अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 554, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ दक्षस्मृतिः ॥
इहलोकेपरत्रापि श्रीश्चतंनैवमुञ्चति ॥ २१ ॥ यथैवात्मापरस्तद्वद् द्रष्टव्यः सुखमिच्छता । सुखदुःखानितुल्यानि यथात्मनितथापरे ॥ २२ ॥ सुखंवायदिवा दुःखं यत्किंचित्क्रियतेपरे । यत्कृतंतुपुनःपश्चात्सर्वमात्मनितद्भवेत् ॥ २३ ॥ नक्लेशेनविनाद्रव्यं नद्रव्येणविनाक्रिया । क्रियाहीनेनधर्मः स्याद्धर्महीनेकुतःसुखम् ॥ २४ ॥ सुखंहिवाञ्छतेसर्वस्तच्चधर्मसमुद्भवम् । तस्माद्धर्मः सदाकार्यः सर्ववर्णैः प्रयत्नतः ॥ २५ ॥ न्यायागतेनद्रव्येण कर्तव्यंपारलौकिकम् । दानंहिविधिनादेयं कालेपात्रेगुणान्विते ॥ २६ ॥ समद्विगुणसाहस्र मानन्त्यंचयथाक्रमात् । दानेफलविशेषः स्याद्धिंसायांतद्वदेवहि ॥ २७ ॥ सममब्राह्मणेदानं द्विगुणं ब्राह्मणब्रुवे ।
मनुष्यों में अधिपति प्रधान माननीय होता है । इस लोक और परलोक में उसको लक्ष्मी नहीं छोड़ती है ॥२१॥ सुख की इच्छा रखने वाला मनुष्य अपने समान दूसरे को देखे, क्योंकि सुख दुःख अपने को जैसे होते वैसे ही दूसरे को होते हैं ॥ २२ ॥ सुख वा दुःख जो कुछ दूसरे के लिये किया जाता है । किये हुए उस सब का फल अपने आत्मा में होता है ॥ २३ ॥ दुःख उठाये बिना द्रव्य नहीं मिलता और द्रव्य के बिना धर्म सम्बन्धी कर्म नहीं होता । कर्म हीन मनुष्य में धर्म नहीं होता और धर्म हीन मनुष्य को सुख नहीं मिलता ॥ २४ ॥ सब मनुष्य सुख को ही चाहते हैं, सो वह सुख धर्म से होता है, तिससे सब ब्राह्मणादि वर्णों को बड़े यत्न से सदा धर्म करना चाहिये ॥ २५ ॥ न्याय से प्राप्त हुये धन से परलोक के काम (यज्ञादि) करे, अच्छे पुण्य समय पर गुणी विद्वान् सुपात्र को विधि पूर्वक दान देवे ॥ २६ ॥ उस दान का फल क्रम से सम (उतनाही) दूना, सहस्रगुना, और अनंत होता है । जैसे दान करने से सुपात्र के भेद से फल न्यून अधिक होता है वैसे ही ब्राह्मण से भिन्न क्षत्रियादिको दान देने से सम फल ब्राह्मण ब्रुव (नाम मात्र के) ब्राह्मणादिकी हिंसा में पाप भी वैसाही क्रमबद्ध जानो ॥२७॥ ब्राह्मण को दिये दानका दूना,