अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
१२ दक्षस्मृतिः ॥
यावज्जीवकृतंपापं तत्क्षणादेवनश्यति ॥ ५८ ॥ पञ्चमेतुतथाभागे संविभागोयथार्थतः । पितृदेवमनुष्याणां कीटानांचोपदिश्यते ॥ ५९ ॥ देवैश्चैवमनुष्यैश्च तिर्यग्भिश्चोपजीव्यते । गृहस्थःप्रत्यहंयस्मात्तस्माच्छ्रेष्ठाश्रमो गृही ॥ ६० ॥ त्रयाणामाश्रमाणांतु गृहस्थोयोनिरुच्यते । सीदमानेनतेनैव सीदन्तीहेतरेत्रयः ॥ ६१ ॥ मूलत्राणेभवेत्स्कन्धः स्कन्धाच्छाखेतिपल्लवाः । मूलेनैवविनष्टेन सर्वमेतद्विनश्यति ॥ ६२ ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षणीयोगृहाश्रमी । राज्ञाचान्यैस्त्रिभिःपूज्यो माननीयश्चसर्वदा ॥ ६३ ॥ गृहस्थोऽपिक्रियायुक्तो गृहेणनगृहीभवेत् ।
माय नमः । धर्मराजायनमः) इत्यादि मन्त्रों द्वारा चौदह यमों को प्रत्येक को तिलांमश्र जलकी तीन २ वा आठ २ अञ्जलि देवे, तो जन्मभर में किया सब पाप क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है ॥५५ । ५६ । ५७ । ५८ ॥ दिनके पांचवें भाग में यथा योग्य पितर, देव, मनुष्य, और कीड़े इनको महायज्ञ सम्बन्धी कर्म-द्वारा संविभाग (देना) कहा है ॥ ५९ ॥ देवता, मनुष्य, तिर्यग्योनि, ये सब जिस कारण आच्छादादि गृहस्थ से ही जीते हैं, तिस से गृहस्थ श्रेष्ठ हैं ॥६०॥ तीनों आश्रमों का योनि (कारण) गृहस्थ कहा है । (गृहस्थ से ही उत्पन्न हो २ कर ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी, होते हैं इससे गृहस्थ सब आश्रमों का मूल कारण है) उस के जगत् में दुःखी रहने से अन्य तीनों आश्रम दुःखी हो जाते हैं ॥ ६१ ॥ जड़ की रक्षा करने से स्कन्ध (गुद्दे) और गुद्दोंसे डाली और डालियों से पत्ते हो जाते हैं और मूल (जड़) का नाश होनेसे ये सब नष्ट हो जाते हैं ॥ ६२ ॥ तिस से सम्पूर्ण यत्नसे गृहस्थ आश्रम की रक्षा, पूजा आदर (सत्कार) और मान प्रतिष्ठा राजा और तीनों आश्रमी सदा करें ॥६३॥ गृहस्थ भी क्रिया (अपने श्रुतिस्मृति प्रतिपादित धर्म कर्म) में तत्पर रहे । घर में रहने से गृहस्थ नहीं होता, अपने कर्म से हीन गृहस्थ पुत्र और स्त्री
भाषाभाष्यसहिता ॥ १३
नचैवपुत्रदारेण स्वकर्मपरिवर्जितः ॥ ६४ ॥
अस्नात्वाचाप्यहुत्वाच तथाऽदत्त्वाचभुञ्जते ।
देवादीनामृणीभूत्वा नरकन्तेव्रजन्त्यधः ॥ ६५ ॥
अस्नात्वासमलंभुङ्क्ते त्वजापीपूयशोणितम् ।
अहुत्वाचकृमिंभुङ्क्ते ह्यदत्त्वाऽमेध्यमेवच ॥६६॥
वृथातप्तोदकस्नानं वृथाजाप्यमवैदिकम् ।
वृथारतमपुत्रस्य वृथाभुक्तमसाक्षिकम् ॥ ६७ ॥
एकोहिभक्षयत्यन्नमपरोऽन्नेनभक्ष्यते ।
नभुज्यतेसएवैकोयोऽन्नं भुङ्क्तेहुतांशकम् ॥६८॥
विभागशीलतायस्य क्षमायुक्तोदयालुतः ।
देवतातिथिभक्तश्च गृहस्थःसतुधार्मिकः ॥६९॥
दयालज्जाक्षमाश्रद्धा प्रज्ञात्यागःकृतज्ञता ।
गुणाद्यस्यभवन्त्येते गृहस्थोमुख्यएवसः ॥७०॥
संविभागंततःकृत्वा गृहस्थःशेषभुग्भवेत् ।
से गृहस्थ नहीं होता कि जो स्वकर्म से रहित है ॥ ६४ ॥ स्नान होम और दान किये विना जो गृहस्थ लोग भोजन करते हैं वे मनुष्य देवता आदि के ऋणी होकर अधोगति नरक में जाते हैं ॥ ६५ ॥ स्नान किये विना भोजन करने वाला, मल सहित खाता, जप किये विना खाने वाला पीव, रुधिर के तुल्य अन्न को खाता, होम किये विना खाने वाला कीड़ों को खाता, अतिथि को दिये विना अशुद्ध को खाता है ॥६६॥ गर्म किये जल से स्नान, वेदसे भिन्न स्तोत्र मन्त्रादि का जप, सन्तान हुए विना स्त्री से समागम, और देवतादि को दिये विना भोजन करना, ये सब काम व्यर्थ हैं॥६७॥ कोई मनुष्य तो अन्न को खाते हैं और किसी मनुष्यको अन्न ही खाता है। यदि अन्न किसी को नहीं खाता तो उस को ही नहीं खाता है जो देव आदिको देकर (वैश्वदेव करके) खाता है ॥ ६८ ॥ जिस का स्वभाव अन्यों का भाग देने का है, जो क्षमायुक्त है, दयालु है, और देवता तथा अतिथियों का भक्त है, वही गृहस्थ धार्मिक है ॥ ६९ ॥ दया, लज्जा, क्षमा, श्रद्धा, बुद्धिमत्ता, त्याग, कृतज्ञता (अन्य के किये उपकार को मानना) ये गुण जिस में हैं, वही गृहस्थ मुख्य है ॥ ७० ॥ फिर सब के लिये विभाग देकर गृहस्थ पुरुष शेष अन्न को
अष्टमेलोकयात्रांतु बहिःसंध्याततःपुनः ॥ ७२ ॥
१४ दक्षस्मृतिः ॥
भुक्त्वाऽथसुखमास्थाय तदन्नंपरिणामयेत् ॥७१॥ इतिहासपुराणाद्यैः षष्ठंवासप्तमंनयेत् । अष्टमेलोकयात्रांतु बहिःसंध्याततःपुनः ॥ ७२ ॥ होमंभोजनकृत्यंच यदन्यद्गृहकृत्यकम् । कृत्वाचैवंततःपश्चात् स्वाध्यायंकिंचिदाचरेत् ॥७३॥ प्रदोषपश्चिमौयामौ वेदाभ्यासेनतौनयेत् । यामद्वयंशयानस्तु ब्रह्मभूयायकल्पते ॥ ७४ ॥ नैमित्तिकानिकाम्यानि निपतन्तियथातथा । तथातथातुकार्याणि नकालं तुविलम्बयेत् ॥७५॥ अस्मिन्नेवप्रयुञ्जानो ह्यस्मिन्नेवप्रलीयते । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्वाध्यायंसर्वदाभ्यसेत् ॥ ७६ ॥ सर्वत्रमध्यमौयामौ हुतशेषंहविश्नयत् । भुञ्जानश्चशयानश्च ब्राह्मणोनावसीदति ॥ ७७ ॥ इति दाक्षे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
खाने वाला हो और भोजन करके सुख पूर्वक बैठकर उस अन्न को पचावे॥७१॥
दिन के छठें वा सांतवें भाग को इतिहास पुराणादि के विचारने पढ़ने में बितावे। दिन के आठवें भागमें घर के कामों का प्रबन्ध करे फिर ग्राम से बाहर शुद्धस्थान में जाकर सन्ध्या करै ॥७२॥ फिर सायंकाल का होम,भोजन का कार्य और जो कुछ अन्य घर का कार्य हो उसे करके पश्चात् स्वाध्याय (थोड़ा वेदाध्ययन ) करै ॥ ७३॥ रात्रि का पहिला और पिछला दो पहर वेदाभ्यास करने में बितावे और मध्यराति के दो पहर सोकर बितावे ऐसा करता हुआ द्विज ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥ नैमित्तिक काम्य कर्म जिस २ समय में आन पड़ें, उसी २ समय करने चाहिये क्योंकि उन के करने को विलम्ब न करे ॥७५॥ वेदाभ्यास में लगा हुआ पुरुष शब्द ब्रह्म में ही लीन होता है जिससे बड़े प्रबल यत्नों के साथ वेद का अभ्यास करे ॥ ७६ ॥ गृहस्थ ब्राह्मण सब जगहों में रात के बीच के दोपहरों में सोता और होम से बचे शेष अन्न का भोजन करता हुआ कभी भी दुःखी नहीं होता ॥७७॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥
भाषार्थसहिता ॥ १५
सुधानवगृहस्थस्य मध्यमानिनवैवच ।
नवकर्माणि तस्यैव विकर्माणिनवैवतु ॥ १ ॥
प्रच्छन्नानिनवान्यानि प्रकाश्यानिपुनर्नव ।
सफलानिनवान्यानि निष्फलानिनवैवतु ॥ २ ॥
अदेयानिनवान्यानि वस्तुजातानिसर्वदा ।
नवकान्वनिर्दिष्टा गृहस्थोन्नतिकारकाः ॥ ३ ॥
सुधावस्तूनिवक्ष्यामि विशिष्टेगृहमागते ।
मनश्चक्षुर्मुखंवाचं सौम्यंदत्त्वाचतुष्टयम् ॥ ४ ॥
अभ्युत्थानंततोगच्छेत् पृच्छालापःप्रियान्वितः ।
उपासनमनुव्रज्या कार्याण्येतानिनित्यशः ॥ ५ ॥
ईषद्दानानिचान्यानि भूमिरापस्तृणानिच ।
पादशौचंतथाभ्यङ्ग आसनंशयनंतथा ॥ ६ ॥
किंचिद्दद्याद्यथाशक्ति नास्यानश्नन्गृहेवसेत् ।
मृज्जलं चार्थिनेदेय मेतान्यपिसतांगृहे ॥ ७ ॥
गृहस्थ के नौ ९ सुधा, (अमृत) नौ ९ मध्यम, नौ ९ कर्तव्य कर्म और नौ ९ विकर्म (निन्दित) कर्म हैं ॥ १ ॥ नौ ९ प्रच्छन्न (छिपे) कर्म, नौ ९ प्रकाश के योग्य, नौ सफल और नौ निष्फल कर्म हैं ॥ २ ॥ और नौ ९ वस्तु सदैव न देने योग्य हैं, ये नौ नवक अर्थात् नौ २ संख्या वाले नौ काम कहे हैं, ये ही गृहस्थ की उन्नति करने वाले नौ काम हैं ॥ ३ ॥ नौ सुधा वस्तुओं को कहते हैं—यदि कोई प्रतिष्ठित विद्वान् वा सज्जन अपने घर आवे तब मन, नेत्र, मुख, वाणी, इन चारों को सौम्य कोमल श्रद्धा युक्त रक्खै ॥ ४ ॥ सज्जनों को आते देख कर उठ कर लावे, आने का प्रयोजन पूछे, प्यार से बोले, सेवा करे, अनुगमन (पीछे चलना) ये ९ काम प्रति दिन अभ्यागत के लिये करे ॥ ५ ॥ ये आगे कहे नौ मध्यम दान हैं भूमि, जल, तृण—(कुश का वा चटाई का आसन) पग धोना, तैल मलना, आसन, शय्या ॥ ६ ॥ आये हुए अतिथि को यथाशक्ति कुछ देना चाहिये, क्योंकि बिना भोजन किये गृहस्थ के घर में अतिथि न बसे, मांगने वाले को मही, वा जल जो वह चाहे देना ये नौ ९ ईषद्दान अच्छे घरों में सदा होते ही हैं ॥ ७ ॥
१६ दक्षस्मृतिः ॥
सन्ध्यास्नानंजपोहोमः स्वाध्यायोदेवतार्चनम् । वैश्वदेवंक्षमातिथ्य मुद्धृत्यापिचशक्तितः ॥ ८ ॥ नवकर्मणिकार्याणि पूर्वोक्तानिमनीषिभिः । कृत्वैवंनवकर्मणि सर्वकर्माभवेन्नरः ॥ ९ ॥ पितृदेवमनुष्याणां दीनानाथतपस्विनाम् । गुरुमातृपितॄणांच संविभागोयथार्थतः ॥ एतानिनवकमाणि विकर्माणितथापुनः ॥ १० ॥ अनृतंपरदाराश्च तथाऽभक्ष्यस्यभक्षणम् । अगम्यागमनापेय पानंस्तेयंचहिंसनम् ॥ ११ ॥ अश्रौतकमाचरणं मैत्रंधर्मबहिष्कृतम् । नवैतानिविकर्माणि तानिसर्वाणिवर्जयेत् ॥ १२ ॥ पैशुन्यमनृतंमाया कामःक्रोधस्तथाप्रियम् । द्वेषोदम्भःपरद्रोहः प्रच्छन्नानितथानव ॥ १३ ॥ गीतनृत्येकृषिःसेवा वाणिज्यंलवणक्रिया ।
सन्ध्या, स्नान, जप, होम, वेदपाठ, देवताओं का पूजन, वैश्वदेव, क्षमा, यथा- शक्ति अन्न निकाल के अतिथि का सत्कार,ये नौ शुभ कर्म हैं ॥ ८ ॥
तथा द्वितीय प्रकार से पितर, देवता, मनुष्य, दीन, अनाथ, तपस्वी, गुरु, माता, पिता इन सब को यथा योग्य भोजनांश देवे । ये पूर्वोक्त नौकर्म जि- तेन्द्रिय विद्वानों को कर्त्तव्य हैं इन नौ कर्मोंको करके पुरुष सब धर्म कर्म करने वाला माना जायगा ॥ ९ ॥ ये नौ ९ शुभ कर्म हैं, और आगे कहे नौ विकर्म नाम बुरे निन्दित कर्म हैं ॥ १० ॥ मिथ्याभाषण, परस्त्रीगमन, अभक्ष्य का भक्षण, अगम्या (वेश्या चाण्डाली आदि) स्त्री का गमन, न पीने योग्य म- द्यादि का पीना, चोरी, हिंसा, ॥ ११ ॥ वेद में जो न कहे हों, ऐसे कर्मों को करना, धर्म से विरुद्ध किसी के साथ मित्रता करना, ये नौ निन्दित कर्म हैं, इन सब को त्याग कर देवे ॥ १२ ॥ पैशुन्य (चुगली करना) मिथ्या भाषण, छल कपट, काम, क्रोध, अन्य का अप्रिय, द्वेष, दंभ, परद्रोह, ये नौ प्रच्छन्न (छिप कर होने वाले) निन्दित काम हैं ॥ १३ ॥ गाना, बजाना, खेती करना, दास कर्म, वणिज व्यापार, लवण बनाना, बेंचना, जुवा खेलना, हथियार बनाना,
भाषार्थसहिता ॥ १७
द्यूतकमार्युधान्यात्म-प्रशंसाचविकर्मच ॥ १४ ॥ आयुर्वित्तंगृहच्छिद्रं मन्त्रोमैथुनभेषजे । तपोदानापमानेच नवगोप्यानि सर्वदा ॥ १५ ॥ अयोग्यमृणशुद्धिश्च दानाध्ययनविक्रयाः । कन्यादानंवृषोत्सर्गो रहस्येतानिवर्जयेत् ॥ १६ ॥ मातापित्रोगुरौमित्रे विनीतेचोपकारिणि । दीनानाथविशिष्टेषु दत्तंचसफलंभवेत् ॥ १७ ॥ धूर्त्तवन्दिनिमल्लेच कुवैद्येकितवेशठे । चाटुचारणचोरेभ्यो दत्तंभवतिनिष्फलम् ॥ १८ ॥ सामान्यंयाचितंन्यास माधिर्दाराःसुहृद्धनम् । भयार्दितंचनिक्षेपः सर्वस्वंचान्वयेसति ॥ १९ ॥ आपत्स्वपिनदेयानि नववस्तूनिसर्वदा । योददातिसमूढंस्तु प्रायश्चित्तेन युज्यते ॥ २० ॥ नवनवकवेत्ताच मनुष्याऽधिपतिर्नृणाम् ।
और अपनी प्रशंसा करना यह भी नौ कर्मों का तीसरा उदाहरण जानो ॥ १४ ॥ अवस्था, धन, घर का छिद्र (कोई बुरीबात,) विष उतारने आदि के मन्त्र, मैथुन, भेषज (उत्तमौषध,) तप, दान, अपमान, ये नौ ९ बातें सदैव छिपाने योग्य हैं ॥ १५ ॥ अयोग्य, ऋण की शुद्धि, दान देना, वेद पढ़ना, किसी वस्तु को बेंचना, कन्या का दान, वृषोत्सर्ग, इन को एकांत में न करे ॥ १६ ॥ माता, पिता, गुरू, मित्र, नम्र, उपकारी, दीन, अनाथ, सज्जन धर्मात्मा विद्वान्, इन नौ को देना सफल है ॥ १७ ॥ धूर्त्त, बंदी (कैदी,) मल्ल, कुवैद्य, कपटी, शठ, चाटु (मिठ बोला ठग) चारण, चोर, इन नौ को देना निष्फल है ॥१८॥ सामान्य वस्तु, भिक्षा, न्यास (धरोहर) आधि मानस दुःख, स्त्री, मित्र का धन, भय से पीड़ित शरणागत मनुष्य, निक्षेप धरो हर, और वंश के होते अपना सर्वस्व धन ये नौ ९ वस्तु आपत्काल में भी सदैव किसी को न देनी चाहिये। जो इन नौ को देता है, वह मूर्ख है और प्रायश्चित्त का भागी होता है ॥ १९ । २० ॥ इस पूर्वोक्त नव नवक इक्कासी ८१ को जानने वाला पुरुष
१८ दक्षस्मृतिः ॥
इहलोकेपरत्रापि श्रीश्चतंनैवमुञ्चति ॥ २१ ॥ यथैवात्मापरस्तद्वद् द्रष्टव्यः सुखमिच्छता । सुखदुःखानितुल्यानि यथात्मनितथापरे ॥ २२ ॥ सुखंवायदिवा दुःखं यत्किंचित्क्रियतेपरे । यत्कृतंतुपुनःपश्चात्सर्वमात्मनितद्भवेत् ॥ २३ ॥ नक्लेशेनविनाद्रव्यं नद्रव्येणविनाक्रिया । क्रियाहीनेनधर्मः स्याद्धर्महीनेकुतःसुखम् ॥ २४ ॥ सुखंहिवाञ्छतेसर्वस्तच्चधर्मसमुद्भवम् । तस्माद्धर्मः सदाकार्यः सर्ववर्णैः प्रयत्नतः ॥ २५ ॥ न्यायागतेनद्रव्येण कर्तव्यंपारलौकिकम् । दानंहिविधिनादेयं कालेपात्रेगुणान्विते ॥ २६ ॥ समद्विगुणसाहस्र मानन्त्यंचयथाक्रमात् । दानेफलविशेषः स्याद्धिंसायांतद्वदेवहि ॥ २७ ॥ सममब्राह्मणेदानं द्विगुणं ब्राह्मणब्रुवे ।
मनुष्यों में अधिपति प्रधान माननीय होता है । इस लोक और परलोक में उसको लक्ष्मी नहीं छोड़ती है ॥२१॥ सुख की इच्छा रखने वाला मनुष्य अपने समान दूसरे को देखे, क्योंकि सुख दुःख अपने को जैसे होते वैसे ही दूसरे को होते हैं ॥ २२ ॥ सुख वा दुःख जो कुछ दूसरे के लिये किया जाता है । किये हुए उस सब का फल अपने आत्मा में होता है ॥ २३ ॥ दुःख उठाये बिना द्रव्य नहीं मिलता और द्रव्य के बिना धर्म सम्बन्धी कर्म नहीं होता । कर्म हीन मनुष्य में धर्म नहीं होता और धर्म हीन मनुष्य को सुख नहीं मिलता ॥ २४ ॥ सब मनुष्य सुख को ही चाहते हैं, सो वह सुख धर्म से होता है, तिससे सब ब्राह्मणादि वर्णों को बड़े यत्न से सदा धर्म करना चाहिये ॥ २५ ॥ न्याय से प्राप्त हुये धन से परलोक के काम (यज्ञादि) करे, अच्छे पुण्य समय पर गुणी विद्वान् सुपात्र को विधि पूर्वक दान देवे ॥ २६ ॥ उस दान का फल क्रम से सम (उतनाही) दूना, सहस्रगुना, और अनंत होता है । जैसे दान करने से सुपात्र के भेद से फल न्यून अधिक होता है वैसे ही ब्राह्मण से भिन्न क्षत्रियादिको दान देने से सम फल ब्राह्मण ब्रुव (नाम मात्र के) ब्राह्मणादिकी हिंसा में पाप भी वैसाही क्रमबद्ध जानो ॥२७॥ ब्राह्मण को दिये दानका दूना,
भाषार्थसहिता ॥ १९
सहस्रगुणमाचार्ये त्वनन्तंवेदपारगे ॥ २८ ॥
विधिहीनेयथाऽपात्रे योददातिप्रतिग्रहम् ।
न केवलंहितद्व्यर्थं शेषमप्यस्यनश्यति ॥ २९ ॥
व्यसनप्रतिकारार्थे कुटुम्बार्थेचयाचते ।
एवमन्विष्यदातव्यं सर्वदानेष्वयंविधिः ॥ ३० ॥
मातापितृविहीनस्य संस्कारोद्वाहनादिभिः ।
यःस्थापयतितस्येह पुण्यसंख्यानविद्यते ॥ ३१ ॥
यच्छ्रेयोनाग्निहोत्रेण नाग्निष्टोमेन लभ्यते ।
तच्छ्रेयःप्राप्नुयाद्विप्रो विप्रेणस्थापितेनवै ॥ ३२ ॥
यद्यदिष्टतमंलोके यच्चात्मदयितंभवेत् ।
तत्तद्गुणवतेदेयं तदेवाक्षयमिच्छता ॥ ३३ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
आचार्य को दान देने से सहस्र गुणा और फल होता और वेदपार गन्ता ( जिस ने वेद का ठीक २ मर्म जान लिया हो ) को दान देने से अनन्त फल होता है ॥ २८ ॥ विधि से-हीन तथा कुपात्र को जो प्रतिग्रह (दान) देता है । वह दान केवल व्यर्थ ही नहीं है किन्तु उस का शेष धन भी नष्ट हो जाता है ॥ २९ ॥ जो ब्राह्मणादि अपनी दुःख विपत्ति को हटाने के लिये वा कुटुम्ब का पालन पोषण करने मात्र के लिये याचना करता हो उस को खोज कर देना चाहिये, यह सब दानों में उत्तम विधि है ॥३०॥ जिस के माता पिता मर गये हों, ऐसे अनाथ बालक की उपनयनादि संस्कार और विवाह आदि कर के जो मनुष्य स्थिति करता है उस के पुण्य की संख्या नहीं है ॥३१॥ जो कल्याण अग्निहोत्र और अग्निष्टोम यज्ञ से प्राप्त नहीं होता । उस कल्याण को वह ब्राह्मण प्राप्त होता है जो अनाथ ब्राह्मण बालक की नींव-स्थापित कर देता है ॥ ३२ ॥ संसार में जो २ वस्तु अत्यन्त इष्ट और जो वस्तु अपने को प्रिय हो वह २ पदार्थ सुपात्र गुणी विद्वान् को देना चाहिये ऐसे दान से अक्षय सुख मिलता है ॥ ३३ ॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥
५
२० दक्षस्मृतिः ॥
पत्नीमूलंगृहंपुंसां यदिच्छन्दानुवर्तिनी । गृहाश्रमात्परंनास्ति यदिभार्यावशानुगा । तयाधर्मार्थकामानां त्रिवर्गफलमश्नुते ॥ १ ॥ अनुकूलकलत्रोयः स्वर्गस्तस्यनसंशयः । प्रतिकूलकलत्रस्य नरकोनात्रसंशयः ॥ २ ॥ स्वर्गेऽपिदुर्लभंह्येतदनुरागःपरस्परम् । रक्तमेकंविरक्तंच ततःकष्टतरंनुकिम् ॥ ३ ॥ गृहवासःसुखार्थोहि पत्नीमूलंचतत्सुखम् । सापत्नीयाविनीतास्याच्चित्तज्ञावशवर्त्तिनी ॥४॥ दुःखान्वितासदाखिन्ना छिद्रंपीडापरस्परम् । प्रतिकूलकलत्रस्य द्विदारस्यविशेषतः ॥ ५ ॥ जलौकाइवताःसर्वा भूषणच्छादनाशनैः । सुकृतापकृतानित्यं पुरुषंह्यपकर्षति ॥ ६ ॥ जलौकारक्तमादत्ते केवलंसातपस्विनी ।
यदि आज्ञाकारिणी हो तो घर का मूल पत्नी ही है और यदि स्त्री वश में हो तो, गृहस्थाश्रम से परे और कोई श्रेष्ठ नहीं है उस स्त्री के साथ ही धर्म अर्थ काम के त्रिवर्ग फल को भोगना है ॥१॥ जिस की स्त्री सर्वथा अनुकूल, हो उस को घर में ही स्वर्ग है इस में संशय नहीं । और जिस की स्त्री प्रतिकूल पति से विरुद्ध है उस को घर ही नरक है इस में भी संदेह नहीं ॥२॥ स्त्री पुरुष की परस्पर पूर्ण प्रीति का होना स्वर्ग में भी दुर्लभ है । एक प्रेम चाहने वाला हो और दूसरा विरक्त [प्रेमी न हो] इस से अधिक और क्या कष्ट हो सकता है ॥३॥ घर का बसना सुख के लिये है और उस सुख का मूल [कारण] धर्मपत्नी है । जो स्त्री नम्र कोमल हो, चित्त की बात को जानने वाली तथा सर्वथा पति के अधीन रहे, वही वास्तव में पत्नी है ॥४॥ जो स्त्री दुःख से युक्त,सदा खेद मानने वाली, परस्पर एक दूसरे को पीडित करे वा छिद्र देखे, ऐसी प्रतिकूल स्त्री वाले तथा विशेष कर दो स्त्री वाले पुरुष को घर में सदा दुःख ही है ॥ ५ ॥ जैसे जींकें (जलौका) जिसके लग जाती हैं उसका सब रुधिर पी लेती हैं । वैसे ही भूषण वस्त्र और भोजनादि से पालन करते हुए भी पति को वे अनेक स्त्रियां तङ्ग करती हैं ॥६॥ तपस्विनी जलौका-जोंक
भाषाऽर्थसहिता ॥ २१
अङ्गानातुधनंवित्तं मांसंवीर्यंबलंसुखम् ॥ ७ ॥ साशंकावालभावेतु यौवनेऽभिमुखीभवेत् । तृणवन्मन्यतेनारी वृद्धभावेस्वकंपतिम् ॥ ८ ॥ सुकाम्येवर्तमानाच स्नेहान्नैकैनिवारिता । सुमुख्यासाभवेत्पश्नाद्यथाव्याधिरुपेक्षितः ॥ ९ ॥ अनुकूलान्ववाग्दुष्टा दक्षासाध्वीपतिव्रता । एभिरेवगुणैर्युक्ता स्त्रीरिवस्त्रीनसंशयः ॥ १० ॥ प्रहृष्टमानसानित्यं स्थानमानविचक्षणा । भर्त्तुःप्रीतिकरीयातु भार्यासाचेतराजरा ॥ ११ ॥ शिष्योभार्याशिशुर्भ्राता मित्रंदासःसमाश्रितः । यस्यैतानिविनीतानि तस्यलोकेऽपिगौरवम् ॥ १२ ॥ प्रथमाधर्मपत्नीतु द्वितीयारतिवर्द्धिनी ।
केवल रुधिरको पीती है। परन्तु प्रतिकूल स्त्रियां पुरुषके धन, अन्न, मांस, वीर्य, बल और सुख इन सबको हरलेती हैं ॥७॥ बाल्य अवस्था में स्त्री अपने पतिकी कुछ आशंका भी करती है, यौवनावस्थामें पतिका सामना करने लगती, और वृद्ध अवस्था में स्त्री अपने पतिको तृणके समान समझती है॥८॥ अपनी इच्छानुसार काम करने में स्वतन्त्र हुई स्त्री को प्रेमके कारण यदि पति ने नहीं रोका तो पीछे वह स्त्री अपने पति का सामना करने लगती है कि जैसे उपेक्षा करने से व्याधि (रोग) बढ़के प्रबल हो कर दवा लेता है ॥ ९ ॥ जो स्त्री अनुकूल हो, जिसकी वाणी कोमल तथा प्रिय हो, जो चतुर बुद्धिमती हो, साध सरल स्वभाव की हो, और पतिव्रता हो, इन सब गुणोंसे युक्त स्त्री लक्ष्मी के तुल्य ही है, इस में संशय नहीं ॥ १० ॥ जो स्त्री मन से सदा प्रसन्न रहे, पति को बढाने और प्रतिष्ठा करने में प्रवीण हो, और जो पति में प्रीति रखने वाली हो, वही भार्या (सच्ची पत्नी) है, इससे भिन्न दुःखदायी जीर्ण करनेवाली है ॥११॥ शिष्य, भार्या, बालक, भाई, मित्र, सेवक, और जो अपने आश्रित शरणागत जिसके, ये शिष्यादि सब विनीत [नम्र कोमल वा शिक्षित] हैं उस की जगत में भी बड़ाई है ॥ १२ ॥ पहिली स्त्री धर्म पत्नी, दूसरी रति (कामासक्ति) बढ़ाने वाली होती है । उस स्त्री का फल इस लोक में प्रत्यक्ष ही होता है
२२ दक्षस्मृतिः ॥
दृष्टमेवफलंतत्र नादृष्टमुपपद्यते ॥ १३ ॥ धर्मपत्नीसमाख्याता निर्दोषायदिसाभवेत् । दोषेसतिनदोषःस्यादन्याकार्यागुणान्विता ॥ १४ ॥ अदुष्टांपतितांभार्यां यौवनेयःपरित्यजेत् । सजीवनन्तेस्त्रीत्वंच वन्ध्यत्वञ्चसमाप्नुयात् ॥ १५ ॥ दरिद्रंव्याधितञ्चैव भर्तारंयावमन्यते। शुनीगृध्रीचमकरी जायतेसापुनःपुनः ॥ १६ ॥ मृतेभर्त्तरियानारी समारोहेद्धुताशनम् । साभवेत्सुभाचारा स्वर्गलोकेमहीयते ॥ १७ ॥ व्यालग्राहोयथाव्यालं बलादुद्धरतेबिलात् । तथासापतिमुद्धृत्य तेनैवसहमोदते ॥ १८ ॥ चाण्डालप्रत्यवसितपरिव्राजकतापसाः । तेषांजातान्यपत्यानि चाण्डालैस्सहवासयेत् ॥ १९ ॥ इति दाक्षे धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
परलोक में कुछ नहीं ॥ १३ ॥ यदि शास्त्रोक्त विधि से विवाहिता स्त्री में कोई दोष न हो तो, वह धर्मपत्नी कहाती है। यदि उसमें दोष हो तो भी चिन्ता नहीं क्योंकि उस दशा में अन्य गुणवती से विवाह कर लेवे ॥ १४ ॥
जो पुरुष व्यभिचारादि दोष से रहित पतित स्त्री को युवावस्था में त्याग देवे वह मर कर बन्ध्या स्त्री होती है ॥ १५ ॥ जो स्त्री रोगी पति का तिरस्कार करती है। वह कुतिया, गीधपक्षिणी, और मगरयोनि में बारम्बार जन्म लेती है ॥ १६ ॥ पति के मरने पर जो स्त्री अग्नि में भस्म हुई सती होती है वह शुभ आचरण वाली होती और स्वर्ग में पूजा को प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
जैसे सांपों को पकड़ने वाला बिल में से सांप को बल से निकाल लेता है। वैसे ही वह स्त्री भी अधोगति को प्राप्त हुए अपने पति का उद्धार करके उसी पति के संग स्वर्ग में आनन्द भोगती है ॥१८॥ चाण्डाल, पतित, संन्यासी और तपस्वी इन चारोंके किसी स्त्री से व्यभिचार द्वारा यदि सन्तान उत्पन्न हों तो. उनको चाण्डालों के संग ही बसावे ॥ १९ ॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
भाषाऽर्थसहिता ॥ २३
उक्तं शौचमशौचं च कार्यंत्याज्यं मनीषिभिः । विशेषार्थंतयोः किंचिद्वक्ष्यामिहितकाम्यया ॥ १ ॥ शौचेयत्नःसदाकार्यः शौचमूलोद्विजःस्मृतः । शौचाचारविहीनस्य समस्तानिष्फलाःक्रियाः ॥ २ ॥ शौचंचद्विविधंप्रोक्तं बाह्यमाभ्यन्तरंतथा । मृज्जलाभ्यांस्मृतंबाह्यं भावशुद्धिस्तथान्तरम् ॥ ३ ॥ आशौचाद्विवरंबाह्यं तस्मादाभ्यन्तरंवरम् । उभाभ्यान्तुशुचिर्यस्तु सशुचिर्नेतरःशुचिः ॥ ४ ॥ एकालिङ्गेगुदेतिस्रो दशवामक रेतथा । उभयोःसप्तदातव्या मृदस्तित्रस्तुपादयोः ॥ ५ ॥ गृहस्थेशौचमाख्यातं त्रिष्वन्येषुक्रमेणतु । द्विगुणं त्रिगुणं चैव चतुर्थस्यचतुर्गुणम् ॥ ६ ॥ अर्द्धप्रसृतिमात्रान्तु प्रथमामृत्तिकास्मृता । द्वितीयाचतृतीयाच तदर्द्धापरिकीर्त्तिता ॥ ७ ॥
मन को वशी करने वाले विद्वान् ऋषि आचार्यों ने शुद्धि, अशुद्धि, करने तथा त्यागने योग्य काम कहे हैं उनदोनों प्रकारके कर्त्तव्यों में मनुष्योंके हित की इच्छासे हम कुछ विशेष विचार कहते हैं ॥१॥ शुद्धि करनेका सदैव प्रबल उपाय करना चाहिये क्योंकि ब्राह्मण पन की स्थिति या पुष्टिका मूल कारण शौच ही है। शौच और शुद्ध आचारण से जो हीन है, उसके सब कर्म निष्फल हैं ॥२॥ शुद्धि दो प्रकार की है, एक बाह्य (बाहर की) और दूसरी आभ्यन्तर (भीतर की) बाह्य शरीरकी शुद्धि मट्टी और जलसे होती तथा भीतरी शुद्धि मनको छल कपट रहित करनेसे होती है ॥३॥ अशुद्ध रहनेसे बाह्य शुद्धि उत्तम है और बाह्य शुद्धि से आभ्यन्तर श्रेष्ठ है। इन दोनों प्रकार से जो शुद्धि करता है वही ठीक शुद्ध है, अन्य नहीं ॥ ४ ॥ लिंग में एक बार, गुदा में तीन बार, एक वांयें हाथ में दशवार, दोनों हाथों में मिला के सात बार और दोनों पगों में तीन २ बार मट्टी लगावे ॥ ५ ॥ यह शुद्धि गृहस्थियों की कही है, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा संन्यासी इन तीनों का क्रमशः गृहस्थ से दूनी तिगुनी, चौगुनी, शुद्धि करनी चाहिये ॥ ६ ॥ पहिली बार आधी पसली मट्टी लगानी कही है और दूसरी वा तीसरी वार में आधी मट्टी जानो ॥ ७ ॥
२४ दक्षस्मृतिः ॥
लिङ्गेतुमृत्समाख्याता त्रिपर्वपूर्यतेयया ।
एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥ ८ ॥
त्रिगुणं तु वनस्थानां यतीनां च चतुर्गुणम् ।
दातव्यमुदकं तावन्मृदभावो यथा भवेत् ॥ ९ ॥
मृत्तिकानां सहस्रेण चोदकुम्भशतेन च ।
न शुद्ध्यन्ति दुरात्मानो येषां भावो न निर्मलः ॥ १० ॥
मृदा तोयेन शुद्धिः स्यान्न क्लेशो न धनव्ययः ।
यस्य शौचेऽपि शैथिल्यं चित्तं तस्य परीक्षितम् ॥ ११ ॥
अन्यदेव दिवा शौचमन्यद्रात्रौ विधीयते ।
अन्यदापदिनिर्दिष्टं ह्यन्यदेव ह्यनापदि ॥ १२ ॥
दिवोदितस्य शौचस्य रात्रावर्द्धं विधीयते ।
तदर्धमातुरस्याहुस्त्वरायामर्द्धवर्त्मनि ॥ १३ ॥
न्यूनाधिकं न कर्तव्यं शौचं शुद्धिमभीप्सता ।
प्रायश्चित्तेन युज्येत विहिताऽतिक्रमे कृते ॥ १४ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
लिंग में इतनी मही लगावे जिस से सब अंगुलियों के तीनों अंगुल भर जावें, यह गृहस्थियों की शुद्धि कही, इस से दूनी ब्रह्मचारियों को ॥ ८ ॥ तिगुनी वानप्रस्थीं को, और चौगुनी संन्यासियों को करनी चाहिये और मही लगाके इतना जल छोड़े जिस से वह सब मही धो जाय ॥ ९ ॥ जिन का अन्तःकरण निर्मल नहीं, वे दुष्टात्मा मनुष्य सहस्रवार मही लगाने वा सौ घड़े जलसे भी शुद्ध नहीं होते ॥ १० ॥ मही और जल से शुद्धि होती है, इस में न तो कछ क्लेश और न धन का कुछ खर्च है. ऐसी शुद्धि करने में भी जिस को आलस्य है, उस के चित्त की परीक्षा हो गयी ॥ ११ ॥ दिन में अन्य, रात्रिमें अन्य, आपत्ति में अन्य, और बिना आपत् के समय अन्य शुद्धि कही है ॥ १२ ॥
दिन में जितनी शुद्धि करे, उससे आधी रात्रि में करे, उससे भी आधी रोगी करे, शीघ्रता के समय और मार्गमें चलने के समय भी आधी शुद्धि करे ॥१३॥
शुद्धिकी इच्छा करने वाला मनुष्य पूर्वोक्त से न्यून वा अधिक शुद्धि न करे । क्योंकि शास्त्र विहित कर्म का उल्लङ्घन करने में प्रायश्चित्त के योग्य हो जाता है ॥ १४ ॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥५॥
भाषार्थसंहिता ॥ २५
आशौचन्तुप्रवक्ष्यामि जन्ममृत्युनिमित्तकम् ।
यावज्जीवंतृतीयंतु यथावदनुपूर्वशः ॥ १ ॥
सद्यःशौचंतथैकाह स्ञ्यहश्चतुरहस्तथा ।
षड्दशद्वादशाहाञ्च पक्षोमासस्तथैवच ॥ २ ॥
मरणान्तंतथाचान्यद्दशपक्षास्तुसूतके ।
उपन्यासक्रमेणैव वक्ष्याम्यहमशेषतः ॥ ३ ॥
ग्रन्थार्थं योविजानाति वेदमङ्गैःसमन्वितम् ।
सकल्पंसरहस्यंच क्रियावांश्चेन्नसूतकी ॥ ४ ॥
राजर्त्विग्दीक्षितानांच बालेदेशान्तरेतथा ।
व्रतिनांसत्रिणांचैव सद्यःशौचंविधीयते ॥ ५ ॥
एकाहाच्छुद्ध्यतेविप्रो योग्निवेदसमन्वितः ।
त्र्यहात्केवलवेदस्तु द्विहीनोदशभिर्दिनैः ॥ ६ ॥
शुद्ध्येद्विप्रोदशाहेन द्वादशाहेनभूमिपः ।
जन्म और मरण निमित्त का आशौच कहते हैं तीसरा आशौच जीवने पर्यन्त का है क्रमसे तीन प्रकार के अशौच शास्त्रोक्त हैं ॥ १ ॥ सद्यः शौच (उसी समय शुद्धि करलेना,) एक दिन, तीन दिन, चार दिन, छः दिन, दश दिन, बारह दिन, पन्द्रह दिन, एकमास॥२॥और मरण पर्यन्त, ये दश पक्ष सूतक में मानेगये हैं। उनको क्रम से हम कहते हैं॥३॥जो पुरुष ग्रन्थों के अर्थको वेदके छः अङ्गों,कल्प और रहस्य के सहित वेदको जानताहै वह यदि श्रौतस्मार्त्त कर्मों को करताहीतो उसको सूतक नहीं लगता । अर्थात् वह स्नानादि करके तत्काल शुद्ध हो जाताहै ॥४॥ राजा, ऋत्विज्, दीक्षित, ( जिस ने यज्ञादि में दीक्षा ले रक्खी हो ) बालक, परदेश में जो रहता हो, व्रती, सत्री ( सत्रयज्ञ में जो बैठे हों ) इन सब को सद्यः तत्काल शुद्धि कही है ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्री तथा वेदपाठी हो वह एकही दिनमें शुद्धि करले । तथा केवल वेदाध्ययन कर्त्ता तीन दिन सूतक माने और अग्निहोत्र तथा वेदाध्ययन दोनों से हीन ब्राह्मण दशदिन में शुद्ध होता है ॥ ६ ॥ जातिमात्र ब्राह्मण को दशदिन का, क्षत्रिय को बारह
२६ दक्षस्मृतिः ॥
वैश्यःपञ्चदशाहेन शूद्रोमासेनशुध्यति ॥ ७ ॥ अस्नात्वाचाप्यहुत्वाच ह्यदत्त्वायैतुभुञ्जते । एवंविधानांसर्वेषां यावज्जीवंहिसूतकम् ॥ ८ ॥ व्याधितस्यकदर्यस्य ऋणग्रस्तस्यसर्वदा । क्रियाहीनस्यमूर्खस्य स्त्रीजितस्यविशेषतः ॥ ९ ॥ व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्यनित्यशः ॥ श्रद्धात्यागविहीनस्य भस्मान्तंसूतकंभवेत् ॥ १० ॥ नसूतकंकदाचित्स्याद्यावज्जीवन्तुसूतकम् । एवंगुणविशेषेण सूतकंसमुदाहृतम् ॥ ११ ॥ सूतकेमृतकेचैव तथाचमृतसूतके । एतत्संहतशौचानां मृताशौचेनशुद्ध्यति ॥ १२ ॥ दानंप्रतिग्रहोहोमः स्वाध्यायश्चनिवर्त्तते । दशाहात्तुपरंशौचं विप्रोऽर्हतिचधर्म्मवित् ॥ १३ ॥ दानंचविधिनादेयमशुभात्तारकंहितत् ।
दिन का, वैश्य को पन्द्रह दिन का, और शूद्र को महीने भर का सूतक लगता है ॥ ७ ॥ स्नान, होम, अतिथि पूजन आदि न करके जो भोजन करते हैं ऐसे सब मनुष्यों को जीवन पर्यन्त (अशौच) सूतक लगता है ॥८॥ रोगी, कदर्य (कञ्जूस,) सदैव ऋणी, क्रिया कर्मसे हीन, मूर्ख, और विशेष कर स्त्री ने जिसे जीत लिया हो ॥ ९ ॥ व्यसन (जुआ आदि) में जिस का चित्त आसक्त हो, नित्य जो पराधीन हो, श्रद्धा तथा त्याग (वैराग्य) से जो हीन हो उस को भस्मान्त (मरण पर्यन्त) सूतक लगता है ॥ १० ॥ सूतक कभी न हो और जीने तक सूतक रहे इसप्रकार गुण विशेषसे सूतक दो प्रकारका है ॥११॥ जन्म सूतक में यदि मरण सूतक हो तथा मरण सूतक में जन्म सूतक मिलजाय तो दोनों की शुद्धि मरण सूतक के संग होती है ॥ १२ ॥ सूतक में दान देना, प्रतिग्रह (दान लेना) होम, स्वाध्याय (वेदपाठ) ये सब काम निवृत्त हो जाते हैं। धर्म को जानने वाला ब्राह्मण दश दिनके पीछे सब कर्मों के योग्य शुद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ शास्त्रोक्त विधि से दान देना चाहिये क्योंकि वह दान अशुभ पाप से तारने वाला है। यदि पहिले
चतुर्थेऽहनिकर्तव्यमस्थिसंचयनंद्विजैः ।
भाषार्थसहिता ॥ २७
मृतकान्तेमृतोयस्तु सूतकान्तेचसूतकम् ॥ १४ ॥ एतत्संहतशौचानां पूर्वाशौचेनशुद्ध्यति । उभयत्रदशाहानि कुलस्यान्नंनभुज्यते ॥ १५ ॥ चतुर्थेऽहनिकर्तव्यमस्थिसंचयनंद्विजैः । ततःसंचयनादूर्ध्वमङ्गम्पर्शोविधीयते ॥ १६ ॥ वर्णानामानुलोम्येन स्त्रीणामेकोयदापतिः । दशाहषट्त्र्यहैकाहं प्रसवेसूतकंभवेत् ॥ १७ ॥ स्वस्थकालेत्विदंसर्वमशौचं परिकीर्तितम् । आपद्गतस्यसर्वस्य सूतकेऽपिनसूतकम् ॥ १८॥ यज्ञेप्रवर्तमानैतु जायेतार्थम्रियेतवा । पूर्वसंकल्पितेकार्ये नदोषस्तत्रविद्यते ॥ १९ ॥ यज्ञकालेविवाहेच देवयागेतथैवच । हूयमानेतथाचाग्नौ नाशौचं नापिसूतकम् ॥ २०॥ इति दाक्षे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
मरण सूतक का समय पूरा न होने तक जो अन्य कोई मरे अथवा ऐसे ही जन्म सूतक में अन्य जन्म हो जाय तो ॥१४॥ इन मिले हुए सूतकों में पूर्व सूतक के शेष दिनों में दोनों की एक साथ शुद्धि हो सकती है। दोनों सूतकों में दश दिन तक सूतक वाले कुल का अन्न न खावे ॥ १५ ॥ मरण के बाद चौथे दिन विद्वान् द्विज अस्थि संचयन करे। फिर अस्थि संचयन के पीछे सूतक वालों के शरीर का स्पर्श कहा है ॥ १६ ॥ वर्णों के अनुलोम क्रमसे यदि स्त्रियों का पति एक होय तो, ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या, शूद्रा, इन ब्राह्मण की चारों स्त्रियों को क्रम से दश, छः, तीन, एक, दिन का प्रसव में सूतक लगता है ॥१७॥ यह सब सूतक का विचार स्वस्थदशा में कहा है और आपत्तिकाल में सूतक के समय में भी सूतक नहीं लगता ॥ १८ ॥ यज्ञ का आरम्भ होजाने के समय यदि कोई जन्मे वा मरे तो, पूर्व जिस यज्ञ का संकल्प हो गया है उस को करने में दोष नहीं है ॥ १९ ॥ यज्ञ के समय, विवाह में प्रतिष्ठादि देवपूजन में, अग्निहोत्र में, मरण और जन्म दोनों के सूतक नहीं लगते ॥२०॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥६॥
२८ दक्षस्मृतिः ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि योगस्यविधिमुत्तमम् ।
लोकावशीकृतायेन येनचात्मावशीकृतः ॥ १ ॥
इन्द्रियार्थास्तपस्तस्य योगंवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २ ॥
प्राणायामस्तथाध्यानं प्रत्याहारोऽथधारणा ।
तर्कश्चैवसमाधिश्च षडङ्गोयोगउच्यते ॥ ३ ॥
मैत्रीक्रियामुदेसर्वा सर्वप्राणिव्यवस्थिता ।
ब्रह्मलोकंनयत्याशु धातारमिवधारणा ॥ ४ ॥
नारण्यसेवनाद्योगो नानेकग्रन्थचिन्तनात् ।
व्रतैैर्यज्ञैस्तपोभिर्वा नयोगःकस्यचिद्भवेत् ॥ ५ ॥
नचपद्मासनाद्योगो ननासाग्रनिरीक्षणात् ।
नचशास्त्रातिरिक्तेन शौचेनभवतिक्वचित् ॥ ६ ॥
नमन्त्रमौनकुहकैरनेकैःसुकृतैस्तथा ।
लोकयात्राभियुक्तस्य न योगःकस्यचिद्भवेत् ॥ ७ ॥
अभियोगात्तथाभ्यासात्तस्मिन्नेवसुनिश्चयात् ।
अब आगे योग का उत्तम विधान कहते हैं । संसारी लोगों को और अपने आप को जिस ने वश में किया है ॥ १ ॥ इन्द्रिय और शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये विषय, ये सब जिसने वश में किये हैं, जो तप करने को तत्पर हो, उस के लिये संपूर्ण योग कहते हैं ॥ २ ॥ प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, तर्क, समाधि ये छः जिस के अंग ( भाग ) हैं उसे योग कहते हैं ॥ ३ ॥ आनन्द प्राप्ति के लिये सब प्राणियों के साथ ईर्ष्या द्वेष बैर विरोध छोड़ के मित्र दृष्टि करे, वह मैत्री योगी को ऐसे ब्रह्मलोक में लेजाती है जैसे धारणा ब्रह्मा जी को ब्रह्मलोक में पहुंचाती है ॥ ४ ॥ केवल वन में रहने से या अनेक ग्रंथों को शोधने विचार ने से, व्रत, यज्ञ और तप करने से किसी को योग नहीं होता ॥ ५ ॥ पद्मासन लगा के बैठसे, नाक के अग्रभाग को देखने से और शास्त्रविरुद्ध अधिक शुद्धि करने से भी योग कभी नहीं होता ॥ ६ ॥ मन्त्र जपने, मौन रहने धूनी लगाने, और अनेक प्रकार के पुण्य करने से और लोक के व्यवहारों में तत्पर रहने, से भी योग नहीं होता ॥ ७ ॥ योग के विचार में तत्परता होने, बार २ लगा तार योग का अभ्यास करने, योग में
भाषार्थसहिता ॥ २९
पुनः पुनश्चनिर्वेदाद्योगः सिद्ध्यतिनान्यथा ॥ ८
आत्मचिन्ताविनोदेन शौचेनक्रीडनेनच ।
सर्वभूतसमत्वेन योगःसिद्ध्यतिनान्यथा ॥ ९ ॥
यश्चाऽऽत्ममिथुनोनित्यमात्मक्रीडस्तथैवच ।
आत्मानन्दस्तुसतत मात्मन्येवसमाहितः ॥ १० ॥
अस्मिन्नेवसुतृप्तश्च संतुष्टोनाऽन्यमानसः ।
आत्मन्येवसुतृप्तस्य योगोभवतिनान्यथा ॥ ११ ॥
सुप्तोऽपियोगयुक्तञ्च जाग्रदेवविशेषतः ।
ईदृक्चेष्टःस्मृतःश्रेष्ठो वरिष्ठोब्रह्मवादिनाम् ॥ १२ ॥
अस्त्वात्मव्यतिरेकेण द्वितीयंनैवपश्यति ।
ब्रह्मभूतःसएवेह दक्षपक्षउदाहृतः ॥ १३ ॥
विषयासक्तचित्तोहि कश्चिद्योगंनविन्दति ।
यत्नेनविषयासक्तिं तस्माद्योगीविवर्जयेत् ॥ १४ ॥
ही अटल श्रद्धा विश्वास होने और बार वार संसार से प्रबल उदासीनता वैराग्य होने से योग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं ॥ ८ ॥ परमात्मा की चिन्ता के आनंद, शौच, अपने आत्मा में ही क्रीड़ा करने और सब प्राणियों में समदृष्टि होने से योग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं ॥९॥ जो नित्य ही आत्म विचार में आनन्दित, आत्मा क्रीड़ा में तत्पर, अपने आत्मा में ही आनन्द मानने वाला और निरंतर एकाग्र चित्त से अपने आपे में रहने वाला ॥ १० ॥ इसी अध्यात्म विचार में सम्यक् तृप्त और मन से संतुष्ट रहे अन्य बात में जिस का मन न लगता हो और आत्मा में ही अच्छे प्रकार तृप्त पुरुष को योग सिद्ध होता है, अन्य था नहीं ॥ ११ ॥ सोता हुआ भी योगी विशेष कर जागता ही है, ऐसी जिस की चेष्टा हो, वही श्रेष्ठ तथा ब्रह्मवादियों में बड़ा है ॥ १२ ॥ जो योगी विद्वान् अपने आत्मा से भिन्न द्वितीय को नहीं देखता अर्थात् सब प्राणियों को एक ब्रह्मात्मरूप अभेद भाव से देखता है वही ब्रह्मरूप दक्ष ऋषि के पक्ष में कहा है ॥ १३ ॥ विषयों में जिसका चित्त आसक्त है, वह कोई भी योग को प्राप्त नहीं होता तिससे योगी पुरुष विषयों की फसावट को बड़े यत्न से छोड़ देवे ॥ १४ ॥
३० दक्षस्मृतिः ॥
विषयेन्द्रियसंयोगं केचिद्योगंवदन्तिवै । अधर्मोधर्मबुद्ध्यातु गृहीतस्तैरपण्डितैः ॥ १५ ॥
आत्मनोमनसश्चैव संयोगन्तुततःपरम् । उत्तानमनसोह्येते केवलंयोगवञ्चिताः ॥ १६ ॥
वृत्तिहीनंमनःकृत्वा क्षेत्रज्ञंपरमात्मनि । एकीकृत्यविमुच्येत योगोऽयंमुख्यउच्यते ॥ १७ ॥
कषायमोहविक्षेप लज्जाशङ्कादिचेतसः । व्यापारास्तुसमाख्यातास्तान्जित्वावशमानयेत् ॥१८॥
कुटुम्बैःपञ्चभिर्ग्रामः षष्ठस्तत्रमहत्तमः । देवासुरैर्मनुष्यैश्च सजंतुर्नैवशक्यते ॥ १९ ॥
मनसैवेन्द्रियाण्यत्र मनश्चात्मनियोजयेत् । सर्वभावविनिर्मुक्तं क्षेत्रज्ञंब्रह्मणिन्यसेत् ॥ २० ॥
बलेनपरराष्ट्राणि गृह्णन्शूरस्तुनोच्यते । जितोयेनेन्द्रियग्रामः सशूरःकथ्यतेबुधैः ॥ २१ ॥
कोई मनुष्य विषय और इन्द्रियों के संयोग को ही योग कहते हैं। उन निर्बुद्धियों ने अधर्म को धर्म बुद्धि से ग्रहण किया जानो ॥१५॥ तथा अन्य कोई लोग आत्मा और मन के संयोग को योग कहते हैं। ये लोग उत्कृष्ट चित्त वाले होने से केवल योग से वञ्चित रहते हैं ॥ १६ ॥ मन को वृत्तियों से हीन निश्चल करके और क्षेत्रज्ञ आत्मा को परमात्मा में एक करके मुक्त हो जाय यह मुख्य योग कहा है ॥ १७ ॥ कषाय (मन की मलिनता) मोह (अविद्या) विक्षेप (चित्त की चञ्चलता) लज्जा और शंका इत्यादि चित्त के व्यापार कहे हैं। उन कषायादि व्यापारों को जीत कर मन को वश में करे ॥ १८ ॥ पांच कुटुम्बों (५ इन्द्रियों) का ग्राम होता है और उस ग्राम में छठा (मन) अत्यन्त बड़ा है उस को देवता मनुष्य और असुर भी जीतने को समर्थ नहीं होते ॥ १९ ॥ इन्द्रियों को मन से रोक कर और मन को आत्मा में युक्त करे और सब भावों (पदार्थों) से रहित क्षेत्रज्ञ आत्मा को ब्रह्म में लीन करे ॥२०॥ जो बल से पराये राज्यों को छीन ले वह शूर नहीं कहाता किन्तु विद्वान् जन उसे ही शूर कहते हैं जिस ने सब इन्द्रियों को जीत लिया है ॥ २१ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ३१
बहिर्मुखानिसर्वाणि कृत्वाचान्तर्मुखानिवै ।
एतद्ध्यानंतथाज्ञानं शेषस्तुग्रन्थविस्तरः ॥ २२ ॥
त्यक्त्वाविषयभोगांस्तु मनानिश्चलताङ्गतम् ।
आत्मशक्तिस्वरूपेण समाधिःपरिकीर्तितः ॥ २३ ॥
चतुर्णांसन्निकर्षेण फलंयत्तदशाश्वतम् ।
द्वयोस्तुसन्निकर्षेण शाश्वतंपदमव्ययम् ॥ २४ ॥
यन्नास्तिसर्वलोकस्य तदस्तीतिविरुद्धयते ।
कथ्यमानंतथान्यस्य हृदयेनावतिष्ठते ॥ २५ ॥
स्वयंवेद्यंचतद्ब्रह्म कुमारीमैथुनंयथा ।
अयोगीनैवजानाति जात्यन्धोहियथाघटम् ॥ २६ ॥
नित्याभ्यसनशीलस्य स्वसंवेद्यंहितद्भवेत् ।
बहिर्मुख (विषयों में लगी) सब इन्द्रियों को अन्तर्मुख (आत्मा में लीन) करके जो योगी रहता है, यही ध्यान और ज्ञान है। बाकी सब ग्रन्थों का विस्तार है ॥ २२ ॥ संसारी विषय भोगों को त्याग कर आत्मा की शक्ति रूप से निश्चय कर निश्चल हुआ जो मन उसे समाधि कहते हैं ॥ २३ ॥ चारो आश्रम के सामान का संग्रह से वा चार आश्रमियों के मेल से जो फल होता है वह अनित्य है और पिछले दो आश्रमी वानप्रस्थ तथा संन्यासी के मेल से सनातन अविनाशी ब्रह्मपद प्राप्त होता है। सब लोगों को जो ब्रह्म नास्ति अभावसा प्रतीत होता है। वह अस्ति शब्द से कहना विरुद्ध पड़ता है इसी से कहा हुआ भी दूसरे के हृदय में नहीं ठहरता अचल विश्वास नहीं जमता ॥ २५ ॥ वह ब्रह्म इस प्रकार स्वयं जानने योग्य है कि जैसे कुमारी का मैथुन (युवति स्त्री को अनुकूल युवा पतिके प्रथम ही संयोग में जो आनन्द होता है वह अकथनीय स्वयं ज्ञेय होता है वैसे ही ब्रह्मज्ञान का आनन्द भी कहने में नहीं आ सकता) और योग मार्ग से हीन पुरुष उस ब्रह्म को इस प्रकार नहीं जानता जैसे जन्मान्ध पुरुष घट के रूप को नहीं देख सकता ॥२६॥
नित्य योगाभ्यास के स्वभाव वाले मनुष्य को अनायास से ब्रह्म स्वयं जानने योग्य होता है। वह सूक्ष्म होने से सनातन पर ब्रह्म अनिर्देश्य (दिखाने