्राह्मण को दिन के