अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें४ दक्षस्मृतिः ॥
द्वितीयेचतृतीयेच चतुर्थेपञ्चमेतथा ॥ ४ ॥
षष्ठेचसप्तमेचैव त्वष्टमेचपृथक्पृथक् ।
विभागेष्वेषुयत्कर्म तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ ५ ॥
उषःकालेचसम्प्राप्ते शौचंकृत्वायथार्थवत् ।
ततःस्नानंप्रकुर्वीत दन्तधावनपूर्वकम् ॥ ६ ॥
अत्यन्तमलिनःकायो नवछिद्रसमन्वितः ।
स्रवत्येवदिवारात्रौ प्रातःस्नानंविशोधनम् ॥ ७ ॥
क्लिद्यन्तिहिप्रसुप्तस्य चेन्द्रियाणिस्रवन्तिच ।
अङ्गानिसमतांयान्ति उत्तमान्यधमानिच ॥ ८ ॥
नानास्वेदसमाकीर्णः शयनादुत्थितःपुमान् ।
अस्नात्वा नाचरेत्किञ्चिज्जपहोमादिकंद्विजः ॥ ९ ॥
प्रातरुत्थाययोविप्रः सन्ध्यास्नायीभवेत्सदा ।
सप्तजन्मकृतंपापं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥ १० ॥
उषस्युपासित्स्नानं सन्ध्यायामुदितेरवौ ।
प्रथम, दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें और आठवें, इन भागों में पृथक् २ जो २ कर्म धर्म शास्त्रों के अनुसार उपदेश किये गये हैं उन सब को क्रम से हम कहेंगे ॥ ४ ॥ ५ ॥ प्रातः सूर्योदय से चार घड़ी पहिले जाग कर शास्त्र में कहे अनुसार मल मूत्र त्यागादि रूप यथावत् शौच करके दंत धावन पूर्वक स्नान करे ॥ ६ ॥ यह देह मलिनता निकलने के नौ दरवाजों से युक्त होने के कारण अत्यन्त मलिन है, रात दिन शरीर से मलिनता निकलती है, प्रातःकाल का स्नान इस का शोधन करने वाला है ॥ ७ ॥ सोते हुये मनुष्य के इन्द्रिय मलिनता से गीले हो जाते और लार आदि टपक ने लगती है । उत्तम, अधम, सब अंग शिथिल होजाते हैं ॥ ८ ॥ सोकर उठा मनुष्य अनेक प्रकार के पसीनादि से युक्त हो जाता है । इस लिये स्नान किये बिना ब्राह्मण किंचित भी जप होमादि कर्म न करे ॥ ९ ॥ जो ब्राह्मण प्रातःकाल ही उठकर नित्यनियम से सन्ध्या स्नान निरन्तर किया करे वह सात जन्म तक में किये पाप को तीन वर्षों में नष्ट कर देता है ॥ १० ॥ प्रतिदिन प्रातःकाल बादल पीले होते ही और सायंकाल में सूर्य के अस्त होने