अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 553, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ १७
द्यूतकमार्युधान्यात्म-प्रशंसाचविकर्मच ॥ १४ ॥ आयुर्वित्तंगृहच्छिद्रं मन्त्रोमैथुनभेषजे । तपोदानापमानेच नवगोप्यानि सर्वदा ॥ १५ ॥ अयोग्यमृणशुद्धिश्च दानाध्ययनविक्रयाः । कन्यादानंवृषोत्सर्गो रहस्येतानिवर्जयेत् ॥ १६ ॥ मातापित्रोगुरौमित्रे विनीतेचोपकारिणि । दीनानाथविशिष्टेषु दत्तंचसफलंभवेत् ॥ १७ ॥ धूर्त्तवन्दिनिमल्लेच कुवैद्येकितवेशठे । चाटुचारणचोरेभ्यो दत्तंभवतिनिष्फलम् ॥ १८ ॥ सामान्यंयाचितंन्यास माधिर्दाराःसुहृद्धनम् । भयार्दितंचनिक्षेपः सर्वस्वंचान्वयेसति ॥ १९ ॥ आपत्स्वपिनदेयानि नववस्तूनिसर्वदा । योददातिसमूढंस्तु प्रायश्चित्तेन युज्यते ॥ २० ॥ नवनवकवेत्ताच मनुष्याऽधिपतिर्नृणाम् ।
और अपनी प्रशंसा करना यह भी नौ कर्मों का तीसरा उदाहरण जानो ॥ १४ ॥ अवस्था, धन, घर का छिद्र (कोई बुरीबात,) विष उतारने आदि के मन्त्र, मैथुन, भेषज (उत्तमौषध,) तप, दान, अपमान, ये नौ ९ बातें सदैव छिपाने योग्य हैं ॥ १५ ॥ अयोग्य, ऋण की शुद्धि, दान देना, वेद पढ़ना, किसी वस्तु को बेंचना, कन्या का दान, वृषोत्सर्ग, इन को एकांत में न करे ॥ १६ ॥ माता, पिता, गुरू, मित्र, नम्र, उपकारी, दीन, अनाथ, सज्जन धर्मात्मा विद्वान्, इन नौ को देना सफल है ॥ १७ ॥ धूर्त्त, बंदी (कैदी,) मल्ल, कुवैद्य, कपटी, शठ, चाटु (मिठ बोला ठग) चारण, चोर, इन नौ को देना निष्फल है ॥१८॥ सामान्य वस्तु, भिक्षा, न्यास (धरोहर) आधि मानस दुःख, स्त्री, मित्र का धन, भय से पीड़ित शरणागत मनुष्य, निक्षेप धरो हर, और वंश के होते अपना सर्वस्व धन ये नौ ९ वस्तु आपत्काल में भी सदैव किसी को न देनी चाहिये। जो इन नौ को देता है, वह मूर्ख है और प्रायश्चित्त का भागी होता है ॥ १९ । २० ॥ इस पूर्वोक्त नव नवक इक्कासी ८१ को जानने वाला पुरुष