अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 571, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ३५
ब्रह्मचर्याद्विनष्टश्च कुलगोत्रंचनाशयेत् ॥ ४७ ॥
वसन्नावसथेभिक्षुर्मैथुनंयदिसेवते ।
तस्यावसथनाशःस्यात्कुलान्यपिनिकृन्तति ॥ ४८ ॥
आश्रमेतुयतिर्यस्य मुहूर्तर्मापविश्रमेत् ।
किंतस्यान्येनधर्मेण कृतकृत्योऽभिजायते ॥ ४९ ॥
संचितंयदगृहस्थेन पापमामरणान्तिकम् ।
निर्दहत्येवतत्सर्वमेकरात्रोषितोयतिः ॥ ५० ॥
अध्वश्रमपरिश्रान्तं यस्तुभोजयतेयतिम् ।
अखिलंभोजितंतेन त्रैलोक्यंसचराचरम् ॥ ५१ ॥
द्वैतंचैवतथाद्वैतं द्वैताद्वैतंतथैवच ।
नद्वैतं नापिचाद्वैत मित्येतत्पारमार्थिकम् ॥ ५२ ॥
नाहंनैवतुसंबंधो ब्रह्मभावेनभावितः ।
ईदृशायांत्ववस्थायामवाप्तं परंमपदम् ॥ ५३ ॥
द्वैतपक्षःसमाख्यातो यद्वै तेतुव्यवस्थिताः ।
है। ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट हुआ अपने कुल और गोत्र को भी नष्ट करदेता है ॥४७॥ किसी के घरमें बसता हुआ संन्यासी यदि मैथुन करे तो-उस घर के स्वामी को और कुलों को जड़मूल से नष्ट करता है ॥ ४८ ॥ जिस के आश्रम में शुद्ध संन्यासी मुहूर्त मात्र दो घड़ी भी विश्राम करे, उसको अन्य धर्म के करने से क्या प्रयोजन है ? क्योंकि वह उस के विश्राम से ही कृतकृत्य हो जाता है ॥ ॥४९॥ अपने देह में गृहस्थ पुरुष ने जो पाप जन्मभर में संचय (इकट्ठा) किया है ॥ उस सब को एक रात भर बसा हुआ भी यति नष्ट कर ही देता है ॥५०॥ मार्ग में चलने के परिश्रम से श्रांत (थके) हुए यति संन्यासी को जो जिमाता है। उस ने जानो चर अचर सब त्रिलोकी को जिमादिया ॥ ५१ ॥ द्वैत ( दो जीव ब्रह्म वा प्रकृति पुरुष को पृथक् २ देखना ), अद्वैत ( केवल एक ब्रह्म को देखना ) द्वैत, अद्वैत, दोनों को संसार परमार्थ भेद से ठीक मानना ये तीन पक्ष हैं। न द्वैत है और न अद्वैत है यही पारमार्थिक ( सच्चा ) ज्ञान है ॥ ५२ ॥ न मैं कोई हूं और न मेरा कुछ है न मेरा किसी से संबंध है किन्तु मैं ब्रह्म रूप हूं ऐसी अवस्था में परम पद प्राप्त होता है ॥ ५३ ॥ जो द्वैत विचार में स्थित हैं उन के लिये द्वैत पक्ष कहा गया है। अद्वैत पक्ष वालों का