अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 534, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ | लिखितस्मृतिः ॥
तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टः प्राजापत्यंसमाचरेत् ॥७५॥
ब्रह्महाचसुरापेयी स्तेयीचगुरुतल्पगः ।
महान्तिपातकान्याहुस्तत्संसर्गीचपञ्चमः ॥७६॥
स्नेहाद्वायदिवालोभाद् भयादज्ञानतोऽपिवा ।
कुर्वन्त्यनुग्रहंयेच तत्पापन्तेषुगच्छति ॥७७॥
उच्छिष्टोच्छिष्टसंस्पृष्टो ब्राह्मणस्तुकदाचन ।
तत्क्षणात्कुरुतेस्नानमाचामेनशुचिर्भवेत् ॥७८॥
कुब्जवामनषण्ढेषु गद्गदेषुजडेषुच ।
जात्यन्धेबधिरेमूके नदोषःपरिवेदने ॥७९॥
क्लीवेदेशान्तरस्थेच पतितेव्रजितेपिवा ।
योगशास्त्राभियुक्तेच नदोषःपरिवेदने ॥८०॥
पूरणेकूपवापीनां वृक्षच्छेदनपातने ।
विक्रीणीतगजंचाश्वं गोवधंतस्यनिर्दिशेत् ॥८१॥
पादेऽङ्गरोमवपनं द्विपादेश्मश्रुकेवलम् ।
हो तो प्राजापत्य व्रत करे ॥ ७५ ॥ ब्रह्महत्यारा, बार २ समझ पूर्वक मदिरा पीने वाला, सुवर्ण का चोर, गुरु पत्नी से संयोग करने वाला और पांचवां इन का संसर्गी मेली ये पांच महापातकी कहाते हैं ॥ ७६ ॥ प्रीति से, लोभ से, भय से, अथवा अज्ञान से, जो अपराधी पर कृपा करते हैं अर्थात् पाप का प्रायश्चित्त नहीं कराते वह अपराधी का पाप उन प्रायश्चित्त न कराने वालों को लगता है ॥ ७७ ॥ यदि कभी उच्छिष्ट ब्राह्मण को अन्य उच्छिष्ट मनुष्य छूलेवे तो उसी क्षण स्नान कर आचमन करने से शुद्ध होता है ॥७८॥ कुबड़ा, बिलंदिया, नपुंसक, तोतला, महामूर्ख, जन्मांध, बहरा, गूंगा, इन के परिवेदन में अर्थात् बड़ा भाई कुब्जादि हो तो छोटे भाई का उस से पहिले विवाह करलेने में कुछ दोष नहीं है । तथा यदि बड़ा भाई क्लीव (हिजड़ा) हो, देशांतर में रहता हो, पतितहो, संन्यासी हो गया हो, और योगाभ्यास में लगा हो तो भी परिवेदन में दोष नहीं है ॥ ७९ । ८० ॥ बावड़ी और कूपों को बन्द करना, काटकर वृक्षों को गिराना, हाथी और घोड़े को बेचना इन कामों को जो करे वह गो हत्या का प्रायश्चित्त करे ॥ ८१ ॥
पाद (चौथाई) कृच्छ्र में सब अंग के रोमों का मुंडन, द्विपाद आधे कृच्छ्र में डाढी मूछों का, त्रिपाद (पौन) कृच्छ्र में शिखा को छोड़कर सब केशों का और चौथे (संपूर्ण