भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषाभाष्यसहिता ॥ १३

नचैवपुत्रदारेण स्वकर्मपरिवर्जितः ॥ ६४ ॥
अस्नात्वाचाप्यहुत्वाच तथाऽदत्त्वाचभुञ्जते ।
देवादीनामृणीभूत्वा नरकन्तेव्रजन्त्यधः ॥ ६५ ॥
अस्नात्वासमलंभुङ्क्ते त्वजापीपूयशोणितम् ।
अहुत्वाचकृमिंभुङ्क्ते ह्यदत्त्वाऽमेध्यमेवच ॥६६॥
वृथातप्तोदकस्नानं वृथाजाप्यमवैदिकम् ।
वृथारतमपुत्रस्य वृथाभुक्तमसाक्षिकम् ॥ ६७ ॥
एकोहिभक्षयत्यन्नमपरोऽन्नेनभक्ष्यते ।
नभुज्यतेसएवैकोयोऽन्नं भुङ्क्तेहुतांशकम् ॥६८॥
विभागशीलतायस्य क्षमायुक्तोदयालुतः ।
देवतातिथिभक्तश्च गृहस्थःसतुधार्मिकः ॥६९॥
दयालज्जाक्षमाश्रद्धा प्रज्ञात्यागःकृतज्ञता ।
गुणाद्यस्यभवन्त्येते गृहस्थोमुख्यएवसः ॥७०॥
संविभागंततःकृत्वा गृहस्थःशेषभुग्भवेत् ।

से गृहस्थ नहीं होता कि जो स्वकर्म से रहित है ॥ ६४ ॥ स्नान होम और दान किये विना जो गृहस्थ लोग भोजन करते हैं वे मनुष्य देवता आदि के ऋणी होकर अधोगति नरक में जाते हैं ॥ ६५ ॥ स्नान किये विना भोजन करने वाला, मल सहित खाता, जप किये विना खाने वाला पीव, रुधिर के तुल्य अन्न को खाता, होम किये विना खाने वाला कीड़ों को खाता, अतिथि को दिये विना अशुद्ध को खाता है ॥६६॥ गर्म किये जल से स्नान, वेदसे भिन्न स्तोत्र मन्त्रादि का जप, सन्तान हुए विना स्त्री से समागम, और देवतादि को दिये विना भोजन करना, ये सब काम व्यर्थ हैं॥६७॥ कोई मनुष्य तो अन्न को खाते हैं और किसी मनुष्यको अन्न ही खाता है। यदि अन्न किसी को नहीं खाता तो उस को ही नहीं खाता है जो देव आदिको देकर (वैश्वदेव करके) खाता है ॥ ६८ ॥ जिस का स्वभाव अन्यों का भाग देने का है, जो क्षमायुक्त है, दयालु है, और देवता तथा अतिथियों का भक्त है, वही गृहस्थ धार्मिक है ॥ ६९ ॥ दया, लज्जा, क्षमा, श्रद्धा, बुद्धिमत्ता, त्याग, कृतज्ञता (अन्य के किये उपकार को मानना) ये गुण जिस में हैं, वही गृहस्थ मुख्य है ॥ ७० ॥ फिर सब के लिये विभाग देकर गृहस्थ पुरुष शेष अन्न को