अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषार्थसहिता ॥ १७
द्यूतकमार्युधान्यात्म-प्रशंसाचविकर्मच ॥ १४ ॥ आयुर्वित्तंगृहच्छिद्रं मन्त्रोमैथुनभेषजे । तपोदानापमानेच नवगोप्यानि सर्वदा ॥ १५ ॥ अयोग्यमृणशुद्धिश्च दानाध्ययनविक्रयाः । कन्यादानंवृषोत्सर्गो रहस्येतानिवर्जयेत् ॥ १६ ॥ मातापित्रोगुरौमित्रे विनीतेचोपकारिणि । दीनानाथविशिष्टेषु दत्तंचसफलंभवेत् ॥ १७ ॥ धूर्त्तवन्दिनिमल्लेच कुवैद्येकितवेशठे । चाटुचारणचोरेभ्यो दत्तंभवतिनिष्फलम् ॥ १८ ॥ सामान्यंयाचितंन्यास माधिर्दाराःसुहृद्धनम् । भयार्दितंचनिक्षेपः सर्वस्वंचान्वयेसति ॥ १९ ॥ आपत्स्वपिनदेयानि नववस्तूनिसर्वदा । योददातिसमूढंस्तु प्रायश्चित्तेन युज्यते ॥ २० ॥ नवनवकवेत्ताच मनुष्याऽधिपतिर्नृणाम् ।
और अपनी प्रशंसा करना यह भी नौ कर्मों का तीसरा उदाहरण जानो ॥ १४ ॥ अवस्था, धन, घर का छिद्र (कोई बुरीबात,) विष उतारने आदि के मन्त्र, मैथुन, भेषज (उत्तमौषध,) तप, दान, अपमान, ये नौ ९ बातें सदैव छिपाने योग्य हैं ॥ १५ ॥ अयोग्य, ऋण की शुद्धि, दान देना, वेद पढ़ना, किसी वस्तु को बेंचना, कन्या का दान, वृषोत्सर्ग, इन को एकांत में न करे ॥ १६ ॥ माता, पिता, गुरू, मित्र, नम्र, उपकारी, दीन, अनाथ, सज्जन धर्मात्मा विद्वान्, इन नौ को देना सफल है ॥ १७ ॥ धूर्त्त, बंदी (कैदी,) मल्ल, कुवैद्य, कपटी, शठ, चाटु (मिठ बोला ठग) चारण, चोर, इन नौ को देना निष्फल है ॥१८॥ सामान्य वस्तु, भिक्षा, न्यास (धरोहर) आधि मानस दुःख, स्त्री, मित्र का धन, भय से पीड़ित शरणागत मनुष्य, निक्षेप धरो हर, और वंश के होते अपना सर्वस्व धन ये नौ ९ वस्तु आपत्काल में भी सदैव किसी को न देनी चाहिये। जो इन नौ को देता है, वह मूर्ख है और प्रायश्चित्त का भागी होता है ॥ १९ । २० ॥ इस पूर्वोक्त नव नवक इक्कासी ८१ को जानने वाला पुरुष
१८ दक्षस्मृतिः ॥
इहलोकेपरत्रापि श्रीश्चतंनैवमुञ्चति ॥ २१ ॥ यथैवात्मापरस्तद्वद् द्रष्टव्यः सुखमिच्छता । सुखदुःखानितुल्यानि यथात्मनितथापरे ॥ २२ ॥ सुखंवायदिवा दुःखं यत्किंचित्क्रियतेपरे । यत्कृतंतुपुनःपश्चात्सर्वमात्मनितद्भवेत् ॥ २३ ॥ नक्लेशेनविनाद्रव्यं नद्रव्येणविनाक्रिया । क्रियाहीनेनधर्मः स्याद्धर्महीनेकुतःसुखम् ॥ २४ ॥ सुखंहिवाञ्छतेसर्वस्तच्चधर्मसमुद्भवम् । तस्माद्धर्मः सदाकार्यः सर्ववर्णैः प्रयत्नतः ॥ २५ ॥ न्यायागतेनद्रव्येण कर्तव्यंपारलौकिकम् । दानंहिविधिनादेयं कालेपात्रेगुणान्विते ॥ २६ ॥ समद्विगुणसाहस्र मानन्त्यंचयथाक्रमात् । दानेफलविशेषः स्याद्धिंसायांतद्वदेवहि ॥ २७ ॥ सममब्राह्मणेदानं द्विगुणं ब्राह्मणब्रुवे ।
मनुष्यों में अधिपति प्रधान माननीय होता है । इस लोक और परलोक में उसको लक्ष्मी नहीं छोड़ती है ॥२१॥ सुख की इच्छा रखने वाला मनुष्य अपने समान दूसरे को देखे, क्योंकि सुख दुःख अपने को जैसे होते वैसे ही दूसरे को होते हैं ॥ २२ ॥ सुख वा दुःख जो कुछ दूसरे के लिये किया जाता है । किये हुए उस सब का फल अपने आत्मा में होता है ॥ २३ ॥ दुःख उठाये बिना द्रव्य नहीं मिलता और द्रव्य के बिना धर्म सम्बन्धी कर्म नहीं होता । कर्म हीन मनुष्य में धर्म नहीं होता और धर्म हीन मनुष्य को सुख नहीं मिलता ॥ २४ ॥ सब मनुष्य सुख को ही चाहते हैं, सो वह सुख धर्म से होता है, तिससे सब ब्राह्मणादि वर्णों को बड़े यत्न से सदा धर्म करना चाहिये ॥ २५ ॥ न्याय से प्राप्त हुये धन से परलोक के काम (यज्ञादि) करे, अच्छे पुण्य समय पर गुणी विद्वान् सुपात्र को विधि पूर्वक दान देवे ॥ २६ ॥ उस दान का फल क्रम से सम (उतनाही) दूना, सहस्रगुना, और अनंत होता है । जैसे दान करने से सुपात्र के भेद से फल न्यून अधिक होता है वैसे ही ब्राह्मण से भिन्न क्षत्रियादिको दान देने से सम फल ब्राह्मण ब्रुव (नाम मात्र के) ब्राह्मणादिकी हिंसा में पाप भी वैसाही क्रमबद्ध जानो ॥२७॥ ब्राह्मण को दिये दानका दूना,
भाषार्थसहिता ॥ १९
सहस्रगुणमाचार्ये त्वनन्तंवेदपारगे ॥ २८ ॥
विधिहीनेयथाऽपात्रे योददातिप्रतिग्रहम् ।
न केवलंहितद्व्यर्थं शेषमप्यस्यनश्यति ॥ २९ ॥
व्यसनप्रतिकारार्थे कुटुम्बार्थेचयाचते ।
एवमन्विष्यदातव्यं सर्वदानेष्वयंविधिः ॥ ३० ॥
मातापितृविहीनस्य संस्कारोद्वाहनादिभिः ।
यःस्थापयतितस्येह पुण्यसंख्यानविद्यते ॥ ३१ ॥
यच्छ्रेयोनाग्निहोत्रेण नाग्निष्टोमेन लभ्यते ।
तच्छ्रेयःप्राप्नुयाद्विप्रो विप्रेणस्थापितेनवै ॥ ३२ ॥
यद्यदिष्टतमंलोके यच्चात्मदयितंभवेत् ।
तत्तद्गुणवतेदेयं तदेवाक्षयमिच्छता ॥ ३३ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
आचार्य को दान देने से सहस्र गुणा और फल होता और वेदपार गन्ता ( जिस ने वेद का ठीक २ मर्म जान लिया हो ) को दान देने से अनन्त फल होता है ॥ २८ ॥ विधि से-हीन तथा कुपात्र को जो प्रतिग्रह (दान) देता है । वह दान केवल व्यर्थ ही नहीं है किन्तु उस का शेष धन भी नष्ट हो जाता है ॥ २९ ॥ जो ब्राह्मणादि अपनी दुःख विपत्ति को हटाने के लिये वा कुटुम्ब का पालन पोषण करने मात्र के लिये याचना करता हो उस को खोज कर देना चाहिये, यह सब दानों में उत्तम विधि है ॥३०॥ जिस के माता पिता मर गये हों, ऐसे अनाथ बालक की उपनयनादि संस्कार और विवाह आदि कर के जो मनुष्य स्थिति करता है उस के पुण्य की संख्या नहीं है ॥३१॥ जो कल्याण अग्निहोत्र और अग्निष्टोम यज्ञ से प्राप्त नहीं होता । उस कल्याण को वह ब्राह्मण प्राप्त होता है जो अनाथ ब्राह्मण बालक की नींव-स्थापित कर देता है ॥ ३२ ॥ संसार में जो २ वस्तु अत्यन्त इष्ट और जो वस्तु अपने को प्रिय हो वह २ पदार्थ सुपात्र गुणी विद्वान् को देना चाहिये ऐसे दान से अक्षय सुख मिलता है ॥ ३३ ॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥
५
२० दक्षस्मृतिः ॥
पत्नीमूलंगृहंपुंसां यदिच्छन्दानुवर्तिनी । गृहाश्रमात्परंनास्ति यदिभार्यावशानुगा । तयाधर्मार्थकामानां त्रिवर्गफलमश्नुते ॥ १ ॥ अनुकूलकलत्रोयः स्वर्गस्तस्यनसंशयः । प्रतिकूलकलत्रस्य नरकोनात्रसंशयः ॥ २ ॥ स्वर्गेऽपिदुर्लभंह्येतदनुरागःपरस्परम् । रक्तमेकंविरक्तंच ततःकष्टतरंनुकिम् ॥ ३ ॥ गृहवासःसुखार्थोहि पत्नीमूलंचतत्सुखम् । सापत्नीयाविनीतास्याच्चित्तज्ञावशवर्त्तिनी ॥४॥ दुःखान्वितासदाखिन्ना छिद्रंपीडापरस्परम् । प्रतिकूलकलत्रस्य द्विदारस्यविशेषतः ॥ ५ ॥ जलौकाइवताःसर्वा भूषणच्छादनाशनैः । सुकृतापकृतानित्यं पुरुषंह्यपकर्षति ॥ ६ ॥ जलौकारक्तमादत्ते केवलंसातपस्विनी ।
यदि आज्ञाकारिणी हो तो घर का मूल पत्नी ही है और यदि स्त्री वश में हो तो, गृहस्थाश्रम से परे और कोई श्रेष्ठ नहीं है उस स्त्री के साथ ही धर्म अर्थ काम के त्रिवर्ग फल को भोगना है ॥१॥ जिस की स्त्री सर्वथा अनुकूल, हो उस को घर में ही स्वर्ग है इस में संशय नहीं । और जिस की स्त्री प्रतिकूल पति से विरुद्ध है उस को घर ही नरक है इस में भी संदेह नहीं ॥२॥ स्त्री पुरुष की परस्पर पूर्ण प्रीति का होना स्वर्ग में भी दुर्लभ है । एक प्रेम चाहने वाला हो और दूसरा विरक्त [प्रेमी न हो] इस से अधिक और क्या कष्ट हो सकता है ॥३॥ घर का बसना सुख के लिये है और उस सुख का मूल [कारण] धर्मपत्नी है । जो स्त्री नम्र कोमल हो, चित्त की बात को जानने वाली तथा सर्वथा पति के अधीन रहे, वही वास्तव में पत्नी है ॥४॥ जो स्त्री दुःख से युक्त,सदा खेद मानने वाली, परस्पर एक दूसरे को पीडित करे वा छिद्र देखे, ऐसी प्रतिकूल स्त्री वाले तथा विशेष कर दो स्त्री वाले पुरुष को घर में सदा दुःख ही है ॥ ५ ॥ जैसे जींकें (जलौका) जिसके लग जाती हैं उसका सब रुधिर पी लेती हैं । वैसे ही भूषण वस्त्र और भोजनादि से पालन करते हुए भी पति को वे अनेक स्त्रियां तङ्ग करती हैं ॥६॥ तपस्विनी जलौका-जोंक
भाषाऽर्थसहिता ॥ २१
अङ्गानातुधनंवित्तं मांसंवीर्यंबलंसुखम् ॥ ७ ॥ साशंकावालभावेतु यौवनेऽभिमुखीभवेत् । तृणवन्मन्यतेनारी वृद्धभावेस्वकंपतिम् ॥ ८ ॥ सुकाम्येवर्तमानाच स्नेहान्नैकैनिवारिता । सुमुख्यासाभवेत्पश्नाद्यथाव्याधिरुपेक्षितः ॥ ९ ॥ अनुकूलान्ववाग्दुष्टा दक्षासाध्वीपतिव्रता । एभिरेवगुणैर्युक्ता स्त्रीरिवस्त्रीनसंशयः ॥ १० ॥ प्रहृष्टमानसानित्यं स्थानमानविचक्षणा । भर्त्तुःप्रीतिकरीयातु भार्यासाचेतराजरा ॥ ११ ॥ शिष्योभार्याशिशुर्भ्राता मित्रंदासःसमाश्रितः । यस्यैतानिविनीतानि तस्यलोकेऽपिगौरवम् ॥ १२ ॥ प्रथमाधर्मपत्नीतु द्वितीयारतिवर्द्धिनी ।
केवल रुधिरको पीती है। परन्तु प्रतिकूल स्त्रियां पुरुषके धन, अन्न, मांस, वीर्य, बल और सुख इन सबको हरलेती हैं ॥७॥ बाल्य अवस्था में स्त्री अपने पतिकी कुछ आशंका भी करती है, यौवनावस्थामें पतिका सामना करने लगती, और वृद्ध अवस्था में स्त्री अपने पतिको तृणके समान समझती है॥८॥ अपनी इच्छानुसार काम करने में स्वतन्त्र हुई स्त्री को प्रेमके कारण यदि पति ने नहीं रोका तो पीछे वह स्त्री अपने पति का सामना करने लगती है कि जैसे उपेक्षा करने से व्याधि (रोग) बढ़के प्रबल हो कर दवा लेता है ॥ ९ ॥ जो स्त्री अनुकूल हो, जिसकी वाणी कोमल तथा प्रिय हो, जो चतुर बुद्धिमती हो, साध सरल स्वभाव की हो, और पतिव्रता हो, इन सब गुणोंसे युक्त स्त्री लक्ष्मी के तुल्य ही है, इस में संशय नहीं ॥ १० ॥ जो स्त्री मन से सदा प्रसन्न रहे, पति को बढाने और प्रतिष्ठा करने में प्रवीण हो, और जो पति में प्रीति रखने वाली हो, वही भार्या (सच्ची पत्नी) है, इससे भिन्न दुःखदायी जीर्ण करनेवाली है ॥११॥ शिष्य, भार्या, बालक, भाई, मित्र, सेवक, और जो अपने आश्रित शरणागत जिसके, ये शिष्यादि सब विनीत [नम्र कोमल वा शिक्षित] हैं उस की जगत में भी बड़ाई है ॥ १२ ॥ पहिली स्त्री धर्म पत्नी, दूसरी रति (कामासक्ति) बढ़ाने वाली होती है । उस स्त्री का फल इस लोक में प्रत्यक्ष ही होता है
२२ दक्षस्मृतिः ॥
दृष्टमेवफलंतत्र नादृष्टमुपपद्यते ॥ १३ ॥ धर्मपत्नीसमाख्याता निर्दोषायदिसाभवेत् । दोषेसतिनदोषःस्यादन्याकार्यागुणान्विता ॥ १४ ॥ अदुष्टांपतितांभार्यां यौवनेयःपरित्यजेत् । सजीवनन्तेस्त्रीत्वंच वन्ध्यत्वञ्चसमाप्नुयात् ॥ १५ ॥ दरिद्रंव्याधितञ्चैव भर्तारंयावमन्यते। शुनीगृध्रीचमकरी जायतेसापुनःपुनः ॥ १६ ॥ मृतेभर्त्तरियानारी समारोहेद्धुताशनम् । साभवेत्सुभाचारा स्वर्गलोकेमहीयते ॥ १७ ॥ व्यालग्राहोयथाव्यालं बलादुद्धरतेबिलात् । तथासापतिमुद्धृत्य तेनैवसहमोदते ॥ १८ ॥ चाण्डालप्रत्यवसितपरिव्राजकतापसाः । तेषांजातान्यपत्यानि चाण्डालैस्सहवासयेत् ॥ १९ ॥ इति दाक्षे धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
परलोक में कुछ नहीं ॥ १३ ॥ यदि शास्त्रोक्त विधि से विवाहिता स्त्री में कोई दोष न हो तो, वह धर्मपत्नी कहाती है। यदि उसमें दोष हो तो भी चिन्ता नहीं क्योंकि उस दशा में अन्य गुणवती से विवाह कर लेवे ॥ १४ ॥
जो पुरुष व्यभिचारादि दोष से रहित पतित स्त्री को युवावस्था में त्याग देवे वह मर कर बन्ध्या स्त्री होती है ॥ १५ ॥ जो स्त्री रोगी पति का तिरस्कार करती है। वह कुतिया, गीधपक्षिणी, और मगरयोनि में बारम्बार जन्म लेती है ॥ १६ ॥ पति के मरने पर जो स्त्री अग्नि में भस्म हुई सती होती है वह शुभ आचरण वाली होती और स्वर्ग में पूजा को प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
जैसे सांपों को पकड़ने वाला बिल में से सांप को बल से निकाल लेता है। वैसे ही वह स्त्री भी अधोगति को प्राप्त हुए अपने पति का उद्धार करके उसी पति के संग स्वर्ग में आनन्द भोगती है ॥१८॥ चाण्डाल, पतित, संन्यासी और तपस्वी इन चारोंके किसी स्त्री से व्यभिचार द्वारा यदि सन्तान उत्पन्न हों तो. उनको चाण्डालों के संग ही बसावे ॥ १९ ॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
भाषाऽर्थसहिता ॥ २३
उक्तं शौचमशौचं च कार्यंत्याज्यं मनीषिभिः । विशेषार्थंतयोः किंचिद्वक्ष्यामिहितकाम्यया ॥ १ ॥ शौचेयत्नःसदाकार्यः शौचमूलोद्विजःस्मृतः । शौचाचारविहीनस्य समस्तानिष्फलाःक्रियाः ॥ २ ॥ शौचंचद्विविधंप्रोक्तं बाह्यमाभ्यन्तरंतथा । मृज्जलाभ्यांस्मृतंबाह्यं भावशुद्धिस्तथान्तरम् ॥ ३ ॥ आशौचाद्विवरंबाह्यं तस्मादाभ्यन्तरंवरम् । उभाभ्यान्तुशुचिर्यस्तु सशुचिर्नेतरःशुचिः ॥ ४ ॥ एकालिङ्गेगुदेतिस्रो दशवामक रेतथा । उभयोःसप्तदातव्या मृदस्तित्रस्तुपादयोः ॥ ५ ॥ गृहस्थेशौचमाख्यातं त्रिष्वन्येषुक्रमेणतु । द्विगुणं त्रिगुणं चैव चतुर्थस्यचतुर्गुणम् ॥ ६ ॥ अर्द्धप्रसृतिमात्रान्तु प्रथमामृत्तिकास्मृता । द्वितीयाचतृतीयाच तदर्द्धापरिकीर्त्तिता ॥ ७ ॥
मन को वशी करने वाले विद्वान् ऋषि आचार्यों ने शुद्धि, अशुद्धि, करने तथा त्यागने योग्य काम कहे हैं उनदोनों प्रकारके कर्त्तव्यों में मनुष्योंके हित की इच्छासे हम कुछ विशेष विचार कहते हैं ॥१॥ शुद्धि करनेका सदैव प्रबल उपाय करना चाहिये क्योंकि ब्राह्मण पन की स्थिति या पुष्टिका मूल कारण शौच ही है। शौच और शुद्ध आचारण से जो हीन है, उसके सब कर्म निष्फल हैं ॥२॥ शुद्धि दो प्रकार की है, एक बाह्य (बाहर की) और दूसरी आभ्यन्तर (भीतर की) बाह्य शरीरकी शुद्धि मट्टी और जलसे होती तथा भीतरी शुद्धि मनको छल कपट रहित करनेसे होती है ॥३॥ अशुद्ध रहनेसे बाह्य शुद्धि उत्तम है और बाह्य शुद्धि से आभ्यन्तर श्रेष्ठ है। इन दोनों प्रकार से जो शुद्धि करता है वही ठीक शुद्ध है, अन्य नहीं ॥ ४ ॥ लिंग में एक बार, गुदा में तीन बार, एक वांयें हाथ में दशवार, दोनों हाथों में मिला के सात बार और दोनों पगों में तीन २ बार मट्टी लगावे ॥ ५ ॥ यह शुद्धि गृहस्थियों की कही है, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा संन्यासी इन तीनों का क्रमशः गृहस्थ से दूनी तिगुनी, चौगुनी, शुद्धि करनी चाहिये ॥ ६ ॥ पहिली बार आधी पसली मट्टी लगानी कही है और दूसरी वा तीसरी वार में आधी मट्टी जानो ॥ ७ ॥
२४ दक्षस्मृतिः ॥
लिङ्गेतुमृत्समाख्याता त्रिपर्वपूर्यतेयया ।
एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥ ८ ॥
त्रिगुणं तु वनस्थानां यतीनां च चतुर्गुणम् ।
दातव्यमुदकं तावन्मृदभावो यथा भवेत् ॥ ९ ॥
मृत्तिकानां सहस्रेण चोदकुम्भशतेन च ।
न शुद्ध्यन्ति दुरात्मानो येषां भावो न निर्मलः ॥ १० ॥
मृदा तोयेन शुद्धिः स्यान्न क्लेशो न धनव्ययः ।
यस्य शौचेऽपि शैथिल्यं चित्तं तस्य परीक्षितम् ॥ ११ ॥
अन्यदेव दिवा शौचमन्यद्रात्रौ विधीयते ।
अन्यदापदिनिर्दिष्टं ह्यन्यदेव ह्यनापदि ॥ १२ ॥
दिवोदितस्य शौचस्य रात्रावर्द्धं विधीयते ।
तदर्धमातुरस्याहुस्त्वरायामर्द्धवर्त्मनि ॥ १३ ॥
न्यूनाधिकं न कर्तव्यं शौचं शुद्धिमभीप्सता ।
प्रायश्चित्तेन युज्येत विहिताऽतिक्रमे कृते ॥ १४ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
लिंग में इतनी मही लगावे जिस से सब अंगुलियों के तीनों अंगुल भर जावें, यह गृहस्थियों की शुद्धि कही, इस से दूनी ब्रह्मचारियों को ॥ ८ ॥ तिगुनी वानप्रस्थीं को, और चौगुनी संन्यासियों को करनी चाहिये और मही लगाके इतना जल छोड़े जिस से वह सब मही धो जाय ॥ ९ ॥ जिन का अन्तःकरण निर्मल नहीं, वे दुष्टात्मा मनुष्य सहस्रवार मही लगाने वा सौ घड़े जलसे भी शुद्ध नहीं होते ॥ १० ॥ मही और जल से शुद्धि होती है, इस में न तो कछ क्लेश और न धन का कुछ खर्च है. ऐसी शुद्धि करने में भी जिस को आलस्य है, उस के चित्त की परीक्षा हो गयी ॥ ११ ॥ दिन में अन्य, रात्रिमें अन्य, आपत्ति में अन्य, और बिना आपत् के समय अन्य शुद्धि कही है ॥ १२ ॥
दिन में जितनी शुद्धि करे, उससे आधी रात्रि में करे, उससे भी आधी रोगी करे, शीघ्रता के समय और मार्गमें चलने के समय भी आधी शुद्धि करे ॥१३॥
शुद्धिकी इच्छा करने वाला मनुष्य पूर्वोक्त से न्यून वा अधिक शुद्धि न करे । क्योंकि शास्त्र विहित कर्म का उल्लङ्घन करने में प्रायश्चित्त के योग्य हो जाता है ॥ १४ ॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥५॥
भाषार्थसंहिता ॥ २५
आशौचन्तुप्रवक्ष्यामि जन्ममृत्युनिमित्तकम् ।
यावज्जीवंतृतीयंतु यथावदनुपूर्वशः ॥ १ ॥
सद्यःशौचंतथैकाह स्ञ्यहश्चतुरहस्तथा ।
षड्दशद्वादशाहाञ्च पक्षोमासस्तथैवच ॥ २ ॥
मरणान्तंतथाचान्यद्दशपक्षास्तुसूतके ।
उपन्यासक्रमेणैव वक्ष्याम्यहमशेषतः ॥ ३ ॥
ग्रन्थार्थं योविजानाति वेदमङ्गैःसमन्वितम् ।
सकल्पंसरहस्यंच क्रियावांश्चेन्नसूतकी ॥ ४ ॥
राजर्त्विग्दीक्षितानांच बालेदेशान्तरेतथा ।
व्रतिनांसत्रिणांचैव सद्यःशौचंविधीयते ॥ ५ ॥
एकाहाच्छुद्ध्यतेविप्रो योग्निवेदसमन्वितः ।
त्र्यहात्केवलवेदस्तु द्विहीनोदशभिर्दिनैः ॥ ६ ॥
शुद्ध्येद्विप्रोदशाहेन द्वादशाहेनभूमिपः ।
जन्म और मरण निमित्त का आशौच कहते हैं तीसरा आशौच जीवने पर्यन्त का है क्रमसे तीन प्रकार के अशौच शास्त्रोक्त हैं ॥ १ ॥ सद्यः शौच (उसी समय शुद्धि करलेना,) एक दिन, तीन दिन, चार दिन, छः दिन, दश दिन, बारह दिन, पन्द्रह दिन, एकमास॥२॥और मरण पर्यन्त, ये दश पक्ष सूतक में मानेगये हैं। उनको क्रम से हम कहते हैं॥३॥जो पुरुष ग्रन्थों के अर्थको वेदके छः अङ्गों,कल्प और रहस्य के सहित वेदको जानताहै वह यदि श्रौतस्मार्त्त कर्मों को करताहीतो उसको सूतक नहीं लगता । अर्थात् वह स्नानादि करके तत्काल शुद्ध हो जाताहै ॥४॥ राजा, ऋत्विज्, दीक्षित, ( जिस ने यज्ञादि में दीक्षा ले रक्खी हो ) बालक, परदेश में जो रहता हो, व्रती, सत्री ( सत्रयज्ञ में जो बैठे हों ) इन सब को सद्यः तत्काल शुद्धि कही है ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्री तथा वेदपाठी हो वह एकही दिनमें शुद्धि करले । तथा केवल वेदाध्ययन कर्त्ता तीन दिन सूतक माने और अग्निहोत्र तथा वेदाध्ययन दोनों से हीन ब्राह्मण दशदिन में शुद्ध होता है ॥ ६ ॥ जातिमात्र ब्राह्मण को दशदिन का, क्षत्रिय को बारह
२६ दक्षस्मृतिः ॥
वैश्यःपञ्चदशाहेन शूद्रोमासेनशुध्यति ॥ ७ ॥ अस्नात्वाचाप्यहुत्वाच ह्यदत्त्वायैतुभुञ्जते । एवंविधानांसर्वेषां यावज्जीवंहिसूतकम् ॥ ८ ॥ व्याधितस्यकदर्यस्य ऋणग्रस्तस्यसर्वदा । क्रियाहीनस्यमूर्खस्य स्त्रीजितस्यविशेषतः ॥ ९ ॥ व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्यनित्यशः ॥ श्रद्धात्यागविहीनस्य भस्मान्तंसूतकंभवेत् ॥ १० ॥ नसूतकंकदाचित्स्याद्यावज्जीवन्तुसूतकम् । एवंगुणविशेषेण सूतकंसमुदाहृतम् ॥ ११ ॥ सूतकेमृतकेचैव तथाचमृतसूतके । एतत्संहतशौचानां मृताशौचेनशुद्ध्यति ॥ १२ ॥ दानंप्रतिग्रहोहोमः स्वाध्यायश्चनिवर्त्तते । दशाहात्तुपरंशौचं विप्रोऽर्हतिचधर्म्मवित् ॥ १३ ॥ दानंचविधिनादेयमशुभात्तारकंहितत् ।
दिन का, वैश्य को पन्द्रह दिन का, और शूद्र को महीने भर का सूतक लगता है ॥ ७ ॥ स्नान, होम, अतिथि पूजन आदि न करके जो भोजन करते हैं ऐसे सब मनुष्यों को जीवन पर्यन्त (अशौच) सूतक लगता है ॥८॥ रोगी, कदर्य (कञ्जूस,) सदैव ऋणी, क्रिया कर्मसे हीन, मूर्ख, और विशेष कर स्त्री ने जिसे जीत लिया हो ॥ ९ ॥ व्यसन (जुआ आदि) में जिस का चित्त आसक्त हो, नित्य जो पराधीन हो, श्रद्धा तथा त्याग (वैराग्य) से जो हीन हो उस को भस्मान्त (मरण पर्यन्त) सूतक लगता है ॥ १० ॥ सूतक कभी न हो और जीने तक सूतक रहे इसप्रकार गुण विशेषसे सूतक दो प्रकारका है ॥११॥ जन्म सूतक में यदि मरण सूतक हो तथा मरण सूतक में जन्म सूतक मिलजाय तो दोनों की शुद्धि मरण सूतक के संग होती है ॥ १२ ॥ सूतक में दान देना, प्रतिग्रह (दान लेना) होम, स्वाध्याय (वेदपाठ) ये सब काम निवृत्त हो जाते हैं। धर्म को जानने वाला ब्राह्मण दश दिनके पीछे सब कर्मों के योग्य शुद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ शास्त्रोक्त विधि से दान देना चाहिये क्योंकि वह दान अशुभ पाप से तारने वाला है। यदि पहिले
चतुर्थेऽहनिकर्तव्यमस्थिसंचयनंद्विजैः ।
भाषार्थसहिता ॥ २७
मृतकान्तेमृतोयस्तु सूतकान्तेचसूतकम् ॥ १४ ॥ एतत्संहतशौचानां पूर्वाशौचेनशुद्ध्यति । उभयत्रदशाहानि कुलस्यान्नंनभुज्यते ॥ १५ ॥ चतुर्थेऽहनिकर्तव्यमस्थिसंचयनंद्विजैः । ततःसंचयनादूर्ध्वमङ्गम्पर्शोविधीयते ॥ १६ ॥ वर्णानामानुलोम्येन स्त्रीणामेकोयदापतिः । दशाहषट्त्र्यहैकाहं प्रसवेसूतकंभवेत् ॥ १७ ॥ स्वस्थकालेत्विदंसर्वमशौचं परिकीर्तितम् । आपद्गतस्यसर्वस्य सूतकेऽपिनसूतकम् ॥ १८॥ यज्ञेप्रवर्तमानैतु जायेतार्थम्रियेतवा । पूर्वसंकल्पितेकार्ये नदोषस्तत्रविद्यते ॥ १९ ॥ यज्ञकालेविवाहेच देवयागेतथैवच । हूयमानेतथाचाग्नौ नाशौचं नापिसूतकम् ॥ २०॥ इति दाक्षे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
मरण सूतक का समय पूरा न होने तक जो अन्य कोई मरे अथवा ऐसे ही जन्म सूतक में अन्य जन्म हो जाय तो ॥१४॥ इन मिले हुए सूतकों में पूर्व सूतक के शेष दिनों में दोनों की एक साथ शुद्धि हो सकती है। दोनों सूतकों में दश दिन तक सूतक वाले कुल का अन्न न खावे ॥ १५ ॥ मरण के बाद चौथे दिन विद्वान् द्विज अस्थि संचयन करे। फिर अस्थि संचयन के पीछे सूतक वालों के शरीर का स्पर्श कहा है ॥ १६ ॥ वर्णों के अनुलोम क्रमसे यदि स्त्रियों का पति एक होय तो, ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या, शूद्रा, इन ब्राह्मण की चारों स्त्रियों को क्रम से दश, छः, तीन, एक, दिन का प्रसव में सूतक लगता है ॥१७॥ यह सब सूतक का विचार स्वस्थदशा में कहा है और आपत्तिकाल में सूतक के समय में भी सूतक नहीं लगता ॥ १८ ॥ यज्ञ का आरम्भ होजाने के समय यदि कोई जन्मे वा मरे तो, पूर्व जिस यज्ञ का संकल्प हो गया है उस को करने में दोष नहीं है ॥ १९ ॥ यज्ञ के समय, विवाह में प्रतिष्ठादि देवपूजन में, अग्निहोत्र में, मरण और जन्म दोनों के सूतक नहीं लगते ॥२०॥
यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥६॥
२८ दक्षस्मृतिः ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि योगस्यविधिमुत्तमम् ।
लोकावशीकृतायेन येनचात्मावशीकृतः ॥ १ ॥
इन्द्रियार्थास्तपस्तस्य योगंवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २ ॥
प्राणायामस्तथाध्यानं प्रत्याहारोऽथधारणा ।
तर्कश्चैवसमाधिश्च षडङ्गोयोगउच्यते ॥ ३ ॥
मैत्रीक्रियामुदेसर्वा सर्वप्राणिव्यवस्थिता ।
ब्रह्मलोकंनयत्याशु धातारमिवधारणा ॥ ४ ॥
नारण्यसेवनाद्योगो नानेकग्रन्थचिन्तनात् ।
व्रतैैर्यज्ञैस्तपोभिर्वा नयोगःकस्यचिद्भवेत् ॥ ५ ॥
नचपद्मासनाद्योगो ननासाग्रनिरीक्षणात् ।
नचशास्त्रातिरिक्तेन शौचेनभवतिक्वचित् ॥ ६ ॥
नमन्त्रमौनकुहकैरनेकैःसुकृतैस्तथा ।
लोकयात्राभियुक्तस्य न योगःकस्यचिद्भवेत् ॥ ७ ॥
अभियोगात्तथाभ्यासात्तस्मिन्नेवसुनिश्चयात् ।
अब आगे योग का उत्तम विधान कहते हैं । संसारी लोगों को और अपने आप को जिस ने वश में किया है ॥ १ ॥ इन्द्रिय और शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये विषय, ये सब जिसने वश में किये हैं, जो तप करने को तत्पर हो, उस के लिये संपूर्ण योग कहते हैं ॥ २ ॥ प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, तर्क, समाधि ये छः जिस के अंग ( भाग ) हैं उसे योग कहते हैं ॥ ३ ॥ आनन्द प्राप्ति के लिये सब प्राणियों के साथ ईर्ष्या द्वेष बैर विरोध छोड़ के मित्र दृष्टि करे, वह मैत्री योगी को ऐसे ब्रह्मलोक में लेजाती है जैसे धारणा ब्रह्मा जी को ब्रह्मलोक में पहुंचाती है ॥ ४ ॥ केवल वन में रहने से या अनेक ग्रंथों को शोधने विचार ने से, व्रत, यज्ञ और तप करने से किसी को योग नहीं होता ॥ ५ ॥ पद्मासन लगा के बैठसे, नाक के अग्रभाग को देखने से और शास्त्रविरुद्ध अधिक शुद्धि करने से भी योग कभी नहीं होता ॥ ६ ॥ मन्त्र जपने, मौन रहने धूनी लगाने, और अनेक प्रकार के पुण्य करने से और लोक के व्यवहारों में तत्पर रहने, से भी योग नहीं होता ॥ ७ ॥ योग के विचार में तत्परता होने, बार २ लगा तार योग का अभ्यास करने, योग में
भाषार्थसहिता ॥ २९
पुनः पुनश्चनिर्वेदाद्योगः सिद्ध्यतिनान्यथा ॥ ८
आत्मचिन्ताविनोदेन शौचेनक्रीडनेनच ।
सर्वभूतसमत्वेन योगःसिद्ध्यतिनान्यथा ॥ ९ ॥
यश्चाऽऽत्ममिथुनोनित्यमात्मक्रीडस्तथैवच ।
आत्मानन्दस्तुसतत मात्मन्येवसमाहितः ॥ १० ॥
अस्मिन्नेवसुतृप्तश्च संतुष्टोनाऽन्यमानसः ।
आत्मन्येवसुतृप्तस्य योगोभवतिनान्यथा ॥ ११ ॥
सुप्तोऽपियोगयुक्तञ्च जाग्रदेवविशेषतः ।
ईदृक्चेष्टःस्मृतःश्रेष्ठो वरिष्ठोब्रह्मवादिनाम् ॥ १२ ॥
अस्त्वात्मव्यतिरेकेण द्वितीयंनैवपश्यति ।
ब्रह्मभूतःसएवेह दक्षपक्षउदाहृतः ॥ १३ ॥
विषयासक्तचित्तोहि कश्चिद्योगंनविन्दति ।
यत्नेनविषयासक्तिं तस्माद्योगीविवर्जयेत् ॥ १४ ॥
ही अटल श्रद्धा विश्वास होने और बार वार संसार से प्रबल उदासीनता वैराग्य होने से योग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं ॥ ८ ॥ परमात्मा की चिन्ता के आनंद, शौच, अपने आत्मा में ही क्रीड़ा करने और सब प्राणियों में समदृष्टि होने से योग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं ॥९॥ जो नित्य ही आत्म विचार में आनन्दित, आत्मा क्रीड़ा में तत्पर, अपने आत्मा में ही आनन्द मानने वाला और निरंतर एकाग्र चित्त से अपने आपे में रहने वाला ॥ १० ॥ इसी अध्यात्म विचार में सम्यक् तृप्त और मन से संतुष्ट रहे अन्य बात में जिस का मन न लगता हो और आत्मा में ही अच्छे प्रकार तृप्त पुरुष को योग सिद्ध होता है, अन्य था नहीं ॥ ११ ॥ सोता हुआ भी योगी विशेष कर जागता ही है, ऐसी जिस की चेष्टा हो, वही श्रेष्ठ तथा ब्रह्मवादियों में बड़ा है ॥ १२ ॥ जो योगी विद्वान् अपने आत्मा से भिन्न द्वितीय को नहीं देखता अर्थात् सब प्राणियों को एक ब्रह्मात्मरूप अभेद भाव से देखता है वही ब्रह्मरूप दक्ष ऋषि के पक्ष में कहा है ॥ १३ ॥ विषयों में जिसका चित्त आसक्त है, वह कोई भी योग को प्राप्त नहीं होता तिससे योगी पुरुष विषयों की फसावट को बड़े यत्न से छोड़ देवे ॥ १४ ॥
३० दक्षस्मृतिः ॥
विषयेन्द्रियसंयोगं केचिद्योगंवदन्तिवै । अधर्मोधर्मबुद्ध्यातु गृहीतस्तैरपण्डितैः ॥ १५ ॥
आत्मनोमनसश्चैव संयोगन्तुततःपरम् । उत्तानमनसोह्येते केवलंयोगवञ्चिताः ॥ १६ ॥
वृत्तिहीनंमनःकृत्वा क्षेत्रज्ञंपरमात्मनि । एकीकृत्यविमुच्येत योगोऽयंमुख्यउच्यते ॥ १७ ॥
कषायमोहविक्षेप लज्जाशङ्कादिचेतसः । व्यापारास्तुसमाख्यातास्तान्जित्वावशमानयेत् ॥१८॥
कुटुम्बैःपञ्चभिर्ग्रामः षष्ठस्तत्रमहत्तमः । देवासुरैर्मनुष्यैश्च सजंतुर्नैवशक्यते ॥ १९ ॥
मनसैवेन्द्रियाण्यत्र मनश्चात्मनियोजयेत् । सर्वभावविनिर्मुक्तं क्षेत्रज्ञंब्रह्मणिन्यसेत् ॥ २० ॥
बलेनपरराष्ट्राणि गृह्णन्शूरस्तुनोच्यते । जितोयेनेन्द्रियग्रामः सशूरःकथ्यतेबुधैः ॥ २१ ॥
कोई मनुष्य विषय और इन्द्रियों के संयोग को ही योग कहते हैं। उन निर्बुद्धियों ने अधर्म को धर्म बुद्धि से ग्रहण किया जानो ॥१५॥ तथा अन्य कोई लोग आत्मा और मन के संयोग को योग कहते हैं। ये लोग उत्कृष्ट चित्त वाले होने से केवल योग से वञ्चित रहते हैं ॥ १६ ॥ मन को वृत्तियों से हीन निश्चल करके और क्षेत्रज्ञ आत्मा को परमात्मा में एक करके मुक्त हो जाय यह मुख्य योग कहा है ॥ १७ ॥ कषाय (मन की मलिनता) मोह (अविद्या) विक्षेप (चित्त की चञ्चलता) लज्जा और शंका इत्यादि चित्त के व्यापार कहे हैं। उन कषायादि व्यापारों को जीत कर मन को वश में करे ॥ १८ ॥ पांच कुटुम्बों (५ इन्द्रियों) का ग्राम होता है और उस ग्राम में छठा (मन) अत्यन्त बड़ा है उस को देवता मनुष्य और असुर भी जीतने को समर्थ नहीं होते ॥ १९ ॥ इन्द्रियों को मन से रोक कर और मन को आत्मा में युक्त करे और सब भावों (पदार्थों) से रहित क्षेत्रज्ञ आत्मा को ब्रह्म में लीन करे ॥२०॥ जो बल से पराये राज्यों को छीन ले वह शूर नहीं कहाता किन्तु विद्वान् जन उसे ही शूर कहते हैं जिस ने सब इन्द्रियों को जीत लिया है ॥ २१ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ३१
बहिर्मुखानिसर्वाणि कृत्वाचान्तर्मुखानिवै ।
एतद्ध्यानंतथाज्ञानं शेषस्तुग्रन्थविस्तरः ॥ २२ ॥
त्यक्त्वाविषयभोगांस्तु मनानिश्चलताङ्गतम् ।
आत्मशक्तिस्वरूपेण समाधिःपरिकीर्तितः ॥ २३ ॥
चतुर्णांसन्निकर्षेण फलंयत्तदशाश्वतम् ।
द्वयोस्तुसन्निकर्षेण शाश्वतंपदमव्ययम् ॥ २४ ॥
यन्नास्तिसर्वलोकस्य तदस्तीतिविरुद्धयते ।
कथ्यमानंतथान्यस्य हृदयेनावतिष्ठते ॥ २५ ॥
स्वयंवेद्यंचतद्ब्रह्म कुमारीमैथुनंयथा ।
अयोगीनैवजानाति जात्यन्धोहियथाघटम् ॥ २६ ॥
नित्याभ्यसनशीलस्य स्वसंवेद्यंहितद्भवेत् ।
बहिर्मुख (विषयों में लगी) सब इन्द्रियों को अन्तर्मुख (आत्मा में लीन) करके जो योगी रहता है, यही ध्यान और ज्ञान है। बाकी सब ग्रन्थों का विस्तार है ॥ २२ ॥ संसारी विषय भोगों को त्याग कर आत्मा की शक्ति रूप से निश्चय कर निश्चल हुआ जो मन उसे समाधि कहते हैं ॥ २३ ॥ चारो आश्रम के सामान का संग्रह से वा चार आश्रमियों के मेल से जो फल होता है वह अनित्य है और पिछले दो आश्रमी वानप्रस्थ तथा संन्यासी के मेल से सनातन अविनाशी ब्रह्मपद प्राप्त होता है। सब लोगों को जो ब्रह्म नास्ति अभावसा प्रतीत होता है। वह अस्ति शब्द से कहना विरुद्ध पड़ता है इसी से कहा हुआ भी दूसरे के हृदय में नहीं ठहरता अचल विश्वास नहीं जमता ॥ २५ ॥ वह ब्रह्म इस प्रकार स्वयं जानने योग्य है कि जैसे कुमारी का मैथुन (युवति स्त्री को अनुकूल युवा पतिके प्रथम ही संयोग में जो आनन्द होता है वह अकथनीय स्वयं ज्ञेय होता है वैसे ही ब्रह्मज्ञान का आनन्द भी कहने में नहीं आ सकता) और योग मार्ग से हीन पुरुष उस ब्रह्म को इस प्रकार नहीं जानता जैसे जन्मान्ध पुरुष घट के रूप को नहीं देख सकता ॥२६॥
नित्य योगाभ्यास के स्वभाव वाले मनुष्य को अनायास से ब्रह्म स्वयं जानने योग्य होता है। वह सूक्ष्म होने से सनातन पर ब्रह्म अनिर्देश्य (दिखाने
३२ | दक्षस्मृतिः ॥
तत्सूक्ष्मत्वादनिर्देश्यं परंब्रह्मसनातनम् ॥ २७ ॥
बुधास्त्वाभरणंभारं मलमालेपनंतथा ।
मन्यन्तेस्त्रीचमूर्खश्च तदेवबहुमन्यते ॥ २८
सत्वोत्कटाःसुराःसर्वे विषयैश्चवशीकृताः ।
प्रमादिनिक्षुद्रसत्त्वे मनुष्येचात्रकाकथा ॥ २९ ॥
तस्मात्त्यक्तकषायेन कर्तव्यंदण्डधारणम् ।
इतरस्तुनाशक्नोति विषयैरभिभूयते ॥ ३० ॥
नस्थिरंक्षणमप्येकमुदकंचयथोर्मिभिः ।
वाताहतंतथाचित्तं तस्मात्तस्यनविश्वसेत् ॥ ३१ ॥
ब्रह्मचर्यंसदारक्षेद्दष्टधामैथुनंपृथक् ।
स्मरणंकीर्तनंकेलिः प्रेक्षणंगुह्यभाषणम् ॥ ३२ ॥
संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेवच ।
एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्तिमनीषिणः ॥ ३३ ॥
वैणवेनत्रिदण्डेन नत्रिदण्डीतिकथ्यते ।
के अयोग्य नहीं) है ॥२७॥ पण्डित लोग आभूषणों के धारण को बोझा तथा शरीर पर मलिनता का लेपन मानते हैं। स्त्री और मूर्ख लोग आभूषण को ही बहुत उत्तम मानते हैं ॥ २८ प्रबल सत्व गुण वाले सब देवता भी विषयों ने जब अपने वशमें करलिये तब प्रमादी (भूल में पड़े) कम सत्त्व गुण वाले मनुष्यों के कामादि वश होनेका कहना ही क्या है ! ॥ २९ ॥ तिससे जिस ने मन की मलिनता त्यागी हो वह विषयों के साथ युद्ध करने के लिये दंड का धारण करै। जिस ने मन की मलिनता नहीं त्यागी वह दंड धारण के लिये समर्थ नहीं होता, क्योंकि विषय ही उस को दबालेते हैं ॥ ३० ॥ जैसे तरंगों के उठने से जल एक क्षण मात्र भी स्थिर नहीं रहता इसी प्रकार विषय वासनाओं के वायु से चलायमान हुए चित्त का भी अनुचित विषयों में न फंसने का विश्वास न करै ॥ ३१ ॥ आठो प्रकार के मैथुन से ब्रह्मचर्य की सदैव रक्षा करै । सुन्दरी युवति स्त्रियों का स्मरण, कीर्तन (उन के अङ्ग प्रत्यङ्गों का वर्णन करना, क्रीड़ा (स्त्रियों के साथ खेलना) प्रेक्षण (देखना) एकान्त में बातें करना, संकल्प (स्त्री संग का मनोरथ होना) अध्यवसाय (संग करने का दृढ़ निश्चय) क्रिया की सिद्धिअर्थात् साक्षात् संयोग करना यह आठ प्रकार का मैथुन बुद्धिमान् कहते हैं ॥३३॥ बांस के त्रिदण्ड रखने से संन्यासी
भाषार्थसहिता ॥ ३३
अध्यात्मदण्डयुक्तोयः सन्त्रिदण्डीतिकथ्यते ॥ ३४ ॥
वाग्दण्डोऽथमनोदण्डः कर्मदण्डश्चतेत्रयः ।
यस्यैतेतुत्रयोदण्डाः सन्त्रिदण्डीतिकथ्यते ॥ ३५ ॥
त्रिदण्डव्यपदेशेन जीवन्तिबहवोनराः ।
यस्तुब्रह्म नजानाति नत्रिदण्डीहिसस्मृतः ॥ ३६ ॥
नाध्येतव्यंन वक्तव्यं नश्रोतव्यंकथञ्चन ।
एतैः सर्वैःसुसंपन्नोयतिर्भवतिनेतरः ॥ ३७ ॥
पारिव्राज्यंगृहीत्वातु यःस्वधर्मेनतिष्ठति ।
श्वपदेनाङ्कयित्वातं राजाशीघ्रंप्रवासयेत् ॥ ३८ ॥
एकोभिक्षुर्यथोक्तस्तु द्वौभिक्षुमिथुनंस्मृतम् ।
त्रयोग्रामःसमाख्यात ऊर्ध्वंतुनगरायते ॥ ३९ ॥
नगरंहिनकर्त्तव्यं ग्रामोवामिथुनंतथा ।
एतत्त्रयंप्रकुर्वाणः स्वधर्माच्च्यवतेयतिः ॥ ४० ॥
राजवार्त्तादितेषांतु भिक्षावार्त्तापरस्परम् ।
त्रिदण्डी नहीं कहाता किन्तु अध्यात्म विचार से काम क्रोध लोभ को पकड़ के वश में रखने ते त्रिदण्डी कहाता है ॥३४॥ तथा द्वितीय प्रकार यह है कि वाणी, मन, और शरीर को दण्ड के समान पकड़ के वश में रखने से भी संन्यासी त्रिदण्डी कहाता है ॥३५॥ त्रिदण्ड के बहाने से कि हम त्रिदण्डी संन्यासी सर्वमान्य जगद्गुरु हैं ऐसा प्रसिद्ध करते हुए बहुत से साधु जीविका करते हैं परन्तु जो ब्रह्म को नहीं जानता वह त्रिदंडी ( संन्यासी ) नहीं है ॥ ३६ ॥ न पढ़े न उपदेश व्याख्यान करे, न कथा उपदेशादि सुने किन्तु इन से जो युक्त हो वही संन्यासी है अन्य नहीं ॥ ३७ ॥ जो संन्यास लेकर अपने धर्म पर स्थिर न रहे उस के मस्तक पर कुत्ते के पग का दाग देकर शीघ्र ही राजा देश से निकलवा देवे ॥ ३८ ॥ संन्यासी अकेला रहे तो ठीक उचित है दो मिलकर रहे तो मिथुन कहाते हैं । तीन मनुष्यों के संगम को ग्राम कहते हैं इस से अधिकों का संग नगर कहाता है ॥ ३९ ॥ इस से संन्यासी ग्राम नगर दोनों ही को त्यागे और किसी दूसरे को भी साथ न रक्खे दूसरे का साथी होना मिथुन है । इन तीन को जो संन्यासी करता है वह अपने धर्म से पतित हो जाता है ॥४०॥ क्योंकि एक से अधिक दो आदि के मिलने से राजा की अथवा भिक्षा की बातें परस्पर होती हैं ।
३४ दक्षस्मृति ॥
स्नेहपैशुन्यमात्सर्यं सन्निकर्षान्नसंशयः ॥ ४१ ॥
लाभपूजानिमित्तं हि व्याख्यानं शिष्यसंग्रहः ।
एते चान्ये च बहवः प्रपञ्चास्तु तपस्विनाम् ॥ ४२ ॥
ध्यानं शौचं तथा भिक्षा नित्यमेकान्तशीलता ।
भिक्षोश्चत्वारिकर्माणि पञ्चमंनोपपद्यते ॥ ४३ ॥
यस्मिन्देशे वसेद्योगी ध्यानयोगविचक्षणः ।
सोऽपि देशो भवेत्पूतः किं पुनस्तस्य बान्धवाः ॥ ४४ ॥
तपोजपैः कृशीभूत्वा व्याधितावसथार्हणः ।
वृद्धारोगगृहीताश्च ये चान्ये विकलेन्द्रियाः ॥ ४५ ॥
नारुजश्च युवा चैव भिक्षुर्नावसथार्हतः ।
संदूषयति तत्स्थानं वृद्धादीन्पीडयत्यपि ॥ ४६ ॥
नीरुजश्च युवा चैव ब्रह्मचर्याद्विनश्यति ।
प्रेम की बाते, चुगली की चर्चा, निन्दा स्तुति, मत्सरता, ये राज वार्त्तादि कई के मिलने से अवश्य निःसन्देह होती हैं ॥ ४१ ॥ उपदेश व्याख्यान करना कथा सुनाना और बहुत शिष्यों को रखना, इन इत्यादि कामों को संन्यासी लोग धन वस्त्रादि का लाभ और प्रशंसा प्रतिष्ठा होने के लिये करते हैं । सो ऐसे अन्य भी बहुत प्रपञ्च तपस्वी लोगोंको अधोगति में गिराते हैं ॥ ४२ ॥ ध्यान करना, शुद्धि करना, भिक्षा मांगकर खाना, और सब से पृथक् एकान्त में ठहरने का स्वभाव, संन्यासी के ये चार कर्म मुख्य तथा नित्य कर्त्तव्य हैं पांचवां सिद्ध नहीं होता ॥ ४३ ॥ ध्यान योगाभ्यास करने में चतुर योगी संन्यासी जिस देश में बसता है। वह देश भी जब पवित्र होजाता है तब उसके कुटुम्बी लोग पवित्र क्यों न होंगे ? ॥ ४४ ॥ तप तथा जप करनेसे कृश हल्के शरीर वाले होके जो रोगी हो गये हैं वे किसी छये पटे घर में निवास करें। तथा जो वृद्ध हों, रोग से युक्त हों और जो लूले, लंगड़े, अन्धे आदि हो गये हों वेभी किसी घर में बसें ॥ ४५ ॥
जो रोगसे हीन युवा अवस्था का संन्यासी हो वह घर में बसाने योग्य नहीं है। वह उस स्थान को दोष युक्त करता और वृद्ध आदि को दुःख देता है ॥ ४६ ॥ रोग हीन और युवा अवस्था का भिक्षु ब्रह्मचर्य से नष्ट हो जाता
भाषाधर्मसंहिता ॥ ३५
ब्रह्मचर्याद्विनष्टश्च कुलगोत्रंचनाशयेत् ॥ ४७ ॥
वसन्नावसथेभिक्षुर्मैथुनंयदिसेवते ।
तस्यावसथनाशःस्यात्कुलान्यपिनिकृन्तति ॥ ४८ ॥
आश्रमेतुयतिर्यस्य मुहूर्तर्मापविश्रमेत् ।
किंतस्यान्येनधर्मेण कृतकृत्योऽभिजायते ॥ ४९ ॥
संचितंयदगृहस्थेन पापमामरणान्तिकम् ।
निर्दहत्येवतत्सर्वमेकरात्रोषितोयतिः ॥ ५० ॥
अध्वश्रमपरिश्रान्तं यस्तुभोजयतेयतिम् ।
अखिलंभोजितंतेन त्रैलोक्यंसचराचरम् ॥ ५१ ॥
द्वैतंचैवतथाद्वैतं द्वैताद्वैतंतथैवच ।
नद्वैतं नापिचाद्वैत मित्येतत्पारमार्थिकम् ॥ ५२ ॥
नाहंनैवतुसंबंधो ब्रह्मभावेनभावितः ।
ईदृशायांत्ववस्थायामवाप्तं परंमपदम् ॥ ५३ ॥
द्वैतपक्षःसमाख्यातो यद्वै तेतुव्यवस्थिताः ।
है। ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट हुआ अपने कुल और गोत्र को भी नष्ट करदेता है ॥४७॥ किसी के घरमें बसता हुआ संन्यासी यदि मैथुन करे तो-उस घर के स्वामी को और कुलों को जड़मूल से नष्ट करता है ॥ ४८ ॥ जिस के आश्रम में शुद्ध संन्यासी मुहूर्त मात्र दो घड़ी भी विश्राम करे, उसको अन्य धर्म के करने से क्या प्रयोजन है ? क्योंकि वह उस के विश्राम से ही कृतकृत्य हो जाता है ॥ ॥४९॥ अपने देह में गृहस्थ पुरुष ने जो पाप जन्मभर में संचय (इकट्ठा) किया है ॥ उस सब को एक रात भर बसा हुआ भी यति नष्ट कर ही देता है ॥५०॥ मार्ग में चलने के परिश्रम से श्रांत (थके) हुए यति संन्यासी को जो जिमाता है। उस ने जानो चर अचर सब त्रिलोकी को जिमादिया ॥ ५१ ॥ द्वैत ( दो जीव ब्रह्म वा प्रकृति पुरुष को पृथक् २ देखना ), अद्वैत ( केवल एक ब्रह्म को देखना ) द्वैत, अद्वैत, दोनों को संसार परमार्थ भेद से ठीक मानना ये तीन पक्ष हैं। न द्वैत है और न अद्वैत है यही पारमार्थिक ( सच्चा ) ज्ञान है ॥ ५२ ॥ न मैं कोई हूं और न मेरा कुछ है न मेरा किसी से संबंध है किन्तु मैं ब्रह्म रूप हूं ऐसी अवस्था में परम पद प्राप्त होता है ॥ ५३ ॥ जो द्वैत विचार में स्थित हैं उन के लिये द्वैत पक्ष कहा गया है। अद्वैत पक्ष वालों का
३६ दक्षस्मृतिः ॥
अद्वैतानांप्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रस्यनिश्चयः ॥ ५४ ॥
अत्रात्मव्यतिरेकेण द्वितीयंयोनपश्यति ।
अतःशास्त्राण्यधीयन्ते श्रूयन्तेग्रन्थविस्तराः ॥ ५५ ॥
दक्षशास्त्रेयथाप्रोक्तमाश्रमप्रतिपालनम् ।
अधीयन्तेतुयेविप्रास्तेयान्त्यमरलोकताम् ॥ ५६ ॥
इदंतुयःपठेद्भक्त्या श्रृणुयादपियोनरः ।
सपुत्रपौत्रपशुमान् कीर्त्तिंचसमवाप्नुयात् ॥ ५७ ॥
श्रावयित्वात्विदंशास्त्रं श्राद्धकालेऽपियोद्विजः ।
अक्षय्यंभवतित्छ्राद्धं पितॄंश्चैवोपतिष्ठते ॥ ५८ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इति दक्षस्मृतिः समाप्ता ॥
शास्त्रानुसार जैसा निश्चय है उस को कहते हैं ॥ ५४ ॥ इस अद्वैत विषय में जो अपने आत्मा से भिन्न द्वितीय को नहीं देखता इसी से शास्त्रों को पढ़ते और ग्रन्थों के विस्तारों को सुनते हैं ॥ ५५ ॥ दक्ष ऋषि के इस धर्म शास्त्र में कहे आश्रमों के धर्म का प्रतिपालन करते और जो ब्राह्मण इस धर्म शास्त्र को पढ़ते हैं वे देवलोक को प्राप्त होते हैं ॥ ५६ ॥ जो इस शास्त्र को भक्ति से पढ़े अथवा जो अधम वर्ण भी इस को सुने वह मनुष्य पुत्र पौत्र और पशु-ओं वाला होकर कीर्ति को प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥ श्राद्ध के समय इस शास्त्र को जो द्विज सुनाता है। उस का श्राद्ध अक्षय फलदायी होता और पितरों को श्राद्ध का फल प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥
यह दक्षस्मृति के पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥ और यह स्मृति भी समाप्त हुई ॥