अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 550, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ दक्षस्मृतिः ॥
भुक्त्वाऽथसुखमास्थाय तदन्नंपरिणामयेत् ॥७१॥ इतिहासपुराणाद्यैः षष्ठंवासप्तमंनयेत् । अष्टमेलोकयात्रांतु बहिःसंध्याततःपुनः ॥ ७२ ॥ होमंभोजनकृत्यंच यदन्यद्गृहकृत्यकम् । कृत्वाचैवंततःपश्चात् स्वाध्यायंकिंचिदाचरेत् ॥७३॥ प्रदोषपश्चिमौयामौ वेदाभ्यासेनतौनयेत् । यामद्वयंशयानस्तु ब्रह्मभूयायकल्पते ॥ ७४ ॥ नैमित्तिकानिकाम्यानि निपतन्तियथातथा । तथातथातुकार्याणि नकालं तुविलम्बयेत् ॥७५॥ अस्मिन्नेवप्रयुञ्जानो ह्यस्मिन्नेवप्रलीयते । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्वाध्यायंसर्वदाभ्यसेत् ॥ ७६ ॥ सर्वत्रमध्यमौयामौ हुतशेषंहविश्नयत् । भुञ्जानश्चशयानश्च ब्राह्मणोनावसीदति ॥ ७७ ॥ इति दाक्षे धर्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
खाने वाला हो और भोजन करके सुख पूर्वक बैठकर उस अन्न को पचावे॥७१॥
दिन के छठें वा सांतवें भाग को इतिहास पुराणादि के विचारने पढ़ने में बितावे। दिन के आठवें भागमें घर के कामों का प्रबन्ध करे फिर ग्राम से बाहर शुद्धस्थान में जाकर सन्ध्या करै ॥७२॥ फिर सायंकाल का होम,भोजन का कार्य और जो कुछ अन्य घर का कार्य हो उसे करके पश्चात् स्वाध्याय (थोड़ा वेदाध्ययन ) करै ॥ ७३॥ रात्रि का पहिला और पिछला दो पहर वेदाभ्यास करने में बितावे और मध्यराति के दो पहर सोकर बितावे ऐसा करता हुआ द्विज ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥ नैमित्तिक काम्य कर्म जिस २ समय में आन पड़ें, उसी २ समय करने चाहिये क्योंकि उन के करने को विलम्ब न करे ॥७५॥ वेदाभ्यास में लगा हुआ पुरुष शब्द ब्रह्म में ही लीन होता है जिससे बड़े प्रबल यत्नों के साथ वेद का अभ्यास करे ॥ ७६ ॥ गृहस्थ ब्राह्मण सब जगहों में रात के बीच के दोपहरों में सोता और होम से बचे शेष अन्न का भोजन करता हुआ कभी भी दुःखी नहीं होता ॥७७॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥