भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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१२ दक्षस्मृतिः ॥

यावज्जीवकृतंपापं तत्क्षणादेवनश्यति ॥ ५८ ॥ पञ्चमेतुतथाभागे संविभागोयथार्थतः । पितृदेवमनुष्याणां कीटानांचोपदिश्यते ॥ ५९ ॥ देवैश्चैवमनुष्यैश्च तिर्यग्भिश्चोपजीव्यते । गृहस्थःप्रत्यहंयस्मात्तस्माच्छ्रेष्ठाश्रमो गृही ॥ ६० ॥ त्रयाणामाश्रमाणांतु गृहस्थोयोनिरुच्यते । सीदमानेनतेनैव सीदन्तीहेतरेत्रयः ॥ ६१ ॥ मूलत्राणेभवेत्स्कन्धः स्कन्धाच्छाखेतिपल्लवाः । मूलेनैवविनष्टेन सर्वमेतद्विनश्यति ॥ ६२ ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षणीयोगृहाश्रमी । राज्ञाचान्यैस्त्रिभिःपूज्यो माननीयश्चसर्वदा ॥ ६३ ॥ गृहस्थोऽपिक्रियायुक्तो गृहेणनगृहीभवेत् ।


माय नमः । धर्मराजायनमः) इत्यादि मन्त्रों द्वारा चौदह यमों को प्रत्येक को तिलांमश्र जलकी तीन २ वा आठ २ अञ्जलि देवे, तो जन्मभर में किया सब पाप क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है ॥५५ । ५६ । ५७ । ५८ ॥ दिनके पांचवें भाग में यथा योग्य पितर, देव, मनुष्य, और कीड़े इनको महायज्ञ सम्बन्धी कर्म-द्वारा संविभाग (देना) कहा है ॥ ५९ ॥ देवता, मनुष्य, तिर्यग्योनि, ये सब जिस कारण आच्छादादि गृहस्थ से ही जीते हैं, तिस से गृहस्थ श्रेष्ठ हैं ॥६०॥ तीनों आश्रमों का योनि (कारण) गृहस्थ कहा है । (गृहस्थ से ही उत्पन्न हो २ कर ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी, होते हैं इससे गृहस्थ सब आश्रमों का मूल कारण है) उस के जगत् में दुःखी रहने से अन्य तीनों आश्रम दुःखी हो जाते हैं ॥ ६१ ॥ जड़ की रक्षा करने से स्कन्ध (गुद्दे) और गुद्दोंसे डाली और डालियों से पत्ते हो जाते हैं और मूल (जड़) का नाश होनेसे ये सब नष्ट हो जाते हैं ॥ ६२ ॥ तिस से सम्पूर्ण यत्नसे गृहस्थ आश्रम की रक्षा, पूजा आदर (सत्कार) और मान प्रतिष्ठा राजा और तीनों आश्रमी सदा करें ॥६३॥ गृहस्थ भी क्रिया (अपने श्रुतिस्मृति प्रतिपादित धर्म कर्म) में तत्पर रहे । घर में रहने से गृहस्थ नहीं होता, अपने कर्म से हीन गृहस्थ पुत्र और स्त्री