अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ दक्षस्मृतिः ॥
सन्ध्यास्नानंजपोहोमः स्वाध्यायोदेवतार्चनम् । वैश्वदेवंक्षमातिथ्य मुद्धृत्यापिचशक्तितः ॥ ८ ॥ नवकर्मणिकार्याणि पूर्वोक्तानिमनीषिभिः । कृत्वैवंनवकर्मणि सर्वकर्माभवेन्नरः ॥ ९ ॥ पितृदेवमनुष्याणां दीनानाथतपस्विनाम् । गुरुमातृपितॄणांच संविभागोयथार्थतः ॥ एतानिनवकमाणि विकर्माणितथापुनः ॥ १० ॥ अनृतंपरदाराश्च तथाऽभक्ष्यस्यभक्षणम् । अगम्यागमनापेय पानंस्तेयंचहिंसनम् ॥ ११ ॥ अश्रौतकमाचरणं मैत्रंधर्मबहिष्कृतम् । नवैतानिविकर्माणि तानिसर्वाणिवर्जयेत् ॥ १२ ॥ पैशुन्यमनृतंमाया कामःक्रोधस्तथाप्रियम् । द्वेषोदम्भःपरद्रोहः प्रच्छन्नानितथानव ॥ १३ ॥ गीतनृत्येकृषिःसेवा वाणिज्यंलवणक्रिया ।
सन्ध्या, स्नान, जप, होम, वेदपाठ, देवताओं का पूजन, वैश्वदेव, क्षमा, यथा- शक्ति अन्न निकाल के अतिथि का सत्कार,ये नौ शुभ कर्म हैं ॥ ८ ॥
तथा द्वितीय प्रकार से पितर, देवता, मनुष्य, दीन, अनाथ, तपस्वी, गुरु, माता, पिता इन सब को यथा योग्य भोजनांश देवे । ये पूर्वोक्त नौकर्म जि- तेन्द्रिय विद्वानों को कर्त्तव्य हैं इन नौ कर्मोंको करके पुरुष सब धर्म कर्म करने वाला माना जायगा ॥ ९ ॥ ये नौ ९ शुभ कर्म हैं, और आगे कहे नौ विकर्म नाम बुरे निन्दित कर्म हैं ॥ १० ॥ मिथ्याभाषण, परस्त्रीगमन, अभक्ष्य का भक्षण, अगम्या (वेश्या चाण्डाली आदि) स्त्री का गमन, न पीने योग्य म- द्यादि का पीना, चोरी, हिंसा, ॥ ११ ॥ वेद में जो न कहे हों, ऐसे कर्मों को करना, धर्म से विरुद्ध किसी के साथ मित्रता करना, ये नौ निन्दित कर्म हैं, इन सब को त्याग कर देवे ॥ १२ ॥ पैशुन्य (चुगली करना) मिथ्या भाषण, छल कपट, काम, क्रोध, अन्य का अप्रिय, द्वेष, दंभ, परद्रोह, ये नौ प्रच्छन्न (छिप कर होने वाले) निन्दित काम हैं ॥ १३ ॥ गाना, बजाना, खेती करना, दास कर्म, वणिज व्यापार, लवण बनाना, बेंचना, जुवा खेलना, हथियार बनाना,