अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 551, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ १५
सुधानवगृहस्थस्य मध्यमानिनवैवच ।
नवकर्माणि तस्यैव विकर्माणिनवैवतु ॥ १ ॥
प्रच्छन्नानिनवान्यानि प्रकाश्यानिपुनर्नव ।
सफलानिनवान्यानि निष्फलानिनवैवतु ॥ २ ॥
अदेयानिनवान्यानि वस्तुजातानिसर्वदा ।
नवकान्वनिर्दिष्टा गृहस्थोन्नतिकारकाः ॥ ३ ॥
सुधावस्तूनिवक्ष्यामि विशिष्टेगृहमागते ।
मनश्चक्षुर्मुखंवाचं सौम्यंदत्त्वाचतुष्टयम् ॥ ४ ॥
अभ्युत्थानंततोगच्छेत् पृच्छालापःप्रियान्वितः ।
उपासनमनुव्रज्या कार्याण्येतानिनित्यशः ॥ ५ ॥
ईषद्दानानिचान्यानि भूमिरापस्तृणानिच ।
पादशौचंतथाभ्यङ्ग आसनंशयनंतथा ॥ ६ ॥
किंचिद्दद्याद्यथाशक्ति नास्यानश्नन्गृहेवसेत् ।
मृज्जलं चार्थिनेदेय मेतान्यपिसतांगृहे ॥ ७ ॥
गृहस्थ के नौ ९ सुधा, (अमृत) नौ ९ मध्यम, नौ ९ कर्तव्य कर्म और नौ ९ विकर्म (निन्दित) कर्म हैं ॥ १ ॥ नौ ९ प्रच्छन्न (छिपे) कर्म, नौ ९ प्रकाश के योग्य, नौ सफल और नौ निष्फल कर्म हैं ॥ २ ॥ और नौ ९ वस्तु सदैव न देने योग्य हैं, ये नौ नवक अर्थात् नौ २ संख्या वाले नौ काम कहे हैं, ये ही गृहस्थ की उन्नति करने वाले नौ काम हैं ॥ ३ ॥ नौ सुधा वस्तुओं को कहते हैं—यदि कोई प्रतिष्ठित विद्वान् वा सज्जन अपने घर आवे तब मन, नेत्र, मुख, वाणी, इन चारों को सौम्य कोमल श्रद्धा युक्त रक्खै ॥ ४ ॥ सज्जनों को आते देख कर उठ कर लावे, आने का प्रयोजन पूछे, प्यार से बोले, सेवा करे, अनुगमन (पीछे चलना) ये ९ काम प्रति दिन अभ्यागत के लिये करे ॥ ५ ॥ ये आगे कहे नौ मध्यम दान हैं भूमि, जल, तृण—(कुश का वा चटाई का आसन) पग धोना, तैल मलना, आसन, शय्या ॥ ६ ॥ आये हुए अतिथि को यथाशक्ति कुछ देना चाहिये, क्योंकि बिना भोजन किये गृहस्थ के घर में अतिथि न बसे, मांगने वाले को मही, वा जल जो वह चाहे देना ये नौ ९ ईषद्दान अच्छे घरों में सदा होते ही हैं ॥ ७ ॥